भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 775
७६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९

| व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**अपने परम आदरणीय पतिके ऐसा कहनेपर लम्बी साँसें खींचती तथा काँपती हुई वे शची अत्यन्त दुःखित होकर इन्द्रसे कहने लगीं—॥ ७॥ | | इत्युक्ता तेन सा देवी पतिनातिप्रशंसिना।<br>निःश्वसन्त्याह तं शक्रं वेपमानातिदुःखिता॥ ७ | | | कथं तिष्ठे महाभाग पापात्मा मां वशानुगाम्।<br>करिष्यति मदोन्मत्तो वरदानेन गर्वितः॥ ८<br>देवाश्च मुनयः सर्वे मामूचुस्तद्भयाकुलाः।<br>तं भजस्व वरारोहे देवराजं स्मरातुरम्॥ ९ | हे महाभाग! मैं कैसे रहूँ? वरदानके द्वारा मदोन्मत्त और अहंकारी बना हुआ वह पापात्मा मुझे अपने वशमें कर लेगा। उससे भयभीत सभी देवताओं और मुनियोंने मुझसे कहा—हे वरारोहे! तुम उस कामातुर देवराजको अंगीकार कर लो॥ ८-९॥ | | बृहस्पतिस्तु शत्रुघ्न वाडवो बलवर्जितः।<br>कथं मां रक्षितुं शक्तो भवेद्देवानुगः सदा॥ १० | हे शत्रुसूदन! बृहस्पति भी निर्बल ब्राह्मण हैं; वे मेरी रक्षा करनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं; क्योंकि वे भी तो सदा देवताओंके ही अनुगामी हैं॥ १०॥ | | तस्माच्चिन्तास्ति महती नार्यहं वशवर्तिनी।<br>अनाथा किं करिष्यामि विपरीते विधौ विभो॥ ११ | अतः हे विभो! मैं वशवर्तिनी नारी हूँ, मुझे यह महान् चिन्ता है कि भाग्यकी इस विपरीत अवस्थामें मैं अनाथ क्या करूँगी?॥ ११॥ | | नार्यस्म्यहं न कुलटा त्वच्चित्तातितिव्रता।<br>नास्ति मे शरणं तत्र यो मां रक्षति दुःखिताम्॥ १२ | मैं कुलटा नहीं हूँ अपितु आपका ही ध्यान करनेवाली पतिव्रता स्त्री हूँ। वहाँ मेरे लिये ऐसा कोई शरण नहीं है, जो मुझ दुःखितकी रक्षा करे॥ १२॥ | | इन्द्र उवाच | **इन्द्र बोले—**हे वरानने! मैं एक उपाय बताता हूँ, तुम उसे इस समय करो। इससे दुःखके समयमें तुम्हारे शीलकी रक्षा हो जायगी॥ १३॥ | | उपायं प्रब्रवीम्यद्य तं कुरुष्व वरानने।<br>शीलं ते दुःखिते काले परित्रातं भविष्यति॥ १३ | | | परेण रक्षिता नारी न भवेच्च पतिव्रता।<br>उपायैः कोटिभिः कामभिन्नचित्तातिचञ्चला॥ १४ | करोड़ों उपाय करनेपर भी दूसरेके द्वारा रक्षित स्त्री पतिव्रता नहीं रह सकती; क्योंकि वह कामसे विचलित मनवाली तथा अत्यन्त चंचल होती है॥ १४॥ | | शीलमेव हि नारीणां सदा रक्षति पापतः।<br>तस्मात्त्वं शीलमास्थाय स्थिरा भव शुचिस्मिते॥ १५ | स्त्रियोंका शील ही पापसे इनकी रक्षा करता है। इसलिये हे पवित्र मुसकानवाली! तुम शीलका आश्रय लेकर धैर्य धारण करो॥ १५॥ | | यदा त्वां नहुषो राजा बलादाकर्षयेत्खलः।<br>तदा त्वं समयं कृत्वा गुप्तं वञ्चय भूपतिम्॥ १६<br>एकान्ते तत्समीपे त्वं गत्वा वद मदालसे।<br>ऋषियानेन दिव्येन मामुपैहि जगत्पते॥ १७<br>एवं तव वशे प्रीता भविष्यामीति मे व्रतम्।<br>इति तं वद सुश्रोणि तदा तु परमोहितः॥ १८<br>कामान्धः स मुनीन् याने योजयिष्यति पार्थिवः।<br>अवश्यं तापसो भूपं शापदग्धं करिष्यति॥ १९ | जब दुष्ट राजा नहुष तुम्हें बलपूर्वक प्राप्त करनेकी चेष्टा करे तब तुम गुप्त प्रतिज्ञा करके राजाको धोखेमें डाल देना। हे मदालसे! तुम एकान्तमें उसके समीप जाकर कहो—हे जगत्पते! आप ऋषियोंके द्वारा वहन किये जानेवाले दिव्य वाहनसे मेरे पास आयें, ऐसा होनेपर मैं प्रेमपूर्वक आपके वशमें हो जाऊँगी—यह मेरी प्रतिज्ञा है। हे सुश्रोणि! तुम उससे ऐसा बोलना, तब मोहित और कामान्ध वह राजा मुनियोंको अपने वाहनमें लगायेगा; इससे तपस्वी अवश्य ही नहुषको शापसे दग्ध कर देंगे॥ १६—१९॥ |