देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ७८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं पुण्यानि स्थानानि ह्यसंख्यातानि भूतले।<br>मुनिभिः परिगीतानि पावनानि महीपते॥ १४<br>एषु स्थानेषु सर्वत्र देवीस्थानानि भूपते।<br>दर्शनात्तापहारीणि वसन्ति नियमेन च॥ १५<br>कथयिष्यामि तान्यग्रे प्रसङ्गेन च कानिचित्। | हे राजन्! इस प्रकार इस भूतलपर असंख्य पवित्र पुण्यस्थल हैं, जो मुनियोंद्वारा पवित्र कहे गये हैं। हे राजन्! इन सभी स्थानोंमें देवीके मन्दिर हैं, जो दर्शन कर लेने मात्रसे पापका हरण करते हैं, वहाँ बहुत-से भक्त नियमपूर्वक वास करते हैं। उन कतिपय स्थानोंका वर्णन आगे करूँगा॥ १४-१५ १/२ ॥ |
| तीर्थानि नृप दानानि व्रतानि च मखास्तथा॥ १६<br>तपांसि पुण्यकर्माणि सापेक्षाणि महीपते।<br>द्रव्यशुद्धिं क्रियाशुद्धिं मनःशुद्धिमपेक्ष्य च॥ १७<br>पावनानि हि तीर्थानि तपांसि च व्रतानि च।<br>कदाचिद् द्रव्यशुद्धिः स्यात्क्रियाशुद्धिः कदाचन॥ १८<br>दुर्लभा मनसः शुद्धिः सर्वेषां सर्वदा नृप।<br>मनस्तु चञ्चलं राजन्ननेकविषयाश्रितम्॥ १९<br>कथं शुद्धं भवेद्राजन्नानाभावसमाश्रितम्। | हे राजन्! तीर्थ, दान, व्रत, यज्ञ, तपस्या और सभी पुण्यकर्म शुद्धिसापेक्ष हैं। द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और मानसिक शुद्धिके आधारपर ही तीर्थ, तप और व्रत पवित्र होते हैं। कभी द्रव्यशुद्धि और कभी क्रियाशुद्धि हो पाती है, लेकिन हे राजन्! मानसिक शुद्धि सबके लिये सदा ही दुर्लभ होती है; क्योंकि हे नृप! मन बड़ा चंचल है और अनेक विषयोंमें भटकता रहता है। तब हे राजन्! विविध विषयोंके आश्रित रहनेवाला मन कैसे शुद्ध रह सकता है?॥ १६—१९ १/२ ॥ |
| कामक्रोधौ तथा लोभो ह्यहङ्कारो मदस्तथा॥ २०<br>सर्वविघ्नकरा ह्येते तपस्तीर्थव्रतेषु च।<br>अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः॥ २१<br>स्वधर्मपालनं राजन् सर्वतीर्थफलप्रदम्।<br>नित्यकर्मपरित्यागान्मार्गे संसर्गदोषतः॥ २२<br>व्यर्थं तीर्थाधिगमनं पापमेवावशिष्यते। | काम, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा मद—ये सभी तपस्या, तीर्थसेवन और व्रतोंमें विघ्नकारी होते हैं। हे राजन्! अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह और अपने धर्मका पालन—समस्त तीर्थोंका फल प्रदान करते हैं। नित्यकर्मके परित्याग और मार्गमें संसर्गदोषसे तीर्थमें जाना व्यर्थ हो जाता है, केवल पाप ही लगता है॥ २०—२२ १/२ ॥ |
| क्षालयन्ति हि तीर्थानि सर्वथा देहजं मलम्॥ २३<br>मानसं क्षालितुं तानि न समर्थानि वै नृप।<br>शक्तानि यदि चेत्तानि गङ्गातीरनिवासिनः॥ २४<br>मुनयो द्रोहसंयुक्ताः कथं स्युर्भावितेश्वराः।<br>वसिष्ठसदृशाः प्रह्रा विश्वामित्रादयः किल॥ २५<br>रागद्वेषरताः सर्वे कामक्रोधाकुलाः सदा।<br>चित्तशुद्धिमयं तीर्थं गङ्गादिभ्योऽतिपावनम्॥ २६ | हे राजन्! तीर्थ तो केवल शरीरजन्य मलको ही धोते हैं, वे अन्तःकरणको धोनेमें समर्थ नहीं होते। यदि वे तीर्थ [मनको शुद्ध करनेमें] समर्थ होते तो गंगाके तटपर रहनेवाले विश्वामित्र और वसिष्ठसदृश ईश्वर-चिन्तनपरायण भक्त मुनि द्रोहभावसे युक्त क्यों होते? इस प्रकार तीर्थोंमें रहनेवाले लोग भी सदैव राग-द्वेषपरायण तथा काम-क्रोधसे व्याकुल रहते हैं। अतः चित्तशुद्धिरूपी तीर्थ गंगा आदि तीर्थोंसे भी अधिक पवित्र है॥ २३—२६॥ |
| यदि स्याद्दैवयोगेन क्षालयत्यान्तरं मलम्।<br>विशेषेण तु सत्सङ्गो ज्ञाननिष्ठस्य भूपते॥ २७<br>न वेदा न च शास्त्राणि न व्रतानि तपांसि न।<br>न मखा न च दानानि चित्तशुद्धेस्तु कारणम्॥ २८ | हे राजन्! यदि दैवयोगसे ज्ञाननिष्ठ पुरुषका सत्संग प्राप्त हो जाय तो वह आन्तरिक मैलको धो देता है। हे राजन्! वेद, शास्त्र, व्रत, तप, यज्ञ तथा दान—ये चित्तकी शुद्धिके कारण नहीं हैं॥ २७-२८॥ |