भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 771

७६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ८

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
किञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व यावत्कुर्वे विनिर्णयम्।<br>इन्द्रोऽस्तीति न वास्तीति सन्देहो मे हृदि स्थितः॥ २९<br>ततस्त्वां समुपस्थास्ये कृत्वा निश्चयमात्मनि।<br>तावत्क्षमस्व राजेन्द्र सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ३०<br>न हि विज्ञायते शक्रो नष्टः किं वा क्व वा गतः।<br>एवमुक्तः स चेन्द्राण्या नहुषः प्रीतिमानभूत्॥ ३१प्रतीक्षा करें, जबतक मैं यह निर्णय कर लूँ कि मेरे पति इन्द्र जीवित हैं या नहीं; क्योंकि इस बातका मेरे मनमें सन्देह है। मनमें इसका निश्चय करनेके अनन्तर मैं आपकी सेवामें उपस्थित होऊँगी। हे राजेन्द्र! तबतकके लिये क्षमा कीजिये; यह मैं सत्य कह रही हूँ। अभी यह ज्ञात नहीं है कि इन्द्र नष्ट हो गये हैं या कहीं चले गये हैं॥ २८-३० १/२ ॥
व्यसर्जयत्स तां देवीं तथेत्युक्त्वा मुदान्वितः।<br>सा विसृष्टा नृपेणाशु गत्वा प्राह सुरान्सती॥ ३२<br>इन्द्रस्यागमने यत्नं कुरुताद्य कृतोद्यमाः।<br>श्रुत्वा तद्वचनं देवा इन्द्राण्या रसवच्छुचि॥ ३३इन्द्राणीके ऐसा कहनेपर नहुष प्रसन्न हो गया और 'ऐसा ही हो'—यह कहकर उसने उन देवी शचीको प्रसन्नतापूर्वक विदा किया। राजासे मुक्ति पाकर वह पतिव्रता शची शीघ्रतापूर्वक देवताओंके पास जाकर बोली—आपलोग उद्यमशील होकर इन्द्रको ले आनेका प्रयास करें॥ ३१-३२ १/२ ॥
मन्त्रयामासुरेकाग्राः शक्रार्थं नृपसत्तम।<br>ते गत्वा वैष्णवं धाम तुष्टुवुः परमेश्वरम्॥ ३४<br>आदिदेवं जगन्नाथं शरणागतवत्सलम्।<br>ऊचुश्चैनं समुद्विग्ना वाक्यं वाक्यविशारदाः॥ ३५हे नृपश्रेष्ठ! इन्द्राणीका पवित्र और मधुर वचन सुनकर सभी देवताओंने एकाग्र होकर इन्द्रके विषयमें विचार-विमर्श किया। तदनन्तर वे वैकुण्ठलोक जाकर शरणागतवत्सल आदिदेव भगवान् जगन्नाथकी स्तुति करने लगे। उन वाक्पटुविशारद देवताओंने उद्विग्न होकर इस प्रकार कहा— ॥ ३३-३५ ॥
देवदेव सुरपतिर्ब्रह्महत्याप्रपीडितः।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां क्वापि तिष्ठति वासवः॥ ३६<br>त्वद्धिया निहते विप्रे ब्रह्महत्या कुतः प्रभो।<br>त्वं गतिस्तस्य भगवन्नस्माकं च तथैव हि॥ ३७<br>त्राहि नः परमापन्नान्मोक्षं तस्य विनिर्देश।<br>देवानां वचनं श्रुत्वा कातरं विष्णुरब्रवीत्॥ ३८हे देवाधिदेव! ब्रह्महत्यासे पीड़ित देवराज इन्द्र सभी प्राणियोंसे अदृश्य होकर कहीं रह रहे हैं। हे प्रभो! आपके परामर्शसे ही उन्होंने ब्राह्मण वृत्रासुरका वध किया था। तब ब्रह्महत्या कहाँ हुई? हे भगवन्! आप ही उनकी और हम सबकी एकमात्र गति हैं। इस महान् कष्टमें पड़े हुए हम सबकी रक्षा कीजिये और उन इन्द्रके ब्रह्महत्यासे छूटनेका उपाय बताइये॥ ३६-३७ १/२ ॥
यजतामश्वमेधेन शक्रपापनिवृत्तये।<br>पुण्येन हयमेधेन पावितः पाकशासनः॥ ३९<br>पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयः।<br>हयमेधेन सन्तुष्टा देवी श्रीजगदम्बिका॥ ४०<br>ब्रह्महत्यादिपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम्।<br>यस्याः स्मरणमात्रेण पापजालं विनश्यति॥ ४१<br>किं पुनर्वाजिमेधेन तत्प्रीत्यर्थं कृतेन च।<br>इन्द्राणी कुरुतान्नित्यं भगवत्याः प्रपूजनम्॥ ४२देवताओंका करुण वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले—इन्द्रके पापकी निवृत्तिके लिये अश्वमेधयज्ञ कीजिये; अश्वमेध करनेसे प्राप्त पुण्यसे इन्द्र पवित्र हो जायेंगे। इससे वे पुनः देवताओंके इन्द्रत्वको पा जायेंगे, फिर कोई भय नहीं रहेगा। अश्वमेधयज्ञसे भगवती श्रीजगदम्बिका प्रसन्न होकर ब्रह्महत्या आदि पाप निश्चितरूपसे नष्ट कर देंगी। जिनके स्मरणमात्रसे पापोंका समूह नष्ट हो जाता है, उन जगदम्बाकी प्रसन्नताके लिये किये गये अश्वमेधयज्ञका क्या कहना! इन्द्राणी भी नित्य भगवती जगदम्बाकी पूजा