देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 774, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० ९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७६५ |
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| स्वस्था भव विशालाक्षि करोमि तव चेप्सितम्॥ ६९ <br><br> भ्रंशयिष्यामि भूपालं मोहितं त्रिदशासनात्। | शान्तचित्त हो जाओ, मैं तुम्हारा अभिलषित कार्य करूँगी। मैं मोहग्रस्त राजा [नहुष]-को इन्द्रपदसे गिरा दूँगी॥ ६७—६९ १/२॥ | | व्यास उवाच <br> देवीदूती तां गृहीत्वा शक्रपत्नीं त्वरान्विता॥ ७० <br><br> प्रापयामास सान्निध्यं स्वपत्युः परमेश्वरीम्। <br> सा दृष्ट्वा तं पतिं बाला सुरेशं गुप्तसंस्थितम्। <br> मुदिताभूद्वरं वीक्ष्य बहुकालाभिवाञ्छितम्॥ ७१ | व्यासजी बोले—तदनन्तर परमेश्वरी इन्द्रपत्नीको ले जाकर देवीकी दूतीने शीघ्रतापूर्वक उनके पति इन्द्रके पास पहुँचा दिया। गुप्तरूपसे रहते हुए अपने पति उन देवराज इन्द्रको देखकर और इस प्रकार चिरकालसे वांछित अपने वरकी प्राप्ति करके वे शची अत्यन्त प्रसन्न हुई॥ ७०-७१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
इन्द्राण्या शक्रदर्शनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
अथ नवमोऽध्यायः
शचीका इन्द्रसे अपना दुःख कहना, इन्द्रका शचीको सलाह देना कि वह नहुषसे ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें आनेको कहे, नहुषका ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें सवार होना और शापित होकर सर्प होना तथा इन्द्रका पुनः स्वर्गाधिपति बनना
| व्यास उवाच <br> तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं रहः शोकसमान्विताम्। <br> आखण्डलः प्रियां भार्यां विस्मितश्चाब्रवीत्तदा॥ १ | व्यासजी बोले—विशाल नेत्रोंवाली अपनी शोकाकुल प्रिय पत्नीको वहाँ एकान्तमें देखकर इन्द्र आश्चर्यचकित हो गये और बोले—॥ १॥ |
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| कथमत्रागता कान्ते कथं ज्ञातस्त्वया ह्यहम्। <br> दुर्ज्ञेयः सर्वभूतानां संस्थितोऽस्मि शुभानने॥ २ | हे प्रिये! तुम यहाँ कैसे आयी? तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ कि मैं यहाँ हूँ? हे शुभानने! मैं सभी प्राणियोंसे अज्ञात रहते हुए यहाँ निवास कर रहा हूँ॥ २॥ |
| शच्युवाच <br> देव देव्याः प्रसादेन ज्ञातोऽस्यद्य भवानिह। <br> पुनस्तस्याः प्रसादेन प्राप्तास्मि त्वां दिवस्पते॥ ३ | शची बोली—हे देव! देवी भगवतीकी कृपासे आप आज मुझे यहाँ ज्ञात हुए हैं। हे देवेन्द्र! उन्हींकी कृपासे मैं आपको पुनः प्राप्त कर सकी हूँ॥ ३॥ |
| नहुषो नाम राजर्षिः स्थापितो भवदासने। <br> त्रिदशैर्मुनिभिश्चैव स मां बाधति नित्यशः॥ ४ <br><br> पतिं मां कुरु चार्वङ्गि तुरासाहं सुराधिपम्। <br> एवं वदति मां पाप्मा किं करोमि बलार्दन॥ ५ | देवताओं और मुनियोंने नहुष नामक राजर्षिको आपके आसनपर बैठा दिया है; वह मुझे नित्य कष्ट देता है। वह पापी मुझसे इस प्रकार कहता है—हे सुन्दरि! मुझ देवराज इन्द्रको अपना पति बना लो। हे बलार्दन! अब मैं क्या करूँ?॥ ४-५॥ |
| इन्द्र उवाच <br> कालाकाङ्क्षी वरारोहे संस्थितोऽस्मि यदृच्छया। <br> तथा त्वमपि कल्याणि सुस्थिरं स्वमनः कुरु॥ ६ | इन्द्र बोले—हे वरारोहे! हे कल्याणि! जिस प्रकार मैं [अनुकूल] समयकी प्रतीक्षा करते हुए प्रारब्धवश यहाँ रह रहा हूँ, वैसे ही तुम भी अपने मनको पूर्णरूपसे स्थिर करो॥ ६॥ |