देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ७८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं पुण्यानि स्थानानि ह्यसंख्यातानि भूतले।<br>मुनिभिः परिगीतानि पावनानि महीपते॥ १४<br>एषु स्थानेषु सर्वत्र देवीस्थानानि भूपते।<br>दर्शनात्तापहारीणि वसन्ति नियमेन च॥ १५<br>कथयिष्यामि तान्यग्रे प्रसङ्गेन च कानिचित्। | हे राजन्! इस प्रकार इस भूतलपर असंख्य पवित्र पुण्यस्थल हैं, जो मुनियोंद्वारा पवित्र कहे गये हैं। हे राजन्! इन सभी स्थानोंमें देवीके मन्दिर हैं, जो दर्शन कर लेने मात्रसे पापका हरण करते हैं, वहाँ बहुत-से भक्त नियमपूर्वक वास करते हैं। उन कतिपय स्थानोंका वर्णन आगे करूँगा॥ १४-१५ १/२ ॥ |
| तीर्थानि नृप दानानि व्रतानि च मखास्तथा॥ १६<br>तपांसि पुण्यकर्माणि सापेक्षाणि महीपते।<br>द्रव्यशुद्धिं क्रियाशुद्धिं मनःशुद्धिमपेक्ष्य च॥ १७<br>पावनानि हि तीर्थानि तपांसि च व्रतानि च।<br>कदाचिद् द्रव्यशुद्धिः स्यात्क्रियाशुद्धिः कदाचन॥ १८<br>दुर्लभा मनसः शुद्धिः सर्वेषां सर्वदा नृप।<br>मनस्तु चञ्चलं राजन्ननेकविषयाश्रितम्॥ १९<br>कथं शुद्धं भवेद्राजन्नानाभावसमाश्रितम्। | हे राजन्! तीर्थ, दान, व्रत, यज्ञ, तपस्या और सभी पुण्यकर्म शुद्धिसापेक्ष हैं। द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और मानसिक शुद्धिके आधारपर ही तीर्थ, तप और व्रत पवित्र होते हैं। कभी द्रव्यशुद्धि और कभी क्रियाशुद्धि हो पाती है, लेकिन हे राजन्! मानसिक शुद्धि सबके लिये सदा ही दुर्लभ होती है; क्योंकि हे नृप! मन बड़ा चंचल है और अनेक विषयोंमें भटकता रहता है। तब हे राजन्! विविध विषयोंके आश्रित रहनेवाला मन कैसे शुद्ध रह सकता है?॥ १६—१९ १/२ ॥ |
| कामक्रोधौ तथा लोभो ह्यहङ्कारो मदस्तथा॥ २०<br>सर्वविघ्नकरा ह्येते तपस्तीर्थव्रतेषु च।<br>अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः॥ २१<br>स्वधर्मपालनं राजन् सर्वतीर्थफलप्रदम्।<br>नित्यकर्मपरित्यागान्मार्गे संसर्गदोषतः॥ २२<br>व्यर्थं तीर्थाधिगमनं पापमेवावशिष्यते। | काम, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा मद—ये सभी तपस्या, तीर्थसेवन और व्रतोंमें विघ्नकारी होते हैं। हे राजन्! अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह और अपने धर्मका पालन—समस्त तीर्थोंका फल प्रदान करते हैं। नित्यकर्मके परित्याग और मार्गमें संसर्गदोषसे तीर्थमें जाना व्यर्थ हो जाता है, केवल पाप ही लगता है॥ २०—२२ १/२ ॥ |
| क्षालयन्ति हि तीर्थानि सर्वथा देहजं मलम्॥ २३<br>मानसं क्षालितुं तानि न समर्थानि वै नृप।<br>शक्तानि यदि चेत्तानि गङ्गातीरनिवासिनः॥ २४<br>मुनयो द्रोहसंयुक्ताः कथं स्युर्भावितेश्वराः।<br>वसिष्ठसदृशाः प्रह्रा विश्वामित्रादयः किल॥ २५<br>रागद्वेषरताः सर्वे कामक्रोधाकुलाः सदा।<br>चित्तशुद्धिमयं तीर्थं गङ्गादिभ्योऽतिपावनम्॥ २६ | हे राजन्! तीर्थ तो केवल शरीरजन्य मलको ही धोते हैं, वे अन्तःकरणको धोनेमें समर्थ नहीं होते। यदि वे तीर्थ [मनको शुद्ध करनेमें] समर्थ होते तो गंगाके तटपर रहनेवाले विश्वामित्र और वसिष्ठसदृश ईश्वर-चिन्तनपरायण भक्त मुनि द्रोहभावसे युक्त क्यों होते? इस प्रकार तीर्थोंमें रहनेवाले लोग भी सदैव राग-द्वेषपरायण तथा काम-क्रोधसे व्याकुल रहते हैं। अतः चित्तशुद्धिरूपी तीर्थ गंगा आदि तीर्थोंसे भी अधिक पवित्र है॥ २३—२६॥ |
| यदि स्याद्दैवयोगेन क्षालयत्यान्तरं मलम्।<br>विशेषेण तु सत्सङ्गो ज्ञाननिष्ठस्य भूपते॥ २७<br>न वेदा न च शास्त्राणि न व्रतानि तपांसि न।<br>न मखा न च दानानि चित्तशुद्धेस्तु कारणम्॥ २८ | हे राजन्! यदि दैवयोगसे ज्ञाननिष्ठ पुरुषका सत्संग प्राप्त हो जाय तो वह आन्तरिक मैलको धो देता है। हे राजन्! वेद, शास्त्र, व्रत, तप, यज्ञ तथा दान—ये चित्तकी शुद्धिके कारण नहीं हैं॥ २७-२८॥ |
| अ० १२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८१ | | :--- | :--- | | वसिष्ठो ब्रह्मणः पुत्रो वेदविद्याविशारदः।<br>रागद्वेषान्वितः कामं गङ्गातीरसमाश्रितः॥ २९<br>आडीबकं महायुद्धं विश्वामित्रवसिष्ठयोः।<br>जातं निरर्थकं द्वेषाद्देवानां विस्मयप्रदम्॥ ३०<br>विश्वामित्रो बकस्तत्र जातः परमतापसः।<br>शप्तः स तु वसिष्ठेन हरिश्चन्द्रस्य कारणात्॥ ३१<br>कौशिकेन वसिष्ठोऽपि शप्त्वाडीदेहभाक्कृतः।<br>शापादाडीबकौ जातौ तौ मुनी विशदप्रभौ॥ ३२<br>निवासं प्राप्तुस्तीरे सरसो मानसस्य च।<br>चक्रतुर्दारुणं युद्धं नखचञ्चुप्रताडनैः॥ ३३<br>वर्षाणामयुतं यावत्तावृषी रोषसंयुतौ।<br>युयुधाते मदोन्मत्तौ सिंहाविव परस्परम्॥ ३४ | ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठ वेदविद्यामें पारंगत थे और गङ्गाजीके तटपर रहते थे, फिर भी वे राग-द्वेषसे युक्त हो गये। विश्वामित्र और वसिष्ठके मध्य देवताओंको भी विस्मयमें डाल देनेवाला आडीबक नामक महायुद्ध हुआ, जो द्वेषके कारण व्यर्थ ही हुआ था। उस युद्धमें परम तपस्वी विश्वामित्र बक हुए थे, उन्हें वसिष्ठने हरिश्चन्द्रके कारण शाप दे दिया था। विश्वामित्रने भी वसिष्ठको शाप देकर आडी पक्षीके देहवाला बना दिया। इस प्रकार निर्मल कान्तिवाले वे दोनों मुनि शापके कारण आडी और बक पक्षीके रूपमें हो गये। वे मानसरोवरके तटपर रहने लगे और वहाँ नखों और चोंचके प्रहारसे भयंकर युद्ध करते रहे। वे दोनों ऋषि मदोन्मत्त सिंहोंके समान रोषयुक्त होकर दस हजार वर्षोंतक आपसमें युद्ध करते रहे॥ २९-३४॥ | | राजोवाच<br>कथं तौ मुनिशार्दूलौ तापसौ धर्मतत्परौ।<br>परस्परं वैरपरौ सञ्जातौ केन हेतुना॥ ३५<br>शापं परस्परं केन कारणेन महामती।<br>दत्तवन्तौ मिथः क्लेशकारकौ दुःखदौ नृणाम्॥ ३६ | राजा बोले— श्रेष्ठ तपस्वी और धर्मपरायण वे दोनों मुनिश्रेष्ठ किस कारण परस्पर वैरपरायण हुए? उन दोनों बुद्धिमान् ऋषियोंने किस कारणसे एक-दूसरेको शाप दिया? जो मनुष्योंके लिये कष्टकारक और दुःखदायक सिद्ध हुए॥ ३५-३६॥ | | व्यास उवाच<br>हरिश्चन्द्रो नृपश्रेष्ठस्त्रिशंकुतनयः पुरा।<br>बभूव रविवंशीयो रामचन्द्रस्य पूर्वजः॥ ३७<br>अनपत्यः स राजर्षिर्वरुणाय महाक्रतुम्।<br>प्रतिजज्ञे पुत्रकामो नरमेधं दुरासदम्॥ ३८<br>वरुणस्तस्य सन्तुष्टो यज्ञस्य नियमे कृते।<br>दधार गर्भं राज्ञस्तु भार्या परमसुन्दरी॥ ३९ | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें सूर्यवंशमें त्रिशंकुके पुत्र हरिश्चन्द्र नामक एक श्रेष्ठ राजा हुए, जो रामचन्द्रजीके पूर्वज थे॥ ३७॥<br>वे राजर्षि सन्तानहीन थे, अतः पुत्रकी कामनासे वरुणदेवकी प्रसन्नताके लिये उन्होंने 'नरमेध' नामक दुष्कर महायज्ञ करनेकी प्रतिज्ञा की। उस यज्ञका व्रत लेनेसे वरुणदेव उनपर प्रसन्न हो गये और राजाकी परम रूपवती भार्याने गर्भ धारण किया॥ ३८-३९॥ | | राजा बभूव सन्तुष्टो दृष्ट्वा भार्यां सदोहदाम्।<br>चकार विधिवत्कर्म गर्भसंस्कारकारकम्॥ ४० | रानीको गर्भवती देखकर राजा प्रसन्न हुए और उन्होंने विधिपूर्वक गर्भको संस्कारित करनेवाला कर्म सम्पन्न कराया॥ ४०॥ | | सुषुवे तनयं नारी सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>मुदं प्राप नृपस्तत्र पुत्रे जाते विशाम्पते॥ ४१<br>कृतवाञ्जातकर्मादिसंस्कारविधिमुत्तमम् ।<br>ददौ हिरण्यं गा दोग्ध्रीर्ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥ ४२ | हे राजन्! रानीने समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया। पुत्रके उत्पन्न होनेपर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने जातकर्म आदि संस्कारकी उत्तम विधि सम्पन्न की। ब्राह्मणोंको विशेषरूपसे स्वर्ण और पयस्विनी गौएँ प्रदान कीं॥ ४१-४२॥ |
| ७८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जन्मोत्सवेऽतिसंवृत्ते गेहे वै यादसाम्पतिः।<br>आजगाम महाराज विप्रवेषधरस्तथा ॥ ४३<br><br>पूजितः पार्थिवेनाथ दत्त्वा विधिवदासनम्।<br>कार्ये पृष्टेऽब्रवीद्वाक्यं वरुणोऽस्मीति भूपतिम् ॥ ४४<br><br>कुरु यज्ञं सुतं कृत्वा पशुं परमपावनम्।<br>सत्यवाग्भव राजेन्द्र संकल्पस्तु त्वया कृतः ॥ ४५ | हे महाराज ! जब घरमें जन्मोत्सव धूमधामसे मनाया जा रहा था। उसी समय ब्राह्मणका वेश धारण करके वरुणदेव आये, आसन प्रदान करके राजाने विधिवत् उनकी पूजा की। आगमनके विषयमें पूछे जानेपर ‘मैं वरुण हूँ’—यह वाक्य उन्होंने राजासे कहा। हे राजेन्द्र ! जैसा आपने संकल्प किया था, अब अपने पुत्रको बलिपशु बनाकर परम पवित्र यज्ञ कीजिये और सत्यवादी बनिये ॥ ४३-४५ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं राजा विह्वलोऽतिव्यथाकुलः।<br>संस्तभ्याधिं नृपः प्राह वरुणं सत्कृताञ्जलिः॥ ४६<br><br>स्वामिन् करोमि तं यज्ञं सर्वथा विधिपूर्वकम्।<br>मया ते यत्प्रतिज्ञातं भवामि सत्यवागहम्॥ ४७ | उनकी यह बात सुनकर राजा व्यथासे व्याकुल तथा विह्वल हो गये; पुनः अपनी मनोव्यथाको शान्त करके उन्होंने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर वरुणदेवसे कहा—हे स्वामिन् ! मैंने जिस यज्ञका संकल्प लिया है, उस यज्ञको मैं विधिपूर्वक करूँगा और सत्यवादी होऊँगा ॥ ४६-४७ ॥ |
| पूर्णे मासे विशुध्येत धर्मपत्नी सुरोत्तम।<br>विशुद्धायां तु भार्यायां कर्तव्यः स पशोर्मखः॥ ४८ | हे सुरश्रेष्ठ ! एक माह पूर्ण होनेपर मेरी धर्मपत्नी [जननाशौचसे] शुद्ध हो जायँगी, पत्नीके शुद्ध हो जानेपर मैं उस पशुयज्ञको करूँगा ॥ ४८ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ते वचने राज्ञा वरुणः स्वगृहं गतः।<br>राजा बभूव सन्तुष्टः किञ्चिच्चिन्तातुरस्तथा ॥ ४९<br><br>पूर्णे मासि पुनः पाशी परीक्षार्थं नृपालये।<br>आजगाम द्विजो भूत्वा सुवेषः सुष्ठुभाषकः ॥ ५० | व्यासजी बोले—राजाके यह कहनेपर वरुणदेव अपने घर चले गये। अब राजा सन्तुष्ट हो गये, किंतु कुछ-कुछ चिन्तातुर रहने लगे ॥ ४९ ॥<br>एक माह पूर्ण होनेपर वरुणदेव सुन्दर और मृदुभाषी ब्राह्मणका वेश बनाकर परीक्षा लेनेके लिये पुनः राजमहलमें आये ॥ ५० ॥ |
| कृतार्हणं सुखासीनं भूपतिस्तं सुरोत्तमम्।<br>उवाच विनयोपेतो हेतुगर्भं वचस्तदा॥ ५१ | तब सम्यक् रूपसे पूजित होकर सुखदायी आसनपर विराजमान उन सुरश्रेष्ठ वरुणसे राजाने विनयपूर्वक उद्देश्यपरक यह बात कही—॥ ५१ ॥ |
| असंस्कृतं सुतं स्वामिन् यूपे बध्नामि तं कथम्।<br>संस्कृत्य क्षत्रियं कृत्वा यजेऽहं यज्ञमुत्तमम् ॥ ५२ | हे स्वामिन् ! पुत्र तो अभी संस्काररहित है, उसे यूपमें कैसे बाँधूँ ? संस्कार करके उसे क्षत्रिय बनाकर मैं उस उत्तम यज्ञको सम्पन्न करूँगा ॥ ५२ ॥ |
| दयसे यदि देव त्वं ज्ञात्वा दीनं स्वसेवकम्।<br>असंस्कृतस्य बालस्य नाधिकारोऽस्ति कुत्रचित् ॥ ५३ | हे देव ! संस्कारहीन बालकका कहीं भी अधिकार नहीं होता है, अतः यदि मुझपर दया करें तो मुझे अपना सेवक और दीन जानकर कुछ समय और दे दीजिये ॥ ५३ ॥ |
| वरुण उवाच<br>प्रतारयसि राजेन्द्र कृत्वा समयमग्रतः।<br>दुस्त्यजस्तव जानामि सुतस्नेहो ह्यपुत्रिणः ॥ ५४<br><br>गृहं व्रजामि भूपाल वचनात्तव कोमलात्।<br>कियत्कालं प्रतीक्ष्याहमागमिष्यामि ते गृहम् ॥ ५५ | वरुण बोले—हे राजन् ! आप समयको आगे बढ़ाकर धोखा दे रहे हैं; निःसन्तान होनेके कारण आपका पुत्रस्नेह छोड़ना दुष्कर है—इसे मैं जानता हूँ। हे राजेन्द्र ! आपकी मधुर वाणी सुनकर मैं घर जा रहा हूँ, कुछ समयतक प्रतीक्षा करके मैं पुनः आपके |
अ० १२] षष्ठ स्कन्ध ७८३
अ० १२] षष्ठ स्कन्ध ७८३
| भवितव्यं त्वया तात तदा सत्यवचोऽन्वितम्।<br>अन्यथा त्वयि मुञ्चामि कोपं शापसमन्वितम्॥ ५६ | घर आऊँगा। हे तात! उस समय आपको अपनी बातको सत्य सिद्ध करना होगा, अन्यथा मैं क्रुद्ध होकर आपको शाप दे दूँगा॥ ५४—५६॥ |
| राजोवाच<br>समावर्तनकर्मान्ते सर्वथा यादसांपते।<br>कृत्वा पुत्रपशुं यज्ञे यजिष्ये विधिपूर्वकम्॥ ५७ | **राजा बोले—**हे जलाधिनाथ! मैं समावर्तनसंस्कार हो जानेपर पुत्रको यज्ञ-पशु बनाकर विधिपूर्वक यज्ञ करूँगा॥ ५७॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञो वरुणः प्रीतमानसः।<br>तथेत्युक्त्वा ययौ तूर्णं नृपस्तु सुस्थितोऽभवत्॥ ५८ | **व्यासजी बोले—**राजाका यह वचन सुनकर वरुणदेव प्रसन्न होकर 'ठीक है'—ऐसा कहकर तुरंत चले गये और राजा भी स्वस्थचित्त हो गये॥ ५८॥ |
| रोहिताख्य इति ख्यातः सुतस्तस्य विवृद्धिमान्।<br>सञ्जातश्चतुरः सर्वविद्यानां च विशारदः॥ ५९ | इधर राजाका रोहित नामका वह पुत्र बड़ा हो गया; वह बुद्धिमान् और समस्त विद्याओंमें पारंगत हो गया॥ ५९॥ |
| यज्ञस्य कारणं तेन ज्ञातं सर्वं सविस्तरम्।<br>भयभीतस्ततः सोऽपि मत्वा मरणमात्मनः॥ ६० | उसे यज्ञका सब कारण विस्तारपूर्वक ज्ञात हो गया। तब वह अपनी मृत्यु जानकर अत्यन्त भयभीत हो गया॥ ६०॥ |
| कृत्वा पलायनं वीरो गतोऽसौ गिरिगह्वरे।<br>अगम्ये नृपतिस्थाने स्थितस्तत्र भयातुरः॥ ६१ | [एक दिन] वह बालक राजमहलसे भागकर एक अगम्य पर्वतकी गुफामें चला गया और भयग्रस्त होकर वहाँ रहने लगा॥ ६१॥ |
| प्राप्ते कालेऽथ वरुणो यज्ञार्थी नृपतेर्गृहम्।<br>गत्वा तमाह भूपालं कुरु यज्ञं विशांपते॥ ६२ | समय आनेपर वरुणदेव यज्ञकी अभिलाषासे राजमहलमें पहुँचकर उन राजासे बोले—हे राजन्! यज्ञ कीजिये॥ ६२॥ |
| प्रम्लानवदनो राजा तमाह व्यथितेन्द्रियः।<br>किं करोमि गतः क्वापि सुतो मे सुरसत्तम॥ ६३ | यह सुनकर उदास मुखवाले राजाने व्यथित होकर उनसे कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मैं क्या करूँ? मेरा पुत्र कहीं चला गया है॥ ६३॥ |
| श्रुत्वा तद्वचनं राज्ञः कुपितो यादसांपतिः।<br>शशाप तं नृपं कोपादसत्यवादिनं भृशम्॥ ६४ | राजाकी यह बात सुनकर जलचरोंके अधिपति वरुणदेवने क्रुद्ध होकर असत्यवादी राजाको शाप दे दिया—कपटविशारद हे राजन्! तुमने प्रतिज्ञा करके मुझे धोखा दिया है, अतः तुम्हारे शरीरमें जलोदर नामक रोग हो जाय॥ ६४-६५॥ |
| जलोदराभिधो व्याधिर्देहे भवतु ते नृप।<br>यतः प्रतारितश्चाहं कृत्वा कपटपण्डित॥ ६५ | |
| इति शप्त्वा ययौ धाम स्वकं पाशधरस्तदा।<br>राजा चिन्तातुरस्तस्थौ भवने व्याधिपीडितः॥ ६६ | ऐसा शाप देकर पाशधारी वरुणदेव अपने लोकको चले गये और रोगसे पीड़ित होकर राजा अपने महलमें चिन्तित रहने लगे॥ ६६॥ |
| यदातिव्याधितो राजा रोगेण शापजेन ह।<br>तदा शुश्राव पुत्रोऽपि पितरं व्याधिपीडितम्॥ ६७ | जब शापजन्य रोगसे राजा बहुत व्यथित हो गये तब उनके पुत्रने भी पिताके रोग-पीड़ित होनेकी बात सुनी॥ ६७॥ |
| पान्थिकः प्राह पुत्रं हि पिता ते भृशदुःखितः।<br>जलोदरविकारेण शापजेन नृपात्मज॥ ६८ | किसी पथिकने उससे कहा—हे राजपुत्र! शापके कारण जलोदर रोगसे ग्रस्त तुम्हारे पिता बहुत अधिक दुःखी हैं॥ ६८॥ |
| ७८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| विनष्टं जीवितं तेऽद्य वृथा जातस्य दुर्मते।<br>यत्त्यक्त्वा पितरं दुःस्थं प्राप्तोऽसि गिरिगह्वरम्॥ ६९ | हे दुर्बुद्धि! तुम्हारा जीवन नष्ट हो गया, तुम्हारा जन्म लेना व्यर्थ है; क्योंकि तुम अपने पिताको दुःखी अवस्थामें छोड़कर पर्वतकी गुफामें छिपे हो॥ ६९॥ | | किमनेन शरीरेण प्राप्तं ते जन्मनः फलम्।<br>देहदं दुःखितं कृत्वा स्थितोऽस्यत्र सुताधम॥ ७० | हे कुपुत्र! तुम्हारे इस शरीरसे तुम्हारे जन्म लेनेका क्या लाभ है, जो तुम अपने पिताको दुःखी करके यहाँ रह रहे हो?॥ ७०॥ | | प्राणास्त्याज्याः पितुः कार्ये सत्पुत्रेणेति निश्चयः।<br>त्वदर्थे दुःखितो राजा क्रन्दति व्याधिपीडितः॥ ७१ | राजा हरिश्चन्द्र तुम्हारे लिये दुःखी और व्याधिसे पीड़ित होकर विलाप कर रहे हैं। पिताके लिये सत्पुत्रको प्राणोंतकका त्याग कर देना चाहिये—यह सिद्धान्त है॥ ७१॥ | | व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचस्तथ्यं पान्थिकाद्धर्मसंयुक्तम्।<br>यदा चक्रे मनो गन्तुं द्रष्टुं तातं व्यथातुरम्॥ ७२<br><br>तदा विप्रवपुर्भूत्वा वासवस्तमुपागमत्।<br>रहः प्राह हितं वाक्यं दयावानिव भारत॥ ७३<br><br>मूर्खोऽसि राजपुत्र त्वं गमनाय मतिं वृथा।<br>करोषि पितरं त्वद्य न जानासि व्यथायुतम्॥ ७४ | व्यासजी बोले—तब पथिककी धर्मसंगत बात सुनकर जैसे ही रोहितने पीडाग्रस्त अपने पिताको देखनेके लिये जानेका विचार किया, वैसे ही ब्राह्मणका रूप धारण करके इन्द्र वहाँ आ गये। हे भारत! उन्होंने दयालुकी भाँति एकान्तमें हितकी यह बात कही—हे राजकुमार! तुम मूर्ख हो, जो वहाँ जानेका व्यर्थ विचार कर रहे हो। तुम नहीं जानते कि तुम्हारे पिता तुम्हारे लिये क्यों दुःखी हैं?॥ ७२–७४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हरिश्चन्द्रस्य जलोदरव्याधिपीडावर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करना, विश्वामित्रसे प्राप्त वरुणमन्त्रके जपसे शुनःशेपका मुक्त होना, परस्पर शापसे विश्वामित्र और वसिष्ठका बक तथा आडी होना
| इन्द्र उवाच<br>साहसं कृतवान् राजा पूर्वं यत्कथितो मखः।<br>वरुणाय प्रतिज्ञातः पुत्रं कृत्वा पशुं प्रियम्॥ १ | इन्द्र बोले—पूर्वकालमें राजाने वरुणदेवसे यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अपने प्रिय पुत्रको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करूँगा—यह उन्होंने बड़ा साहस किया था॥ १॥ | | गते त्वयि पिता पुत्रं बद्ध्वा यूपेऽघृणः पुनः।<br>पशुं कृत्वा महाबुद्धे वधिष्यति व्यथातुरः॥ २ | हे महामते! तुम्हारे वहाँ जानेपर रोगसे दुःखी तुम्हारे निर्दयी पिता तुम्हें यज्ञीय पशु बनाकर यूपमें बाँधकर मार डालेंगे॥ २॥ | | इत्थं निषिद्धस्तत्पुत्रः शक्रोणामिततेजसा।<br>स्थितस्तत्रैव मायेशीमायया मोहितो भृशम्॥ ३ | अमित तेजस्वी इन्द्रके द्वारा इस प्रकार रोक दिये जानेपर मायेश्वरीकी मायासे अत्यन्त मोहित होकर वह राजपुत्र वहीं रुक गया॥ ३॥ | | यदा पुनः पुनः श्रुत्वा पितरं रोगपीडितम्।<br>गमनाय मतिं चक्रे तदेन्द्रः प्रत्यषेधयत्॥ ४ | इस प्रकार जब-जब वह पिताको रोगसे पीड़ित सुनकर जानेका विचार करता था, तब-तब इन्द्र उसे रोक देते थे॥ ४॥ |
| अ० १३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हरिश्चन्द्रोऽतिदुःखार्तः पप्रच्छ गुरुमन्तिके।<br>स्थितं वसिष्ठमेकान्ते सर्वज्ञं हिततत्परम्॥ ५ | एक दिन राजा हरिश्चन्द्रने अत्यन्त दुःखी होकर एकान्तमें बैठे हुए सर्वज्ञ और कल्याणकारी गुरु वसिष्ठके पास जाकर पूछा—॥ ५॥ |
| राजोवाच<br>भगवन् किं करोम्यद्य कातरोऽस्मि व्यथाकुलः।<br>त्राहि मां दुःखमनसं महाव्याधिभयातुरम्॥ ६ | **राजा बोले—**हे भगवन्! मैं क्या करूँ? मैं अत्यन्त भयभीत और कष्टसे पीड़ित हूँ। इस महाव्याधिसे पीड़ित मुझ दुःखितचित्तकी रक्षा कीजिये॥ ६॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>शृणु राजन्नुपायोऽस्ति रोगनाशं प्रति स्तुतः।<br>त्रयोदशविधाः पुत्राः कथिता धर्मसंग्रहे॥ ७ | **वसिष्ठजी बोले—**हे राजन्! सुनिये, रोगनाशका एक प्रशस्त उपाय है। धर्मशास्त्रमें तेरह प्रकारके पुत्र कहे गये हैं॥ ७॥ |
| तस्मात्क्रीतं सुतं कृत्वा यजस्व मखमुत्तमम्।<br>द्रव्यं दत्त्वा यथेष्टमानयस्व द्विजोत्तमम्॥ ८ | इसलिये किसी ब्राह्मणके उत्तम बालकको उसका मनोभिलषित धन देकर क्रय करके उसे ले आइये और उत्तम यज्ञको सम्पन्न कीजिये॥ ८॥ |
| एवं कृते मखे भूप रोगनाशो भविष्यति।<br>वरुणोऽपि प्रसन्नात्मा भविष्यति यथासुखम्॥ ९ | हे राजन्! इस प्रकार यज्ञ करनेसे आपका रोग नष्ट हो जायगा और वरुणदेव भी हर्षित होकर प्रसन्नचित्त हो जायँगे॥ ९॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा प्रोवाच मन्त्रिणम्।<br>अन्वेषय महाबुद्धे विषयेष्वतियत्नतः॥ १० | **व्यासजी बोले—**उनकी ऐसी बात सुनकर राजाने मन्त्रीसे कहा—हे महामते! सभी स्थानोंमें प्रयत्नपूर्वक पता लगाइये॥ १०॥ |
| कदाचित्कोऽपि लोभार्थी ददाति स्वसुतं पिता।<br>समानय धनं दत्त्वा यावत्प्रार्थयतेऽप्यसौ॥ ११ | यदि कोई लोभी पिता अपने पुत्रको देता है तो वह जितना धन माँगे, उतना देकर उसे ले आइये॥ ११॥ |
| सर्वथैव समानेयो यज्ञार्थे द्विजबालकः।<br>न कार्या कृपणा बुद्धिस्त्वया मत्कार्यहेतवे॥ १२ | सब प्रकारसे प्रयास करके यज्ञके लिये ब्राह्मणबालक लाना ही चाहिये। मेरे कार्यमें तुम्हें किसी भी प्रकारका बुद्धिशैथिल्य नहीं करना चाहिये॥ १२॥ |
| प्रार्थनीयस्त्वया पुत्रः कस्यचिद् द्विजवादिनः।<br>द्रव्येण देहि यज्ञार्थं कर्तव्योऽसौ पशुः किल॥ १३ | तुम्हें प्रत्येक ब्राह्मणसे प्रार्थना करनी चाहिये कि धन लेकर राजाको पुत्र दे दीजिये, उसे यज्ञके लिये यज्ञीय पशु बनाना है॥ १३॥ |
| इति सञ्चोदितस्तेन सचिवः कार्यहेतवे।<br>अन्वेषयामास पुरे ग्रामे ग्रामे गृहे गृहे॥ १४ | उन राजासे यह आदेश प्राप्तकर मन्त्रीने यज्ञकार्यके लिये राज्यके प्रत्येक गाँव तथा घरमें पता लगाया॥ १४॥ |
| एवमन्वेषतस्तस्य विषये कश्चिदातुरः।<br>निर्धनस्त्रिसुतश्चासीदजीगर्तैति नामतः॥ १५ | इस प्रकार राज्यमें पता लगाते हुए उसे अजीगर्त नामक एक दुःखी और निर्धन ब्राह्मण मिला, जिसके तीन पुत्र थे॥ १५॥ |
| तस्य पुत्रं शुनःशेपं मध्यमं मन्त्रिसत्तमः।<br>आनयामास दत्त्वार्थं प्रार्थितं यद्धनं तदा॥ १६ | उस ब्राह्मणने जितना धन माँगा, उतना देकर वह मन्त्रिश्रेष्ठ उसके मझले पुत्र शुनःशेपको ले आया॥ १६॥ |
| समानीय शुनःशेपं सचिवः कार्यतत्परः।<br>राज्ञे निवेदयामास पशुयोग्यं द्विजात्मजम्॥ १७ | कार्यकुशल मन्त्रीने पशुयोग्य ब्राह्मणपुत्र शुनःशेपको लाकर राजाको समर्पित कर दिया॥ १७॥ |
| ७८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजातिमुदितस्तेन विप्रानानीय सर्वतः।<br>कारयामास सम्भारान्यज्ञार्थं वेदवित्तमान्॥ १८ | इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर राजाने वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर यज्ञके लिये सामग्री एकत्र करवायी॥ १८॥ |
| प्रारब्धे तु मखे तत्र विश्वामित्रो महामुनिः।<br>बद्धं दृष्ट्वा शुनःशेपं निषिषेध नृपं तदा॥ १९ | यज्ञके प्रारम्भ होनेपर महामुनि विश्वामित्रने वहाँ शुनः-शेपको बँधा देखकर राजाको मना करते हुए कहा—॥ १९॥ |
| राजन्मा साहसं कार्षीर्मुञ्चैनं द्विजबालकम्।<br>प्रार्थयाम्यहमायुष्मन् सुखं तेऽद्य भविष्यति॥ २० | हे राजन्! ऐसा साहस न कीजिये, इस ब्राह्मणबालकको छोड़ दीजिये। हे आयुष्मन्! मैं प्रार्थना करता हूँ, इससे आपको सुखकी प्राप्ति होगी॥ २०॥ |
| क्रन्दत्ययं शुनःशेपः करुणा मां दुनोत्यपि।<br>दयावान्भव राजेन्द्र कुरु मे वचनं नृप॥ २१ | यह शुनःशेप क्रन्दन कर रहा है, अतः करुणा मुझे बहुत व्यथित कर रही है। हे राजेन्द्र! मेरी बात मानिये; हे नृप! दयावान् बनिये॥ २१॥ |
| परदेहस्य रक्षायै स्वदेहं ये दयापराः।<br>ददति क्षत्रियाः पूर्वं स्वर्गकामाः शुचिव्रताः॥ २२<br><br>त्वं स्वदेहस्य रक्षार्थं हंसि द्विजसुतं बलात्।<br>पापं मा कुरु राजेन्द्र दयावान्भव बालके॥ २३ | पूर्वकालमें स्वर्गके इच्छुक, पवित्रव्रती तथा दयापरायण जो क्षत्रियगण थे, वे दूसरोंके शरीरकी रक्षाके लिये अपने प्राण दे देते थे और आप अपने शरीरकी रक्षाके लिये बलपूर्वक ब्राह्मणपुत्रका वध कर रहे हैं। हे राजेन्द्र! पाप मत कीजिये और इस बालकपर दयावान् होइए॥ २२-२३॥ |
| सर्वेषां सदृशी प्रीतिर्देहे वेत्सि स्वयं नृप।<br>मुञ्चैनं बालकं तस्मात्प्रमाणं यदि मे वचः॥ २४ | हे राजन्! अपने देहके प्रति सभीको एक-जैसी प्रीति होती है—यह बात आप स्वयं जानते हैं। यदि आप मेरी बातको प्रमाण मानते हैं तो इस बालकको छोड़ दीजिये॥ २४॥ |
| व्यास उवाच<br>अनादृत्य च तद्वाक्यं राजा दुःखातुरो भृशम्।<br>न मुमोच मुनिस्तस्मै चुकोपातीव तापसः॥ २५ | व्यासजी बोले— दुःखसे अत्यन्त पीड़ित राजाने मुनिकी बातका अनादर करके उस बालकको नहीं छोड़ा; इससे वे तपस्वी मुनि उनके ऊपर अत्यन्त क्रुद्ध हो गये॥ २५॥ |
| उपदेशं ददौ तस्मै शुनःशेपाय कौशिकः।<br>मन्त्रं पाशधरस्याथ दयावान्वेदवित्तमः॥ २६<br><br>शुनःशेपोऽपि तं मन्त्रमसकृद्वधकर्शितः।<br>प्लुतस्वरेण चुक्रोश संस्मरन्वरुणं भृशम्॥ २७ | वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उन दयालु विश्वामित्रने शुनःशेपको पाशधारी वरुणदेवके मन्त्रका उपदेश दिया। अपने वधके भयसे व्याकुल शुनःशेप भी वरुणदेवका स्मरण करते हुए उच्च स्वरसे बार-बार मन्त्रका जप करने लगा॥ २६-२७॥ |
| स्तुवन्तं मुनिपुत्रं तं ज्ञात्वा वै यादसां पतिः।<br>तत्रागत्य शुनःशेपं मुमोच करुणार्णवः॥ २८<br><br>रोगहीनं नृपं कृत्वा वरुणः स्वगृहं ययौ।<br>विश्वामित्रस्तु तं पुत्रं कृतवान्मोचितं मृतेः॥ २९ | जलचरोंके अधिपति करुणासिन्धु वरुणदेवने वहाँ आकर स्तुति करते हुए उस ब्राह्मणपुत्र शुनः-शेपको छुड़ा दिया और राजाको रोगमुक्त करके वे वरुणदेव अपने लोकको चले गये। विश्वामित्रने उस बालकको मृत्युसे मुक्ति प्रदान कर दी॥ २८-२९॥ |
| अ० १३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न कृतं वचनं राज्ञा कौशिकस्य महात्मनः।<br>रोषं दधार मनसा राजोपरि स गाधिजः॥ ३० | राजाने महात्मा विश्वामित्रकी बात नहीं मानी, अतः वे गाधिपुत्र विश्वामित्र मन-ही-मन राजाके ऊपर बहुत क्रुद्ध हुए॥ ३०॥ |
| एकस्मिन्समये राजा हयारूढो वनं गतः।<br>सूकरं हन्तुकामस्तु मध्याह्ने कौशिकीतटे॥ ३१ | एक समय राजा घोड़ेपर सवार होकर वनमें गये। वे सूअरको मारनेकी इच्छासे ठीक दोपहरके समय कौशिकी नदीके तटपर पहुँचे॥ ३१॥ |
| वृद्धब्राह्मणवेषेण विश्वामित्रेण वञ्चितः।<br>सर्वस्वं प्रार्थितं तस्य गृहीतं राज्यमद्भुतम्॥ ३२ | वहाँ विश्वामित्रने वृद्ध ब्राह्मणका वेश धारण करके छलपूर्वक उनका सर्वस्व माँग लिया और उनके महान् राज्यपर अपना अधिकार कर लिया॥ ३२॥ |
| पीडितोऽसौ हरिश्चन्द्रो यजमानो यतो भृशम्।<br>वसिष्ठः कौशिकं प्राह वने प्राप्तं यदृच्छया॥ ३३<br>क्षत्रियाधम दुर्बुद्धे वृथा ब्राह्मणवेषभृत्।<br>बकधर्म वृथा किं त्वं गर्वं वहसि दाम्भिक॥ ३४ | जिससे [वसिष्ठके] यजमान राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त कष्ट पाने लगे। एक बार संयोगवश वनमें आये हुए विश्वामित्रसे वसिष्ठने कहा— हे क्षत्रियाधम! हे दुर्बुद्धे! तुमने व्यर्थ ही ब्राह्मणका वेश बना रखा है, बगुलेके समान वृत्तिवाले हे दाम्भिक! तुम व्यर्थमें गर्व क्यों करते हो?॥ ३३-३४॥ |
| कस्मात्त्वया नृपश्रेष्ठो यजमानो ममाप्यसौ।<br>अपराधं विना जाल्म गमितो दुःखमद्भुतम्॥ ३५ | हे जाल्म! तुमने मेरे यजमान नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्रको बिना अपराधके महान् कष्टमें क्यों डाल दिया?॥ ३५॥ |
| बकध्यानपरो यस्मात्तस्मात्त्वं वै बको भव।<br>इति शप्तो वसिष्ठेन कौशिकः प्राह तं पुनः॥ ३६ | तुम बगुलेके समान ध्यानपरायण हो। अतः तुम 'बक' (बगुला) हो जाओ। वसिष्ठके द्वारा इस प्रकार शापप्राप्त विश्वामित्रने उनसे कहा— |
| त्वमप्याडिर्भवायुष्मन् बकोऽहं यावदेव हि। | हे आयुष्मन्! जबतक मैं बक रहूँगा, तबतक तुम भी आडी पक्षी बनकर रहोगे॥ ३६ ½॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं परस्परं दत्त्वा शापं तौ क्रोधपीडितौ॥ ३७<br>अण्डजौ तरसा जातौ सरस्याडीबकौ मुनी।<br>एकस्मिन्पादपे नीडं कृत्वासौ बकरूपभाक्॥ ३८<br>विश्वामित्रः स्थितस्तत्र दिव्ये सरसि मानसे।<br>अन्यस्मिन्पादपे कृत्वा वसिष्ठो नीडमुत्तमम्॥ ३९<br>आडीरूपधरस्तस्थावन्योन्यं द्वेषतत्परौ।<br>दिने दिने तौ संग्रामं चक्रतुः क्रोधसंयुतौ॥ ४०<br>दुःखदं सर्वलोकानां क्रन्दमानावुभौ भृशम्।<br>चञ्चुपक्षप्रहारैस्तु नखाघातैः परस्परम्॥ ४१<br>जघ्नतू रुधिरक्लिन्नौ पुष्पिताविव किंशुकौ।<br>एवं बहूनि वर्षाणि पक्षिरूपधरौ मुनी॥ ४२<br>स्थितौ तत्र महाराज शापपाशेन यन्त्रितौ। | व्यासजी बोले— इस प्रकार क्रोधसे व्याकुल उन दोनोंने एक-दूसरेको शाप दे दिया और एक सरोवरके समीप वे दोनों मुनि 'आडी' और 'बक' के रूपमें अण्डोंसे उत्पन्न हुए। दिव्य मानसरोवरके तटपर एक वृक्षपर घोंसला बनाकर बकरूपधारी विश्वामित्र और एक दूसरे वृक्षपर उत्तम घोंसला बनाकर आडीरूपधारी वसिष्ठ परस्पर द्वेषपरायण होकर रहने लगे। वे दोनों कोपाविष्ट होकर प्रतिदिन घोर क्रन्दन करते हुए सभी लोगोंके लिये दुःखदायी युद्ध करते थे। वे दोनों चोंच और पंखोंके प्रहार तथा नखोंके आघातसे परस्पर चोट पहुँचाते थे। रक्तसे लथपथ वे दोनों खिले हुए किंशुकके फूल-जैसे प्रतीत होते थे। हे महाराज! इस प्रकार पक्षीरूपधारी दोनों मुनि शापरूपी पाशमें जकड़े हुए वहाँ बहुत वर्षोंतक पड़े रहे॥ ३७-४२ ½॥ |
| राजोवाच<br>कथं मुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ शापाद्वसिष्ठकौशिकौ॥ ४३<br>तन्ममाचक्ष्व विप्रर्षे परं कौतूहलं हि मे। | राजा बोले— हे विप्रर्षे! वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ और विश्वामित्र शापसे किस प्रकार मुक्त हुए, यह मुझे बताइये, मुझे बड़ा कौतूहल है॥ ४३ ½॥ |
| ७८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| युध्यमानावुभौ दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ४४<br>तत्राजगामानिमिषैर्वृतः सर्वैर्दयापरैः।<br>तावाश्वास्य जगत्कर्ता युद्धतो विनिवार्य च॥ ४५ | लोकपितामह ब्रह्माजी उन दोनोंको युद्ध करते देखकर समस्त दयापरायण देवताओंके साथ वहाँ आये। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने उन दोनोंको समझाकर युद्धसे विरत करके परस्पर दिये गये शापसे भी मुक्त कर दिया॥ ४४-४५ १/२॥ |
| शापं संमोचयामास तयोः क्षिप्तं परस्परम्।<br>ततो जग्मुः सुराः सर्वे स्वानि धिष्ण्यानि पद्मभूः॥ ४६<br>सत्यलोकं जगामाशु हंसारूढः प्रतापवान्।<br>विश्वामित्रोऽप्यगात्तूर्णं वसिष्ठः स्वाश्रमं गतः॥ ४७<br>मिथः स्नेहं ततः कृत्वा प्रजापत्युपदेशतः।<br>मैत्रावरुणिनाप्येवं कृतं युद्धमकारणम्॥ ४८ | इसके बाद सभी देवगण अपने-अपने लोकोंको चले गये, कमलयोनि प्रतापी ब्रह्माजी शीघ्र हंसपर आरूढ़ होकर सत्यलोकको चले गये और प्रजापतिके उपदेशसे परस्पर स्नेह करके विश्वामित्र तथा वसिष्ठजी भी अपने-अपने आश्रमोंको शीघ्र चले गये। हे राजन्! इस प्रकार मैत्रावरुणि वसिष्ठने भी अकारण ही विश्वामित्रके साथ परस्पर दुःखप्रद युद्ध किया था॥ ४६-४८ १/२॥ |
| कौशिकेन समं भूप दुःखदं च परस्परम्।<br>को नाम मानवो लोके देवो वा दानवोऽपि वा॥ ४९<br>अहङ्कारजयं कृत्वा सर्वदा सुखभाग्भवेत्।<br>तस्माद्राजंश्चित्तशुद्धिर्महतामपि दुर्लभा॥ ५०<br>यत्नेन साधनीया सा तद्विहीनं निरर्थकम्।<br>तीर्थं दानं तपः सत्यं यत्किञ्चिद्धर्मसाधनम्॥ ५१ | इस संसारमें मनुष्य, देवता या दैत्य—कौन ऐसा है, जो अहंकारपर विजय प्राप्तकर सदा सुखी रह सके। अतः हे राजन्! चित्तकी शुद्धि महापुरुषोंके लिये भी दुर्लभ है। उसे प्रयत्नपूर्वक शुद्ध करना चाहिये; उसके बिना तीर्थयात्रा, दान, तपस्या, सत्य आदि जो कुछ भी धर्मसाधन है; वह सब निरर्थक है॥ ४९-५१॥ |
| ( श्रद्धात्र त्रिविधा प्रोक्ता सात्त्विकी राजसी तथा।<br>तामसी सर्वदेहेषु देहिनां धर्मकर्मसु॥<br>सात्त्विकी दुर्लभा लोके यथोक्तफलदा सदा।<br>तदर्धफलदा प्रोक्ता राजसी विधिसंयुता॥<br>तामसी त्वफला राजन्न तु कीर्तिकरी पुनः।<br>कामक्रोधाभिभूतानां जनानां नृपसत्तम॥ ) | (सबके देहोंमें तथा प्राणियोंके धर्मकर्मोंमें सात्त्विकी, राजसी और तामसी—यह तीन प्रकारकी श्रद्धा कही गयी है। इनमें यथोक्त फल देनेवाली सात्त्विकी श्रद्धा जगत्में सदा दुर्लभ होती है। विधिविधानसे युक्त राजसी श्रद्धा उसका आधा फल देनेवाली कही गयी है। हे राजन्! काम-क्रोधके वशीभूत पुरुषोंकी श्रद्धा तामसी होती है। हे नृपश्रेष्ठ! वह फलविहीन होती है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं होती।) |
| वासनारहितं कृत्वा तच्चित्तं श्रवणादिना।<br>तीर्थादिषु वसेन्नित्यं देवीपूजनतत्परः॥ ५२<br>देवीनामानि वचसा गृह्णंस्तस्या गुणान्स्तुवन्।<br>ध्यायंस्तस्याः पदाम्भोजं कलिदोषभयार्दितः॥ ५३ | कलियुगके दोषोंसे भयभीत व्यक्तिको कथा-श्रवण आदिके द्वारा चित्तको वासनारहित करके देवीकी पूजामें तत्पर रहते हुए, वाणीसे देवीके नामोंको ग्रहण करते हुए, उनके गुणोंका कीर्तन करते हुए तथा उनके चरण-कमलका ध्यान करते हुए तीर्थ आदिमें नित्य वास करना चाहिये॥ ५२-५३॥ |
| एवं तु कुर्वतस्तस्य न कदाचित्कलेर्भयम्।<br>अनायासेन संसारान्मुच्यते पातकी जनः॥ ५४ | ऐसा करनेसे उसे कभी कलियुगका भय नहीं होगा, इससे पापी प्राणी भी अनायास ही संसारसे मुक्त हो जाता है॥ ५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे आडीबकयुद्धवर्णनसहितं देवीमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
| अ० १४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८९ |
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अथ चतुर्दशोऽध्यायः
राजा निमि और वसिष्ठका एक-दूसरेको शाप देना, वसिष्ठका मित्रावरुणके पुत्रके रूपमें जन्म लेना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जनमेजय उवाच<br>मैत्रावरुणिरित्युक्तं नाम तस्य मुनेः कथम्।<br>वसिष्ठस्य महाभाग ब्रह्मणस्तनुजस्य ह॥ १<br>किमसो कर्मतो नाम प्राप्तवान् गुणतस्तथा।<br>ब्रूहि मे वदतां श्रेष्ठ कारणं तस्य नामजम्॥ २ | जनमेजय बोले—हे महाभाग! ब्रह्माके पुत्र मुनि वसिष्ठका 'मैत्रावरुणि'—यह नाम कैसे पड़ा? हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! किस कर्म अथवा गुणके कारण उन्होंने यह नाम प्राप्त किया। उनके नाम पड़नेका कारण मुझे बताइये॥ १-२॥ |
| व्यास उवाच<br>निबोध नृपतिश्रेष्ठ वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः।<br>निमिशापात्तनुं त्यक्त्वा पुनर्जातो महाद्युतिः॥ ३<br>मित्रावरुणयोर्यस्मात्तस्मात्तन्नाम विश्रुतम्।<br>मैत्रावरुणिरित्यस्मिँल्लोके सर्वत्र पार्थिव॥ ४ | व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! सुनिये, वसिष्ठजी ब्रह्माके पुत्र हैं, उन महातेजस्वीने निमिके शापसे वह शरीर त्यागकर पुनः जन्म लिया॥ ३॥<br>हे राजन्! उनका जन्म मित्र और वरुणके यहाँ हुआ था, इसीलिये इस संसारमें सर्वत्र उनका 'मैत्रावरुणि'—यह नाम विख्यात हुआ॥ ४॥ |
| राजोवाच<br>कस्माच्छप्तः स धर्मात्मा राज्ञा ब्रह्मात्मजो मुनिः।<br>चित्रमेतन्मुनिं लग्नो राज्ञः शापोऽतिदारुणः॥ ५<br>अनागसं मुनिं राजा किमसो शप्तवान्मुने।<br>कारणं वद धर्मज्ञ तस्य शापस्य मूलतः॥ ६ | राजा बोले—राजा निमिने ब्रह्माजीके पुत्र धर्मात्मा वसिष्ठको शाप क्यों दिया? राजाका वह दारुण शाप मुनिको लग गया—यह तो आश्चर्य है!॥ ५॥<br>हे मुने! निरपराध मुनिको राजाने क्यों शाप दे दिया; हे धर्मज्ञ! उस शापका कारण यथार्थरूपमें बताइये?॥ ६॥ |
| व्यास उवाच<br>कारणं तु मया प्रोक्तं तव पूर्वं विनिश्चितम्।<br>संसारोऽयं त्रिभिर्व्याप्तो राजन्मायागुणैः किल॥ ७<br>धर्मं करोतु भूपालश्चरन्तु तापसास्तपः।<br>सर्वेषां तु गुणैर्विद्धं प्रोज्ज्वलं तद्भवेदिह॥ ८<br>कामक्रोधाभिभूताश्च राजानो मुनयस्तथा।<br>लोभाहङ्कारसंयुक्ताश्चरन्ति दुश्चरं तपः॥ ९<br>यजन्ति क्षत्रिया राजन् रजोगुणसमावृताः।<br>ब्राह्मणास्तु तथा राजन् न कोऽपि सत्त्वसंयुतः॥ १०<br>ऋषिणासौ निमिः शप्तस्तेन शप्तो मुनिः पुनः।<br>दुःखाह्दुःखतरं प्राप्तावुभावपि विधेर्बलात्॥ ११<br>द्रव्यशुद्धिः क्रियाशुद्धिर्मनसः शुद्धिरुज्ज्वला।<br>दुर्लभा प्राणिनां भूप संसारे त्रिगुणात्मके॥ १२ | व्यासजी बोले—इसका सम्यक् रूपसे निर्णीत कारण तो मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ। हे राजन्! यह संसार मायाके तीनों गुणोंसे व्याप्त है॥ ७॥<br>राजा धर्म करें और तपस्वी तप करें—यह स्वाभाविक कर्म है, परंतु सभी प्राणियोंका मन गुणोंसे आबद्ध रहनेके कारण विशुद्ध नहीं रह पाता॥ ८॥<br>राजालोग काम और क्रोधसे अभिभूत रहते हैं और उसी प्रकार तपस्वीगण भी लोभ और अहंकारयुक्त होकर कठोर तपस्या करते हैं॥ ९॥<br>हे राजन्! क्षत्रियगण रजोगुणसे युक्त होकर यज्ञ करते थे, वैसे ही ब्राह्मण भी थे। हे राजन्! कोई भी सत्त्वगुणसे युक्त नहीं था॥ १०॥<br>ऋषिने राजाको शाप दिया और तब राजाने भी मुनिको शाप दे दिया। इस प्रकार दैववशात् दोनोंको बहुत दुःख प्राप्त हुआ॥ ११॥<br>हे राजन्! इस त्रिगुणात्मक जगत्में प्राणियोंके लिये द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और उज्ज्वल मनःशुद्धि दुर्लभ है॥ १२॥ |
| ७९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पराशक्तिप्रभावोऽयं नोल्लङ्घ्यः केनचित्क्वचित्।<br>यस्यानुग्रहमिच्छेत्सा मोचयत्येव तं क्षणात्॥ १३ | यह पराशक्तिका ही प्रभाव है और कोई कभी इसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। जिसपर वे भगवती कृपा करना चाहती हैं, उसे तत्काल मुक्त कर देती हैं॥ १३॥ |
| महान्तोऽपि न मुच्यन्ते हरिब्रह्महरादयः।<br>पामरा अपि मुच्यन्ते यथा सत्यव्रतादयः॥ १४ | ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि महान् देवता भी मुक्त नहीं हो पाते, किंतु सत्यव्रत आदि जैसे अधम भी मुक्त हो जाते हैं॥ १४॥ |
| तस्यास्तु हृदयं कोऽपि न वेत्ति भुवनत्रये।<br>तथापि भक्तवश्येयं भवत्येव सुनिश्चितम्॥ १५ | यद्यपि तीनों लोकोंमें भगवतीके रहस्यको कोई नहीं जानता है, फिर भी वे भक्तके वशमें हो जाती हैं—ऐसा निश्चित है॥ १५॥ |
| तस्मात्तद्भक्तिरास्थेया दोषनिर्मूलनाय च।<br>रागदम्भादियुक्ता चेत्सा भक्तिर्नाशिनी भवेत्॥ १६ | अतः दोषोंके निर्मूलनके लिये उनकी भक्ति करनी चाहिये। यदि वह भक्ति राग, दम्भ आदिसे युक्त हो तो वह नाश करनेवाली होती है॥ १६॥ |
| इक्ष्वाकुकुलसम्भूतो निमिर्नाम नराधिपः।<br>रूपवान् गुणसम्पन्नो धर्मज्ञो लोकरञ्जकः॥ १७<br><br>सत्यवादी दानपरो याजको ज्ञानवाञ्छुचिः।<br>द्वादशस्तनयो धीमान्प्रजापालनतत्परः॥ १८ | इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न निमि नामके एक राजा थे। वे रूपवान्, गुणवान्, धर्मज्ञ, प्रजावत्सल सत्यवादी, दानशील, यज्ञ-कर्ता, ज्ञानी और पुण्यात्मा थे। वे बुद्धिमान् और प्रजापालक राजा निमि इक्ष्वाकुके बारहवें पुत्र थे॥ १७-१८॥ |
| पुरं निवेशयामास गौतमाश्रमसन्निधौ।<br>जयन्तपुरसंज्ञं तु ब्राह्मणानां हिताय सः॥ १९ | उन्होंने ब्राह्मणोंके हितके लिये गौतममुनिके आश्रमके समीप जयन्तपुर नामका एक नगर बसाया॥ १९॥ |
| बुद्धिस्तस्य समुत्पन्ना यजेयमिति राजसी।<br>यज्ञेन बहुकालेन दक्षिणासंयुतेन च॥ २० | उनके मनमें एक बार यह राजसी बुद्धि उत्पन्न हुई कि बहुत समयतक चलनेवाले और विपुल दक्षिणावाले यज्ञके द्वारा आराधना करूँ॥ २०॥ |
| इक्ष्वाकुं पितरं पृष्ट्वा यज्ञकार्याय पार्थिवः।<br>कारयामास सम्भारं यथोद्दिष्टं महात्मभिः॥ २१ | तब राजाने यज्ञकार्यके लिये अपने पिता इक्ष्वाकुसे आज्ञा लेकर महात्माओंके कथनानुसार समस्त यज्ञीय सामग्री एकत्र करायी॥ २१॥ |
| भृगुमङ्गिरसं चैव वामदेवं च गौतमम्।<br>वसिष्ठं च पुलस्त्यं च ऋचीकं पुलहं क्रतुम्॥ २२<br><br>मुनीनामन्त्रयामास सर्वज्ञांर्वेदपारगान्।<br>यज्ञविद्याप्रवीणांश्च तापसान्वेदवित्तमान्॥ २३ | इसके बाद राजाने भृगु, अंगिरा, वामदेव, गौतम, वसिष्ठ, पुलस्त्य, ऋचीक, पुलह और क्रतु—इन सर्वज्ञ, वेदमें पारंगत, यज्ञविद्याओंमें कुशल एवं वेदज्ञ मुनियों और तपस्वियोंको आमन्त्रित किया॥ २२-२३॥ |
| राजा सम्भृतसम्भारः सम्पूज्य गुरुमात्मनः।<br>वसिष्ठं प्राह धर्मज्ञो विनयेन समन्वितः॥ २४ | समस्त सामग्री एकत्र कर धर्मज्ञ राजाने अपने गुरु वसिष्ठकी पूजा करके विनयसे युक्त होकर उनसे कहा—॥ २४॥ |
| यजेयं मुनिशार्दूल याजयस्व कृपानिधे।<br>गुरुस्त्वं सर्ववेत्तासि कार्यं मे कुरु साम्प्रतम्॥ २५ | हे मुनिश्रेष्ठ! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ। अतः यज्ञ करानेकी कृपा करें। हे कृपानिधे! आप सर्वज्ञ हैं और मेरे गुरु हैं; इस समय आप मेरा कार्य सम्पन्न कीजिये॥ २५॥ |
| यज्ञोपकरणं सर्वं समानीतं सुसंस्कृतम्।<br>पञ्चवर्षसहस्रं तु दीक्षां कर्तुं मतिश्च मे॥ २६ | मैंने समस्त यज्ञीय सामग्री मँँगवा ली है और उसका संस्कार भी करा लिया है। मेरा विचार है कि मैं पाँच हजार वर्षके लिये यज्ञ-दीक्षा ग्रहण कर लूँ॥ २६॥ |
अ० १४ ] षष्ठ स्कन्ध ७९१
अ० १४ ] षष्ठ स्कन्ध ७९१
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यस्मिन्यज्ञे समाराध्या देवी श्रीजगदम्बिका।<br>तत्प्रीत्यर्थमहं यज्ञं करोमि विधिपूर्वकम्॥ २७<br>तच्छ्रुत्वासौ निमेर्वाक्यं वसिष्ठः प्राह भूपतिम्।<br>इन्द्रेणाहं वृतः पूर्वं यज्ञार्थं नृपसत्तम॥ २८<br>पराशक्तिमखं कर्तुमुद्युक्तः पाकशासनः।<br>स दीक्षां गमितो देवः पञ्चवर्षशतात्मिकाम्॥ २९<br>तस्मात्त्वमन्तरं तावत्प्रतिपालय पार्थिव।<br>इन्द्रयज्ञे समाप्तेऽत्र कृत्वा कार्यं दिवस्पतेः॥ ३०<br>आगमिष्याम्यहं राजंस्तावत्त्वं प्रतिपालय। | जिस यज्ञमें भगवती जगदम्बाकी आराधना होती हो, उस यज्ञको मैं उनकी प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक करना चाहता हूँ॥ २७॥<br>निमिकी वह बात सुनकर वसिष्ठजीने राजासे कहा—हे नृपश्रेष्ठ! मैं इन्द्रके द्वारा यज्ञके लिये पहले ही वरण कर लिया गया हूँ। इन्द्र पराशक्तिके प्रीत्यर्थ यज्ञ करनेके लिये तत्पर हैं और देवेन्द्रने पाँच सौ वर्षतक चलनेवाले यज्ञकी दीक्षा ले ली है। अतः हे राजन्! तबतक आप यज्ञ-सामग्रियोंकी रक्षा करें, इन्द्रके यज्ञके पूर्ण हो जानेपर उन देवराजका कार्य सम्पन्न करके मैं आ जाऊँगा। हे राजन्! तबतक आप समयकी प्रतीक्षा करें॥ २८—३० १/२॥ |
| राजोवाच<br>मया निमन्त्रिताश्चान्ये मुनयो यज्ञकारणात्॥ ३१<br>सम्भाराः सम्भृताः सर्वे पालयामि कथं गुरो।<br>इक्ष्वाकूणां कुले ब्रह्मन्गुरुस्त्वं वेदवित्तमः॥ ३२<br>कथं त्यक्त्वाद्य मे कार्यमुद्यतो गन्तुमाशु वै।<br>न ते युक्तं द्विजश्रेष्ठ यदुत्सृज्य मखं मम॥ ३३<br>गन्तासि धनलोभेन लोभाकुलितचेतनः। | राजा बोले—हे गुरुदेव! मैंने यज्ञके लिये दूसरे बहुत-से मुनियोंको निमन्त्रित कर दिया है तथा समस्त यज्ञीय सामग्रियाँ भी एकत्र कर ली हैं, मैं इन सबको [इतने समयतक] कैसे सुरक्षित रखूँगा ? हे ब्रह्मन्! आप इक्ष्वाकुवंशके वेदवेत्ता गुरु हैं, आज मेरा कार्य छोड़कर आप अन्यत्र जानेके लिये क्यों उद्यत हैं? हे द्विजश्रेष्ठ! यह आपके लिये उचित नहीं है जो कि लोभसे व्याकुलचित्तवाले आप मेरा यज्ञ छोड़कर अन्यत्र जा रहे हैं॥ ३१—३३ १/२॥ |
| निवारितोऽपि राज्ञा स जगामेन्द्रमखं गुरुः॥ ३४<br>राजापि विमना भूत्वा गौतमं प्रत्यपूजयत्।<br>इयाज हिमवत्पार्श्वे सागरस्य समीपतः॥ ३५<br>दक्षिणा बहुला दत्ता विप्रेभ्यो मखकर्मणि।<br>निमिना पञ्चसाहस्त्री दीक्षा तत्र कृता नृप॥ ३६<br>ऋत्विजः पूजिताः कामं धनैर्गोभिर्मुदा युताः। | राजाके इस प्रकार रोकनेपर भी वे गुरु वसिष्ठ इन्द्रके यज्ञमें चले गये। राजाने भी उदास होकर [अपना आचार्य बनाकर] गौतमऋषिका पूजन किया। उन्होंने हिमालयके पार्श्वभागमें समुद्रके निकट यज्ञ किया और उस यज्ञकर्ममें ब्राह्मणोंको बहुत दक्षिणा दी। हे राजन्! निमिने उस पाँच हजार वर्षवाले यज्ञकी दीक्षा ली और ऋत्विजोंको उनके इच्छानुसार धन और गौएँ प्रदान करके उनकी पूजा की, जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए॥ ३४—३६ १/२॥ |
| शक्रयज्ञसमाप्ते तु पञ्चवर्षशतात्मके॥ ३७<br>आजगाम वसिष्ठस्तु राज्ञः सत्रदिदृक्षया।<br>आगत्य संस्थितस्तत्र दर्शनार्थं नृपस्य च॥ ३८ | इन्द्रके पाँच सौ वर्षवाले यज्ञके समाप्त होनेपर वसिष्ठजी राजाके यज्ञको देखनेकी इच्छासे आये और आकरके राजाके दर्शनके लिये वहाँ रुके रहे॥ ३७-३८॥ |
| तदा राजा प्रसुप्तस्तु निद्रयापहतो भृशम्।<br>नासौ प्रबोधितो भृत्यैर्नागतस्तु मुनिं नृपः॥ ३९<br>वसिष्ठस्य ततो मन्युः प्रादुर्भूतोऽवमानतः।<br>अदर्शनान्निमेस्तत्र चुकोप मुनिसत्तमः॥ ४० | उस समय राजा निमि सोये हुए थे और उन्हें गहरी नींद आ गयी थी। सेवकोंने उन्हें नहीं जगाया, जिससे वे राजा मुनिके पास न आ सके। तब अपमानके कारण वसिष्ठजीको क्रोध आ गया। मिलनेके लिये निमिके न आनेसे मुनिश्रेष्ठ कुपित हो उठे। क्रोधके वशीभूत हुए |
७९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शापं च दत्तवांस्तस्मै राज्ञे मन्युवशं गतः।<br>यस्मात्त्वं मां गुरुं त्यक्त्वा कृत्वान्यं गुरुमात्मनः॥ ४१<br>दीक्षितोऽसि बलान्मन्द मामवज्ञाय पार्थिव।<br>वारितोऽपि मया तस्माद्विदेहस्त्वं भविष्यसि॥ ४२<br>पतत्विदं शरीरं ते विदेहो भव भूपते। | उन मुनिने राजाको शाप दे दिया—‘हे मूर्ख पार्थिव ! मेरे द्वारा मना किये जानेपर भी तुम मुझ गुरुका त्याग करके दूसरेको अपना गुरु बनाकर शक्तिके अभिमानमें मेरी अवहेलना करके यज्ञमें दीक्षित हो गये हो, उससे तुम विदेह हो जाओगे। हे राजन् ! तुम्हारा यह शरीर नष्ट हो जाय और तुम विदेह हो जाओ’॥ ३९–४२ ½॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तद्व्याहृतं श्रुत्वा राज्ञस्तु परिचारकाः॥ ४३<br>सद्यः प्रबोधयामासुर्मुनिमाहुः प्रकोपितम्।<br>कुपितं तं समागत्य राजा विगतकल्मषः॥ ४४ | **व्यासजी बोले—**उनका यह शापवचन सुनकर राजाके सेवकोंने शीघ्रतासे जाकर राजाको जगाया और उन्हें बताया कि मुनि वसिष्ठ बहुत क्रोधित हो गये हैं, तब उन कुपित मुनिके पास आकर निष्पाप राजाने मधुर शब्दोंमें युक्तिपूर्ण तथा सारगर्भित वचन कहा—॥ ४३–४४ ½॥ |
| उवाच वचनं श्लक्ष्णं हेतुगर्भं च युक्तिमत्।<br>मम दोषो न धर्मज्ञ गतस्त्वं तृष्णयाकुलः॥ ४५<br>हित्वा मां यजमानं वै प्रार्थितोऽपि मया भृशम्।<br>न लज्जसे द्विजश्रेष्ठ कृत्वा कर्म जुगुप्सितम्॥ ४६<br>सन्तोषे ब्राह्मणश्रेष्ठ जानन्धर्मस्य निश्चयम्।<br>पुत्रोऽसि ब्रह्मणः साक्षाद्वेदवेदाङ्गवित्तमः॥ ४७<br>न वेत्सि विप्रधर्मस्य गतिं सूक्ष्मां दुरत्ययाम्।<br>आत्मदोषं मयि ज्ञात्वा मृषा मां शप्तुमिच्छसि॥ ४८<br>त्याज्यस्तु सुजनैः क्रोधश्चण्डालादधिको यतः।<br>वृथा क्रोधपरीतेन मयि शापः प्रपातितः॥ ४९<br>तवापि च पतत्वद्य देहोऽयं क्रोधसंयुतः। | हे धर्मज्ञ ! इसमें मेरा दोष नहीं है, आप ही लोभके वशीभूत होकर मेरे बार-बार अनुरोध करनेपर भी मुझ यजमानको छोड़कर चले गये। हे विप्रवर ! हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! ब्राह्मणको सदा सन्तोष रखना चाहिये—धर्मके इस सिद्धान्तको जानते हुए भी ऐसा निन्दित कर्म करके आपको लज्जा नहीं आ रही है। आप तो साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र और वेद-वेदांगोंके सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता हैं तो भी आप ब्राह्मणधर्मकी अत्यन्त कठिन और सूक्ष्म गतिको नहीं जानते। अपना दोष मुझमें आरोपित करके आप मुझे व्यर्थ ही शाप देना चाहते हैं। सज्जनोंको चाहिये कि क्रोधका त्याग कर दें; क्योंकि यह चण्डालसे भी अधिक दूषित है; क्रोधके वशीभूत होकर आपने मुझे व्यर्थ ही शाप दे दिया है। अतः आपकी भी यह क्रोधयुक्त देह आज ही नष्ट हो जाय॥ ४५–४९ ½॥ |
| एवं शप्तो मुनी राज्ञा राजा च मुनिना तथा॥ ५०<br>परस्परं प्राप्य शापं दुःखितौ तौ बभूवतुः।<br>वसिष्ठस्त्वतिचिन्तार्तो ब्रह्माणं शरणं गतः॥ ५१<br>निवेदयामास तथा शापं भूपकृतं महत्। | इस प्रकार राजाके द्वारा मुनि और मुनिके द्वारा राजा शापित हो गये और दोनों एक-दूसरेसे शाप पाकर बहुत दुःखी हुए। तब वसिष्ठजी अत्यधिक चिन्तातुर होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये और उन्होंने राजाके द्वारा प्रदत्त कठिन शापके विषयमें उनसे निवेदन किया॥ ५०–५१ ½॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>राज्ञा शप्तोऽस्मि देहोऽयं पतत्वद्य तवेति वै॥ ५२<br>किं करोमि पितः प्राप्तं कष्टं कायप्रपातजम्।<br>अन्यदेहसमुत्पत्तौ जनकं वद साम्प्रतम्॥ ५३ | **वसिष्ठजी बोले—**हे पिताजी ! राजा निमिने मुझे शाप दे दिया है कि तुम्हारा यह शरीर आज ही नष्ट हो जाय। अतः शरीर नष्ट होनेसे प्राप्त कष्टके लिये मैं क्या करूँ? इस समय आप मुझे यह बतायें कि दूसरे शरीरकी प्राप्तिमें मेरे पिता कौन होंगे? हे पिताजी ! दूसरे देहसे सम्बन्ध होनेपर भी मेरी स्थिति |
| अ० १४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७९३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथा मे देहसंयोगः पूर्ववत्सम्पद्यताम्।<br>यादृशं ज्ञानमेतस्मिन्देहे तत्रास्तु तत्पितः॥ ५४<br>समर्थोऽसि महाराज प्रसादं कर्तुमर्हसि। | पूर्ववत् ही रहे। इस शरीरमें जैसा ज्ञान है, वैसा ही उस शरीरमें भी रहे। हे महाराज! आप समर्थ हैं; मुझपर कृपा करने योग्य हैं॥ ५२—५४ १/२॥ |
| वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्मा प्रोवाच तं सुतम्॥ ५५<br>मित्रावरुणयोस्तेजस्त्वं प्रविश्य स्थिरो भव।<br>तस्मादयोनिजः काले भविता त्वं न संशयः॥ ५६<br>पुनर्देहं समासाद्य धर्मयुक्तो भविष्यसि।<br>भूतात्मा वेदवित्कामं सर्वज्ञः सर्वपूजितः॥ ५७ | वसिष्ठकी बात सुनकर ब्रह्माजी अपने उस पुत्रसे बोले—तुम मित्रावरुणके तेज हो, अतः इन्हींमें प्रवेश करके स्थिर हो जाओ। कुछ समय बाद तुम उन्हींसे अयोनिज पुत्रके रूपमें प्रकट होओगे; इसमें सन्देह नहीं है। इस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त करके तुम धर्मनिष्ठ, प्राणियोंके सुहृद्, वेदवेत्ता, सर्वज्ञ और सबके द्वारा पूजित होओगे॥ ५५—५७॥ |
| एवमुक्तस्तदा पित्रा प्रययौ वरुणालयम्।<br>कृत्वा प्रदक्षिणं प्रीत्या प्रणम्य च पितामहम्॥ ५८<br>विवेश स तयोर्देहे मित्रावरुणयोः किल।<br>जीवांशेन वसिष्ठोऽथ त्यक्त्वा देहमनुत्तमम्॥ ५९ | पिताके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी प्रसन्नतापूर्वक पितामह ब्रह्माजीकी परिक्रमा करके और उन्हें प्रणाम करके वरुणके वासस्थानको चले गये। वसिष्ठजीने अपने उत्तम देहका त्याग करके मित्र और वरुणके शरीरमें जीवांशरूपसे प्रवेश किया॥ ५८-५९॥ |
| कदाचित्तूर्वशी राजन्नागता वरुणालयम्।<br>यदृच्छया वरारोहा सखीगणसमावृता॥ ६० | हे राजन्! किसी समय परम सुन्दरी अप्सरा उर्वशी अपनी सखियोंके साथ स्वेच्छापूर्वक मित्रावरुणके स्थानपर आयी॥ ६०॥ |
| दृष्ट्वा तामप्सरां दिव्यां रूपयौवनसंयुताम्।<br>जातौ कामातुरौ देवौ तदा तामूचतुर्नृप॥ ६१<br>विवशौ चारुसर्वाङ्गीं देवकन्यां मनोरमाम्।<br>आवां त्वमनवद्याङ्गि वरयस्व समाकुलौ॥ ६२<br>विहरस्व यथाकामं स्थानेऽस्मिन्वरवर्णिनि।<br>तथोक्ता सा ततो देवी ताभ्यां तत्र स्थितावशा॥ ६३<br>कृत्वा भावं स्थिरं देवी मित्रावरुणयोर्गृहे।<br>सा गृहीत्वा तयोर्भावं संस्थिता चारुदर्शना॥ ६४ | हे राजन्! उस रूपयौवनसे सम्पन्न दिव्य अप्सराको देखकर वे दोनों देवता कामातुर हो गये और समस्त सुन्दर अंगोंवाली उस मनोरम देवकन्यासे कहने लगे—हे प्रशस्त अंगोंवाली! विवश तथा व्याकुल हम दोनोंका तुम वरण कर लो और हे वरवर्णिनि! तुम अपनी इच्छाके अनुसार इस स्थानपर विहार करो। उनके इस प्रकार कहनेपर वह देवी उर्वशी मन स्थिर करके मित्रावरुणके घरमें उन दोनोंके साथ विवश होकर रहने लगी। प्रिय दर्शनवाली वह अप्सरा उन दोनोंके भावोंको समझकर वहीं रहने लगी॥ ६१—६४॥ |
| तयोस्तु पतितं वीर्यं कुम्भे दैवादनावृते।<br>तस्माज्जातौ मुनी राजन्द्व्वावेवातिमनोंहरौ॥ ६५<br>अगस्तिः प्रथमस्तत्र वसिष्ठश्चापरस्तथा।<br>मित्रावरुणयोर्वीर्यात्तापसावृषिसत्तमौ ॥ ६६ | दैववशात् वहाँ रखे हुए एक आवरणरहित कुम्भमें दोनोंका वीर्य स्खलित हो गया; और हे राजन्! उसमेंसे दो अत्यन्त सुन्दर मुनिकुमारोंने जन्म लिया। उनमें पहले अगस्ति थे और दूसरे वसिष्ठ थे। इस प्रकार मित्र और वरुणके तेजसे वे दोनों ऋषिश्रेष्ठ तपस्वी प्रकट हुए॥ ६५-६६॥ |
| प्रथमस्तु वनं प्राप्तो बाल एव महातपाः।<br>इक्ष्वाकुस्तु वसिष्ठं तं बालं वव्रे पुरोहितम्॥ ६७ | महातपस्वी अगस्ति बाल्यावस्थामें ही वन चले गये और महाराज इक्ष्वाकुने अपने पुरोहितके रूपमें दूसरे बालक वसिष्ठका वरण कर लिया॥ ६७॥ |
| ७९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
|---|
| वंशस्यास्य सुखार्थं ते पालयामास पार्थिव ।<br>विशेषेण मुनिं ज्ञात्वा प्रीत्या युक्तो बभूव ह ॥ ६८ | हे राजन् ! आपका यह वंश सुखी रहे, इसलिये राजा इक्ष्वाकुने वसिष्ठका पालन-पोषण किया और विशेष-रूपसे इन्हें मुनि जानकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ ६८ ॥ | | एतत्ते सर्वमाख्यातं वसिष्ठस्य च कारणम् ।<br>शापाद्देहान्तरप्राप्तिर्मित्रावरुणयोः कुले ॥ ६९ | इस प्रकार शापके कारण मित्रावरुणके कुलमें वसिष्ठजीके अन्य शरीरकी प्राप्तिका समस्त आख्यान मैंने आपको बता दिया ॥ ६९ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां षष्ठस्कन्धे वसिष्ठस्य मैत्रावरुणिरितिनामवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
भगवतीकी कृपासे निमिको मनुष्योंके नेत्र-पलकोंमें वासस्थान मिलना तथा संसारी प्राणियोंकी त्रिगुणात्मकताका वर्णन
| जनमेजय उवाच<br>देहप्राप्तिर्वसिष्ठस्य कथिता भवता किल ।<br>निमिः कथं पुनर्देहं प्राप्तवानिति मे वद ॥ १ | जनमेजय बोले—आपने वसिष्ठकी शरीर-प्राप्तिका वर्णन किया; निमिने पुनः किस प्रकार देह प्राप्त की; यह मुझसे कहिये ॥ १ ॥ |
|---|---|
| <div align="center">व्यास उवाच</div>वसिष्ठेन च सम्प्राप्तः पुनर्देहो नराधिप ।<br>निमिना न तथा प्राप्तो देहः शापादनन्तरम् ॥ २ | व्यासजी बोले—हे राजन् ! वसिष्ठने जिस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त किया, उस प्रकार निमिको शापके बाद पुनः देह नहीं मिली ॥ २ ॥ |
| यदा शप्तो वसिष्ठेन तदा ते ब्राह्मणाः क्रतौ ।<br>ऋत्विजो ये वृता राज्ञा ते सर्वे समचिन्तयन् ॥ ३ | जब वसिष्ठजीने शाप दिया तो राजाके द्वारा यज्ञमें वरण किये गये ब्राह्मण और ऋत्विज् विचार करने लगे— ॥ ३ ॥ |
| किं कर्तव्यमहोऽस्माभिः शापदग्धो महीपतिः ।<br>अस्मिन्यज्ञे त्वसम्पूर्णे दीक्षायुक्तश्च धार्मिकः ॥ ४ | अहो, यज्ञमें दीक्षित ये धर्मनिष्ठ राजा शापसे दग्ध हो गये हैं और यज्ञ भी अपूर्ण ही रह गया है—ऐसेमें हम सबको क्या करना चाहिये ? अब हम क्या करें ? यह तो विपरीत कार्य हो गया । भवितव्यताके अवश्य होनेके कारण इसका निवारण करनेमें हम असमर्थ हैं ॥ ४-५ ॥ |
| किं कर्तव्यं कार्यमेतद्विपरीतमभूत्किल ।<br>अवश्यम्भाविभावत्वादशक्ताः स्म निवारणे ॥ ५ | |
| मन्त्रैर्बहुविधैर्देहं तदा तस्य महात्मनः ।<br>रक्षितं धारयामासुः किञ्चिच्छ्वसनसंयुतम् ॥ ६ | तब उन महात्मा राजाकी देहको ऋत्विजोंने अनेक प्रकारके मन्त्रोंसे सुरक्षित रखा; उनकी श्वास मन्द गतिसे चल रही थी । मन्त्रशक्तिसे उनकी निर्विकार आत्माको देहमें प्रतिष्ठित करके ऋत्विजोंने उसे अनेक प्रकारके गन्ध, माल्य आदिसे सुपूजित कर रखा था ॥ ६-७ ॥ |
| गन्धैर्माल्यैश्च विविधैः पूज्यमानं मुहुर्मुहुः ।<br>मन्त्रशक्त्या प्रतिष्टभ्य निर्विकारं सुपूजितम् ॥ ७ | |
| समाप्ते च क्रतौ तत्र देवाः सर्वे समागताः ।<br>ऋत्विग्भिस्तु स्तुताः सर्वे सुप्रीताश्चाभवन्नृप ॥ ८ | यज्ञके सम्पूर्ण होनेपर वहाँ सभी देवगण आये । हे राजन् ! ऋत्विजोंने उन सबकी स्तुति की, जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए । मुनियोंके द्वारा राजाके विषयमें समस्त बातोंको जान लेनेपर स्तोत्रोंसे सन्तुष्ट देवताओंने |
| अ० १५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७९५ | | :--- | :--- |
| विज्ञप्ता मुनिभिः स्तोत्रैर्निर्विण्णात्मानमब्रुवन् ।<br>प्रसन्नाः स्म महीपाल वरं वरय सुव्रत ॥ ९<br>यज्ञेनानेन राजर्षे वरं जन्म विधीयते ।<br>देवदेहं नृदेहं वा यत्ते मनसि वाञ्छितम् ॥ १०<br>दृप्तः कामं पुरोधास्ते मृत्युलोके यथासुखम् ।<br>एवमुक्तो निमेरात्मा सन्तुष्टास्तानुवाच ह ॥ ११ | दुःखी मनवाले राजासे कहा—हे राजन् ! हे सुव्रत ! हम प्रसन्न हैं; वर माँगिये। हे राजर्षे ! इस यज्ञके कारण आपको श्रेष्ठ जन्म प्राप्त हो सकता है। देवशरीर, मनुष्यशरीर अथवा आपके मनमें जो इच्छा हो, उसे आप प्राप्त कर सकते हैं; जैसे कि आपके पुरोहित वसिष्ठ गर्वयुक्त होकर मर्त्यलोकमें सुखपूर्वक रह रहे हैं ॥ ८—१० १/२ ॥<br>उनके ऐसा कहनेपर निमिकी आत्माने परम सन्तुष्ट होकर उनसे कहा—हे श्रेष्ठ देवगण ! सर्वदा विनष्ट होनेवाली इस देहमें रहनेकी मेरी इच्छा नहीं है, सम्पूर्ण प्राणियोंकी दृष्टिमें मेरा निवास हो, जिससे मैं वायुरूप होकर समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें विचरण करूँ ॥ ११-१२ १/२ ॥ | | न देहे मम वाञ्छास्ति सर्वदैव विनश्वरे ।<br>वासो मे सर्वसत्त्वानां दृष्टावस्तु सुरोत्तमाः ॥ १२<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां वायुभूतश्चराम्यहम् ।<br>एवमुक्ताः सुरास्तत्र निमेरात्मानमब्रुवन् ॥ १३ | उनसे ऐसा कहे जानेपर देवताओंने निमिकी आत्मासे कहा—हे महाराज ! आप कल्याणकारिणी तथा सबकी ईश्वरी भगवतीकी आराधना करें। आपके इस यज्ञसे प्रसन्न होकर वे आपका अभीष्ट अवश्य पूर्ण करेंगी ॥ १३-१४ ॥ | | प्रार्थय त्वं महाराज देवीं सर्वेश्वरीं शिवाम् ।<br>मखेनानेन सन्तुष्टा सा तेऽभीष्टं विधास्यति ॥ १४ | देवताओंके ऐसा कहनेपर उन्होंने अनेक प्रकारके दिव्य स्तोत्रोंद्वारा भक्तिपूर्वक गद्गद वाणीमें देवीकी प्रार्थना की ॥ १५ ॥ | | स देवैरेवमुक्तस्तु प्रार्थयामास देवताम् ।<br>स्तोत्रैर्नानाविधैर्दिव्यैर्भक्त्या गद्गदया गिरा ॥ १५ | तब प्रसन्न होकर देवीने उन्हें साक्षात् दर्शन दिया। उनके करोड़ों सूर्योंकी प्रभाके समान तथा लावण्यसे दीप्तिमान रूपको देखकर सभी कृतकृत्य हो गये और उनके मनमें परम प्रसन्नता हुई। हे राजन् ! देवीके प्रसन्न हो जानेपर राजाने वर माँगा—मुझे वह विमल ज्ञान दीजिये, जिससे मोक्ष प्राप्त हो जाय तथा समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें मेरा निवास हो जाय ॥ १६—१८ ॥ | | प्रसन्ना सा तदा देवी प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ ।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशं रूपं लावण्यदीपितम् ॥ १६<br>दृष्ट्वा प्रमुदिताः सर्वे कृतकृत्याश्च चेतसि ।<br>प्रसन्नायां देवतायां राजा वव्रे वरं नृप ॥ १७<br>ज्ञानं तद्विमलं देहि येन मोक्षो भवेदपि ।<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासो मे भवेदिति ॥ १८ | तब प्रसन्न हुई देवेश्वरी जगदम्बाने कहा—तुम्हें विमल ज्ञान प्राप्त होगा, परंतु अभी तुम्हारा प्रारब्ध शेष है। समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें तुम्हारा निवास भी होगा। तुम्हारे कारण ही प्राणियोंके नेत्रोंमें पलक गिरानेकी शक्ति होगी। तुम्हारे निवासके कारण ही मनुष्य, पशु तथा पक्षी 'निमिष' (पलक गिरानेवाले) तथा देवता 'अनिमिष' (पलक न गिरानेवाले) होंगे ॥ १९—२१ ॥ | | ततः प्रसन्ना देवेशी प्रोवाच जगदम्बिका ।<br>ज्ञानं ते विमलं भूयात्प्रारब्धस्यावशेषतः ॥ १९<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासोऽपि भविष्यति ।<br>निमिषं यान्ति चक्षूंषि त्वत्कृतेनैव देहिनाम् ॥ २०<br>तव वासात्सनिमिषा मानवाः पशवस्तथा ।<br>पतङ्गाश्च भविष्यन्ति पुनश्चानिमिषाः सुराः ॥ २१ | इस प्रकार उन राजाको वर देकर और सब मुनियोंको बुलाकर वे श्रीवरदायिनी भगवती वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ २२ ॥ | | इति दत्त्वा वरं तस्मै तदा श्रीवरदेवता ।<br>आमन्त्र्य च मुनीन्सर्वांस्तत्रैवान्तर्हिताभवत् ॥ २२ | |
| ७९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |
| अन्तर्हितायां देव्यां तु मुनयस्तत्र संस्थिताः।<br>विचिन्त्य विधिवत्सर्वं निमेर्देहं समाहरन्॥ २३<br>अरणिं तत्र संस्थाप्य ममन्थुर्मन्त्रवत्तदा।<br>मन्त्रहोमैर्महात्मानः पुत्रहेतोर्निमेरथ॥ २४ | देवीके अन्तर्धान हो जानेपर वहाँ उपस्थित मुनिगण विधिवत् विचार करके निमिके शरीरको ले आये और पुत्रप्राप्तिके लिये उसपर अरणिकाष्ठ रखकर वे महात्मा मन्त्र पढ़कर मन्त्रहोमके द्वारा निमिके देहका मन्थन करने लगे॥ २३-२४॥ | | अरण्यां मथ्यमानायां पुत्रः प्रादुरभूत्तदा।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नः साक्षान्निमिरिवापरः॥ २५<br>अरण्या मथनाज्जातस्तस्मान्मंथिरिति स्मृतः।<br>येनायं जनकाज्जातस्तेनासौ जनकोऽभवत्॥ २६<br>विदेहस्तु निमिर्जातो यस्मात्तस्मात्तदन्वये।<br>समुद्भूतास्तु राजानो विदेहा इति कीर्तिताः॥ २७ | तब अरणीके मन्थनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो समस्त लक्षणोंसे सम्पन्न और साक्षात् दूसरे निमिकी भाँति था। अरणीके मन्थनसे इसका जन्म हुआ था, अतः यह ‘मिथि’—ऐसा कहा गया और जनकसे जन्म होनेके कारण ‘जनक’ यह नामवाला हुआ। राजा निमि विदेह हुए, अतः उनके कुलमें उत्पन्न सभी राजा ‘विदेह’ ऐसा कहे गये॥ २५-२७॥ | | एवं निमिसुतो राजा प्रथितो जनकोऽभवत्।<br>नगरी निर्मिता तेन गङ्गातीरे मनोहरा॥ २८<br>मिथिलेति सुविख्याता गोपुराट्टालसंयुता।<br>धनधान्यसमायुक्ता हट्टशालाविरजिता॥ २९ | इस प्रकार निमिके पुत्र राजा जनक प्रसिद्ध हुए। उन्होंने गंगाके तटपर एक सुन्दर नगरीका निर्माण कराया, जो मिथिला नामसे विख्यात है। यह गोपुरों, अट्टालिकाओं तथा धन-धान्यसे सम्पन्न और बाजारोंसे सुशोभित है॥ २८-२९॥ | | वंशेऽस्मिन् येऽपि राजानस्ते सर्वे जनकास्तथा।<br>विख्याता ज्ञानिनः सर्वे विदेहाः परिकीर्तिताः॥ ३० | इस वंशमें जो अन्य राजा हुए, वे सभी जनक कहे गये; वे सभी विख्यात ज्ञानी और विदेह कहे जाते थे॥ ३०॥ | | एतत्ते कथितं राजन्निमेराख्यानमुत्तमम्।<br>शापाद्यस्य विदेहत्वं विस्तरादुदितं मया॥ ३१ | हे राजन्! इस प्रकार निमिकी उत्तम कथाका मैंने आपसे वर्णन किया, शापके कारण उनके विदेह होनेको भी मैंने विस्तारसे कह दिया॥ ३१॥ | | राजोवाच<br>भगवन्भवता प्रोक्तं निमिशापस्य कारणम्।<br>श्रुत्वा सन्देहमापन्नं मनो मेऽतीव चञ्चलम्॥ ३२ | राजा बोले—हे भगवन्! आपने निमिके शापका कारण बताया, इसे सुनकर मेरा मन संशयग्रस्त और अत्यन्त चंचल हो गया है॥ ३२॥ | | वसिष्ठो ब्राह्मणः श्रेष्ठो राज्ञश्चैव पुरोहितः।<br>पुत्रः पङ्कजयोनेस्तु राज्ञा शप्तः कथं मुनिः॥ ३३<br>गुरुं च ब्राह्मणं ज्ञात्वा निमिना न कृता क्षमा।<br>यज्ञकर्म शुभं कृत्वा कथं क्रोधमुपागतः॥ ३४<br>ज्ञात्वा धर्मस्य विज्ञानं कथमिक्ष्वाकुसम्भवः।<br>क्रोधस्य वशमापन्नः शप्तवान्ब्राह्मणं गुरुम्॥ ३५ | वसिष्ठजी श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, राजाके पुरोहित थे और वे कमलयोनि ब्रह्माजीके पुत्र थे, तब राजा निमिने उन मुनिको कैसे शाप दिया? निमिने उन्हें गुरु और ब्राह्मण जानकर क्षमा क्यों नहीं किया। यज्ञ-जैसा शुभ कार्य करनेपर भी उन्हें क्रोध कैसे आ गया? धर्मका रहस्य जान करके भी इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न राजाने क्रोधके वशीभूत होकर अपने ब्राह्मण गुरुको शाप क्यों दिया?॥ ३३-३५॥ | | व्यास उवाच<br>क्षमातिदुर्लभा राजन्प्राणिभिरजितात्मभिः।<br>क्षमावान्दुर्लभो लोके सुसमर्थो विशेषतः॥ ३६ | व्यासजी बोले—हे राजन्! अजितेन्द्रिय प्राणियोंके लिये क्षमा अत्यन्त दुर्लभ है, विशेषरूपसे सामर्थ्यशाली व्यक्तिका क्षमाशील होना इस संसारमें दुर्लभ है॥ ३६॥ |
| अ० १५] | षष्ठ स्कन्ध | ७९७ | | :--- | :--- |
| सर्वसङ्गपरित्यागी मुनिर्भवतु तापसः।<br>निद्राक्षुधोर्विजेता च योगाभ्यासे सुनिश्चितः॥ ३७ | मुनिको चाहिये कि वह सभी आसक्तियोंका परित्याग करनेवाला, तपस्वी, निद्रा तथा भूखपर विजय प्राप्त करनेवाला और योगाभ्यासमें सम्यक् रूपसे निष्ठा रखनेवाला हो॥ ३७॥ | | कामः क्रोधस्तथा लोभो ह्यहङ्कारश्चतुर्थकः।<br>दुर्जेया देहमध्यस्था रिपवस्तेन सर्वथा॥ ३८<br>न भूतपूर्वः संसारे न चैव वर्ततेऽधुना।<br>भविता न पुमान्कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान्॥ ३९ | काम, क्रोध, लोभ और चौथा अहंकार—ये शत्रु शरीरमें सदा विद्यमान रहते हैं जो सर्वथा दुर्जेय होते हैं। संसारमें न पहले कोई व्यक्ति हुआ है, न इस समय है और न तो आगे होगा जो इन शत्रुओंको जीत सके॥ ३८-३९॥ | | न स्वर्गे न च भूलोके ब्रह्मलोके हरेः पदे।<br>कैलासे नेदृशः कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान्॥ ४० | न स्वर्गमें, न पृथ्वीलोकमें, न ब्रह्मलोकमें, न विष्णुलोकमें और न तो कैलासमें भी ऐसा कोई व्यक्ति है, जो इन शत्रुओंको जीत सके॥ ४०॥ | | मुनयो ब्रह्मपुत्राश्च तथान्ये तापसोत्तमाः।<br>तेऽपि गुणत्रयाविद्धाः किं पुनर्मानवा भुवि॥ ४१ | जो मुनिगण, ब्रह्माजीके सभी पुत्र तथा अन्य श्रेष्ठ तपस्वीलोग हैं, वे भी तीनों गुणोंसे बँधे रहते हैं, तो मर्त्यलोकके मनुष्योंकी बात ही क्या ? ॥ ४१॥ | | कपिलः सांख्यवेत्ता च योगाभ्यासरतः शुचिः।<br>तेनापि दैवयोगाद्धि प्रदग्धाः सगरात्मजाः॥ ४२ | कपिलमुनि सांख्यशास्त्रके ज्ञाता, योगाभ्यास-परायण और शुद्ध चित्तवाले थे, किंतु उन्होंने भी दैववश सगर-पुत्रोंको भस्म कर दिया॥ ४२॥ | | तस्माद्राजन्नहङ्कारात्सञ्जातं भुवनत्रयम्।<br>कार्यकारणभावात्तु तद्वियुक्तं कथं भवेत्॥ ४३ | अतः हे राजन्! कार्य-कारणस्वरूप अहंकारसे ही यह त्रिलोक उत्पन्न हुआ है, तो फिर मनुष्य उससे वियुक्त कैसे रह सकता है? ॥ ४३॥ | | ब्रह्मा गुणत्रयाविष्टो विष्णुश्चैवाथ शङ्करः।<br>प्रभवन्ति शरीरेषु तेषां भावाः पृथक्पृथक्॥ ४४<br>मानवानां च का वार्ता सत्त्वैकान्तव्यवस्थितौ।<br>गुणानां सङ्करो राजन्सर्वत्र समवस्थितः॥ ४५<br>कदाचित्सत्त्ववृद्धिः स्यात्कदाचिद्रजसः किल।<br>कदाचित्तमसो वृद्धिः समभावः कदाचन॥ ४६ | ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी त्रिगुणसे बँधे हुए हैं; उनके भी शरीरोंमें गुणोंके पृथक्-पृथक् भाव उत्पन्न होते हैं। जब एकमात्र सत्त्वप्रधान देवताओंकी भी यह स्थिति है तो फिर मनुष्योंकी क्या बात? हे राजन्! गुणोंका संकर (मेल) सर्वत्र विद्यमान है। कभी सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, कभी रजोगुणकी वृद्धि होती है, कभी तमोगुणकी वृद्धि हो जाती है और कभी तीनों गुण बराबर हो जाते हैं॥ ४४-४६॥ | | निर्गुणः परमात्मासौ निर्लेपः परमोऽव्ययः।<br>अलक्ष्यः सर्वसत्त्वानामप्रमेयः सनातनः॥ ४७<br>तथैव परमा शक्तिर्निर्गुणा ब्रह्मसंस्थिता।<br>दुर्ज्ञेया चाल्पमतिभिः सर्वभूतव्यवस्थितिः॥ ४८<br>परात्मनस्तथा शक्तेस्तयोरैक्यं सदैव हि।<br>अभिन्नं तद्वपुर्ज्ञात्वा मुच्यते सर्वदोषतः॥ ४९<br>तज्ज्ञानादेव मोक्षः स्यादिति वेदान्तडिण्डिमः।<br>यो वेद स विमुक्तोऽस्मिन्संसारे त्रिगुणात्मके॥ ५० | वे परमात्मा निर्गुण, निर्लेप, परम अविनाशी, सभी प्राणियोंसे अलक्ष्य, अप्रमेय और सनातन हैं। उसी प्रकार वे परमा शक्ति भी निर्गुण, ब्रह्ममें स्थित, अल्पबुद्धि प्राणियोंके द्वारा दुर्ज्ञेय, समस्त प्राणियोंकी आश्रय हैं। परमात्मा और पराशक्ति—उन दोनोंमें सदासे ऐक्य है। उनका स्वरूप अभिन्न है—यह जानकर प्राणी समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। इस ज्ञानसे मुक्ति हो जाती है—यह वेदान्तका डिंडिमघोष है। जो यह जान लेता है, वह इस त्रिगुणात्मक संसारसे मुक्त हो जाता है॥ ४७-५०॥ |
७९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
७९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम्।<br>वेदशास्त्रार्थविज्ञानात्तद्द्भवेद् बुद्धियोगतः॥ ५१<br>विकल्पास्तत्र बहवो भवन्ति मतिकल्पिताः।<br>( कुतर्ककल्पिताः केचित्सुतर्ककल्पिताः परे।<br>वितर्कैर्विभ्रमोत्पत्तिर्विभ्रमाद् बुद्धिभ्रंशता।<br>बुद्धिभ्रंशाज्ज्ञाननाशः प्राणिनां परिकीर्तितः।)<br>अनुभवाख्यं द्वितीयं तु ज्ञानं तद्दुर्लभं नृप॥ ५२<br>तत्तदा प्राप्यते तस्य वेत्तुः सङ्गो यदा भवेत्।<br>शब्दज्ञानान्न कार्यस्य सिद्धिर्भवति भारत॥ ५३<br>तस्मान्नानुभवज्ञानं सम्भवत्यतिमानुषम्।<br>अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शब्दबोधो हि न क्षमः॥ ५४<br>यथा न नश्यति तमः कृत्यया दीपवार्तया। | ज्ञान भी दो प्रकारका कहा गया है। प्रथम शाब्दिक ज्ञान बताया गया है। वह ज्ञान बुद्धिकी सहायतासे वेद और शास्त्रके अर्थविज्ञानद्वारा प्राप्त हो जाता है। बुद्धिवैभिन्न्यके अनुसार इस ज्ञानके भी बहुत-से भेद हो जाते हैं। (इनमेंसे कुछ ज्ञान कुतर्कसे और कुछ सुतर्कसे कल्पित होते हैं। कुतर्कोंसे भ्रान्तिकी उत्पत्ति होती है और विभ्रमसे बुद्धिनाश हो जाता है। बुद्धिनाशसे प्राणियोंका ज्ञान नष्ट हो जाना कहा गया है।) हे राजन्! अनुभव नामक वह दूसरा ज्ञान तो दुर्लभ होता है। वह ज्ञान तब प्राप्त होता है, जब उसके जाननेवालेका संग हो जाय। हे भारत! शब्दज्ञानसे कार्यकी सिद्धि नहीं होती, इसलिये अनुभवज्ञान अत्यन्त अलौकिक होता है। शब्दज्ञान अन्तःकरणके अन्धकारको दूर करनेमें उसी प्रकार समर्थ नहीं है जैसे दीपकसम्बन्धी वार्ता करनेसे अन्धकार नष्ट नहीं होता॥ ५१–५४ १/२ ॥ |
| तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये॥ ५५<br>आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्।<br>शीलं परहितत्वं च कोपाभावः क्षमा धृतिः॥ ५६<br>सन्तोषश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम्।<br>विद्यया तपसा वापि योगाभ्यासेन भूपते॥ ५७<br>विना कामादिशत्रूणां नैव नाशः कदाचन।<br>( मनस्तु चञ्चलं राजन्स्वभावादतिदुर्ग्रहम्।<br>तद्वशः सर्वथा प्राणी त्रिविधो भुवनत्रये।)<br>कामक्रोधादयो भावाश्चित्तजाः परिकीर्तिताः॥ ५८<br>ते तदा न भवन्त्येव यदा वै निर्जितं मनः।<br>तस्मात्तु निमिना राजन् क्षमा विहिता मुनौ॥ ५९<br>यथा ययातिना पूर्वं कृता शुक्रे कृतागसि।<br>भृगुपुत्रेण शप्तोऽपि ययातिर्नृपसत्तमः॥ ६०<br>न शशाप मुनिं क्रोधाज्जरां राजा गृहीतवान्। | कर्म वही है, जो बन्धन न करे और विद्या वही है जो मुक्तिके लिये हो। अन्य कर्म तो मात्र परिश्रमके लिये होता है तथा दूसरी विद्या तो मात्र शिल्पसम्बन्धी कौशल है। शील, परोपकार, क्रोधका अभाव, क्षमा, धैर्य और सन्तोष—यह सब विद्याका अत्यन्त उत्तम फल है। हे भूपते! विद्या, तपस्या अथवा योगाभ्यासके बिना काम आदि शत्रुओंका नाश कभी नहीं हो सकता। (हे राजन्! मन चंचल और स्वभावतः अति दुर्ग्रह होता है, तीनों लोकोंमें तीनों प्रकारके प्राणी उसी मनके वशमें रहते हैं) काम-क्रोध आदि भाव चित्तजन्य कहे गये हैं। ये सब उस समय नहीं उत्पन्न होते, जब मनपर विजय पा ली जाती है। हे राजन्! इसीलिये निमिने मुनिको उस प्रकार क्षमा नहीं किया, जिस प्रकार ययातिने अपराध करनेपर भी शुक्राचार्यको क्षमा कर दिया था। पूर्वकालमें भृगुपुत्र शुक्राचार्यने नृपश्रेष्ठ ययातिको शाप दे दिया था, लेकिन राजाने क्रोधित होकर मुनिको शाप नहीं दिया और स्वयं वृद्धावस्थाको स्वीकार कर लिया था॥ ५५–६० १/२ ॥ |
| कश्चित्सौम्यो भवेत्कश्चित्क्रूरो भवति पार्थिवः॥ ६१<br>स्वभावभेदान्नृपते कस्य दोषोऽत्र कल्प्यते।<br>हैहया भार्गवान्पूर्वं धनलोभात्पुरोहितान्॥ ६२ | हे राजन्! कोई राजा शान्तस्वभाव और कोई क्रूर होता है। स्वभावमें भेद होनेके कारण इसमें किसका दोष कहा जाय? पूर्वकालमें हैहयवंशी क्षत्रियोंने ब्रह्महत्याजनित पापकी उपेक्षा करके धनके |
अ० १६ ] षष्ठ स्कन्ध ७९९
| ब्राह्मणामूलतः सर्वांश्चच्छिदुः क्रोधमूर्च्छिताः।<br>पातकं पृष्ठतः कृत्वा ब्रह्महत्यासमुद्भवम् ॥ ६३ | लोभसे भृगुवंशी ब्राह्मण पुरोहितोंका कोपाविष्ट होकर समूलोच्छेद कर दिया था॥ ६१-६३॥ |
|---|
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे देवीमहिम्नि नानाभाववर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः
हैहयवंशी क्षत्रियोंद्वारा भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार
| जनमेजय उवाच | जनमेजय बोले— |
|---|---|
| कुले कस्य समुत्पन्नाः क्षत्रिया हैहयाश्च ते।<br>ब्रह्महत्यामनादृत्य निजघ्नुर्भार्गवांश्च ये ॥ १ | जिन हैहय क्षत्रियोंने ब्रह्महत्याकी लेशमात्र भी चिन्ता न करके भृगुवंशी ब्राह्मणोंका वध कर दिया, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए थे? ॥ १॥ |
| वैरस्य कारणं तेषां किं मे ब्रूहि पितामह।<br>निमित्तेन विना क्रोधं कथं कुर्वन्ति सत्तमाः ॥ २ | हे पितामह ! उनके वैरका क्या कारण था, आप मुझे बतलाइये। श्रेष्ठजन किसी कारणविशेषके बिना क्रोध कैसे कर सकते हैं ? ॥ २ ॥ |
| वैरं पुरोहितैः सार्धं कस्मात्तेषामजायत ।<br>नाल्पहेतोर्हि तद्वैरं क्षत्रियाणां भविष्यति ॥ ३ | अपने ही पुरोहितोंके साथ उनकी शत्रुता किसलिये हो गयी थी ? सम्भवतः उन क्षत्रियोंकी उस शत्रुताके पीछे कोई महान् कारण रहा होगा। अन्यथा पापसे भयभीत रहनेवाले वे पराक्रमी क्षत्रिय निरपराध एवं पूजनीय ब्राह्मणोंकी हत्या क्यों करते ? ॥ ३-४॥ |
| अन्यथा ब्राह्मण्यान्पूज्यान्कथं जघ्नुरनागसः।<br>बाहुजा बलवन्तोऽपि पापभीताः कथं न ते ॥ ४ | |
| स्वल्पेऽपराधे को हन्याद्ब्राह्मणांक्षत्रियर्षभः।<br>सन्देहो मे मुनिश्रेष्ठ कारणं वक्तुमर्हसि ॥ ५ | हे मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कौन श्रेष्ठ क्षत्रिय होगा, जो अल्प अपराधके कारण ब्राह्मणोंका वध करेगा ? मुझे तो इस विषयमें महान् शंका हो रही है, इसका कारण बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| इति पृष्टस्तदा तेन राज्ञा सत्यवतीसुतः।<br>उवाच परमप्रीतः कथां संस्मृत्य चेतसा ॥ ६ | तब राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर सत्यवतीनन्दन व्यासजी परम प्रसन्न हुए और मनमें उस वृत्तान्तका स्मरण करके कहने लगे ॥ ६ ॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| शृणु पारिक्षिते वार्तां क्षत्रियाणां पुरातनीम् ।<br>आश्चर्यकारिणीं सम्यग्विदितां च पुरा मया ॥ ७ | हे जनमेजय ! मेरे द्वारा पूर्वकालमें सम्यक् प्रकारसे ज्ञात, क्षत्रियोंसे सम्बन्ध रखनेवाली इस आश्चर्यजनक प्राचीन कथाको आप सुनिये ? ॥ ७ ॥ |
| कार्तवीर्येति नाम्नाभूद्धैहयः पृथिवीपतिः।<br>सहस्त्रबाहुर्बलवानर्जुनो धर्मतत्परः ॥ ८ | कार्तवीर्य नामक एक हैहयवंशीय राजा हो चुके हैं। सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले उन बलवान् राजाकी हजार भुजाएँ थीं, वे सहस्रार्जुन भी कहे जाते थे ॥ ८ ॥ |
| दत्तात्रेयस्य शिष्योऽभूदवतारो हरेरिव ।<br>सिद्धः सर्वार्थदः शाक्तो भृगूणां याज्य एव सः ॥ ९ | वे भगवान् विष्णुके अवतारस्वरूप, दत्तात्रेयके शिष्य, भगवतीके उपासक, परम सिद्ध, सब कुछ देनेमें समर्थ तथा भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यजमान थे ॥ ९ ॥ |