भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 802

| अ० १४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७९३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तथा मे देहसंयोगः पूर्ववत्सम्पद्यताम्।<br>यादृशं ज्ञानमेतस्मिन्देहे तत्रास्तु तत्पितः॥ ५४<br>समर्थोऽसि महाराज प्रसादं कर्तुमर्हसि।पूर्ववत् ही रहे। इस शरीरमें जैसा ज्ञान है, वैसा ही उस शरीरमें भी रहे। हे महाराज! आप समर्थ हैं; मुझपर कृपा करने योग्य हैं॥ ५२—५४ १/२॥
वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्मा प्रोवाच तं सुतम्॥ ५५<br>मित्रावरुणयोस्तेजस्त्वं प्रविश्य स्थिरो भव।<br>तस्मादयोनिजः काले भविता त्वं न संशयः॥ ५६<br>पुनर्देहं समासाद्य धर्मयुक्तो भविष्यसि।<br>भूतात्मा वेदवित्कामं सर्वज्ञः सर्वपूजितः॥ ५७वसिष्ठकी बात सुनकर ब्रह्माजी अपने उस पुत्रसे बोले—तुम मित्रावरुणके तेज हो, अतः इन्हींमें प्रवेश करके स्थिर हो जाओ। कुछ समय बाद तुम उन्हींसे अयोनिज पुत्रके रूपमें प्रकट होओगे; इसमें सन्देह नहीं है। इस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त करके तुम धर्मनिष्ठ, प्राणियोंके सुहृद्, वेदवेत्ता, सर्वज्ञ और सबके द्वारा पूजित होओगे॥ ५५—५७॥
एवमुक्तस्तदा पित्रा प्रययौ वरुणालयम्।<br>कृत्वा प्रदक्षिणं प्रीत्या प्रणम्य च पितामहम्॥ ५८<br>विवेश स तयोर्देहे मित्रावरुणयोः किल।<br>जीवांशेन वसिष्ठोऽथ त्यक्त्वा देहमनुत्तमम्॥ ५९पिताके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी प्रसन्नतापूर्वक पितामह ब्रह्माजीकी परिक्रमा करके और उन्हें प्रणाम करके वरुणके वासस्थानको चले गये। वसिष्ठजीने अपने उत्तम देहका त्याग करके मित्र और वरुणके शरीरमें जीवांशरूपसे प्रवेश किया॥ ५८-५९॥
कदाचित्तूर्वशी राजन्नागता वरुणालयम्।<br>यदृच्छया वरारोहा सखीगणसमावृता॥ ६०हे राजन्! किसी समय परम सुन्दरी अप्सरा उर्वशी अपनी सखियोंके साथ स्वेच्छापूर्वक मित्रावरुणके स्थानपर आयी॥ ६०॥
दृष्ट्वा तामप्सरां दिव्यां रूपयौवनसंयुताम्।<br>जातौ कामातुरौ देवौ तदा तामूचतुर्नृप॥ ६१<br>विवशौ चारुसर्वाङ्गीं देवकन्यां मनोरमाम्।<br>आवां त्वमनवद्याङ्गि वरयस्व समाकुलौ॥ ६२<br>विहरस्व यथाकामं स्थानेऽस्मिन्वरवर्णिनि।<br>तथोक्ता सा ततो देवी ताभ्यां तत्र स्थितावशा॥ ६३<br>कृत्वा भावं स्थिरं देवी मित्रावरुणयोर्गृहे।<br>सा गृहीत्वा तयोर्भावं संस्थिता चारुदर्शना॥ ६४हे राजन्! उस रूपयौवनसे सम्पन्न दिव्य अप्सराको देखकर वे दोनों देवता कामातुर हो गये और समस्त सुन्दर अंगोंवाली उस मनोरम देवकन्यासे कहने लगे—हे प्रशस्त अंगोंवाली! विवश तथा व्याकुल हम दोनोंका तुम वरण कर लो और हे वरवर्णिनि! तुम अपनी इच्छाके अनुसार इस स्थानपर विहार करो। उनके इस प्रकार कहनेपर वह देवी उर्वशी मन स्थिर करके मित्रावरुणके घरमें उन दोनोंके साथ विवश होकर रहने लगी। प्रिय दर्शनवाली वह अप्सरा उन दोनोंके भावोंको समझकर वहीं रहने लगी॥ ६१—६४॥
तयोस्तु पतितं वीर्यं कुम्भे दैवादनावृते।<br>तस्माज्जातौ मुनी राजन्द्व्वावेवातिमनोंहरौ॥ ६५<br>अगस्तिः प्रथमस्तत्र वसिष्ठश्चापरस्तथा।<br>मित्रावरुणयोर्वीर्यात्तापसावृषिसत्तमौ ॥ ६६दैववशात् वहाँ रखे हुए एक आवरणरहित कुम्भमें दोनोंका वीर्य स्खलित हो गया; और हे राजन्! उसमेंसे दो अत्यन्त सुन्दर मुनिकुमारोंने जन्म लिया। उनमें पहले अगस्ति थे और दूसरे वसिष्ठ थे। इस प्रकार मित्र और वरुणके तेजसे वे दोनों ऋषिश्रेष्ठ तपस्वी प्रकट हुए॥ ६५-६६॥
प्रथमस्तु वनं प्राप्तो बाल एव महातपाः।<br>इक्ष्वाकुस्तु वसिष्ठं तं बालं वव्रे पुरोहितम्॥ ६७महातपस्वी अगस्ति बाल्यावस्थामें ही वन चले गये और महाराज इक्ष्वाकुने अपने पुरोहितके रूपमें दूसरे बालक वसिष्ठका वरण कर लिया॥ ६७॥