देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 776, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 776
| अ० ९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| साहाय्यं जगदम्बा ते करिष्यति न संशयः।<br>जगदम्बापदस्मर्तुः सङ्कटं न कदाचन॥ २०<br>यदि जायेत तच्चापि ज्ञेयं तत्स्वस्तये किल।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मणिद्वीपाधिवासिनीम्॥ २१<br>भज त्वं भुवनेशानीं गुरुवाक्यानुसारतः। | भगवती जगदम्बा तुम्हारी सहायता करेंगी; इसमें सन्देह नहीं है। भगवती जगदम्बाके चरणोंका स्मरण करनेवालेको कभी संकट नहीं होता। यदि संकट उत्पन्न भी हो जाय तो उसे भी अपने कल्याणके लिये ही समझना चाहिये। अतः तुम गुरु बृहस्पतिके कथनानुसार पूर्ण प्रयत्नसे मणिद्वीपवासिनी भगवती भुवनेश्वरीका भजन करो॥ २०-२१ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याख्याता शची तेन जगाम नहुषं प्रति॥ २२<br>तथेत्युक्त्वातिविश्वस्ता भाविकार्ये कृतोद्यमा।<br>नहुषस्तां समालोक्य मुदितो वाक्यमब्रवीत्॥ २३<br>स्वागतं सत्यवचनैस्त्वदधीनोऽस्मि कामिनि।<br>दासोऽहं तव सत्येन पालितं वचनं त्वया॥ २४<br>यदागता समीपे मे तुष्टोऽस्मि मितभाषिणि।<br>न च व्रीडा त्वया कार्या भक्तं मां भज सुस्मिते॥ २५<br>कार्यं वद विशालाक्षि करिष्यामि तव प्रियम्। | व्यासजी बोले—उनके ऐसा कहनेपर ‘वैसा ही होगा’—यह कहकर अत्यन्त विश्वस्त तथा भावी कार्यके प्रति प्रयत्नशील शची नहुषके पास गयीं। नहुष उन्हें देखकर प्रसन्न होता हुआ यह वचन बोला—हे कामिनि! तुम्हारा स्वागत है, मैं तुम्हारे सत्य वचनोंके कारण तुम्हारे अधीन हूँ। तुमने अपने वचनका सत्यतापूर्वक पालन किया, इसलिये मैं तुम्हारा दास हो गया हूँ। हे मितभाषिणि! तुम जब मेरे समीप आ गयी हो तो मैं सन्तुष्ट हो गया हूँ। तुम्हें अब लज्जा नहीं करनी चाहिये। हे सुन्दर मुसकानवाली! मुझ अनुरक्तको अंगीकार करो। हे विशाल नेत्रोंवाली! अपना कार्य बताओ; मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा॥ २२—२५ १/२॥ |
| शच्युवाच<br>सर्वं कृतं त्वया कार्यं मम कृत्रिमवासव॥ २६<br>मनोरथोऽस्ति मे देव शृणु चित्तेऽधुना विभो।<br>वाञ्छितं कुरु कल्याण त्वद्वशाहमतः परम्॥ २७<br>ब्रवीमि मानसोत्साहं त्वं तं कर्तुमिहार्हसि। | शची बोलीं—हे कृत्रिम वासव! आपने मेरा सम्पूर्ण कार्य कर दिया है। हे देव! हे विभो! इस समय मेरे मनमें एक अभिलाषा है, उसे आप सुनें। हे कल्याण! मेरा मनोरथ पूर्ण कर दीजिये; इसके बाद मैं आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी, मैं बड़े उत्साहसे अपना मनोरथ कह रही हूँ, आप उसे पूरा करनेमें समर्थ हैं॥ २६-२७ १/२॥ |
| नहुष उवाच<br>कार्यं त्वं ब्रूहि चन्द्रास्ये करोमि तव वाञ्छितम्॥ २८<br>अलभ्यमपि दास्यामि तुभ्यं सुभ्रु वदस्व माम्। | नहुष बोला—हे चन्द्रमुखि! तुम अपना कार्य बताओ, मैं तुम्हारा अभिलाषित कार्य करता हूँ। हे सुभ्रु! यदि अलभ्य वस्तु होगी तो भी मैं तुम्हें दूँगा; मुझे बताओ॥ २८ १/२॥ |
| शच्युवाच<br>कथं ब्रवीमि राजेन्द्र प्रत्ययो नास्ति मे तव॥ २९<br>शपथं कुरु राजेन्द्र यत्करोमि प्रियं तव।<br>राजानः सत्यवचसो दुर्लभा एव भूतले॥ ३० | शची बोलीं—हे राजेन्द्र! मैं कैसे बताऊँ, मुझे आपका विश्वास नहीं है। हे राजेन्द्र! आप शपथ लें कि मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा; क्योंकि पृथ्वीतलपर सत्यवादी राजा दुर्लभ हैं। हे राजन्! आपको सत्यसे बँधा जाननेके बाद ही मैं अपना अभिलाषित बताऊँगी। |