भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 772
अ० ८ ]षष्ठ स्कन्ध७६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आराधनं शिवायास्तु सुखकारि भविष्यति।<br>नहुषोऽपि जगन्मातुर्मायया मोहितः किल॥ ४३<br><br>विनाशं स्वकृतेनाशु गमिष्यत्येनसा सुराः।<br>पावितश्चाश्वमेधेन तुराषाडपि वैभवम्॥ ४४करें; भगवती शिवाकी आराधना सुखकारी होगी। हे देवताओ! नहुष भी जगदम्बिकाकी मायासे मोहित होकर शीघ्र ही अपने किये हुए पापसे अवश्य विनष्ट हो जायगा। अश्वमेधयज्ञसे पवित्र होकर इन्द्र भी शीघ्र ही अपने उत्तम इन्द्रपद और वैभवको प्राप्त करेंगे॥ ३८–४४ १/२॥
प्राप्स्यत्यचिरकालेन स्वमासनमनुत्तमम्।<br>ते तु श्रुत्वा शुभां वाणीं विष्णोरमिततेजसः॥ ४५<br><br>जग्मुस्तं देशमनिशं यत्रास्ते पाकशासनः।<br>तमाश्वास्य सुराः शक्रं बृहस्पतिपुरोगमाः॥ ४६अमित तेजवाले भगवान् विष्णुकी इस शुभ वाणीको सुनकर वे देवगण उस स्थानको चल दिये जहाँ इन्द्र रह रहे थे। बृहस्पतिके नेतृत्वमें देवताओंने इन्द्रको आश्वासन देकर सम्पूर्ण अश्वमेध महायज्ञ सम्पन्न कराया॥ ४५–४६ १/२॥
कारयामासुरखिलं हयमेधं महाक्रतुम्।<br>विभज्य ब्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च॥ ४७<br><br>पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैवाक्षिपद्विभुः।<br>तां विसृज्य च भूतेषु विपापः पाकशासनः॥ ४८<br><br>विज्वरः समभूद् भूयः कालाकाङ्क्षी स्थितो जले।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां पद्मनाले व्यतिष्ठत॥ ४९तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने ब्रह्महत्याको विभाजितकर वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियोंपर फेंक दिया। इस प्रकार उसको प्राणि-पदार्थोंमें विसर्जित करके इन्द्र पापरहित हो गये। सन्तापरहित होनेपर भी इन्द्र अच्छे समयकी प्रतीक्षा करते हुए जलमें ही ठहरे रहे। वहाँ सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहते हुए जलमें वे एक कमलनालमें स्थित रहे॥ ४७–४९॥
देवास्तु निर्गताः स्थाने कृत्वा कार्यं तदद्भुतम्।<br>पौलोमी तु गुरुं प्राह दुःखिता विरहाकुला॥ ५०<br><br>कृतयज्ञोऽपि मे भर्ता किमदृश्यः पुरन्दरः।<br>कथं द्रक्ष्ये प्रियं स्वामिंस्तमुपायं वदस्व मे॥ ५१देवगण उस अद्भुत कार्यको करके अपने स्थानको चले गये। तब शचीने दुःख और वियोगसे व्याकुल होकर देवगुरु बृहस्पतिसे कहा—यज्ञ करनेपर भी मेरे स्वामी इन्द्र क्यों अदृश्य हैं? हे स्वामिन्! मैं अपने प्रियको कैसे देख सकूँगी; आप मुझे उस उपायको बतायें॥ ५०–५१॥
बृहस्पतिरुवाच<br>त्वमाराधय पौलोमि देवीं भगवतीं शिवाम्।<br>दर्शयिष्यति ते नाथं देवी विगतकल्मषम्॥ ५२<br><br>आराधिता जगद्धात्री नहुषं वारयिष्यति।<br>मोहयित्वा नृपं स्थानात्यातयिष्यति चाम्बिका॥ ५३बृहस्पति बोले—हे पौलोमि! तुम देवी भगवती शिवाकी आराधना करो। वे देवी तुम्हारे पापरहित पतिका तुम्हें दर्शन करायेंगी। आराधना करनेपर जगत्का पालन करनेवाली वे भगवती नहुषको शक्तिहीन कर देंगी। वे अम्बिका राजाको मोहित करके उसे उसके स्थानसे गिरा देंगी॥ ५२–५३॥
इत्युक्ता सा तदा तेन पुलोमतनया नृप।<br>जग्राह मन्त्रं विधिवद् गुरोर्देव्याः ससाधनम्॥ ५४हे राजन्! बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर पुलोमापुत्री शचीने देवगुरुसे पूजाविधिसहित देवीका मन्त्र विधिवत् प्राप्त कर लिया॥ ५४॥
विद्यां प्राप्य गुरोर्देवी देवीं श्रीभुवनेश्वरीम्।<br>सम्यगाराधयामास बलिपुष्पार्चनैः शुभैः॥ ५५गुरुसे मन्त्रविद्या प्राप्त करके देवी शचीने बलि, पुष्प आदि शुभ अर्चनोंसे भगवती श्रीभुवनेश्वरीकी सम्यक् आराधना की॥ ५५॥