भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 794

| अ० १३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हरिश्चन्द्रोऽतिदुःखार्तः पप्रच्छ गुरुमन्तिके।<br>स्थितं वसिष्ठमेकान्ते सर्वज्ञं हिततत्परम्॥ ५एक दिन राजा हरिश्चन्द्रने अत्यन्त दुःखी होकर एकान्तमें बैठे हुए सर्वज्ञ और कल्याणकारी गुरु वसिष्ठके पास जाकर पूछा—॥ ५॥
राजोवाच<br>भगवन् किं करोम्यद्य कातरोऽस्मि व्यथाकुलः।<br>त्राहि मां दुःखमनसं महाव्याधिभयातुरम्॥ ६**राजा बोले—**हे भगवन्! मैं क्या करूँ? मैं अत्यन्त भयभीत और कष्टसे पीड़ित हूँ। इस महाव्याधिसे पीड़ित मुझ दुःखितचित्तकी रक्षा कीजिये॥ ६॥
वसिष्ठ उवाच<br>शृणु राजन्नुपायोऽस्ति रोगनाशं प्रति स्तुतः।<br>त्रयोदशविधाः पुत्राः कथिता धर्मसंग्रहे॥ ७**वसिष्ठजी बोले—**हे राजन्! सुनिये, रोगनाशका एक प्रशस्त उपाय है। धर्मशास्त्रमें तेरह प्रकारके पुत्र कहे गये हैं॥ ७॥
तस्मात्क्रीतं सुतं कृत्वा यजस्व मखमुत्तमम्।<br>द्रव्यं दत्त्वा यथेष्टमानयस्व द्विजोत्तमम्॥ ८इसलिये किसी ब्राह्मणके उत्तम बालकको उसका मनोभिलषित धन देकर क्रय करके उसे ले आइये और उत्तम यज्ञको सम्पन्न कीजिये॥ ८॥
एवं कृते मखे भूप रोगनाशो भविष्यति।<br>वरुणोऽपि प्रसन्नात्मा भविष्यति यथासुखम्॥ ९हे राजन्! इस प्रकार यज्ञ करनेसे आपका रोग नष्ट हो जायगा और वरुणदेव भी हर्षित होकर प्रसन्नचित्त हो जायँगे॥ ९॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा प्रोवाच मन्त्रिणम्।<br>अन्वेषय महाबुद्धे विषयेष्वतियत्नतः॥ १०**व्यासजी बोले—**उनकी ऐसी बात सुनकर राजाने मन्त्रीसे कहा—हे महामते! सभी स्थानोंमें प्रयत्नपूर्वक पता लगाइये॥ १०॥
कदाचित्कोऽपि लोभार्थी ददाति स्वसुतं पिता।<br>समानय धनं दत्त्वा यावत्प्रार्थयतेऽप्यसौ॥ ११यदि कोई लोभी पिता अपने पुत्रको देता है तो वह जितना धन माँगे, उतना देकर उसे ले आइये॥ ११॥
सर्वथैव समानेयो यज्ञार्थे द्विजबालकः।<br>न कार्या कृपणा बुद्धिस्त्वया मत्कार्यहेतवे॥ १२सब प्रकारसे प्रयास करके यज्ञके लिये ब्राह्मणबालक लाना ही चाहिये। मेरे कार्यमें तुम्हें किसी भी प्रकारका बुद्धिशैथिल्य नहीं करना चाहिये॥ १२॥
प्रार्थनीयस्त्वया पुत्रः कस्यचिद् द्विजवादिनः।<br>द्रव्येण देहि यज्ञार्थं कर्तव्योऽसौ पशुः किल॥ १३तुम्हें प्रत्येक ब्राह्मणसे प्रार्थना करनी चाहिये कि धन लेकर राजाको पुत्र दे दीजिये, उसे यज्ञके लिये यज्ञीय पशु बनाना है॥ १३॥
इति सञ्चोदितस्तेन सचिवः कार्यहेतवे।<br>अन्वेषयामास पुरे ग्रामे ग्रामे गृहे गृहे॥ १४उन राजासे यह आदेश प्राप्तकर मन्त्रीने यज्ञकार्यके लिये राज्यके प्रत्येक गाँव तथा घरमें पता लगाया॥ १४॥
एवमन्वेषतस्तस्य विषये कश्चिदातुरः।<br>निर्धनस्त्रिसुतश्चासीदजीगर्तैति नामतः॥ १५इस प्रकार राज्यमें पता लगाते हुए उसे अजीगर्त नामक एक दुःखी और निर्धन ब्राह्मण मिला, जिसके तीन पुत्र थे॥ १५॥
तस्य पुत्रं शुनःशेपं मध्यमं मन्त्रिसत्तमः।<br>आनयामास दत्त्वार्थं प्रार्थितं यद्धनं तदा॥ १६उस ब्राह्मणने जितना धन माँगा, उतना देकर वह मन्त्रिश्रेष्ठ उसके मझले पुत्र शुनःशेपको ले आया॥ १६॥
समानीय शुनःशेपं सचिवः कार्यतत्परः।<br>राज्ञे निवेदयामास पशुयोग्यं द्विजात्मजम्॥ १७कार्यकुशल मन्त्रीने पशुयोग्य ब्राह्मणपुत्र शुनःशेपको लाकर राजाको समर्पित कर दिया॥ १७॥