देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 793, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| विनष्टं जीवितं तेऽद्य वृथा जातस्य दुर्मते।<br>यत्त्यक्त्वा पितरं दुःस्थं प्राप्तोऽसि गिरिगह्वरम्॥ ६९ | हे दुर्बुद्धि! तुम्हारा जीवन नष्ट हो गया, तुम्हारा जन्म लेना व्यर्थ है; क्योंकि तुम अपने पिताको दुःखी अवस्थामें छोड़कर पर्वतकी गुफामें छिपे हो॥ ६९॥ | | किमनेन शरीरेण प्राप्तं ते जन्मनः फलम्।<br>देहदं दुःखितं कृत्वा स्थितोऽस्यत्र सुताधम॥ ७० | हे कुपुत्र! तुम्हारे इस शरीरसे तुम्हारे जन्म लेनेका क्या लाभ है, जो तुम अपने पिताको दुःखी करके यहाँ रह रहे हो?॥ ७०॥ | | प्राणास्त्याज्याः पितुः कार्ये सत्पुत्रेणेति निश्चयः।<br>त्वदर्थे दुःखितो राजा क्रन्दति व्याधिपीडितः॥ ७१ | राजा हरिश्चन्द्र तुम्हारे लिये दुःखी और व्याधिसे पीड़ित होकर विलाप कर रहे हैं। पिताके लिये सत्पुत्रको प्राणोंतकका त्याग कर देना चाहिये—यह सिद्धान्त है॥ ७१॥ | | व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचस्तथ्यं पान्थिकाद्धर्मसंयुक्तम्।<br>यदा चक्रे मनो गन्तुं द्रष्टुं तातं व्यथातुरम्॥ ७२<br><br>तदा विप्रवपुर्भूत्वा वासवस्तमुपागमत्।<br>रहः प्राह हितं वाक्यं दयावानिव भारत॥ ७३<br><br>मूर्खोऽसि राजपुत्र त्वं गमनाय मतिं वृथा।<br>करोषि पितरं त्वद्य न जानासि व्यथायुतम्॥ ७४ | व्यासजी बोले—तब पथिककी धर्मसंगत बात सुनकर जैसे ही रोहितने पीडाग्रस्त अपने पिताको देखनेके लिये जानेका विचार किया, वैसे ही ब्राह्मणका रूप धारण करके इन्द्र वहाँ आ गये। हे भारत! उन्होंने दयालुकी भाँति एकान्तमें हितकी यह बात कही—हे राजकुमार! तुम मूर्ख हो, जो वहाँ जानेका व्यर्थ विचार कर रहे हो। तुम नहीं जानते कि तुम्हारे पिता तुम्हारे लिये क्यों दुःखी हैं?॥ ७२–७४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हरिश्चन्द्रस्य जलोदरव्याधिपीडावर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करना, विश्वामित्रसे प्राप्त वरुणमन्त्रके जपसे शुनःशेपका मुक्त होना, परस्पर शापसे विश्वामित्र और वसिष्ठका बक तथा आडी होना
| इन्द्र उवाच<br>साहसं कृतवान् राजा पूर्वं यत्कथितो मखः।<br>वरुणाय प्रतिज्ञातः पुत्रं कृत्वा पशुं प्रियम्॥ १ | इन्द्र बोले—पूर्वकालमें राजाने वरुणदेवसे यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अपने प्रिय पुत्रको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करूँगा—यह उन्होंने बड़ा साहस किया था॥ १॥ | | गते त्वयि पिता पुत्रं बद्ध्वा यूपेऽघृणः पुनः।<br>पशुं कृत्वा महाबुद्धे वधिष्यति व्यथातुरः॥ २ | हे महामते! तुम्हारे वहाँ जानेपर रोगसे दुःखी तुम्हारे निर्दयी पिता तुम्हें यज्ञीय पशु बनाकर यूपमें बाँधकर मार डालेंगे॥ २॥ | | इत्थं निषिद्धस्तत्पुत्रः शक्रोणामिततेजसा।<br>स्थितस्तत्रैव मायेशीमायया मोहितो भृशम्॥ ३ | अमित तेजस्वी इन्द्रके द्वारा इस प्रकार रोक दिये जानेपर मायेश्वरीकी मायासे अत्यन्त मोहित होकर वह राजपुत्र वहीं रुक गया॥ ३॥ | | यदा पुनः पुनः श्रुत्वा पितरं रोगपीडितम्।<br>गमनाय मतिं चक्रे तदेन्द्रः प्रत्यषेधयत्॥ ४ | इस प्रकार जब-जब वह पिताको रोगसे पीड़ित सुनकर जानेका विचार करता था, तब-तब इन्द्र उसे रोक देते थे॥ ४॥ |