देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० १२] षष्ठ स्कन्ध ७८३
| भवितव्यं त्वया तात तदा सत्यवचोऽन्वितम्।<br>अन्यथा त्वयि मुञ्चामि कोपं शापसमन्वितम्॥ ५६ | घर आऊँगा। हे तात! उस समय आपको अपनी बातको सत्य सिद्ध करना होगा, अन्यथा मैं क्रुद्ध होकर आपको शाप दे दूँगा॥ ५४—५६॥ |
| राजोवाच<br>समावर्तनकर्मान्ते सर्वथा यादसांपते।<br>कृत्वा पुत्रपशुं यज्ञे यजिष्ये विधिपूर्वकम्॥ ५७ | **राजा बोले—**हे जलाधिनाथ! मैं समावर्तनसंस्कार हो जानेपर पुत्रको यज्ञ-पशु बनाकर विधिपूर्वक यज्ञ करूँगा॥ ५७॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञो वरुणः प्रीतमानसः।<br>तथेत्युक्त्वा ययौ तूर्णं नृपस्तु सुस्थितोऽभवत्॥ ५८ | **व्यासजी बोले—**राजाका यह वचन सुनकर वरुणदेव प्रसन्न होकर 'ठीक है'—ऐसा कहकर तुरंत चले गये और राजा भी स्वस्थचित्त हो गये॥ ५८॥ |
| रोहिताख्य इति ख्यातः सुतस्तस्य विवृद्धिमान्।<br>सञ्जातश्चतुरः सर्वविद्यानां च विशारदः॥ ५९ | इधर राजाका रोहित नामका वह पुत्र बड़ा हो गया; वह बुद्धिमान् और समस्त विद्याओंमें पारंगत हो गया॥ ५९॥ |
| यज्ञस्य कारणं तेन ज्ञातं सर्वं सविस्तरम्।<br>भयभीतस्ततः सोऽपि मत्वा मरणमात्मनः॥ ६० | उसे यज्ञका सब कारण विस्तारपूर्वक ज्ञात हो गया। तब वह अपनी मृत्यु जानकर अत्यन्त भयभीत हो गया॥ ६०॥ |
| कृत्वा पलायनं वीरो गतोऽसौ गिरिगह्वरे।<br>अगम्ये नृपतिस्थाने स्थितस्तत्र भयातुरः॥ ६१ | [एक दिन] वह बालक राजमहलसे भागकर एक अगम्य पर्वतकी गुफामें चला गया और भयग्रस्त होकर वहाँ रहने लगा॥ ६१॥ |
| प्राप्ते कालेऽथ वरुणो यज्ञार्थी नृपतेर्गृहम्।<br>गत्वा तमाह भूपालं कुरु यज्ञं विशांपते॥ ६२ | समय आनेपर वरुणदेव यज्ञकी अभिलाषासे राजमहलमें पहुँचकर उन राजासे बोले—हे राजन्! यज्ञ कीजिये॥ ६२॥ |
| प्रम्लानवदनो राजा तमाह व्यथितेन्द्रियः।<br>किं करोमि गतः क्वापि सुतो मे सुरसत्तम॥ ६३ | यह सुनकर उदास मुखवाले राजाने व्यथित होकर उनसे कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मैं क्या करूँ? मेरा पुत्र कहीं चला गया है॥ ६३॥ |
| श्रुत्वा तद्वचनं राज्ञः कुपितो यादसांपतिः।<br>शशाप तं नृपं कोपादसत्यवादिनं भृशम्॥ ६४ | राजाकी यह बात सुनकर जलचरोंके अधिपति वरुणदेवने क्रुद्ध होकर असत्यवादी राजाको शाप दे दिया—कपटविशारद हे राजन्! तुमने प्रतिज्ञा करके मुझे धोखा दिया है, अतः तुम्हारे शरीरमें जलोदर नामक रोग हो जाय॥ ६४-६५॥ |
| जलोदराभिधो व्याधिर्देहे भवतु ते नृप।<br>यतः प्रतारितश्चाहं कृत्वा कपटपण्डित॥ ६५ | |
| इति शप्त्वा ययौ धाम स्वकं पाशधरस्तदा।<br>राजा चिन्तातुरस्तस्थौ भवने व्याधिपीडितः॥ ६६ | ऐसा शाप देकर पाशधारी वरुणदेव अपने लोकको चले गये और रोगसे पीड़ित होकर राजा अपने महलमें चिन्तित रहने लगे॥ ६६॥ |
| यदातिव्याधितो राजा रोगेण शापजेन ह।<br>तदा शुश्राव पुत्रोऽपि पितरं व्याधिपीडितम्॥ ६७ | जब शापजन्य रोगसे राजा बहुत व्यथित हो गये तब उनके पुत्रने भी पिताके रोग-पीड़ित होनेकी बात सुनी॥ ६७॥ |
| पान्थिकः प्राह पुत्रं हि पिता ते भृशदुःखितः।<br>जलोदरविकारेण शापजेन नृपात्मज॥ ६८ | किसी पथिकने उससे कहा—हे राजपुत्र! शापके कारण जलोदर रोगसे ग्रस्त तुम्हारे पिता बहुत अधिक दुःखी हैं॥ ६८॥ |