देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 790, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८१ | | :--- | :--- | | वसिष्ठो ब्रह्मणः पुत्रो वेदविद्याविशारदः।<br>रागद्वेषान्वितः कामं गङ्गातीरसमाश्रितः॥ २९<br>आडीबकं महायुद्धं विश्वामित्रवसिष्ठयोः।<br>जातं निरर्थकं द्वेषाद्देवानां विस्मयप्रदम्॥ ३०<br>विश्वामित्रो बकस्तत्र जातः परमतापसः।<br>शप्तः स तु वसिष्ठेन हरिश्चन्द्रस्य कारणात्॥ ३१<br>कौशिकेन वसिष्ठोऽपि शप्त्वाडीदेहभाक्कृतः।<br>शापादाडीबकौ जातौ तौ मुनी विशदप्रभौ॥ ३२<br>निवासं प्राप्तुस्तीरे सरसो मानसस्य च।<br>चक्रतुर्दारुणं युद्धं नखचञ्चुप्रताडनैः॥ ३३<br>वर्षाणामयुतं यावत्तावृषी रोषसंयुतौ।<br>युयुधाते मदोन्मत्तौ सिंहाविव परस्परम्॥ ३४ | ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठ वेदविद्यामें पारंगत थे और गङ्गाजीके तटपर रहते थे, फिर भी वे राग-द्वेषसे युक्त हो गये। विश्वामित्र और वसिष्ठके मध्य देवताओंको भी विस्मयमें डाल देनेवाला आडीबक नामक महायुद्ध हुआ, जो द्वेषके कारण व्यर्थ ही हुआ था। उस युद्धमें परम तपस्वी विश्वामित्र बक हुए थे, उन्हें वसिष्ठने हरिश्चन्द्रके कारण शाप दे दिया था। विश्वामित्रने भी वसिष्ठको शाप देकर आडी पक्षीके देहवाला बना दिया। इस प्रकार निर्मल कान्तिवाले वे दोनों मुनि शापके कारण आडी और बक पक्षीके रूपमें हो गये। वे मानसरोवरके तटपर रहने लगे और वहाँ नखों और चोंचके प्रहारसे भयंकर युद्ध करते रहे। वे दोनों ऋषि मदोन्मत्त सिंहोंके समान रोषयुक्त होकर दस हजार वर्षोंतक आपसमें युद्ध करते रहे॥ २९-३४॥ | | राजोवाच<br>कथं तौ मुनिशार्दूलौ तापसौ धर्मतत्परौ।<br>परस्परं वैरपरौ सञ्जातौ केन हेतुना॥ ३५<br>शापं परस्परं केन कारणेन महामती।<br>दत्तवन्तौ मिथः क्लेशकारकौ दुःखदौ नृणाम्॥ ३६ | राजा बोले— श्रेष्ठ तपस्वी और धर्मपरायण वे दोनों मुनिश्रेष्ठ किस कारण परस्पर वैरपरायण हुए? उन दोनों बुद्धिमान् ऋषियोंने किस कारणसे एक-दूसरेको शाप दिया? जो मनुष्योंके लिये कष्टकारक और दुःखदायक सिद्ध हुए॥ ३५-३६॥ | | व्यास उवाच<br>हरिश्चन्द्रो नृपश्रेष्ठस्त्रिशंकुतनयः पुरा।<br>बभूव रविवंशीयो रामचन्द्रस्य पूर्वजः॥ ३७<br>अनपत्यः स राजर्षिर्वरुणाय महाक्रतुम्।<br>प्रतिजज्ञे पुत्रकामो नरमेधं दुरासदम्॥ ३८<br>वरुणस्तस्य सन्तुष्टो यज्ञस्य नियमे कृते।<br>दधार गर्भं राज्ञस्तु भार्या परमसुन्दरी॥ ३९ | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें सूर्यवंशमें त्रिशंकुके पुत्र हरिश्चन्द्र नामक एक श्रेष्ठ राजा हुए, जो रामचन्द्रजीके पूर्वज थे॥ ३७॥<br>वे राजर्षि सन्तानहीन थे, अतः पुत्रकी कामनासे वरुणदेवकी प्रसन्नताके लिये उन्होंने 'नरमेध' नामक दुष्कर महायज्ञ करनेकी प्रतिज्ञा की। उस यज्ञका व्रत लेनेसे वरुणदेव उनपर प्रसन्न हो गये और राजाकी परम रूपवती भार्याने गर्भ धारण किया॥ ३८-३९॥ | | राजा बभूव सन्तुष्टो दृष्ट्वा भार्यां सदोहदाम्।<br>चकार विधिवत्कर्म गर्भसंस्कारकारकम्॥ ४० | रानीको गर्भवती देखकर राजा प्रसन्न हुए और उन्होंने विधिपूर्वक गर्भको संस्कारित करनेवाला कर्म सम्पन्न कराया॥ ४०॥ | | सुषुवे तनयं नारी सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>मुदं प्राप नृपस्तत्र पुत्रे जाते विशाम्पते॥ ४१<br>कृतवाञ्जातकर्मादिसंस्कारविधिमुत्तमम् ।<br>ददौ हिरण्यं गा दोग्ध्रीर्ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥ ४२ | हे राजन्! रानीने समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया। पुत्रके उत्पन्न होनेपर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने जातकर्म आदि संस्कारकी उत्तम विधि सम्पन्न की। ब्राह्मणोंको विशेषरूपसे स्वर्ण और पयस्विनी गौएँ प्रदान कीं॥ ४१-४२॥ |