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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

७६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ८

७६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ८

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
किञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व यावत्कुर्वे विनिर्णयम्।<br>इन्द्रोऽस्तीति न वास्तीति सन्देहो मे हृदि स्थितः॥ २९<br>ततस्त्वां समुपस्थास्ये कृत्वा निश्चयमात्मनि।<br>तावत्क्षमस्व राजेन्द्र सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ३०<br>न हि विज्ञायते शक्रो नष्टः किं वा क्व वा गतः।<br>एवमुक्तः स चेन्द्राण्या नहुषः प्रीतिमानभूत्॥ ३१प्रतीक्षा करें, जबतक मैं यह निर्णय कर लूँ कि मेरे पति इन्द्र जीवित हैं या नहीं; क्योंकि इस बातका मेरे मनमें सन्देह है। मनमें इसका निश्चय करनेके अनन्तर मैं आपकी सेवामें उपस्थित होऊँगी। हे राजेन्द्र! तबतकके लिये क्षमा कीजिये; यह मैं सत्य कह रही हूँ। अभी यह ज्ञात नहीं है कि इन्द्र नष्ट हो गये हैं या कहीं चले गये हैं॥ २८-३० १/२ ॥
व्यसर्जयत्स तां देवीं तथेत्युक्त्वा मुदान्वितः।<br>सा विसृष्टा नृपेणाशु गत्वा प्राह सुरान्सती॥ ३२<br>इन्द्रस्यागमने यत्नं कुरुताद्य कृतोद्यमाः।<br>श्रुत्वा तद्वचनं देवा इन्द्राण्या रसवच्छुचि॥ ३३इन्द्राणीके ऐसा कहनेपर नहुष प्रसन्न हो गया और 'ऐसा ही हो'—यह कहकर उसने उन देवी शचीको प्रसन्नतापूर्वक विदा किया। राजासे मुक्ति पाकर वह पतिव्रता शची शीघ्रतापूर्वक देवताओंके पास जाकर बोली—आपलोग उद्यमशील होकर इन्द्रको ले आनेका प्रयास करें॥ ३१-३२ १/२ ॥
मन्त्रयामासुरेकाग्राः शक्रार्थं नृपसत्तम।<br>ते गत्वा वैष्णवं धाम तुष्टुवुः परमेश्वरम्॥ ३४<br>आदिदेवं जगन्नाथं शरणागतवत्सलम्।<br>ऊचुश्चैनं समुद्विग्ना वाक्यं वाक्यविशारदाः॥ ३५हे नृपश्रेष्ठ! इन्द्राणीका पवित्र और मधुर वचन सुनकर सभी देवताओंने एकाग्र होकर इन्द्रके विषयमें विचार-विमर्श किया। तदनन्तर वे वैकुण्ठलोक जाकर शरणागतवत्सल आदिदेव भगवान् जगन्नाथकी स्तुति करने लगे। उन वाक्पटुविशारद देवताओंने उद्विग्न होकर इस प्रकार कहा— ॥ ३३-३५ ॥
देवदेव सुरपतिर्ब्रह्महत्याप्रपीडितः।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां क्वापि तिष्ठति वासवः॥ ३६<br>त्वद्धिया निहते विप्रे ब्रह्महत्या कुतः प्रभो।<br>त्वं गतिस्तस्य भगवन्नस्माकं च तथैव हि॥ ३७<br>त्राहि नः परमापन्नान्मोक्षं तस्य विनिर्देश।<br>देवानां वचनं श्रुत्वा कातरं विष्णुरब्रवीत्॥ ३८हे देवाधिदेव! ब्रह्महत्यासे पीड़ित देवराज इन्द्र सभी प्राणियोंसे अदृश्य होकर कहीं रह रहे हैं। हे प्रभो! आपके परामर्शसे ही उन्होंने ब्राह्मण वृत्रासुरका वध किया था। तब ब्रह्महत्या कहाँ हुई? हे भगवन्! आप ही उनकी और हम सबकी एकमात्र गति हैं। इस महान् कष्टमें पड़े हुए हम सबकी रक्षा कीजिये और उन इन्द्रके ब्रह्महत्यासे छूटनेका उपाय बताइये॥ ३६-३७ १/२ ॥
यजतामश्वमेधेन शक्रपापनिवृत्तये।<br>पुण्येन हयमेधेन पावितः पाकशासनः॥ ३९<br>पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयः।<br>हयमेधेन सन्तुष्टा देवी श्रीजगदम्बिका॥ ४०<br>ब्रह्महत्यादिपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम्।<br>यस्याः स्मरणमात्रेण पापजालं विनश्यति॥ ४१<br>किं पुनर्वाजिमेधेन तत्प्रीत्यर्थं कृतेन च।<br>इन्द्राणी कुरुतान्नित्यं भगवत्याः प्रपूजनम्॥ ४२देवताओंका करुण वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले—इन्द्रके पापकी निवृत्तिके लिये अश्वमेधयज्ञ कीजिये; अश्वमेध करनेसे प्राप्त पुण्यसे इन्द्र पवित्र हो जायेंगे। इससे वे पुनः देवताओंके इन्द्रत्वको पा जायेंगे, फिर कोई भय नहीं रहेगा। अश्वमेधयज्ञसे भगवती श्रीजगदम्बिका प्रसन्न होकर ब्रह्महत्या आदि पाप निश्चितरूपसे नष्ट कर देंगी। जिनके स्मरणमात्रसे पापोंका समूह नष्ट हो जाता है, उन जगदम्बाकी प्रसन्नताके लिये किये गये अश्वमेधयज्ञका क्या कहना! इन्द्राणी भी नित्य भगवती जगदम्बाकी पूजा
अ० ८ ]षष्ठ स्कन्ध७६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आराधनं शिवायास्तु सुखकारि भविष्यति।<br>नहुषोऽपि जगन्मातुर्मायया मोहितः किल॥ ४३<br><br>विनाशं स्वकृतेनाशु गमिष्यत्येनसा सुराः।<br>पावितश्चाश्वमेधेन तुराषाडपि वैभवम्॥ ४४करें; भगवती शिवाकी आराधना सुखकारी होगी। हे देवताओ! नहुष भी जगदम्बिकाकी मायासे मोहित होकर शीघ्र ही अपने किये हुए पापसे अवश्य विनष्ट हो जायगा। अश्वमेधयज्ञसे पवित्र होकर इन्द्र भी शीघ्र ही अपने उत्तम इन्द्रपद और वैभवको प्राप्त करेंगे॥ ३८–४४ १/२॥
प्राप्स्यत्यचिरकालेन स्वमासनमनुत्तमम्।<br>ते तु श्रुत्वा शुभां वाणीं विष्णोरमिततेजसः॥ ४५<br><br>जग्मुस्तं देशमनिशं यत्रास्ते पाकशासनः।<br>तमाश्वास्य सुराः शक्रं बृहस्पतिपुरोगमाः॥ ४६अमित तेजवाले भगवान् विष्णुकी इस शुभ वाणीको सुनकर वे देवगण उस स्थानको चल दिये जहाँ इन्द्र रह रहे थे। बृहस्पतिके नेतृत्वमें देवताओंने इन्द्रको आश्वासन देकर सम्पूर्ण अश्वमेध महायज्ञ सम्पन्न कराया॥ ४५–४६ १/२॥
कारयामासुरखिलं हयमेधं महाक्रतुम्।<br>विभज्य ब्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च॥ ४७<br><br>पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैवाक्षिपद्विभुः।<br>तां विसृज्य च भूतेषु विपापः पाकशासनः॥ ४८<br><br>विज्वरः समभूद् भूयः कालाकाङ्क्षी स्थितो जले।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां पद्मनाले व्यतिष्ठत॥ ४९तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने ब्रह्महत्याको विभाजितकर वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियोंपर फेंक दिया। इस प्रकार उसको प्राणि-पदार्थोंमें विसर्जित करके इन्द्र पापरहित हो गये। सन्तापरहित होनेपर भी इन्द्र अच्छे समयकी प्रतीक्षा करते हुए जलमें ही ठहरे रहे। वहाँ सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहते हुए जलमें वे एक कमलनालमें स्थित रहे॥ ४७–४९॥
देवास्तु निर्गताः स्थाने कृत्वा कार्यं तदद्भुतम्।<br>पौलोमी तु गुरुं प्राह दुःखिता विरहाकुला॥ ५०<br><br>कृतयज्ञोऽपि मे भर्ता किमदृश्यः पुरन्दरः।<br>कथं द्रक्ष्ये प्रियं स्वामिंस्तमुपायं वदस्व मे॥ ५१देवगण उस अद्भुत कार्यको करके अपने स्थानको चले गये। तब शचीने दुःख और वियोगसे व्याकुल होकर देवगुरु बृहस्पतिसे कहा—यज्ञ करनेपर भी मेरे स्वामी इन्द्र क्यों अदृश्य हैं? हे स्वामिन्! मैं अपने प्रियको कैसे देख सकूँगी; आप मुझे उस उपायको बतायें॥ ५०–५१॥
बृहस्पतिरुवाच<br>त्वमाराधय पौलोमि देवीं भगवतीं शिवाम्।<br>दर्शयिष्यति ते नाथं देवी विगतकल्मषम्॥ ५२<br><br>आराधिता जगद्धात्री नहुषं वारयिष्यति।<br>मोहयित्वा नृपं स्थानात्यातयिष्यति चाम्बिका॥ ५३बृहस्पति बोले—हे पौलोमि! तुम देवी भगवती शिवाकी आराधना करो। वे देवी तुम्हारे पापरहित पतिका तुम्हें दर्शन करायेंगी। आराधना करनेपर जगत्का पालन करनेवाली वे भगवती नहुषको शक्तिहीन कर देंगी। वे अम्बिका राजाको मोहित करके उसे उसके स्थानसे गिरा देंगी॥ ५२–५३॥
इत्युक्ता सा तदा तेन पुलोमतनया नृप।<br>जग्राह मन्त्रं विधिवद् गुरोर्देव्याः ससाधनम्॥ ५४हे राजन्! बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर पुलोमापुत्री शचीने देवगुरुसे पूजाविधिसहित देवीका मन्त्र विधिवत् प्राप्त कर लिया॥ ५४॥
विद्यां प्राप्य गुरोर्देवी देवीं श्रीभुवनेश्वरीम्।<br>सम्यगाराधयामास बलिपुष्पार्चनैः शुभैः॥ ५५गुरुसे मन्त्रविद्या प्राप्त करके देवी शचीने बलि, पुष्प आदि शुभ अर्चनोंसे भगवती श्रीभुवनेश्वरीकी सम्यक् आराधना की॥ ५५॥
७६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८
त्यक्तान्यभोगसम्भारा तापसीवेषधारिणी।<br>चकार पूजनं देव्याः प्रियदर्शनलालसा॥ ५६अपने प्रिय पतिके दर्शनकी लालसासे युक्त शची समस्त भोगोंका त्यागकर तपस्विनीका वेश धारणकर देवीका पूजन करने लगीं॥ ५६॥
कालेन कियता तुष्टा प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।<br>सौम्यरूपधरा देवी वरदा हंसवाहिनी॥ ५७<br><br>सूर्यकोटिप्रतीकाशा चन्द्रकोटिसुशीतला।<br>विद्युत्कोटिसमानाभा चतुर्वेदसमन्विता॥ ५८<br><br>पाशांकुशाभयवरान्दधती निजबाहुभिः।<br>आपादलम्बिनीं स्वच्छां मुक्तामालां च बिभ्रती॥ ५९<br><br>प्रसन्नस्मेरवदना लोचनत्रयभूषिता।<br>आब्रह्मकीटजननी करुणामृतसागरा॥ ६०<br><br>अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिका परमेश्वरी।<br>सौम्यानन्तरसैर्युक्तस्तनद्वयविराजिता ॥ ६१<br><br>सर्वेश्वरी च सर्वज्ञा कूटस्थाक्षररूपिणी।<br>तामुवाच प्रसन्ना सा शक्रपत्नीं कृतोद्यमाम्॥ ६२<br><br>मेघगम्भीरशब्देन मुदमाददती भृशम्।[ आराधना करनेपर] कुछ समय बाद प्रसन्न होकर भगवतीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे वरदायिनी देवी सौम्य रूप धारण किये हुए हंसपर सवार थीं। वे करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, करोड़ों चन्द्रमाओंके समान शीतल, करोड़ों विद्युत्के समान प्रभासे युक्त और चारों वेदोंसे समन्वित थीं। उन्होंने अपनी भुजाओंमें पाश, अंकुश, अभय तथा वर-मुद्राएँ धारण कर रखी थीं, वे चरणोंतक लटकती हुई स्वच्छ मोतियोंकी माला पहने हुए थीं। उनके मुखपर मधुर मुसकान थी और वे तीन नेत्रोंसे सुशोभित थीं। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सभी प्राणियोंकी जननी, करुणारूपी अमृतकी सागरस्वरूपा तथा अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी अधीश्वरी वे परमेश्वरी सौम्य थीं तथा अनन्त रसोंसे आपूरित स्तनयुगलसे सुशोभित हो रही थीं। सबकी अधीश्वरी, सब कुछ जाननेवाली, कूटस्थ और बीजाक्षरस्वरूपिणी वे भगवती उद्यमशील इन्द्रपत्नी शचीसे प्रसन्न होकर मेघके समान अत्यन्त गम्भीर वाणीके द्वारा उन्हें परम हर्षित करती हुई कहने लगीं॥ ५७—६२ १/२॥
देव्युवाच<br>वरं वरय सुश्रोणि वाञ्छितं शक्रवल्लभे॥ ६३<br><br>ददाम्यद्य प्रसन्नास्मि पूजिता सुभृशं त्वया।<br>वरदाहं समायाता दर्शनं सहजं न मे॥ ६४<br><br>अनेककोटिजन्मोत्थपुण्यपुञ्जैर्र्हि लभ्यते।देवी बोलीं— हे सुन्दर कटिप्रदेशवाली इन्द्रप्रिये! अपना अभिलषित वर माँगो, तुम्हारे द्वारा सम्यक् प्रकारसे पूजित मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ, मैं तुम्हें आज वरदान दूँगी। मैं वर प्रदान करनेके लिये आयी हूँ; मेरा दर्शन सहज सुलभ नहीं है। करोड़ों जन्मोंकी संचित पुण्यराशिसे ही यह प्राप्त होता है॥ ६३-६४ १/२॥
इत्युक्ता सा तदा देवी तामाह प्रणता पुरः॥ ६५<br><br>शक्रपत्नी भगवतीं प्रसन्नां परमेश्वरीम्।<br>वाञ्छामि दर्शनं मातः पत्युः परमदुर्लभम्॥ ६६<br><br>नहुषाद्भयनाशं च स्वपदप्रापणं तथा।उनके ऐसा कहनेपर इन्द्रपत्नी देवी शचीने सम्मुख स्थित होकर उन प्रसन्न भगवती परमेश्वरीसे विनतभावसे कहा—हे माता! मैं अपने पतिका अत्यन्त दुर्लभ दर्शन, नहुषसे उत्पन्न भयका नाश और अपने पदकी पुनः प्राप्ति चाहती हूँ॥ ६५-६६ १/२॥
देव्युवाच<br>गच्छ त्वमनया दूत्या सार्धं श्रीमानसं सरः॥ ६७<br><br>यत्र मे मूर्तिरचला विश्वकामाभिधा मता।<br>तत्र पश्यसि शक्रं त्वं दुःखितं भयविह्वलम्॥ ६८<br><br>मोहयिष्यामि राजानं कालेन कियता पुनः।देवी बोलीं— तुम [मेरी] इस दूतीके साथ मानसरोवर चली जाओ, जहाँ मेरी विश्वकामा नामक अचल मूर्ति प्रतिष्ठित है, वहीं तुम्हें भयभीत और दुःखी इन्द्रके दर्शन हो जायेंगे। कुछ समय बाद मैं पुनः राजाको मोहित करूँगी। हे विशालाक्षि! तुम

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे

अ० ९ ]षष्ठ स्कन्ध७६५

| स्वस्था भव विशालाक्षि करोमि तव चेप्सितम्॥ ६९ <br><br> भ्रंशयिष्यामि भूपालं मोहितं त्रिदशासनात्। | शान्तचित्त हो जाओ, मैं तुम्हारा अभिलषित कार्य करूँगी। मैं मोहग्रस्त राजा [नहुष]-को इन्द्रपदसे गिरा दूँगी॥ ६७—६९ १/२॥ | | व्यास उवाच <br> देवीदूती तां गृहीत्वा शक्रपत्नीं त्वरान्विता॥ ७० <br><br> प्रापयामास सान्निध्यं स्वपत्युः परमेश्वरीम्। <br> सा दृष्ट्वा तं पतिं बाला सुरेशं गुप्तसंस्थितम्। <br> मुदिताभूद्वरं वीक्ष्य बहुकालाभिवाञ्छितम्॥ ७१ | व्यासजी बोले—तदनन्तर परमेश्वरी इन्द्रपत्नीको ले जाकर देवीकी दूतीने शीघ्रतापूर्वक उनके पति इन्द्रके पास पहुँचा दिया। गुप्तरूपसे रहते हुए अपने पति उन देवराज इन्द्रको देखकर और इस प्रकार चिरकालसे वांछित अपने वरकी प्राप्ति करके वे शची अत्यन्त प्रसन्न हुई॥ ७०-७१॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
इन्द्राण्या शक्रदर्शनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥


अथ नवमोऽध्यायः

शचीका इन्द्रसे अपना दुःख कहना, इन्द्रका शचीको सलाह देना कि वह नहुषसे ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें आनेको कहे, नहुषका ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें सवार होना और शापित होकर सर्प होना तथा इन्द्रका पुनः स्वर्गाधिपति बनना

व्यास उवाच <br> तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं रहः शोकसमान्विताम्। <br> आखण्डलः प्रियां भार्यां विस्मितश्चाब्रवीत्तदा॥ १व्यासजी बोले—विशाल नेत्रोंवाली अपनी शोकाकुल प्रिय पत्नीको वहाँ एकान्तमें देखकर इन्द्र आश्चर्यचकित हो गये और बोले—॥ १॥
कथमत्रागता कान्ते कथं ज्ञातस्त्वया ह्यहम्। <br> दुर्ज्ञेयः सर्वभूतानां संस्थितोऽस्मि शुभानने॥ २हे प्रिये! तुम यहाँ कैसे आयी? तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ कि मैं यहाँ हूँ? हे शुभानने! मैं सभी प्राणियोंसे अज्ञात रहते हुए यहाँ निवास कर रहा हूँ॥ २॥
शच्युवाच <br> देव देव्याः प्रसादेन ज्ञातोऽस्यद्य भवानिह। <br> पुनस्तस्याः प्रसादेन प्राप्तास्मि त्वां दिवस्पते॥ ३शची बोली—हे देव! देवी भगवतीकी कृपासे आप आज मुझे यहाँ ज्ञात हुए हैं। हे देवेन्द्र! उन्हींकी कृपासे मैं आपको पुनः प्राप्त कर सकी हूँ॥ ३॥
नहुषो नाम राजर्षिः स्थापितो भवदासने। <br> त्रिदशैर्मुनिभिश्चैव स मां बाधति नित्यशः॥ ४ <br><br> पतिं मां कुरु चार्वङ्गि तुरासाहं सुराधिपम्। <br> एवं वदति मां पाप्मा किं करोमि बलार्दन॥ ५देवताओं और मुनियोंने नहुष नामक राजर्षिको आपके आसनपर बैठा दिया है; वह मुझे नित्य कष्ट देता है। वह पापी मुझसे इस प्रकार कहता है—हे सुन्दरि! मुझ देवराज इन्द्रको अपना पति बना लो। हे बलार्दन! अब मैं क्या करूँ?॥ ४-५॥
इन्द्र उवाच <br> कालाकाङ्क्षी वरारोहे संस्थितोऽस्मि यदृच्छया। <br> तथा त्वमपि कल्याणि सुस्थिरं स्वमनः कुरु॥ ६इन्द्र बोले—हे वरारोहे! हे कल्याणि! जिस प्रकार मैं [अनुकूल] समयकी प्रतीक्षा करते हुए प्रारब्धवश यहाँ रह रहा हूँ, वैसे ही तुम भी अपने मनको पूर्णरूपसे स्थिर करो॥ ६॥
७६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९

| व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**अपने परम आदरणीय पतिके ऐसा कहनेपर लम्बी साँसें खींचती तथा काँपती हुई वे शची अत्यन्त दुःखित होकर इन्द्रसे कहने लगीं—॥ ७॥ | | इत्युक्ता तेन सा देवी पतिनातिप्रशंसिना।<br>निःश्वसन्त्याह तं शक्रं वेपमानातिदुःखिता॥ ७ | | | कथं तिष्ठे महाभाग पापात्मा मां वशानुगाम्।<br>करिष्यति मदोन्मत्तो वरदानेन गर्वितः॥ ८<br>देवाश्च मुनयः सर्वे मामूचुस्तद्भयाकुलाः।<br>तं भजस्व वरारोहे देवराजं स्मरातुरम्॥ ९ | हे महाभाग! मैं कैसे रहूँ? वरदानके द्वारा मदोन्मत्त और अहंकारी बना हुआ वह पापात्मा मुझे अपने वशमें कर लेगा। उससे भयभीत सभी देवताओं और मुनियोंने मुझसे कहा—हे वरारोहे! तुम उस कामातुर देवराजको अंगीकार कर लो॥ ८-९॥ | | बृहस्पतिस्तु शत्रुघ्न वाडवो बलवर्जितः।<br>कथं मां रक्षितुं शक्तो भवेद्देवानुगः सदा॥ १० | हे शत्रुसूदन! बृहस्पति भी निर्बल ब्राह्मण हैं; वे मेरी रक्षा करनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं; क्योंकि वे भी तो सदा देवताओंके ही अनुगामी हैं॥ १०॥ | | तस्माच्चिन्तास्ति महती नार्यहं वशवर्तिनी।<br>अनाथा किं करिष्यामि विपरीते विधौ विभो॥ ११ | अतः हे विभो! मैं वशवर्तिनी नारी हूँ, मुझे यह महान् चिन्ता है कि भाग्यकी इस विपरीत अवस्थामें मैं अनाथ क्या करूँगी?॥ ११॥ | | नार्यस्म्यहं न कुलटा त्वच्चित्तातितिव्रता।<br>नास्ति मे शरणं तत्र यो मां रक्षति दुःखिताम्॥ १२ | मैं कुलटा नहीं हूँ अपितु आपका ही ध्यान करनेवाली पतिव्रता स्त्री हूँ। वहाँ मेरे लिये ऐसा कोई शरण नहीं है, जो मुझ दुःखितकी रक्षा करे॥ १२॥ | | इन्द्र उवाच | **इन्द्र बोले—**हे वरानने! मैं एक उपाय बताता हूँ, तुम उसे इस समय करो। इससे दुःखके समयमें तुम्हारे शीलकी रक्षा हो जायगी॥ १३॥ | | उपायं प्रब्रवीम्यद्य तं कुरुष्व वरानने।<br>शीलं ते दुःखिते काले परित्रातं भविष्यति॥ १३ | | | परेण रक्षिता नारी न भवेच्च पतिव्रता।<br>उपायैः कोटिभिः कामभिन्नचित्तातिचञ्चला॥ १४ | करोड़ों उपाय करनेपर भी दूसरेके द्वारा रक्षित स्त्री पतिव्रता नहीं रह सकती; क्योंकि वह कामसे विचलित मनवाली तथा अत्यन्त चंचल होती है॥ १४॥ | | शीलमेव हि नारीणां सदा रक्षति पापतः।<br>तस्मात्त्वं शीलमास्थाय स्थिरा भव शुचिस्मिते॥ १५ | स्त्रियोंका शील ही पापसे इनकी रक्षा करता है। इसलिये हे पवित्र मुसकानवाली! तुम शीलका आश्रय लेकर धैर्य धारण करो॥ १५॥ | | यदा त्वां नहुषो राजा बलादाकर्षयेत्खलः।<br>तदा त्वं समयं कृत्वा गुप्तं वञ्चय भूपतिम्॥ १६<br>एकान्ते तत्समीपे त्वं गत्वा वद मदालसे।<br>ऋषियानेन दिव्येन मामुपैहि जगत्पते॥ १७<br>एवं तव वशे प्रीता भविष्यामीति मे व्रतम्।<br>इति तं वद सुश्रोणि तदा तु परमोहितः॥ १८<br>कामान्धः स मुनीन् याने योजयिष्यति पार्थिवः।<br>अवश्यं तापसो भूपं शापदग्धं करिष्यति॥ १९ | जब दुष्ट राजा नहुष तुम्हें बलपूर्वक प्राप्त करनेकी चेष्टा करे तब तुम गुप्त प्रतिज्ञा करके राजाको धोखेमें डाल देना। हे मदालसे! तुम एकान्तमें उसके समीप जाकर कहो—हे जगत्पते! आप ऋषियोंके द्वारा वहन किये जानेवाले दिव्य वाहनसे मेरे पास आयें, ऐसा होनेपर मैं प्रेमपूर्वक आपके वशमें हो जाऊँगी—यह मेरी प्रतिज्ञा है। हे सुश्रोणि! तुम उससे ऐसा बोलना, तब मोहित और कामान्ध वह राजा मुनियोंको अपने वाहनमें लगायेगा; इससे तपस्वी अवश्य ही नहुषको शापसे दग्ध कर देंगे॥ १६—१९॥ |

अ० ९ ]षष्ठ स्कन्ध७६७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
साहाय्यं जगदम्बा ते करिष्यति न संशयः।<br>जगदम्बापदस्मर्तुः सङ्कटं न कदाचन॥ २०<br>यदि जायेत तच्चापि ज्ञेयं तत्स्वस्तये किल।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मणिद्वीपाधिवासिनीम्॥ २१<br>भज त्वं भुवनेशानीं गुरुवाक्यानुसारतः।भगवती जगदम्बा तुम्हारी सहायता करेंगी; इसमें सन्देह नहीं है। भगवती जगदम्बाके चरणोंका स्मरण करनेवालेको कभी संकट नहीं होता। यदि संकट उत्पन्न भी हो जाय तो उसे भी अपने कल्याणके लिये ही समझना चाहिये। अतः तुम गुरु बृहस्पतिके कथनानुसार पूर्ण प्रयत्नसे मणिद्वीपवासिनी भगवती भुवनेश्वरीका भजन करो॥ २०-२१ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्याख्याता शची तेन जगाम नहुषं प्रति॥ २२<br>तथेत्युक्त्वातिविश्वस्ता भाविकार्ये कृतोद्यमा।<br>नहुषस्तां समालोक्य मुदितो वाक्यमब्रवीत्॥ २३<br>स्वागतं सत्यवचनैस्त्वदधीनोऽस्मि कामिनि।<br>दासोऽहं तव सत्येन पालितं वचनं त्वया॥ २४<br>यदागता समीपे मे तुष्टोऽस्मि मितभाषिणि।<br>न च व्रीडा त्वया कार्या भक्तं मां भज सुस्मिते॥ २५<br>कार्यं वद विशालाक्षि करिष्यामि तव प्रियम्।व्यासजी बोले—उनके ऐसा कहनेपर ‘वैसा ही होगा’—यह कहकर अत्यन्त विश्वस्त तथा भावी कार्यके प्रति प्रयत्नशील शची नहुषके पास गयीं। नहुष उन्हें देखकर प्रसन्न होता हुआ यह वचन बोला—हे कामिनि! तुम्हारा स्वागत है, मैं तुम्हारे सत्य वचनोंके कारण तुम्हारे अधीन हूँ। तुमने अपने वचनका सत्यतापूर्वक पालन किया, इसलिये मैं तुम्हारा दास हो गया हूँ। हे मितभाषिणि! तुम जब मेरे समीप आ गयी हो तो मैं सन्तुष्ट हो गया हूँ। तुम्हें अब लज्जा नहीं करनी चाहिये। हे सुन्दर मुसकानवाली! मुझ अनुरक्तको अंगीकार करो। हे विशाल नेत्रोंवाली! अपना कार्य बताओ; मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा॥ २२—२५ १/२॥
शच्युवाच<br>सर्वं कृतं त्वया कार्यं मम कृत्रिमवासव॥ २६<br>मनोरथोऽस्ति मे देव शृणु चित्तेऽधुना विभो।<br>वाञ्छितं कुरु कल्याण त्वद्वशाहमतः परम्॥ २७<br>ब्रवीमि मानसोत्साहं त्वं तं कर्तुमिहार्हसि।शची बोलीं—हे कृत्रिम वासव! आपने मेरा सम्पूर्ण कार्य कर दिया है। हे देव! हे विभो! इस समय मेरे मनमें एक अभिलाषा है, उसे आप सुनें। हे कल्याण! मेरा मनोरथ पूर्ण कर दीजिये; इसके बाद मैं आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी, मैं बड़े उत्साहसे अपना मनोरथ कह रही हूँ, आप उसे पूरा करनेमें समर्थ हैं॥ २६-२७ १/२॥
नहुष उवाच<br>कार्यं त्वं ब्रूहि चन्द्रास्ये करोमि तव वाञ्छितम्॥ २८<br>अलभ्यमपि दास्यामि तुभ्यं सुभ्रु वदस्व माम्।नहुष बोला—हे चन्द्रमुखि! तुम अपना कार्य बताओ, मैं तुम्हारा अभिलाषित कार्य करता हूँ। हे सुभ्रु! यदि अलभ्य वस्तु होगी तो भी मैं तुम्हें दूँगा; मुझे बताओ॥ २८ १/२॥
शच्युवाच<br>कथं ब्रवीमि राजेन्द्र प्रत्ययो नास्ति मे तव॥ २९<br>शपथं कुरु राजेन्द्र यत्करोमि प्रियं तव।<br>राजानः सत्यवचसो दुर्लभा एव भूतले॥ ३०शची बोलीं—हे राजेन्द्र! मैं कैसे बताऊँ, मुझे आपका विश्वास नहीं है। हे राजेन्द्र! आप शपथ लें कि मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा; क्योंकि पृथ्वीतलपर सत्यवादी राजा दुर्लभ हैं। हे राजन्! आपको सत्यसे बँधा जाननेके बाद ही मैं अपना अभिलाषित बताऊँगी।
७६८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९

| पश्चाद् ब्रवीम्यहं राजन् ज्ञात्वा सत्येन यन्त्रितम्।<br>कृते चेद्वाञ्छिते भूप सदा ते वशवर्तिनी ॥ ३१<br>भविष्यामि तुराषाड् वै सत्यमेतद्वचो मम।<br><br>नहुष उवाच<br>अवश्यमेव कर्तव्यं वचनं तव सुन्दरि ॥ ३२<br>शपामि सुकृतेनाहं यज्ञदानकृतेन वै।<br><br>शच्युवाच<br>इन्द्रस्य हरयो वाहा गजश्चैव रथस्तथा ॥ ३३<br>गरुडो वासुदेवस्य यमस्य महिषस्तथा।<br>वृषभः शङ्करस्यापि ब्रह्मणो वरटापतिः ॥ ३४<br>मयूरः कार्तिकेयस्य गजास्यस्य तु मूषकः।<br>इच्छाम्यहमपूर्वं वै वाहनं ते सुराधिप ॥ ३५<br>यन्न विष्णोर्न रुद्रस्य नासुराणां न रक्षसाम्।<br>वहन्तु त्वां महाराज मुनयः संशितव्रताः ॥ ३६<br>सर्वे शिबिकया राजन्नेतद्धि मम वाञ्छितम्।<br>सर्वदेवाधिकं त्वां वै जानामि वसुधाधिप ॥ ३७<br>तेन ते तेजसो वृद्धिं वाञ्छाम्यहमतन्द्रिता।<br><br>व्यास उवाच<br>तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा प्रहस्य ज्ञानदुर्बलः ॥ ३८<br>मोहितस्तु महादेव्या कृतमोहेन तत्क्षणम्।<br>उवाच वचनं भूपः संस्तुवन्वासवप्रियाम् ॥ ३९<br><br>नहुष उवाच<br>सत्यमुक्तं त्वया तन्वि वाहनं रुचिरं मम।<br>करिष्यामि सुकेशान्ते वचनं तव सर्वथा ॥ ४०<br>न ह्यल्पवीर्यो भवति यो वाहान्कुरुते मुनीन्।<br>अहमारुह्य यानेन त्वामेष्यामि शुचिस्मिते ॥ ४१<br>सप्तर्षयो मां वक्ष्यन्ति सर्वे देवर्षयस्तथा।<br>समर्थं त्रिषु लोकेषु ज्ञात्वा मां तपसाधिकम् ॥ ४२<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा तां सुसन्तुष्टो विससर्ज हरिप्रियाम्।<br>मुनीनाहूय सर्वांस्तानित्युवाच स्मरान्वितः ॥ ४३ | हे राजन्! मेरी उस अभिलाषाको पूर्ण कर देनेपर मैं सदाके लिये आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी। हे इन्द्र! यह मेरा सत्यवचन है॥ २९-३१½॥<br><br>**नहुष बोला—**हे सुन्दरि! मैं यज्ञ, दान आदि कृत्योंसे संचित पुण्यकी शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं तुम्हारे वचनका अवश्य पालन करूँगा॥ ३२½॥<br><br>**शची बोलीं—**इन्द्रके वाहन अश्व, गज और रथ हैं। भगवान् विष्णुका वाहन गरुड़, यमराजका वाहन महिष, शिवका वाहन वृषभ, ब्रह्माका वाहन हंस, कार्तिकेयका वाहन मयूर और गजाननका वाहन मूषक है। हे सुराधिप! मैं चाहती हूँ कि आपका वाहन ऐसा विलक्षण हो जो विष्णु, रुद्र, असुरों तथा राक्षसोंके भी पास न हो ॥ ३३-३५½॥<br>हे महाराज! अपने व्रतमें अटल रहनेवाले समस्त मुनिगण शिबिका (पालकी)-में आपको ढोयें—हे राजन्! यही मेरी इच्छा है। हे पृथ्वीपते! मैं आपको सभी देवताओंसे महान् समझती हूँ; इसीलिये मैं सावधान रहती हुई आपके तेजकी वृद्धि चाहती हूँ॥ ३६-३७½॥<br><br>**व्यासजी बोले—**उनकी यह बात सुनकर महादेवीद्वारा प्रकट किये गये मोहसे मोहित हुआ बुद्धिहीन राजा नहुष हँसकर इन्द्रप्रिया शचीको सन्तुष्ट करते हुए यह वचन कहने लगा— ॥ ३८-३९॥<br><br>**नहुष बोला—**हे तन्वंगि! तुमने सत्य ही कहा है, यह वाहन मुझे भी रुचिकर है। हे सुन्दर केशपाशवाली! मैं तुम्हारे वचनोंका सम्यक् रूपसे पालन करूँगा॥ ४०॥<br>हे पवित्र मुसकानवाली! जो अल्प पराक्रमवाला होता है, वही ऋषियोंको पालकी ढोनेमें नहीं लगा सकता; मैं [तुम्हारी इच्छाके अनुसार] वाहनपर आरूढ़ होकर तुम्हारे पास आऊँगा॥ ४१॥<br>मुझे तीनों लोकोंमें सबसे बड़ा तपस्वी और समर्थ जानकर सप्तर्षि तथा सभी देवर्षि मेरा वहन करेंगे॥ ४२॥<br><br>**व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर परम सन्तुष्ट उस नहुषने उन इन्द्रप्रिया शचीको विदा किया, इसके बाद सभी मुनियोंको बुलाकर वह कामातुर उनसे इस प्रकार कहने लगा— ॥ ४३॥ |

अ० ९]षष्ठ स्कन्ध७६१
नहुष उवाचनहुष बोला—
अहमिन्द्रोऽद्य भो विप्राः सर्वशक्तिसमन्वितः।<br>कार्यमत्र प्रकुर्वन्तु भवन्तो विगतस्मयाः॥ ४४हे विप्रगण! मैं आज सर्वशक्तिसम्पन्न इन्द्र हूँ। आपलोग गर्वरहित होकर मेरा कार्य करें॥ ४४॥
इन्द्रासनं मया प्राप्तं नेन्द्राणी मामुपैति च।<br>आकारिता च मां ब्रूते प्रेमपूर्वमिदं वचः॥ ४५<br><br>मुनियानेन देवेन्द्र मामुपैहि सुराधिप।<br>देवदेव महाराज मत्प्रियं कुरु मानद॥ ४६इन्द्रपद मुझे प्राप्त हो गया है, परंतु इन्द्राणी अभी मुझे नहीं प्राप्त हो सकी हैं। उन्होंने मेरे पास आकर प्रेमपूर्वक यह बात कही है—'हे सुरेन्द्र! हे सुराधिप! मुनियोंद्वारा ढोयी जानेवाली पालकीसे आप मेरे पास आयें। हे देवाधिदेव! हे महाराज! हे मानद! आप मेरा यह प्रिय कार्य करें'॥ ४५-४६॥
एतत्कार्यं मुनिश्रेष्ठा ममात्यन्तं दुरासदम्।<br>भवद्भिरस्तु प्रकर्तव्यं सर्वथैव दयालुभिः॥ ४७<br><br>मनो दहति मे कामः शक्रपत्न्यां प्रवर्तितम्।<br>भवन्तः शरणं मेऽद्य कुरुध्वं कार्यमद्भुतम्॥ ४८हे श्रेष्ठ मुनिगण! मेरा यह कार्य अत्यन्त दुष्कर है, परंतु आप सब दयालुओेंको मेरा यह कार्य अवश्य करना चाहिये। इन्द्रपत्नी शचीमें अत्यन्त आसक्त मेरे मनको काम जला रहा है, मैं आप सबकी शरणमें हूँ। अतः मेरे इस महान् कार्यको सम्पन्न करें॥ ४७-४८॥
अगस्तिप्रमुखास्तस्य श्रुत्वा वाक्यमसत्करम्।<br>अङ्गीचक्रुश्च भावित्वात्कृपया परमर्षयः॥ ४९अगस्त्य आदि प्रमुख ऋषियोंने उसकी यह अनादरपूर्ण बात सुनकर भावीवश उसे कृपापूर्वक स्वीकार कर लिया॥ ४९॥
अङ्गीकृतेऽथ तद्वाक्ये मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>मुदं प्राप नृपः कामं पौलोमीकृतमानसः॥ ५०उन तत्त्वदर्शी मुनियोंके द्वारा उस वचनके स्वीकार कर लिये जानेपर शचीके प्रति आसक्तचित्तवाला राजा नहुष प्रसन्न हो गया॥ ५०॥
आरुह्य शिबिकां रम्यां संस्थितस्त्वरयान्वितः।<br>वाहान्कृत्वा मुनीन्दिव्यान्सर्प सर्पेति चाब्रवीत्॥ ५१वह तुरंत एक सुन्दर पालकीपर चढ़कर उसमें बैठ गया और दिव्य मुनियोंको उसे ढोनेके लिये नियुक्तकर उन्हें ‘सर्प-सर्प’ (शीघ्र चलो-शीघ्र चलो) ऐसा कहने लगा॥ ५१॥
कामार्तः सोऽस्पृशन्मूढः पादेन मुनिमस्तकम्।<br>अगस्तिं तापसश्रेष्ठं लोपामुद्रापतिं तदा॥ ५२<br><br>वातापिभक्षकतारं समुद्रस्यापि शोषकम्।<br>कशया ताडयामास पञ्चबाणशराहतः॥ ५३उस कामातुर मूर्खने मुनि अगस्तिके मस्तकका पैरसे स्पर्श कर दिया। कामबाणसे आहत तथा इन्द्राणीके द्वारा आकृष्टचित्तवाले उस राजा नहुषने शीघ्र चलो—ऐसा कहते हुए वातापि नामक राक्षसका भक्षण करनेवाले तथा समुद्रको भी पी जानेवाले उन तपस्विश्रेष्ठ लोपामुद्रापति मुनि अगस्तिपर कोड़ेसे प्रहार भी किया॥ ५२-५३ १/२॥
इन्द्राणीहृतचित्तोऽसौ सर्पेति प्रब्रुवन्मुनिम्।<br>तं शशाप मुनिः क्रुद्धः कशाघातमनुस्मरन्॥ ५४<br><br>सर्पो भव दुराचार वने घोरवपुर्महान्।<br>बहुवर्षसहस्राणि यत्र क्लेशो महान्भवेत्॥ ५५तब उस कोड़ेके आघातका स्मरण करते हुए मुनिने उसे यह शाप दे दिया। हे दुराचारी! तुम वनमें भयंकर शरीरवाले विशाल सर्प हो जाओ, जहाँ तुम्हें हजारों वर्षोंतक बहुत कष्ट भोगते हुए विचरण करना पड़ेगा और अपने प्रभावसे तुम पुनः स्वर्ग प्राप्त

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 25 A

| ७७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- |

| विचरिष्यसि वीर्येण पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि।<br>दृष्ट्वा युधिष्ठिरं नाम तव मोक्षो भविष्यति॥ ५६<br>प्रश्नानामुत्तरं श्रुत्वा धर्मपुत्रमुखात्ततः। | करोगे। युधिष्ठिर नामवाले धर्मपुत्रका दर्शनकर और उनके मुखसे अपने प्रश्नोंके उत्तर सुनकर तुम्हारी मुक्ति हो जायगी॥ ५४–५६ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>एवं शप्तः स राजर्षिः स्तुत्वा तं मुनिसत्तमम्॥ ५७<br>स्वर्गात्पपात सहसा सर्परूपधरोऽभवत्। | **व्यासजी बोले—**इस प्रकार शाप प्राप्तकर राजर्षि नहुष उन मुनिश्रेष्ठकी स्तुति करके अचानक स्वर्गसे गिर पड़ा और सर्परूपधारी हो गया॥ ५७ १/२॥ | | बृहस्पतिस्ततो गत्वा तरसा मानसं प्रति॥ ५८<br>इन्द्राय सर्ववृत्तान्तं कथयामास विस्तरात्।<br>तच्छ्रुत्वा मघवा राज्ञः स्वर्गात्प्रच्यवनादिकम्॥ ५९<br>मुदितोऽभून्महाराज स्थितस्तत्रैव वासवः।<br>देवाश्च मुनयो दृष्ट्वा नहुषं पतितं भुवि॥ ६०<br>जग्मुः सर्वेऽपि तत्रैव यत्रेन्द्रः सरसि स्थितः। | तब बृहस्पतिने शीघ्रतापूर्वक मानसरोवर जाकर इन्द्रसे सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कहा। हे महाराज (जनमेजय)! राजा नहुषके स्वर्गसे पतन आदिकी बात सुनकर इन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। वे इन्द्र अब भी वहींपर स्थित रहे। सभी देवता और मुनि नहुषको पृथ्वीपर गिरा देखकर उसी सरोवरके पास गये, जहाँ इन्द्र रहते थे॥ ५८–६० १/२॥ | | तमाश्वास्य सुराः सर्वे मुनिभिः सहितास्तदा॥ ६१<br>स्वर्गे समानयामासुर्मानपूर्वं शचीपतिम्।<br>समागतं ततः शक्रं सर्वे ते मुनयः सुराः॥ ६२<br>स्थापयित्वासने पश्चादभिषेकं दधुः शिवम्।<br>इन्द्रोऽपि स्वासनं प्राप्य शच्या सह सुरालये॥ ६३<br>चिक्रीड नन्दने रम्ये कानने प्रेमयुक्तया। | तत्पश्चात् उन शचीपति इन्द्रको आश्वासन देकर मुनियोंसहित सभी देवता उन्हें सम्मानपूर्वक स्वर्ग ले आये। तदनन्तर वापस आये हुए उन इन्द्रको सभी मुनियों और देवताओंने आसनपर स्थापित करके उनका पवित्र अभिषेक किया। इन्द्र भी अपने पदको प्राप्तकर प्रेमयुक्त शचीके साथ देवप्रासाद और मनोहर नन्दनवनमें क्रीड़ा करने लगे॥ ६१–६३ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>एवमिन्द्रेण सम्प्राप्तं दुःखं परमदारुणम्॥ ६४<br>हत्वासुरं कामरूपं विश्वरूपं महामुनिम्।<br>पुनर्देव्याः प्रसादेन स्वस्थानं प्राप्तवान्नृप॥ ६५ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले महामुनि विश्वरूप और वृत्रासुरको मारनेके कारण इन्द्रको अत्यन्त भीषण दुःख प्राप्त हुआ और देवीकी कृपासे उन्होंने पुनः अपना स्थान प्राप्त कर लिया॥ ६४-६५॥ | | एतत्ते सर्वमाख्यातं वृत्रासुरवधाश्रयम्।<br>यत्पृष्टोऽहं त्वया राजन् कथानकमनुत्तमम्॥ ६६ | हे राजन्! इस प्रकार आपने मुझसे जो पूछा था, वृत्रासुरवधपर आधारित वह सम्पूर्ण उत्तम आख्यान मैंने आपको कह दिया॥ ६६॥ | | यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमाप्नुयात्।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ ६७ | जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा फल प्राप्त होता है। किये गये शुभ-अशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है॥ ६७॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां षष्ठस्कन्धे नहुषस्वर्गच्युतिवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥

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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 B

अथ दशमोऽध्यायः

| अ० १० ] | षष्ठ स्कन्ध | ७७१ | | :--- | :--- |

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अथ दशमोऽध्यायः

कर्मकी गहन गतिका वर्णन तथा इस सम्बन्धमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका उदाहरण

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>कथितं चरितं ब्रह्मञ्छक्रस्याद्भुतकर्मणः।<br>स्थानभ्रंशस्तथा दुःखप्राप्तिरुक्ता विशेषतः॥ १<br>यत्र देवाधिदेव्याश्च महिमातीव वर्णितः।<br>सन्देहोऽत्र ममाप्यस्ति यच्छक्रोऽपि महातपाः॥ २जनमेजय बोले—हे ब्रह्मन्! आपने अद्भुत कर्म करनेवाले इन्द्रका आख्यान कहा, जिसमें उनके पदच्युत होने और दुःख प्राप्त करनेका विशेषरूपसे वर्णन किया गया है तथा जिसमें देवताओंकी भी अधीश्वरी देवी भगवतीकी महिमा विस्तारसे वर्णित हुई है॥ १ १/२ ॥
देवाधिपत्यमासाद्य दुःसहं दुःखमन्वभूत्।<br>मखानां तु शतं कृत्वा प्राप्तं स्थानमनुत्तमम्॥ ३<br>देवेशत्वं च सम्प्राप्य भ्रष्टः स्थानादसौ कथम्।<br>एतत्सर्वं समाचक्ष्व कारणं करुणानिधे॥ ४मुझे महान् सन्देह है कि महान् तपस्वी इन्द्रको देवाधिपतिका पद प्राप्त होनेपर भी दारुण दुःख प्राप्त हुआ। सौ यज्ञ करके उन्होंने अतिश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया; और देवताओंके स्वामीका पद प्राप्त करके भी वे अपने स्थानसे कैसे च्युत हो गये?॥ २-३ १/२ ॥
सर्वज्ञोऽसि मुनिश्रेष्ठ पुराणानां प्रवर्तकः।<br>नावाच्यं महतां किञ्चिच्छिष्ये च श्रद्धयान्विते॥ ५<br>तस्मात्कुरु महाभाग मत्सन्देहापनोदनम्।हे दयानिधे! इस सबका कारण सम्यक् रूपसे बताइये। हे मुनिश्रेष्ठ! आप सब कुछ जाननेवाले और पुराणोंके प्रवर्तक हैं, महापुरुषोंके लिये अपने श्रद्धालु शिष्यसे कुछ भी अकथ्य नहीं होता, इसलिये हे महाभाग! मेरे सन्देहका निवारण कीजिये॥ ४-५ १/२ ॥
सूत उवाच<br>इति पृष्टः स राज्ञा वै तदा सत्यवतीसुतः॥ ६<br>तमाहातिप्रसन्नात्मा यथानुक्रममुत्तरम्।सूतजी बोले—तब राजाके ऐसा पूछनेपर सत्यवतीपुत्र वेदव्यासजी प्रसन्नतापूर्वक उनके प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर देने लगे॥ ६ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपतिश्रेष्ठ कारणं परमाद्भुतम्॥ ७<br>कर्मणस्तु त्रिधा प्रोक्ता गतिस्तत्त्वविदां वरैः।<br>सञ्चितं वर्तमानं च प्रारब्धमिति भेदतः॥ ८<br>अनेकजन्मस्सञ्जातं प्राक्तनं सञ्चितं स्मृतम्।<br>सात्त्विकं राजसं कर्म तामसं त्रिविधं पुनः॥ ९व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! इसका अत्यन्त अद्भुत कारण सुनो। श्रेष्ठ तत्त्वज्ञानियोंने संचित, वर्तमान और प्रारब्धके भेदसे कर्मकी तीन गतियाँ बतलायी हैं। अनेक जन्मोंका संचित प्राक्तन कर्म संचित-कर्म कहा गया है; फिर वे कर्म भी सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकारके होते हैं॥ ७—९॥
शुभं वाप्यशुभं भूप सञ्चितं बहुकालिकम्।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं सुकृतं दुष्कृतं तथा॥ १०<br>जन्मजन्मनि जीवानां सञ्चितानां च कर्मणाम्।<br>निःशेषस्तु क्षयो नाभूत्कल्पकोटिशतैरपि॥ ११हे राजन्! बहुत समयके संचित शुभ या अशुभ कर्म पुण्य या पापके रूपमें अवश्य ही भोगने पड़ते हैं। जीवोंके प्रत्येक जन्मके संचित कर्म बिना भोग किये करोड़ों कल्पोंमें भी नहीं नष्ट होते॥ १०-११॥
क्रियमाणं च यत्कर्म वर्तमानं तदुच्यते।<br>देहं प्राप्य शुभं वापि ह्यशुभं वा समाचरेत्॥ १२<br>सञ्चितानां पुनर्मध्यात्समाहृत्य कियान्किल।<br>देहारम्भे च समये कालः प्रेरयतीव तत्॥ १३जो कर्म किया जा रहा है, उसे वर्तमान कहा जाता है, जीव देह प्राप्तकर शुभ या अशुभ कार्यमें प्रवृत्त होता है। संचित कर्मोंके कारण देह प्राप्त होनेपर काल जीवको पुनः कर्मके लिये प्रेरित करता है॥ १२-१३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 C

| ७७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० | | :--- | :--- |

| प्रारब्धं कर्म विज्ञेयं भोगात्तस्य क्षयः स्मृतः।<br>प्राणिभिः खलु भोक्तव्यं प्रारब्धं नात्र संशयः ॥ १४<br><br>पुरा कृतानि राजेन्द्र ह्यशुभानि शुभानि च।<br>अवश्यमेव कर्माणि भोक्तव्यानीति निश्चयः ॥ १५<br><br>देवैर्मनुष्यैरसुरैर्यक्षगन्धर्वकिन्नरैः ।<br>कर्मैव हि महाराज देहारम्भस्य कारणम् ॥ १६ | प्रारब्ध कर्म उसे जानना चाहिये, जिसका भोगसे क्षय हो जाता है। प्राणियोंको यहाँ प्रारब्ध कर्म अवश्य भोगना पड़ता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे राजेन्द्र! देवता, मनुष्य, असुर, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर—इन सभीको पूर्वकालमें किये गये शुभ-अशुभ कर्मोंका फल भोगना पड़ता है—यह निश्चित है। हे महाराज! सबके देह-धारणका कारण उनका कर्म ही होता है। कर्मके समाप्त हो जानेपर प्राणियोंका जन्म लेना भी समाप्त हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं है॥ १४–१६ १/२ ॥ | | कर्मक्षये जन्मनाशः प्राणिनां नात्र संशयः।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र इन्द्राद्याश्च सुरास्तथा ॥ १७<br><br>दानवा यक्षगन्धर्वाः सर्वे कर्मवशाः किल।<br>अन्यथा देहसम्बन्धः कथं भवति भूपते ॥ १८<br><br>कारणं यस्तु भोगस्य देहिनः सुखदुःखयोः।<br>तस्मादनेकजन्मोत्थसञ्चितानां च कर्मणाम् ॥ १९<br><br>मध्ये वेगः समायाति कस्यचित्कालपाकतः।<br>तत्प्रारब्धवशात्पुण्यं करोति च यथा तथा ॥ २० | हे राजन्! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र आदि देवता, दानव, यक्ष और गन्धर्व—ये सभी कर्मके वशीभूत हैं, अन्यथा जीवके सुख-दुःखमें भोगका जो कारणरूप देहसम्बन्ध है वह कैसे होता? इसीलिये किसी कालविपाकके योगसे यथासमय अनेक जन्मोंमें किये हुए संचित कर्मोंका प्रभाव प्रकट हो जाता है। उसी प्रारब्धकर्मके वशमें होकर ही मनुष्य पुण्य या पाप करता है, उसी प्रकार देवता आदि भी करते हैं॥ १७–२० १/२ ॥ | | पापं करोति मनुजस्तथा देवादयोऽपि च।<br>तथा नारायणो राजन्नरश्च धर्मजावुभौ ॥ २१<br><br>जातौ कृष्णार्जुनौ काममंशौ नारायणस्य तौ।<br>पुराणपीठिकेयं वै मुनिभिः परिकीर्तिता ॥ २२ | हे राजन्! भगवान् विष्णुके अंशसे धर्मपुत्र नर और नारायण ही कृष्ण और अर्जुनके रूपमें प्रकट हुए। मुनियोंके द्वारा इस पौराणिक आख्यानका विवेचन किया गया है॥ २१–२२ ॥ | | देवांशः स तु विज्ञेयो यो भवेद्विभवाधिकः।<br>नानृषिः कुरुते काव्यं नारुद्रो रुद्रमर्चते ॥ २३<br><br>नादेवांशो ददात्यन्नं नाविष्णुः पृथिवीपतिः।<br>इन्द्रादग्नेर्यमाद्विष्णोर्धनदादिति भूपते ॥ २४<br><br>प्रभुत्वं च प्रभावं च कोपं चैव पराक्रमम्।<br>आदाय क्रियते नूनं शरीरमिति निश्चयः ॥ २५ | जो अधिक वैभवशाली होता है उसे देवांश जानना चाहिये। जो ऋषि नहीं है वह काव्यकी रचना नहीं कर सकता; जो रुद्र नहीं है वह रुद्रकी अर्चना नहीं कर सकता। जिसमें देवांश नहीं है वह अन्नदान नहीं कर सकता और जिसमें विष्णुका अंश नहीं है वह राजा नहीं हो सकता। हे राजन्! विष्णु, इन्द्र, अग्नि, यम और कुबेरसे प्रभुत्व, प्रभाव, कोप और पराक्रम प्राप्त करके ही निश्चितरूपसे यह शरीर बनता है॥ २३–२५ ॥ | | यः कश्चिद्बलवाँल्लोके भाग्यवानथ भोगवान्।<br>विद्यावान्दानवान्वापि स देवांशः प्रपठ्यते ॥ २६ | इस संसारमें जो कोई बलवान्, भाग्यवान्, भोगवान्, विद्यावान् या दानशील है, उसे देवांश कहा जाता है॥ २६ ॥ | | तथैवैते मयाख्याताः पाण्डवाः पृथिवीपते।<br>देवांशो वासुदेवोऽपि नारायणसमद्युतिः ॥ २७ | हे राजन्! उसी प्रकार मैंने पाण्डवोंको भी देवांश बताया था। वासुदेव श्रीकृष्ण तो नारायणके अंश और उन्हींके समान कान्तियुक्त थे॥ २७ ॥ |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 D

अ० १० ]षष्ठ स्कन्ध७७३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरीरं प्राणिनां नूनं भाजनं सुखदुःखयोः।<br>शरीरी प्राप्नुयात्कामं सुखं दुःखमनन्तरम्॥ २८प्राणियोंका शरीर सुख-दुःखका भाजन होता है; शरीरधारी सुख-दुःख प्राप्त करता रहता है॥ २८॥
देही नास्ति वशः कोऽपि दैवाधीनः सदैव हि।<br>जननं मरणं दुःखं सुखं प्राप्नोति चावशः॥ २९कोई भी प्राणी स्वतन्त्र नहीं है, बल्कि सदैव दैवके अधीन रहता है। वह विवश होकर जन्म, मरण, सुख तथा दुःख प्राप्त करता है॥ २९॥
पाण्डवास्ते वने जाताः प्राप्तास्तु स्वगृहं पुनः।<br>स्वबाहुबलतः पश्चाद्राजसूयं क्रतूत्तमम्॥ ३०<br>वनवासं पुनः प्राप्ता बहुदुःखकरं परम्।<br>अर्जुनेन तपस्तप्तं दुष्करं ह्यजितेन्द्रियैः॥ ३१<br>सन्तुष्टैस्तु सुरैर्दत्तं वरदानं पुनः शुभम्।<br>नरदेहकृतं पुण्यं क्व गतं वनवासजम्॥ ३२<br>नरदेहे तपस्तप्तं चोग्रं बदरिकाश्रमे।<br>नार्जुनस्य शरीरे तत्फलदं सम्बभूव ह॥ ३३दैववश ही पाण्डव वन गये और पुनः उन्होंने अपना राज्य प्राप्त किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने बाहुबलसे राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किया और बादमें अत्यन्त दुःखदायक वनवास उन्हें पुनः प्राप्त हुआ। वहाँ अर्जुनने अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुष्कर तपस्या की। तब [उस तपस्यासे] सन्तुष्ट होकर देवताओंने उन्हें कल्याणकारी वरदान दिया। उस वनवास और नरावतारमें किया गया पुण्य कहाँ गया ? नरावतारमें उन्होंने बदरिकाश्रममें उग्र तपस्या की थी, परंतु अर्जुनके रूपमें उन्हें उस तपस्याका फल नहीं मिला!॥ ३०—३३॥
प्राणिनां देहसम्बन्धे गहना कर्मणो गतिः।<br>दुर्ज्ञेया सर्वथा दैवर्मानवानां तु का कथा॥ ३४प्राणियोंके देह-सम्बन्धी कर्मोंकी गति अत्यन्त गहन है; यह देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय है तो मनुष्योंकी क्या बात !॥ ३४॥
वासुदेवोऽपि सञ्जातः कारागारेऽतिसङ्कटे।<br>नीतोऽसौ वसुदेवेन नन्दगोपस्य गोकुलम्॥ ३५<br>एकादशैव वर्षाणि संस्थितस्तत्र भारत।<br>पुनः स मथुरां गत्वा जघानोग्रसुतं बलात्॥ ३६<br>मोचयामास पितरौ बन्धनाद् भृशदुःखितौ।<br>उग्रसेनं च राजानञ्चकार मथुरापुरे॥ ३७<br>जगाम द्वारवत्यां स म्लेच्छराजभयात्पुनः।<br>सर्वं भाविवशात्कृष्णः कृतवान्पौरुषं महत्॥ ३८वासुदेव श्रीकृष्ण भी अत्यन्त संकटमय कारागारमें उत्पन्न हुए और वसुदेवके द्वारा गोकुलमें नन्दगोपके घर ले जाये गये। हे भारत! वे वहाँ ग्यारह वर्षतक रहे और पुनः मथुरा जाकर उन्होंने बलपूर्वक उग्रसेनके पुत्र कंसका वध किया। तदनन्तर अत्यन्त दुःखित माता-पिताको बन्धनसे मुक्त किया तथा उग्रसेनको मथुरापुरीका राजा नियुक्त किया। पुनः वे म्लेच्छराज कालयवनके भयसे द्वारका चले गये। श्रीकृष्णने यह सब महान् पराक्रम दैवके अधीन होकर ही किया॥ ३५—३८॥
कृत्वा कार्याण्यनेकानि द्वारवत्यां जनार्दनः।<br>देहं त्यक्त्वा प्रभासे तु सकुदुम्बो दिवं गतः॥ ३९<br>पुत्राः पौत्राश्च सुहृदो भ्रातरो जामयस्तथा।<br>प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापात्क्षयं गताः॥ ४०<br>एवं ते कथिता राजन् कर्मणो गहना गतिः।<br>वासुदेवोऽपि व्याधस्य बाणेन निधनं गतः॥ ४१वे जनार्दन श्रीकृष्ण द्वारकामें अनेक कार्य करके और प्रभासक्षेत्रमें देहका परित्यागकर अपने कुटुम्बसहित स्वर्ग चले गये। विप्रशापके कारण समस्त यादवगण पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, भाइयों और बहनोंसहित प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये और वासुदेव श्रीकृष्ण भी व्याधके बाणसे निधनको प्राप्त हुए। हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे कर्मकी गहन गतिका वर्णन कर दिया॥ ३९—४१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
कर्मणां गहनगतिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

७७४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

अथैकादशोऽध्यायः

युगधर्म एवं तत्सम्बन्धी व्यवस्थाका वर्णन

जनमेजय उवाचजनमेजय बोले—
भारावतारणार्थाय कथितं जन्म कृष्णयोः।<br>संशयोऽयं द्विजश्रेष्ठ हृदये मम तिष्ठति॥ १<br><br>पृथिवी गोस्वरूपेण ब्रह्माणं शरणं गता।<br>द्वापरान्तेऽतिदीनार्ता गुरुभारप्रपीडिता॥ २हे द्विजश्रेष्ठ! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये बलराम और श्रीकृष्णके अवतारकी बात आपने कही, किंतु मेरे मनमें एक संशय है॥ १॥<br><br>द्वापरयुगके अन्तमें अत्यन्त दीन तथा आतुर होकर भारी बोझसे दबी हुई पृथ्वी गौका रूप धारण करके ब्रह्माजीकी शरणमें गयी॥ २॥
वेधसा प्रार्थितो विष्णुः कमलापतिरीश्वरः।<br>भूभारोत्तारणार्थाय साधूनां रक्षणाय च॥ ३<br><br>भगवन् भारते खण्डे देवैः सह जनार्दन।<br>अवतारं गृहाणाशु वसुदेवगृहे विभो॥ ४तब ब्रह्माजीने लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुसे प्रार्थना की—‘हे भगवन्! हे विभो! हे जनार्दन! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये और साधुजनोंकी रक्षाके लिये आप देवताओंके साथ भारतवर्षमें वसुदेवके घरमें शीघ्र ही अवतार लीजिये’॥ ३-४॥
एवं सम्प्रार्थितो धात्रा भगवान्देवकीसुतः।<br>बभूव सह रामेण भूभारोत्तारणाय वै॥ ५<br><br>कियानुत्तारितो भारो हत्वा दुष्टाननेकprimary:शः।<br>ज्ञात्वा सर्वान्दुराचारान्यापबुद्धिन्नृपानिह॥ ६ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर भगवान् पृथ्वीका भार उतारनेके लिये बलरामके साथ देवकीके पुत्र हुए; तब उन्होंने अनेक दुष्टों तथा सभी दुराचारी और पापबुद्धि राजाओंको ज्ञात करके उन्हें मारकर पृथ्वीका कितना भार उतारा?॥ ५-६॥
हतो भीष्मो हतो द्रोणो विराटो द्रुपदस्तथा।<br>बाह्लीकः सोमदत्तश्च कर्णो वैकर्तनस्तथा॥ ७<br><br>यैर्लुण्ठितं धनं सर्वं हृताश्च हरियोषितः।<br>कथं न नाशिता दुष्टा ये स्थिताः पृथिवीतले॥ ८<br><br>आभीराश्च शका म्लेच्छा निषादाः कोटिशस्तथा।<br>भारावतरणं किं तत्कृतं कृष्णेन धीमता॥ ९<br><br>सन्देहोऽयं महाभाग न निवर्तति चित्ततः।<br>कलावस्मिन्प्रजाः सर्वाः पश्यतः पापनिश्चयाः॥ १०भीष्म मारे गये, द्रोणाचार्य मारे गये; इसी प्रकार विराट, द्रुपद, बाह्लीक, सोमदत्त और सूर्यपुत्र कर्ण मारे गये। परंतु जिन्होंने कृष्णकी पत्नियोंका हरण किया और उनका सारा धन लूट लिया, उन दुष्टोंको तथा जो करोड़ों आभीर, शक, म्लेच्छ और निषाद पृथ्वीतलपर स्थित थे—उन सबको उन्होंने नष्ट क्यों नहीं कर दिया? तब उन बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पृथ्वीका कौन-सा भार उतार दिया! हे महाभाग! मेरे चित्तसे यह सन्देह नहीं हटता है; इस कलियुगमें तो समस्त प्रजा पापपरायण ही दिखायी देती है॥ ७—१०॥
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
राजन् यस्मिन्युगे यादृक्प्रजा भवति कालतः।<br>नान्यथा तद्भवेन्नूनं युगधर्मोऽत्र कारणम्॥ ११हे राजन्! जैसा युग होता है, कालप्रभावसे प्रजा भी वैसी ही होती है, इसके विपरीत नहीं होता; इसमें युगधर्म ही कारण है॥ ११॥
ये धर्मरसिका जीवास्ते वै सत्ययुगेऽभवन्।<br>धर्मार्थरसिका ये तु ते वै त्रेतायुगेऽभवन्॥ १२<br><br>धर्मार्थकामरसिका द्वापरे चाभवन्युगे।<br>अर्थकामपराः सर्वे कलावस्मिन्भवन्ति हि॥ १३जो धर्मानुरागी जीव हैं, वे सत्ययुगमें हुए; जो धर्म और अर्थसे प्रेम रखनेवाले प्राणी हैं, वे त्रेतायुगमें हुए; धर्म, अर्थ और कामके रसिक प्राणी द्वापरयुगमें हुए और अर्थ तथा काममें आसक्ति रखनेवाले सभी प्राणी इस कलियुगमें होते हैं॥ १२-१३॥

| अ० ११ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७७५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
युगधर्मस्तु राजेन्द्र न याति व्यत्ययं पुनः।<br>कालः कर्तास्ति धर्मस्य ह्यधर्मस्य च वै पुनः॥ १४हे राजेन्द्र! युगधर्मका प्रभाव विपरीत नहीं होता है; काल ही धर्म और अधर्मका कर्ता है॥ १४॥
राजोवाच<br>ये तु सत्ययुगे जीवा भवन्ति धर्मतत्पराः।<br>कुत्र तेऽद्य महाभाग तिष्ठन्ति पुण्यभागिनः॥ १५<br>त्रेतायुगे द्वापरे वा ये दानव्रतकारकाः।<br>वर्तन्ते मुनयः श्रेष्ठाः कुत्र ब्रूहि पितामह॥ १६<br>कलावद्य दुराचारा येऽत्र सन्ति गतत्रपाः।<br>आद्ये युगे क्व यास्यन्ति पापिष्ठा देवनिन्दकाः॥ १७<br>एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते।<br>सर्वथा श्रोतुकामोऽस्मि यदेतद्धर्मनिर्णयम्॥ १८राजा बोले—हे महाभाग! सत्ययुगमें जो धर्मपरायण प्राणी हुए हैं, वे पुण्यशाली लोग इस समय कहाँ स्थित हैं? हे पितामह! त्रेतायुग या द्वापरमें जो दान तथा व्रत करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हुए हैं, वे अब कहाँ विद्यमान हैं; मुझे बतायें। इस कलियुगमें जो दुराचारी, निर्लज्ज, देवनिन्दक और पापी लोग विद्यमान हैं, वे सत्ययुगमें कहाँ जायेंगे? हे महामते! यह सब विस्तारपूर्वक कहिये; मैं इस धर्मनिर्णयके विषयमें सब कुछ सुनना चाहता हूँ॥ १५—१८॥
व्यास उवाच<br>ये वै कृतयुगे राजन् सम्भवन्तीह मानवाः।<br>कृत्वा ते पुण्यकर्माणि देवलोकान्व्रजन्ति वै॥ १९व्यासजी बोले—हे राजन्! जो मनुष्य सत्ययुगमें उत्पन्न होते हैं, वे अपने पुण्यकार्योंके कारण देवलोकको चले जाते हैं॥ १९॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम।<br>स्वधर्मनिरता यान्ति लोकान्कर्मजितान्किल॥ २०हे नृपश्रेष्ठ! अपने-अपने वर्णाश्रमधर्मोंमें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने कर्मोंसे अर्जित लोकोंमें चले जाते हैं॥ २०॥
सत्यं दया तथा दानं स्वदारगमनं तथा।<br>अद्रोहः सर्वभूतेषु समता सर्वजन्तुषु॥ २१<br>एतत्साधारणं धर्मं कृत्वा सत्ययुगे पुनः।<br>स्वर्गं यान्तीतरे वर्णा धर्मतो रजकादयः॥ २२<br>तथा त्रेतायुगे राजन् द्वापरेऽथ युगे तथा।<br>कलावस्मिन्युगे पापा नरकं यान्ति मानवाः॥ २३<br>तावत्तिष्ठन्ति ते तत्र यावत्स्याद्युगपर्ययः।<br>पुनश्च मानुषे लोके भवन्ति भुवि मानवाः॥ २४सत्य, दया, दान, एकपत्नीव्रत, सभी प्राणियोंमें अद्रोहभाव तथा सभी जीवोंमें समभाव रखना—यह सत्ययुगका साधारण धर्म है। सत्ययुगमें इसका धर्मपूर्वक पालन करके रजक आदि इतर वर्णके लोग भी स्वर्ग चले जाते हैं। हे राजन्! त्रेता और द्वापरयुगमें यही स्थिति रहती है, किंतु इस कलियुगमें पापी मनुष्य नरक जाते हैं और वे वहाँ तबतक रहते हैं जबतक युगका परिवर्तन नहीं होता, उसके बाद मनुष्यके रूपमें पुनः पृथ्वीपर जन्म लेते हैं॥ २१—२४॥
यदा सत्ययुगस्यादिः कलेरन्तश्च पार्थिव।<br>तदा स्वर्गात्पुण्यकृतो जायन्ते किल मानवाः॥ २५हे राजन्! जब कलियुगका अन्त और सत्ययुगका आरम्भ होता है, तब पुण्यशाली लोग स्वर्गसे पुनः मनुष्यके रूपमें जन्म लेते हैं॥ २५॥
यदा कलियुगस्यादिर्द्वापरस्य क्षयस्तथा।<br>नरकात्पापिनः सर्वे भवन्ति भुवि मानवाः॥ २६जब द्वापरका अन्त और कलियुगका प्रारम्भ होता है, तब नरकके सभी पापी पृथ्वीपर मनुष्यके रूपमें उत्पन्न होते हैं॥ २६॥
एवं कालसमाचारो नान्यथाभूत्कदाचन।<br>तस्मात्कलिरसत्कर्ता तस्मिंस्तु तादृशी प्रजा॥ २७इस प्रकार युगके अनुरूप ही आचार होता है, उसके विपरीत कभी नहीं। कलियुग असत्-प्रधान होता है, इसलिये उसमें प्रजा भी वैसी ही होती है।
७७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कदाचिद्दैवयोगात् प्राणिनां व्यत्ययो भवेत्।<br>कलौ ये साधवः केचिद् द्वापरे सम्भवन्ति ते ॥ २८<br>तथा त्रेतायुगे केचित्केचित्सत्ययुगे तथा।<br>दुष्टाः सत्ययुगे ये तु ते भवन्ति कलावपि ॥ २९<br>कृतकर्मप्रभावेण प्राप्नुवन्त्यसुखानि च।<br>पुनश्च तादृशं कर्म कुर्वन्ति युगभावतः ॥ ३०दैवयोगसे कभी-कभी इन प्राणियोंके जन्म लेनेमें व्यतिक्रम भी हो जाता है। कलियुगमें कुछ जो साधुजन हैं, वे द्वापरके मनुष्य हैं। उसी प्रकार द्वापरके मनुष्य कभी-कभी त्रेतामें और त्रेताके मनुष्य सत्ययुगमें जन्म लेते हैं। जो सत्ययुगमें दुराचारी मनुष्य होते हैं, वे कलियुगके हैं। वे अपने किये हुए कर्मके प्रभावसे दुःख पाते हैं और पुनः युगप्रभावसे वे वैसा ही कर्म करते हैं॥ २७-३०॥
जनमेजय उवाच<br>युगधर्मान्महाभाग ब्रूहि सर्वानशेषतः।<br>यस्मिन्वै यादृशो धर्मो ज्ञातुमिच्छामि तं तथा ॥ ३१जनमेजय बोले— हे महाभाग! आप समस्त युगधर्मोंका पूर्णरूपसे वर्णन करें; जिस युगमें जैसा धर्म होता है, उसे मैं जानना चाहता हूँ॥ ३१॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपशार्दूल दृष्टान्तं ते ब्रवीम्यहम्।<br>साधूनामपि चेतांसि युगभावाद् भ्रमन्ति हि ॥ ३२व्यासजी बोले— हे नृपशार्दूल! ध्यानपूर्वक सुनिये, इस सम्बन्धमें मैं एक दृष्टान्त कहता हूँ। साधुजनोंके मन भी युगधर्मसे प्रभावित होते हैं॥ ३२॥
पितुर्यथा ते राजेन्द्र बुद्धिर्विप्रावहेलने।<br>कृता वै कलिना राजन् धर्मज्ञस्य महात्मनः ॥ ३३<br>अन्यथा क्षत्रियो राजा ययातिकुलसम्भवः।<br>तापसस्य गले सर्पं मृतं कस्मादयोजयत् ॥ ३४हे राजेन्द्र! आपके महात्मा और धर्मज्ञ पिताकी भी बुद्धि कलियुगने विप्रका अपमान करनेकी ओर प्रेरित कर दी थी; अन्यथा ययातिके कुलमें पैदा हुए क्षत्रिय राजा परीक्षित् एक तपस्वीके गलेमें मरा हुआ सर्प क्यों डालते?॥ ३३-३४॥
सर्वं युगबलं राजन्वेदितव्यं विजानता।<br>प्रयत्नेन हि कर्तव्यं धर्मकर्म विशेषतः ॥ ३५हे राजन्! विद्वान्को इसे युगका ही प्रभाव समझना चाहिये। इसलिये विशेषरूपसे धर्माचरण ही प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये॥ ३५॥
नूनं सत्ययुगे राजन् ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>पराशक्त्यर्चनरता देवीदर्शनलालसाः ॥ ३६<br>गायत्रीप्रणवासक्ता गायत्रीध्यानकारिणः।<br>गायत्रीजपसंसक्ता मायाबीजैकजापिनः ॥ ३७<br>ग्रामे ग्रामे पराम्बायाः प्रासादकरणोत्सुकाः।<br>स्वकर्मनिरताः सर्वे सत्यशौचदयान्विताः ॥ ३८<br>त्रय्युक्तकर्मनिरतास्तत्त्वज्ञानविशारदाः।<br>अभवन्क्षत्रियास्तत्र प्रजाभरणतत्पराः ॥ ३९<br>वैश्यास्तु कृषिवणिज्यगोसेवानिरतास्तथा।<br>शूद्राः सेवापरास्तत्र पुण्ये सत्ययुगे नृप ॥ ४०हे राजन्! सत्ययुगमें सभी ब्राह्मण वेदके ज्ञाता, पराशक्तिकी पूजामें तत्पर रहनेवाले, देवीदर्शनकी लालसासे युक्त, गायत्री और प्रणवमन्त्रमें अनुरक्त, गायत्रीका ध्यान करनेवाले, गायत्रीजपपरायण, एकमात्र मायाबीजमन्त्रका जप करनेवाले, प्रत्येक गाँवमें भगवती पराम्बाका मन्दिर बनानेके लिये उत्सुक रहनेवाले, अपने-अपने कर्मोंमें निरत रहनेवाले, सत्य-पवित्रता-दयासे समन्वित, वेदत्रयी कर्ममें संलग्न रहनेवाले और तत्त्वज्ञानमें पूर्ण निष्णात होते थे। क्षत्रिय प्रजाओंके भरण-पोषणमें संलग्न रहते थे। हे राजन्! उस पुण्यमय सत्ययुगमें वैश्यलोग कृषि, व्यापार और गो-पालन करते थे तथा शूद्र सेवापरायण रहते थे॥ ३६-४०॥
पराम्बापूजनासक्ताः सर्वे वर्णाः परे युगे।<br>तथा त्रेतायुगे किञ्चिन्न्यूना धर्मस्य संस्थितिः ॥ ४१उस सत्ययुगमें सभी वर्णोंके लोग भगवती पराम्बाके पूजनमें आसक्त रहते थे। उसके बाद त्रेतायुगमें धर्मकी स्थिति कुछ कम हो गयी। सत्ययुगमें
अ० ११ ]षष्ठ स्कन्ध७७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्वापरे च विशेषेण न्यूना सत्ययुगस्थितिः।<br>पूर्वं ये राक्षसा राजन् ते कलौ ब्राह्मणाः स्मृताः॥ ४२जो धर्मकी स्थिति थी, वह द्वापरमें विशेषरूपसे कम हो गयी। हे राजन्! पूर्वयुगोंमें जो राक्षस समझे जाते थे, वे ही कलियुगमें ब्राह्मण माने जाते हैं॥ ४१-४२॥
पाखण्डनिरताः प्रायो भवन्ति जनवञ्चकाः।<br>असत्यवादिनः सर्वे वेदधर्मविवर्जिताः॥ ४३<br>दाम्भिका लोकचतुरा मानिनो वेदवर्जिताः।<br>शूद्रसेवापराः केचिन्नानाधर्मप्रवर्तकाः॥ ४४<br>वेदनिन्दाकराः क्रूरा धर्मभ्रष्टातिवादुकाः।<br>यथा यथा कलिर्वृद्धिं याति राजंस्तथा तथा॥ ४५<br>धर्मस्य सत्यमूलस्य क्षयः सर्वात्मना भवेत्।<br>तथैव क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च धर्मवर्जिताः॥ ४६<br>असत्यवादिनः पापास्तथा वर्णेतराः कलौ।<br>शूद्रधर्मरता विप्राः प्रतिग्रहपरायणाः॥ ४७वे प्रायः पाखण्डी, लोगोंको ठगनेवाले, झूठ बोलनेवाले तथा वेद और धर्मसे दूर रहनेवाले होते हैं। उनमेंसे कुछ तो दम्भी, लोकव्यवहारमें चालाक, अभिमानी, वेदप्रतिपादित मार्गसे हटकर चलनेवाले, शूद्रोंकी सेवा करनेवाले, विभिन्न धर्मोंका प्रवर्तन करनेवाले, वेदनिन्दक, क्रूर, धर्मभ्रष्ट और व्यर्थ वाद-विवादमें लगे रहनेवाले होते हैं। हे राजन्! जैसे-जैसे कलियुगकी वृद्धि होती है, वैसे-वैसे सत्यमूलक धर्मका सर्वथा क्षय होता जाता है और वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इतर वर्णोंके लोग भी धर्महीन, मिथ्यावादी तथा पापी होते हैं। ब्राह्मण शूद्रधर्ममें संलग्न और प्रतिग्रहपरायण हो जाते हैं॥ ४३-४७॥
भविष्यन्ति कलौ राजन् युगे वृद्धिं गताः किल।<br>कामचाराः स्त्रियः कामलोभमोहसमन्विताः॥ ४८<br>पापा मिथ्याभिवादिन्यः सदा क्लेशरता नृप।<br>स्वभर्तृवञ्चका नित्यं धर्मभाषणपण्डिताः॥ ४९हे राजन्! कलियुगका प्रभाव और बढ़नेपर स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी तथा काम, लोभ और मोहसे युक्त हो जायेंगी। हे राजन्! वे पापाचारिणी, झूठ बोलनेवाली, सदा कलह करनेवाली, अपने पतिको ठगनेवाली और नित्य धर्मका भाषण करनेमें निपुण होंगी। कलियुगमें इस प्रकारकी पापपरायण स्त्रियाँ होती हैं॥ ४८-४९ १/२॥
भवन्त्येवंविधा नार्यः पापिष्ठाश्च कलौ युगे।<br>आहारशुद्ध्या नृपते चित्तशुद्धिस्तु जायते॥ ५०<br>शुद्धे चित्ते प्रकाशः स्याद्धर्मस्य नृपसत्तम।<br>वृत्तसङ्करदोषेण जायते धर्मसङ्करः॥ ५१<br>धर्मस्य सङ्करे जाते नूनं स्याद्वर्णसङ्करः।<br>एवं कलियुगे भूप सर्वधर्मविवर्जिते॥ ५२<br>स्ववर्णधर्मवार्तैषा न कुत्राप्युपलभ्यते।<br>महान्तोऽपि च धर्मज्ञा अधर्मं कुर्वते नृप॥ ५३<br>कलिस्वभाव एवैष परिहार्यो न केनचित्।<br>तस्मादत्र मनुष्याणां स्वभावात्पापकारिणाम्॥ ५४<br>निष्कृतिर्न हि राजेन्द्र सामान्योपायतो भवेत्।हे राजन्! आहारकी शुद्धिसे ही अन्तःकरणकी शुद्धि होती है और हे नृपश्रेष्ठ! चित्त शुद्ध होनेपर ही धर्मका प्रकाश होता है। आचारसंकरता (दूसरे वर्णोंके अनुसार आचरण)-दोषसे धर्ममें व्यतिक्रम (विकार) उत्पन्न होता है और धर्ममें विकृति होनेपर वर्णसंकरता उत्पन्न होती है। हे राजन्! इस प्रकार सभी धर्मोंसे हीन कलियुगमें अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मकी चर्चा भी कहीं नहीं सुनायी देती। हे राजन्! धर्मज्ञ और श्रेष्ठजन भी अधर्म करने लग जाते हैं। यह कलियुगका स्वभाव ही है; किसीके भी द्वारा इसका प्रतीकार नहीं किया जा सकता। अतः हे राजेन्द्र! इस कालमें स्वभावसे ही पाप करनेवाले मनुष्योंकी निष्कृति सामान्य उपायसे नहीं हो सकती॥ ५०-५४ १/२॥
७७८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| जनमेजय उवाच<br>भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ॥ ५५<br>कलावधर्मबहुले नराणां का गतिर्भवेत्।<br>यद्यस्ति तदुपायश्चेद्दया तं वदस्व मे ॥ ५६ | जनमेजय बोले— हे भगवन्! हे समस्त धर्मोंके ज्ञाता! हे समस्त शास्त्रोंमें निपुण! अधर्मके बाहुल्यवाले कलियुगमें मनुष्योंकी क्या गति होती है? यदि उससे निस्तारका कोई उपाय हो तो उसे दयापूर्वक मुझे बतलाइये॥ ५५-५६॥ | | व्यास उवाच<br>एक एव महाराज तत्रोपायोऽस्ति नापरः।<br>सर्वदोषनिरासार्थं ध्यायेद्देवीपदाम्बुजम् ॥ ५७<br>न सन्त्यघानि तावन्ति यावती शक्तिरस्ति हि।<br>नाम्नि देव्याः पापदाहे तस्माद्भीतिः कुतो नृप ॥ ५८<br>अवशेनापि यन्नाम लीलयोच्चारितं यदि।<br>किं किं ददाति तज्ज्ञातुं समर्था न हरादयः ॥ ५९ | व्यासजी बोले— हे महाराज! इसका एक ही उपाय है दूसरा नहीं है; समस्त पापोंके शमनके लिये देवीके चरणकमलका ध्यान करना चाहिये। हे राजन्! देवीके पापदाहक नाममें जितनी शक्ति है, उतने पाप तो हैं ही नहीं। इसलिये भयकी क्या आवश्यकता? यदि विवशतापूर्वक भी भगवतीके नामका उच्चारण हो जाय, तो वे क्या-क्या दे देती हैं, उसे जाननेमें भगवान् शंकर आदि भी समर्थ नहीं हैं!॥ ५७-५९॥ | | प्रायश्चित्तं तु पापानां श्रीदेवीनामसंस्मृतिः।<br>तस्मात्कलिभयाद्राजन् पुण्यक्षेत्रे वसेन्नरः ॥ ६०<br>निरन्तरं पराम्बाया नामसंस्मरणं चरेत्।<br>छित्त्वा भित्त्वा च भूतानि हत्वा सर्वमिदं जगत् ॥ ६१ | भगवती देवीके नामका स्मरण ही समस्त पापोंका प्रायश्चित्त है, इसलिये हे राजन्! मनुष्यको कलिके भयसे पुण्यक्षेत्रमें निवास करना चाहिये और पराम्बाके नामका निरन्तर स्मरण करना चाहिये। जो देवीको भक्तिभावसे नमस्कार करता है, वह प्राणियोंका छेदन-भेदन और सारे संसारको पीड़ित करके भी उन पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ६०-६१ १/२॥ | | देवीं नमति भक्त्या यो न स पापैर्विलिप्यते।<br>रहस्यं सर्वशास्त्राणां मया राजन्नुदीरितम् ॥ ६२<br>विमृश्यैतदशेषेण भज देवीपदाम्बुजम्।<br>अजपां नाम गायत्रीं जपन्ति निखिला जनाः ॥ ६३<br>महिमानं न जानन्ति मायाया वैभवं महत्।<br>गायत्रीं ब्राह्मणाः सर्वे जपन्ति हृदयान्तरे ॥ ६४<br>महिमानं न जानन्ति मायाया वैभवं महत्।<br>एतत्सर्वं समाख्यातं यत्पृष्टं तत्त्वया नृप।<br>युगधर्मव्यवस्थायां किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ६५ | हे राजन्! यह मैंने आपसे सम्पूर्ण शास्त्रोंके रहस्यको कह दिया, इसपर भलीभाँति विचारकर आप देवीके चरणकमलकी आराधना करें। [वैसे तो] सभी लोग 'अजपा' नामक गायत्रीका जप करते हैं, लेकिन वे [मायासे मोहित होनेके कारण] उन महामायाकी महिमा और महान् वैभवको नहीं जानते। सभी ब्राह्मण अपने हृदयमें गायत्रीका जप करते हैं, परंतु वे भी उन महामायाकी महिमा और उनके महान् वैभवको नहीं जानते। हे राजन्! युगधर्मकी व्यवस्थाके विषयमें आपने जो कुछ पूछा था, यह सब मैंने कह दिया, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ६२-६५॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे युगधर्मव्यवस्थावर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥

अ० १२] षष्ठ स्कन्ध ७७९


अथ द्वादशोऽध्यायः

पवित्र तीर्थोंका वर्णन, चित्तशुद्धिकी प्रधानता तथा इस सम्बन्धमें विश्वामित्र और वसिष्ठके परस्पर वैरकी कथा, राजा हरिश्चन्द्रका वरुणदेवके शापसे जलोदरग्रस्त होना

राजोवाच**राजा बोले—**हे मुनिश्रेष्ठ! अब आप मुझे मनुष्यों और देवताओंके द्वारा सेवनीय इस पृथ्वीपर स्थित पुण्य तीर्थों, क्षेत्रों तथा नदियोंके विषयमें बताइये। उन तीर्थोंमें स्नान तथा दानका जैसा फल मिलता है, उसे और विशेषरूपसे तीर्थयात्राकी विधि तथा नियमोंको भी बताइये॥ १-२॥
तीर्थानि भुवि पुण्यानि ब्रूहि मे मुनिसत्तम।<br>गम्यानि मानवैर्देवैः क्षेत्राणि सरितस्तथा॥ १
फलं च यादृशं यत्र तीर्थेषु स्नानदानतः।<br>विधिं तु तीर्थयात्रायां नियमांश्च विशेषतः॥ २
व्यास उवाच**व्यासजी बोले—**हे राजन्! सुनिये, मैं उन विविध तीर्थोंका वर्णन करूँगा, जिन तीर्थोंमें देवियोंके प्रशस्त मन्दिर विद्यमान हैं॥ ३॥
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि तीर्थानि विविधानि च।<br>येषु तीर्थेषु देवीनां प्रशस्तान्यायनानि च॥ ३
नदीनां जाह्नवी श्रेष्ठा यमुना च सरस्वती।<br>नर्मदा गण्डकी सिन्धुर्गोमती तमसा तथा॥ ४नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं, इसी प्रकार यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गण्डकी, सिन्धु, गोमती, तमसा, कावेरी, चन्द्रभागा, पुण्या, शुभ वेत्रवती, चर्मण्वती, सरयू, तापी तथा साभ्रमती भी हैं—इन्हें मैंने बतला दिया। हे राजन्! इनके अतिरिक्त सैकड़ों अन्य नदियाँ भी हैं। उनमेंसे समुद्रमें गिरनेवाली नदियाँ पुण्यमयी हैं तथा समुद्रमें न गिरनेवाली नदियाँ अल्प पुण्यवाली हैं। समुद्रगामिनी नदियोंमें वे बहुत पवित्र हैं जो सदा जलपूरित होकर बहती हैं। श्रावण और भाद्रपद—इन दो महीनोंमें सभी नदियाँ रजस्वला होती हैं; क्योंकि उनमें वर्षाकालमें ग्रामीणजल प्रवाहित होता है॥ ४–७ ½॥
कावेरी चन्द्रभागा च पुण्या वेत्रवती शुभा।<br>चर्मण्वती च सरयूस्तापी साभ्रमती तथा॥ ५
एताश्च कथिता राजन्नन्याश्च शतशः पुनः।<br>तासां समुद्रगाः पुण्याः स्वल्पपुण्या ह्यनब्धिगाः॥ ६
समुद्रगानां ताः पुण्याः सर्वदौघवहास्तु याः।<br>मासद्वयं श्रावणादौ ताश्च सर्वा रजस्वलाः॥ ७
भवन्ति वृष्टियोगेन ग्राम्यवारिवहास्तथा।
पुष्करं च कुरुक्षेत्रं धर्मारण्यं सुपावनम्॥ ८पुष्कर, कुरुक्षेत्र, धर्मारण्य, प्रभास, प्रयाग, नैमिषारण्य और विख्यात अर्बुदारण्य—ये अत्यन्त पवित्र तीर्थ हैं। इसी प्रकार श्रीशैल, सुमेरु और गन्धमादन पवित्र पर्वत हैं। सरोवरोंमें सर्वविख्यात मानसरोवर, श्रेष्ठ बिन्दुसर और पवित्र अच्छोदसरोवर पुण्य सरोवर हैं॥ ८–१० ½॥
प्रभासं च प्रयागं च नैमिषारण्यमेव च।<br>विश्रुतं चार्बुदारण्यं शैलाश्च पावनास्तथा॥ ९
श्रीशैलश्च सुमेरुश्च पर्वतो गन्धमादनः।<br>सरांसि चैव पुण्यानि मानसं सर्वविश्रुतम्॥ १०
तथा बिन्दुसरः श्रेष्ठमच्छोदं नाम पावनम्।
आश्रमास्तु तथा पुण्या मुनीनां भावितात्मनाम्॥ ११इसी प्रकार शुद्ध मनवाले मुनियोंके आश्रम भी पुण्यस्थल हैं। विख्यात बदरिकाश्रम सदैव पुण्यशाली आश्रमके रूपमें कहा गया है जहाँ नर-नारायण नामके दो मुनियोंने तपस्या की थी। ऐसे ही वामनाश्रम और शतयूपाश्रम भी विख्यात हैं। जिस ऋषिने जहाँ तपस्या की वह आश्रम उसीके नामसे प्रसिद्ध हो गया॥ ११–१३॥
विश्रुतस्तु सदा पुण्यः ख्यातो बदरिकाश्रमः।<br>नरनारायणौ यत्र तेपाते तौ मुनी तपः॥ १२
वामनाश्रम आख्यातः शतयूपाश्रमस्तथा।<br>येन यत्र तपस्तप्तं तस्य नाम्नातिविश्रुतः॥ १३
७८०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं पुण्यानि स्थानानि ह्यसंख्यातानि भूतले।<br>मुनिभिः परिगीतानि पावनानि महीपते॥ १४<br>एषु स्थानेषु सर्वत्र देवीस्थानानि भूपते।<br>दर्शनात्तापहारीणि वसन्ति नियमेन च॥ १५<br>कथयिष्यामि तान्यग्रे प्रसङ्गेन च कानिचित्।हे राजन्! इस प्रकार इस भूतलपर असंख्य पवित्र पुण्यस्थल हैं, जो मुनियोंद्वारा पवित्र कहे गये हैं। हे राजन्! इन सभी स्थानोंमें देवीके मन्दिर हैं, जो दर्शन कर लेने मात्रसे पापका हरण करते हैं, वहाँ बहुत-से भक्त नियमपूर्वक वास करते हैं। उन कतिपय स्थानोंका वर्णन आगे करूँगा॥ १४-१५ १/२ ॥
तीर्थानि नृप दानानि व्रतानि च मखास्तथा॥ १६<br>तपांसि पुण्यकर्माणि सापेक्षाणि महीपते।<br>द्रव्यशुद्धिं क्रियाशुद्धिं मनःशुद्धिमपेक्ष्य च॥ १७<br>पावनानि हि तीर्थानि तपांसि च व्रतानि च।<br>कदाचिद् द्रव्यशुद्धिः स्यात्क्रियाशुद्धिः कदाचन॥ १८<br>दुर्लभा मनसः शुद्धिः सर्वेषां सर्वदा नृप।<br>मनस्तु चञ्चलं राजन्ननेकविषयाश्रितम्॥ १९<br>कथं शुद्धं भवेद्राजन्नानाभावसमाश्रितम्।हे राजन्! तीर्थ, दान, व्रत, यज्ञ, तपस्या और सभी पुण्यकर्म शुद्धिसापेक्ष हैं। द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और मानसिक शुद्धिके आधारपर ही तीर्थ, तप और व्रत पवित्र होते हैं। कभी द्रव्यशुद्धि और कभी क्रियाशुद्धि हो पाती है, लेकिन हे राजन्! मानसिक शुद्धि सबके लिये सदा ही दुर्लभ होती है; क्योंकि हे नृप! मन बड़ा चंचल है और अनेक विषयोंमें भटकता रहता है। तब हे राजन्! विविध विषयोंके आश्रित रहनेवाला मन कैसे शुद्ध रह सकता है?॥ १६—१९ १/२ ॥
कामक्रोधौ तथा लोभो ह्यहङ्कारो मदस्तथा॥ २०<br>सर्वविघ्नकरा ह्येते तपस्तीर्थव्रतेषु च।<br>अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः॥ २१<br>स्वधर्मपालनं राजन् सर्वतीर्थफलप्रदम्।<br>नित्यकर्मपरित्यागान्मार्गे संसर्गदोषतः॥ २२<br>व्यर्थं तीर्थाधिगमनं पापमेवावशिष्यते।काम, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा मद—ये सभी तपस्या, तीर्थसेवन और व्रतोंमें विघ्नकारी होते हैं। हे राजन्! अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह और अपने धर्मका पालन—समस्त तीर्थोंका फल प्रदान करते हैं। नित्यकर्मके परित्याग और मार्गमें संसर्गदोषसे तीर्थमें जाना व्यर्थ हो जाता है, केवल पाप ही लगता है॥ २०—२२ १/२ ॥
क्षालयन्ति हि तीर्थानि सर्वथा देहजं मलम्॥ २३<br>मानसं क्षालितुं तानि न समर्थानि वै नृप।<br>शक्तानि यदि चेत्तानि गङ्गातीरनिवासिनः॥ २४<br>मुनयो द्रोहसंयुक्ताः कथं स्युर्भावितेश्वराः।<br>वसिष्ठसदृशाः प्रह्रा विश्वामित्रादयः किल॥ २५<br>रागद्वेषरताः सर्वे कामक्रोधाकुलाः सदा।<br>चित्तशुद्धिमयं तीर्थं गङ्गादिभ्योऽतिपावनम्॥ २६हे राजन्! तीर्थ तो केवल शरीरजन्य मलको ही धोते हैं, वे अन्तःकरणको धोनेमें समर्थ नहीं होते। यदि वे तीर्थ [मनको शुद्ध करनेमें] समर्थ होते तो गंगाके तटपर रहनेवाले विश्वामित्र और वसिष्ठसदृश ईश्वर-चिन्तनपरायण भक्त मुनि द्रोहभावसे युक्त क्यों होते? इस प्रकार तीर्थोंमें रहनेवाले लोग भी सदैव राग-द्वेषपरायण तथा काम-क्रोधसे व्याकुल रहते हैं। अतः चित्तशुद्धिरूपी तीर्थ गंगा आदि तीर्थोंसे भी अधिक पवित्र है॥ २३—२६॥
यदि स्याद्दैवयोगेन क्षालयत्यान्तरं मलम्।<br>विशेषेण तु सत्सङ्गो ज्ञाननिष्ठस्य भूपते॥ २७<br>न वेदा न च शास्त्राणि न व्रतानि तपांसि न।<br>न मखा न च दानानि चित्तशुद्धेस्तु कारणम्॥ २८हे राजन्! यदि दैवयोगसे ज्ञाननिष्ठ पुरुषका सत्संग प्राप्त हो जाय तो वह आन्तरिक मैलको धो देता है। हे राजन्! वेद, शास्त्र, व्रत, तप, यज्ञ तथा दान—ये चित्तकी शुद्धिके कारण नहीं हैं॥ २७-२८॥

| अ० १२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८१ | | :--- | :--- | | वसिष्ठो ब्रह्मणः पुत्रो वेदविद्याविशारदः।<br>रागद्वेषान्वितः कामं गङ्गातीरसमाश्रितः॥ २९<br>आडीबकं महायुद्धं विश्वामित्रवसिष्ठयोः।<br>जातं निरर्थकं द्वेषाद्देवानां विस्मयप्रदम्॥ ३०<br>विश्वामित्रो बकस्तत्र जातः परमतापसः।<br>शप्तः स तु वसिष्ठेन हरिश्चन्द्रस्य कारणात्॥ ३१<br>कौशिकेन वसिष्ठोऽपि शप्त्वाडीदेहभाक्कृतः।<br>शापादाडीबकौ जातौ तौ मुनी विशदप्रभौ॥ ३२<br>निवासं प्राप्तुस्तीरे सरसो मानसस्य च।<br>चक्रतुर्दारुणं युद्धं नखचञ्चुप्रताडनैः॥ ३३<br>वर्षाणामयुतं यावत्तावृषी रोषसंयुतौ।<br>युयुधाते मदोन्मत्तौ सिंहाविव परस्परम्॥ ३४ | ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठ वेदविद्यामें पारंगत थे और गङ्गाजीके तटपर रहते थे, फिर भी वे राग-द्वेषसे युक्त हो गये। विश्वामित्र और वसिष्ठके मध्य देवताओंको भी विस्मयमें डाल देनेवाला आडीबक नामक महायुद्ध हुआ, जो द्वेषके कारण व्यर्थ ही हुआ था। उस युद्धमें परम तपस्वी विश्वामित्र बक हुए थे, उन्हें वसिष्ठने हरिश्चन्द्रके कारण शाप दे दिया था। विश्वामित्रने भी वसिष्ठको शाप देकर आडी पक्षीके देहवाला बना दिया। इस प्रकार निर्मल कान्तिवाले वे दोनों मुनि शापके कारण आडी और बक पक्षीके रूपमें हो गये। वे मानसरोवरके तटपर रहने लगे और वहाँ नखों और चोंचके प्रहारसे भयंकर युद्ध करते रहे। वे दोनों ऋषि मदोन्मत्त सिंहोंके समान रोषयुक्त होकर दस हजार वर्षोंतक आपसमें युद्ध करते रहे॥ २९-३४॥ | | राजोवाच<br>कथं तौ मुनिशार्दूलौ तापसौ धर्मतत्परौ।<br>परस्परं वैरपरौ सञ्जातौ केन हेतुना॥ ३५<br>शापं परस्परं केन कारणेन महामती।<br>दत्तवन्तौ मिथः क्लेशकारकौ दुःखदौ नृणाम्॥ ३६ | राजा बोले— श्रेष्ठ तपस्वी और धर्मपरायण वे दोनों मुनिश्रेष्ठ किस कारण परस्पर वैरपरायण हुए? उन दोनों बुद्धिमान् ऋषियोंने किस कारणसे एक-दूसरेको शाप दिया? जो मनुष्योंके लिये कष्टकारक और दुःखदायक सिद्ध हुए॥ ३५-३६॥ | | व्यास उवाच<br>हरिश्चन्द्रो नृपश्रेष्ठस्त्रिशंकुतनयः पुरा।<br>बभूव रविवंशीयो रामचन्द्रस्य पूर्वजः॥ ३७<br>अनपत्यः स राजर्षिर्वरुणाय महाक्रतुम्।<br>प्रतिजज्ञे पुत्रकामो नरमेधं दुरासदम्॥ ३८<br>वरुणस्तस्य सन्तुष्टो यज्ञस्य नियमे कृते।<br>दधार गर्भं राज्ञस्तु भार्या परमसुन्दरी॥ ३९ | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें सूर्यवंशमें त्रिशंकुके पुत्र हरिश्चन्द्र नामक एक श्रेष्ठ राजा हुए, जो रामचन्द्रजीके पूर्वज थे॥ ३७॥<br>वे राजर्षि सन्तानहीन थे, अतः पुत्रकी कामनासे वरुणदेवकी प्रसन्नताके लिये उन्होंने 'नरमेध' नामक दुष्कर महायज्ञ करनेकी प्रतिज्ञा की। उस यज्ञका व्रत लेनेसे वरुणदेव उनपर प्रसन्न हो गये और राजाकी परम रूपवती भार्याने गर्भ धारण किया॥ ३८-३९॥ | | राजा बभूव सन्तुष्टो दृष्ट्वा भार्यां सदोहदाम्।<br>चकार विधिवत्कर्म गर्भसंस्कारकारकम्॥ ४० | रानीको गर्भवती देखकर राजा प्रसन्न हुए और उन्होंने विधिपूर्वक गर्भको संस्कारित करनेवाला कर्म सम्पन्न कराया॥ ४०॥ | | सुषुवे तनयं नारी सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>मुदं प्राप नृपस्तत्र पुत्रे जाते विशाम्पते॥ ४१<br>कृतवाञ्जातकर्मादिसंस्कारविधिमुत्तमम् ।<br>ददौ हिरण्यं गा दोग्ध्रीर्ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥ ४२ | हे राजन्! रानीने समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया। पुत्रके उत्पन्न होनेपर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने जातकर्म आदि संस्कारकी उत्तम विधि सम्पन्न की। ब्राह्मणोंको विशेषरूपसे स्वर्ण और पयस्विनी गौएँ प्रदान कीं॥ ४१-४२॥ |