देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ७८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जन्मोत्सवेऽतिसंवृत्ते गेहे वै यादसाम्पतिः।<br>आजगाम महाराज विप्रवेषधरस्तथा ॥ ४३<br><br>पूजितः पार्थिवेनाथ दत्त्वा विधिवदासनम्।<br>कार्ये पृष्टेऽब्रवीद्वाक्यं वरुणोऽस्मीति भूपतिम् ॥ ४४<br><br>कुरु यज्ञं सुतं कृत्वा पशुं परमपावनम्।<br>सत्यवाग्भव राजेन्द्र संकल्पस्तु त्वया कृतः ॥ ४५ | हे महाराज ! जब घरमें जन्मोत्सव धूमधामसे मनाया जा रहा था। उसी समय ब्राह्मणका वेश धारण करके वरुणदेव आये, आसन प्रदान करके राजाने विधिवत् उनकी पूजा की। आगमनके विषयमें पूछे जानेपर ‘मैं वरुण हूँ’—यह वाक्य उन्होंने राजासे कहा। हे राजेन्द्र ! जैसा आपने संकल्प किया था, अब अपने पुत्रको बलिपशु बनाकर परम पवित्र यज्ञ कीजिये और सत्यवादी बनिये ॥ ४३-४५ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं राजा विह्वलोऽतिव्यथाकुलः।<br>संस्तभ्याधिं नृपः प्राह वरुणं सत्कृताञ्जलिः॥ ४६<br><br>स्वामिन् करोमि तं यज्ञं सर्वथा विधिपूर्वकम्।<br>मया ते यत्प्रतिज्ञातं भवामि सत्यवागहम्॥ ४७ | उनकी यह बात सुनकर राजा व्यथासे व्याकुल तथा विह्वल हो गये; पुनः अपनी मनोव्यथाको शान्त करके उन्होंने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर वरुणदेवसे कहा—हे स्वामिन् ! मैंने जिस यज्ञका संकल्प लिया है, उस यज्ञको मैं विधिपूर्वक करूँगा और सत्यवादी होऊँगा ॥ ४६-४७ ॥ |
| पूर्णे मासे विशुध्येत धर्मपत्नी सुरोत्तम।<br>विशुद्धायां तु भार्यायां कर्तव्यः स पशोर्मखः॥ ४८ | हे सुरश्रेष्ठ ! एक माह पूर्ण होनेपर मेरी धर्मपत्नी [जननाशौचसे] शुद्ध हो जायँगी, पत्नीके शुद्ध हो जानेपर मैं उस पशुयज्ञको करूँगा ॥ ४८ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ते वचने राज्ञा वरुणः स्वगृहं गतः।<br>राजा बभूव सन्तुष्टः किञ्चिच्चिन्तातुरस्तथा ॥ ४९<br><br>पूर्णे मासि पुनः पाशी परीक्षार्थं नृपालये।<br>आजगाम द्विजो भूत्वा सुवेषः सुष्ठुभाषकः ॥ ५० | व्यासजी बोले—राजाके यह कहनेपर वरुणदेव अपने घर चले गये। अब राजा सन्तुष्ट हो गये, किंतु कुछ-कुछ चिन्तातुर रहने लगे ॥ ४९ ॥<br>एक माह पूर्ण होनेपर वरुणदेव सुन्दर और मृदुभाषी ब्राह्मणका वेश बनाकर परीक्षा लेनेके लिये पुनः राजमहलमें आये ॥ ५० ॥ |
| कृतार्हणं सुखासीनं भूपतिस्तं सुरोत्तमम्।<br>उवाच विनयोपेतो हेतुगर्भं वचस्तदा॥ ५१ | तब सम्यक् रूपसे पूजित होकर सुखदायी आसनपर विराजमान उन सुरश्रेष्ठ वरुणसे राजाने विनयपूर्वक उद्देश्यपरक यह बात कही—॥ ५१ ॥ |
| असंस्कृतं सुतं स्वामिन् यूपे बध्नामि तं कथम्।<br>संस्कृत्य क्षत्रियं कृत्वा यजेऽहं यज्ञमुत्तमम् ॥ ५२ | हे स्वामिन् ! पुत्र तो अभी संस्काररहित है, उसे यूपमें कैसे बाँधूँ ? संस्कार करके उसे क्षत्रिय बनाकर मैं उस उत्तम यज्ञको सम्पन्न करूँगा ॥ ५२ ॥ |
| दयसे यदि देव त्वं ज्ञात्वा दीनं स्वसेवकम्।<br>असंस्कृतस्य बालस्य नाधिकारोऽस्ति कुत्रचित् ॥ ५३ | हे देव ! संस्कारहीन बालकका कहीं भी अधिकार नहीं होता है, अतः यदि मुझपर दया करें तो मुझे अपना सेवक और दीन जानकर कुछ समय और दे दीजिये ॥ ५३ ॥ |
| वरुण उवाच<br>प्रतारयसि राजेन्द्र कृत्वा समयमग्रतः।<br>दुस्त्यजस्तव जानामि सुतस्नेहो ह्यपुत्रिणः ॥ ५४<br><br>गृहं व्रजामि भूपाल वचनात्तव कोमलात्।<br>कियत्कालं प्रतीक्ष्याहमागमिष्यामि ते गृहम् ॥ ५५ | वरुण बोले—हे राजन् ! आप समयको आगे बढ़ाकर धोखा दे रहे हैं; निःसन्तान होनेके कारण आपका पुत्रस्नेह छोड़ना दुष्कर है—इसे मैं जानता हूँ। हे राजेन्द्र ! आपकी मधुर वाणी सुनकर मैं घर जा रहा हूँ, कुछ समयतक प्रतीक्षा करके मैं पुनः आपके |