देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० १४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७९३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तथा मे देहसंयोगः पूर्ववत्सम्पद्यताम्।<br>यादृशं ज्ञानमेतस्मिन्देहे तत्रास्तु तत्पितः॥ ५४<br>समर्थोऽसि महाराज प्रसादं कर्तुमर्हसि। | पूर्ववत् ही रहे। इस शरीरमें जैसा ज्ञान है, वैसा ही उस शरीरमें भी रहे। हे महाराज! आप समर्थ हैं; मुझपर कृपा करने योग्य हैं॥ ५२—५४ १/२॥ |
| वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्मा प्रोवाच तं सुतम्॥ ५५<br>मित्रावरुणयोस्तेजस्त्वं प्रविश्य स्थिरो भव।<br>तस्मादयोनिजः काले भविता त्वं न संशयः॥ ५६<br>पुनर्देहं समासाद्य धर्मयुक्तो भविष्यसि।<br>भूतात्मा वेदवित्कामं सर्वज्ञः सर्वपूजितः॥ ५७ | वसिष्ठकी बात सुनकर ब्रह्माजी अपने उस पुत्रसे बोले—तुम मित्रावरुणके तेज हो, अतः इन्हींमें प्रवेश करके स्थिर हो जाओ। कुछ समय बाद तुम उन्हींसे अयोनिज पुत्रके रूपमें प्रकट होओगे; इसमें सन्देह नहीं है। इस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त करके तुम धर्मनिष्ठ, प्राणियोंके सुहृद्, वेदवेत्ता, सर्वज्ञ और सबके द्वारा पूजित होओगे॥ ५५—५७॥ |
| एवमुक्तस्तदा पित्रा प्रययौ वरुणालयम्।<br>कृत्वा प्रदक्षिणं प्रीत्या प्रणम्य च पितामहम्॥ ५८<br>विवेश स तयोर्देहे मित्रावरुणयोः किल।<br>जीवांशेन वसिष्ठोऽथ त्यक्त्वा देहमनुत्तमम्॥ ५९ | पिताके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी प्रसन्नतापूर्वक पितामह ब्रह्माजीकी परिक्रमा करके और उन्हें प्रणाम करके वरुणके वासस्थानको चले गये। वसिष्ठजीने अपने उत्तम देहका त्याग करके मित्र और वरुणके शरीरमें जीवांशरूपसे प्रवेश किया॥ ५८-५९॥ |
| कदाचित्तूर्वशी राजन्नागता वरुणालयम्।<br>यदृच्छया वरारोहा सखीगणसमावृता॥ ६० | हे राजन्! किसी समय परम सुन्दरी अप्सरा उर्वशी अपनी सखियोंके साथ स्वेच्छापूर्वक मित्रावरुणके स्थानपर आयी॥ ६०॥ |
| दृष्ट्वा तामप्सरां दिव्यां रूपयौवनसंयुताम्।<br>जातौ कामातुरौ देवौ तदा तामूचतुर्नृप॥ ६१<br>विवशौ चारुसर्वाङ्गीं देवकन्यां मनोरमाम्।<br>आवां त्वमनवद्याङ्गि वरयस्व समाकुलौ॥ ६२<br>विहरस्व यथाकामं स्थानेऽस्मिन्वरवर्णिनि।<br>तथोक्ता सा ततो देवी ताभ्यां तत्र स्थितावशा॥ ६३<br>कृत्वा भावं स्थिरं देवी मित्रावरुणयोर्गृहे।<br>सा गृहीत्वा तयोर्भावं संस्थिता चारुदर्शना॥ ६४ | हे राजन्! उस रूपयौवनसे सम्पन्न दिव्य अप्सराको देखकर वे दोनों देवता कामातुर हो गये और समस्त सुन्दर अंगोंवाली उस मनोरम देवकन्यासे कहने लगे—हे प्रशस्त अंगोंवाली! विवश तथा व्याकुल हम दोनोंका तुम वरण कर लो और हे वरवर्णिनि! तुम अपनी इच्छाके अनुसार इस स्थानपर विहार करो। उनके इस प्रकार कहनेपर वह देवी उर्वशी मन स्थिर करके मित्रावरुणके घरमें उन दोनोंके साथ विवश होकर रहने लगी। प्रिय दर्शनवाली वह अप्सरा उन दोनोंके भावोंको समझकर वहीं रहने लगी॥ ६१—६४॥ |
| तयोस्तु पतितं वीर्यं कुम्भे दैवादनावृते।<br>तस्माज्जातौ मुनी राजन्द्व्वावेवातिमनोंहरौ॥ ६५<br>अगस्तिः प्रथमस्तत्र वसिष्ठश्चापरस्तथा।<br>मित्रावरुणयोर्वीर्यात्तापसावृषिसत्तमौ ॥ ६६ | दैववशात् वहाँ रखे हुए एक आवरणरहित कुम्भमें दोनोंका वीर्य स्खलित हो गया; और हे राजन्! उसमेंसे दो अत्यन्त सुन्दर मुनिकुमारोंने जन्म लिया। उनमें पहले अगस्ति थे और दूसरे वसिष्ठ थे। इस प्रकार मित्र और वरुणके तेजसे वे दोनों ऋषिश्रेष्ठ तपस्वी प्रकट हुए॥ ६५-६६॥ |
| प्रथमस्तु वनं प्राप्तो बाल एव महातपाः।<br>इक्ष्वाकुस्तु वसिष्ठं तं बालं वव्रे पुरोहितम्॥ ६७ | महातपस्वी अगस्ति बाल्यावस्थामें ही वन चले गये और महाराज इक्ष्वाकुने अपने पुरोहितके रूपमें दूसरे बालक वसिष्ठका वरण कर लिया॥ ६७॥ |
| ७९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| वंशस्यास्य सुखार्थं ते पालयामास पार्थिव ।<br>विशेषेण मुनिं ज्ञात्वा प्रीत्या युक्तो बभूव ह ॥ ६८ | हे राजन् ! आपका यह वंश सुखी रहे, इसलिये राजा इक्ष्वाकुने वसिष्ठका पालन-पोषण किया और विशेष-रूपसे इन्हें मुनि जानकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ ६८ ॥ | | एतत्ते सर्वमाख्यातं वसिष्ठस्य च कारणम् ।<br>शापाद्देहान्तरप्राप्तिर्मित्रावरुणयोः कुले ॥ ६९ | इस प्रकार शापके कारण मित्रावरुणके कुलमें वसिष्ठजीके अन्य शरीरकी प्राप्तिका समस्त आख्यान मैंने आपको बता दिया ॥ ६९ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां षष्ठस्कन्धे वसिष्ठस्य मैत्रावरुणिरितिनामवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
भगवतीकी कृपासे निमिको मनुष्योंके नेत्र-पलकोंमें वासस्थान मिलना तथा संसारी प्राणियोंकी त्रिगुणात्मकताका वर्णन
| जनमेजय उवाच<br>देहप्राप्तिर्वसिष्ठस्य कथिता भवता किल ।<br>निमिः कथं पुनर्देहं प्राप्तवानिति मे वद ॥ १ | जनमेजय बोले—आपने वसिष्ठकी शरीर-प्राप्तिका वर्णन किया; निमिने पुनः किस प्रकार देह प्राप्त की; यह मुझसे कहिये ॥ १ ॥ |
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| <div align="center">व्यास उवाच</div>वसिष्ठेन च सम्प्राप्तः पुनर्देहो नराधिप ।<br>निमिना न तथा प्राप्तो देहः शापादनन्तरम् ॥ २ | व्यासजी बोले—हे राजन् ! वसिष्ठने जिस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त किया, उस प्रकार निमिको शापके बाद पुनः देह नहीं मिली ॥ २ ॥ |
| यदा शप्तो वसिष्ठेन तदा ते ब्राह्मणाः क्रतौ ।<br>ऋत्विजो ये वृता राज्ञा ते सर्वे समचिन्तयन् ॥ ३ | जब वसिष्ठजीने शाप दिया तो राजाके द्वारा यज्ञमें वरण किये गये ब्राह्मण और ऋत्विज् विचार करने लगे— ॥ ३ ॥ |
| किं कर्तव्यमहोऽस्माभिः शापदग्धो महीपतिः ।<br>अस्मिन्यज्ञे त्वसम्पूर्णे दीक्षायुक्तश्च धार्मिकः ॥ ४ | अहो, यज्ञमें दीक्षित ये धर्मनिष्ठ राजा शापसे दग्ध हो गये हैं और यज्ञ भी अपूर्ण ही रह गया है—ऐसेमें हम सबको क्या करना चाहिये ? अब हम क्या करें ? यह तो विपरीत कार्य हो गया । भवितव्यताके अवश्य होनेके कारण इसका निवारण करनेमें हम असमर्थ हैं ॥ ४-५ ॥ |
| किं कर्तव्यं कार्यमेतद्विपरीतमभूत्किल ।<br>अवश्यम्भाविभावत्वादशक्ताः स्म निवारणे ॥ ५ | |
| मन्त्रैर्बहुविधैर्देहं तदा तस्य महात्मनः ।<br>रक्षितं धारयामासुः किञ्चिच्छ्वसनसंयुतम् ॥ ६ | तब उन महात्मा राजाकी देहको ऋत्विजोंने अनेक प्रकारके मन्त्रोंसे सुरक्षित रखा; उनकी श्वास मन्द गतिसे चल रही थी । मन्त्रशक्तिसे उनकी निर्विकार आत्माको देहमें प्रतिष्ठित करके ऋत्विजोंने उसे अनेक प्रकारके गन्ध, माल्य आदिसे सुपूजित कर रखा था ॥ ६-७ ॥ |
| गन्धैर्माल्यैश्च विविधैः पूज्यमानं मुहुर्मुहुः ।<br>मन्त्रशक्त्या प्रतिष्टभ्य निर्विकारं सुपूजितम् ॥ ७ | |
| समाप्ते च क्रतौ तत्र देवाः सर्वे समागताः ।<br>ऋत्विग्भिस्तु स्तुताः सर्वे सुप्रीताश्चाभवन्नृप ॥ ८ | यज्ञके सम्पूर्ण होनेपर वहाँ सभी देवगण आये । हे राजन् ! ऋत्विजोंने उन सबकी स्तुति की, जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए । मुनियोंके द्वारा राजाके विषयमें समस्त बातोंको जान लेनेपर स्तोत्रोंसे सन्तुष्ट देवताओंने |
| अ० १५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७९५ | | :--- | :--- |
| विज्ञप्ता मुनिभिः स्तोत्रैर्निर्विण्णात्मानमब्रुवन् ।<br>प्रसन्नाः स्म महीपाल वरं वरय सुव्रत ॥ ९<br>यज्ञेनानेन राजर्षे वरं जन्म विधीयते ।<br>देवदेहं नृदेहं वा यत्ते मनसि वाञ्छितम् ॥ १०<br>दृप्तः कामं पुरोधास्ते मृत्युलोके यथासुखम् ।<br>एवमुक्तो निमेरात्मा सन्तुष्टास्तानुवाच ह ॥ ११ | दुःखी मनवाले राजासे कहा—हे राजन् ! हे सुव्रत ! हम प्रसन्न हैं; वर माँगिये। हे राजर्षे ! इस यज्ञके कारण आपको श्रेष्ठ जन्म प्राप्त हो सकता है। देवशरीर, मनुष्यशरीर अथवा आपके मनमें जो इच्छा हो, उसे आप प्राप्त कर सकते हैं; जैसे कि आपके पुरोहित वसिष्ठ गर्वयुक्त होकर मर्त्यलोकमें सुखपूर्वक रह रहे हैं ॥ ८—१० १/२ ॥<br>उनके ऐसा कहनेपर निमिकी आत्माने परम सन्तुष्ट होकर उनसे कहा—हे श्रेष्ठ देवगण ! सर्वदा विनष्ट होनेवाली इस देहमें रहनेकी मेरी इच्छा नहीं है, सम्पूर्ण प्राणियोंकी दृष्टिमें मेरा निवास हो, जिससे मैं वायुरूप होकर समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें विचरण करूँ ॥ ११-१२ १/२ ॥ | | न देहे मम वाञ्छास्ति सर्वदैव विनश्वरे ।<br>वासो मे सर्वसत्त्वानां दृष्टावस्तु सुरोत्तमाः ॥ १२<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां वायुभूतश्चराम्यहम् ।<br>एवमुक्ताः सुरास्तत्र निमेरात्मानमब्रुवन् ॥ १३ | उनसे ऐसा कहे जानेपर देवताओंने निमिकी आत्मासे कहा—हे महाराज ! आप कल्याणकारिणी तथा सबकी ईश्वरी भगवतीकी आराधना करें। आपके इस यज्ञसे प्रसन्न होकर वे आपका अभीष्ट अवश्य पूर्ण करेंगी ॥ १३-१४ ॥ | | प्रार्थय त्वं महाराज देवीं सर्वेश्वरीं शिवाम् ।<br>मखेनानेन सन्तुष्टा सा तेऽभीष्टं विधास्यति ॥ १४ | देवताओंके ऐसा कहनेपर उन्होंने अनेक प्रकारके दिव्य स्तोत्रोंद्वारा भक्तिपूर्वक गद्गद वाणीमें देवीकी प्रार्थना की ॥ १५ ॥ | | स देवैरेवमुक्तस्तु प्रार्थयामास देवताम् ।<br>स्तोत्रैर्नानाविधैर्दिव्यैर्भक्त्या गद्गदया गिरा ॥ १५ | तब प्रसन्न होकर देवीने उन्हें साक्षात् दर्शन दिया। उनके करोड़ों सूर्योंकी प्रभाके समान तथा लावण्यसे दीप्तिमान रूपको देखकर सभी कृतकृत्य हो गये और उनके मनमें परम प्रसन्नता हुई। हे राजन् ! देवीके प्रसन्न हो जानेपर राजाने वर माँगा—मुझे वह विमल ज्ञान दीजिये, जिससे मोक्ष प्राप्त हो जाय तथा समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें मेरा निवास हो जाय ॥ १६—१८ ॥ | | प्रसन्ना सा तदा देवी प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ ।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशं रूपं लावण्यदीपितम् ॥ १६<br>दृष्ट्वा प्रमुदिताः सर्वे कृतकृत्याश्च चेतसि ।<br>प्रसन्नायां देवतायां राजा वव्रे वरं नृप ॥ १७<br>ज्ञानं तद्विमलं देहि येन मोक्षो भवेदपि ।<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासो मे भवेदिति ॥ १८ | तब प्रसन्न हुई देवेश्वरी जगदम्बाने कहा—तुम्हें विमल ज्ञान प्राप्त होगा, परंतु अभी तुम्हारा प्रारब्ध शेष है। समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें तुम्हारा निवास भी होगा। तुम्हारे कारण ही प्राणियोंके नेत्रोंमें पलक गिरानेकी शक्ति होगी। तुम्हारे निवासके कारण ही मनुष्य, पशु तथा पक्षी 'निमिष' (पलक गिरानेवाले) तथा देवता 'अनिमिष' (पलक न गिरानेवाले) होंगे ॥ १९—२१ ॥ | | ततः प्रसन्ना देवेशी प्रोवाच जगदम्बिका ।<br>ज्ञानं ते विमलं भूयात्प्रारब्धस्यावशेषतः ॥ १९<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासोऽपि भविष्यति ।<br>निमिषं यान्ति चक्षूंषि त्वत्कृतेनैव देहिनाम् ॥ २०<br>तव वासात्सनिमिषा मानवाः पशवस्तथा ।<br>पतङ्गाश्च भविष्यन्ति पुनश्चानिमिषाः सुराः ॥ २१ | इस प्रकार उन राजाको वर देकर और सब मुनियोंको बुलाकर वे श्रीवरदायिनी भगवती वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ २२ ॥ | | इति दत्त्वा वरं तस्मै तदा श्रीवरदेवता ।<br>आमन्त्र्य च मुनीन्सर्वांस्तत्रैवान्तर्हिताभवत् ॥ २२ | |
| ७९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |
| अन्तर्हितायां देव्यां तु मुनयस्तत्र संस्थिताः।<br>विचिन्त्य विधिवत्सर्वं निमेर्देहं समाहरन्॥ २३<br>अरणिं तत्र संस्थाप्य ममन्थुर्मन्त्रवत्तदा।<br>मन्त्रहोमैर्महात्मानः पुत्रहेतोर्निमेरथ॥ २४ | देवीके अन्तर्धान हो जानेपर वहाँ उपस्थित मुनिगण विधिवत् विचार करके निमिके शरीरको ले आये और पुत्रप्राप्तिके लिये उसपर अरणिकाष्ठ रखकर वे महात्मा मन्त्र पढ़कर मन्त्रहोमके द्वारा निमिके देहका मन्थन करने लगे॥ २३-२४॥ | | अरण्यां मथ्यमानायां पुत्रः प्रादुरभूत्तदा।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नः साक्षान्निमिरिवापरः॥ २५<br>अरण्या मथनाज्जातस्तस्मान्मंथिरिति स्मृतः।<br>येनायं जनकाज्जातस्तेनासौ जनकोऽभवत्॥ २६<br>विदेहस्तु निमिर्जातो यस्मात्तस्मात्तदन्वये।<br>समुद्भूतास्तु राजानो विदेहा इति कीर्तिताः॥ २७ | तब अरणीके मन्थनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो समस्त लक्षणोंसे सम्पन्न और साक्षात् दूसरे निमिकी भाँति था। अरणीके मन्थनसे इसका जन्म हुआ था, अतः यह ‘मिथि’—ऐसा कहा गया और जनकसे जन्म होनेके कारण ‘जनक’ यह नामवाला हुआ। राजा निमि विदेह हुए, अतः उनके कुलमें उत्पन्न सभी राजा ‘विदेह’ ऐसा कहे गये॥ २५-२७॥ | | एवं निमिसुतो राजा प्रथितो जनकोऽभवत्।<br>नगरी निर्मिता तेन गङ्गातीरे मनोहरा॥ २८<br>मिथिलेति सुविख्याता गोपुराट्टालसंयुता।<br>धनधान्यसमायुक्ता हट्टशालाविरजिता॥ २९ | इस प्रकार निमिके पुत्र राजा जनक प्रसिद्ध हुए। उन्होंने गंगाके तटपर एक सुन्दर नगरीका निर्माण कराया, जो मिथिला नामसे विख्यात है। यह गोपुरों, अट्टालिकाओं तथा धन-धान्यसे सम्पन्न और बाजारोंसे सुशोभित है॥ २८-२९॥ | | वंशेऽस्मिन् येऽपि राजानस्ते सर्वे जनकास्तथा।<br>विख्याता ज्ञानिनः सर्वे विदेहाः परिकीर्तिताः॥ ३० | इस वंशमें जो अन्य राजा हुए, वे सभी जनक कहे गये; वे सभी विख्यात ज्ञानी और विदेह कहे जाते थे॥ ३०॥ | | एतत्ते कथितं राजन्निमेराख्यानमुत्तमम्।<br>शापाद्यस्य विदेहत्वं विस्तरादुदितं मया॥ ३१ | हे राजन्! इस प्रकार निमिकी उत्तम कथाका मैंने आपसे वर्णन किया, शापके कारण उनके विदेह होनेको भी मैंने विस्तारसे कह दिया॥ ३१॥ | | राजोवाच<br>भगवन्भवता प्रोक्तं निमिशापस्य कारणम्।<br>श्रुत्वा सन्देहमापन्नं मनो मेऽतीव चञ्चलम्॥ ३२ | राजा बोले—हे भगवन्! आपने निमिके शापका कारण बताया, इसे सुनकर मेरा मन संशयग्रस्त और अत्यन्त चंचल हो गया है॥ ३२॥ | | वसिष्ठो ब्राह्मणः श्रेष्ठो राज्ञश्चैव पुरोहितः।<br>पुत्रः पङ्कजयोनेस्तु राज्ञा शप्तः कथं मुनिः॥ ३३<br>गुरुं च ब्राह्मणं ज्ञात्वा निमिना न कृता क्षमा।<br>यज्ञकर्म शुभं कृत्वा कथं क्रोधमुपागतः॥ ३४<br>ज्ञात्वा धर्मस्य विज्ञानं कथमिक्ष्वाकुसम्भवः।<br>क्रोधस्य वशमापन्नः शप्तवान्ब्राह्मणं गुरुम्॥ ३५ | वसिष्ठजी श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, राजाके पुरोहित थे और वे कमलयोनि ब्रह्माजीके पुत्र थे, तब राजा निमिने उन मुनिको कैसे शाप दिया? निमिने उन्हें गुरु और ब्राह्मण जानकर क्षमा क्यों नहीं किया। यज्ञ-जैसा शुभ कार्य करनेपर भी उन्हें क्रोध कैसे आ गया? धर्मका रहस्य जान करके भी इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न राजाने क्रोधके वशीभूत होकर अपने ब्राह्मण गुरुको शाप क्यों दिया?॥ ३३-३५॥ | | व्यास उवाच<br>क्षमातिदुर्लभा राजन्प्राणिभिरजितात्मभिः।<br>क्षमावान्दुर्लभो लोके सुसमर्थो विशेषतः॥ ३६ | व्यासजी बोले—हे राजन्! अजितेन्द्रिय प्राणियोंके लिये क्षमा अत्यन्त दुर्लभ है, विशेषरूपसे सामर्थ्यशाली व्यक्तिका क्षमाशील होना इस संसारमें दुर्लभ है॥ ३६॥ |
| अ० १५] | षष्ठ स्कन्ध | ७९७ | | :--- | :--- |
| सर्वसङ्गपरित्यागी मुनिर्भवतु तापसः।<br>निद्राक्षुधोर्विजेता च योगाभ्यासे सुनिश्चितः॥ ३७ | मुनिको चाहिये कि वह सभी आसक्तियोंका परित्याग करनेवाला, तपस्वी, निद्रा तथा भूखपर विजय प्राप्त करनेवाला और योगाभ्यासमें सम्यक् रूपसे निष्ठा रखनेवाला हो॥ ३७॥ | | कामः क्रोधस्तथा लोभो ह्यहङ्कारश्चतुर्थकः।<br>दुर्जेया देहमध्यस्था रिपवस्तेन सर्वथा॥ ३८<br>न भूतपूर्वः संसारे न चैव वर्ततेऽधुना।<br>भविता न पुमान्कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान्॥ ३९ | काम, क्रोध, लोभ और चौथा अहंकार—ये शत्रु शरीरमें सदा विद्यमान रहते हैं जो सर्वथा दुर्जेय होते हैं। संसारमें न पहले कोई व्यक्ति हुआ है, न इस समय है और न तो आगे होगा जो इन शत्रुओंको जीत सके॥ ३८-३९॥ | | न स्वर्गे न च भूलोके ब्रह्मलोके हरेः पदे।<br>कैलासे नेदृशः कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान्॥ ४० | न स्वर्गमें, न पृथ्वीलोकमें, न ब्रह्मलोकमें, न विष्णुलोकमें और न तो कैलासमें भी ऐसा कोई व्यक्ति है, जो इन शत्रुओंको जीत सके॥ ४०॥ | | मुनयो ब्रह्मपुत्राश्च तथान्ये तापसोत्तमाः।<br>तेऽपि गुणत्रयाविद्धाः किं पुनर्मानवा भुवि॥ ४१ | जो मुनिगण, ब्रह्माजीके सभी पुत्र तथा अन्य श्रेष्ठ तपस्वीलोग हैं, वे भी तीनों गुणोंसे बँधे रहते हैं, तो मर्त्यलोकके मनुष्योंकी बात ही क्या ? ॥ ४१॥ | | कपिलः सांख्यवेत्ता च योगाभ्यासरतः शुचिः।<br>तेनापि दैवयोगाद्धि प्रदग्धाः सगरात्मजाः॥ ४२ | कपिलमुनि सांख्यशास्त्रके ज्ञाता, योगाभ्यास-परायण और शुद्ध चित्तवाले थे, किंतु उन्होंने भी दैववश सगर-पुत्रोंको भस्म कर दिया॥ ४२॥ | | तस्माद्राजन्नहङ्कारात्सञ्जातं भुवनत्रयम्।<br>कार्यकारणभावात्तु तद्वियुक्तं कथं भवेत्॥ ४३ | अतः हे राजन्! कार्य-कारणस्वरूप अहंकारसे ही यह त्रिलोक उत्पन्न हुआ है, तो फिर मनुष्य उससे वियुक्त कैसे रह सकता है? ॥ ४३॥ | | ब्रह्मा गुणत्रयाविष्टो विष्णुश्चैवाथ शङ्करः।<br>प्रभवन्ति शरीरेषु तेषां भावाः पृथक्पृथक्॥ ४४<br>मानवानां च का वार्ता सत्त्वैकान्तव्यवस्थितौ।<br>गुणानां सङ्करो राजन्सर्वत्र समवस्थितः॥ ४५<br>कदाचित्सत्त्ववृद्धिः स्यात्कदाचिद्रजसः किल।<br>कदाचित्तमसो वृद्धिः समभावः कदाचन॥ ४६ | ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी त्रिगुणसे बँधे हुए हैं; उनके भी शरीरोंमें गुणोंके पृथक्-पृथक् भाव उत्पन्न होते हैं। जब एकमात्र सत्त्वप्रधान देवताओंकी भी यह स्थिति है तो फिर मनुष्योंकी क्या बात? हे राजन्! गुणोंका संकर (मेल) सर्वत्र विद्यमान है। कभी सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, कभी रजोगुणकी वृद्धि होती है, कभी तमोगुणकी वृद्धि हो जाती है और कभी तीनों गुण बराबर हो जाते हैं॥ ४४-४६॥ | | निर्गुणः परमात्मासौ निर्लेपः परमोऽव्ययः।<br>अलक्ष्यः सर्वसत्त्वानामप्रमेयः सनातनः॥ ४७<br>तथैव परमा शक्तिर्निर्गुणा ब्रह्मसंस्थिता।<br>दुर्ज्ञेया चाल्पमतिभिः सर्वभूतव्यवस्थितिः॥ ४८<br>परात्मनस्तथा शक्तेस्तयोरैक्यं सदैव हि।<br>अभिन्नं तद्वपुर्ज्ञात्वा मुच्यते सर्वदोषतः॥ ४९<br>तज्ज्ञानादेव मोक्षः स्यादिति वेदान्तडिण्डिमः।<br>यो वेद स विमुक्तोऽस्मिन्संसारे त्रिगुणात्मके॥ ५० | वे परमात्मा निर्गुण, निर्लेप, परम अविनाशी, सभी प्राणियोंसे अलक्ष्य, अप्रमेय और सनातन हैं। उसी प्रकार वे परमा शक्ति भी निर्गुण, ब्रह्ममें स्थित, अल्पबुद्धि प्राणियोंके द्वारा दुर्ज्ञेय, समस्त प्राणियोंकी आश्रय हैं। परमात्मा और पराशक्ति—उन दोनोंमें सदासे ऐक्य है। उनका स्वरूप अभिन्न है—यह जानकर प्राणी समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। इस ज्ञानसे मुक्ति हो जाती है—यह वेदान्तका डिंडिमघोष है। जो यह जान लेता है, वह इस त्रिगुणात्मक संसारसे मुक्त हो जाता है॥ ४७-५०॥ |
७९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
७९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम्।<br>वेदशास्त्रार्थविज्ञानात्तद्द्भवेद् बुद्धियोगतः॥ ५१<br>विकल्पास्तत्र बहवो भवन्ति मतिकल्पिताः।<br>( कुतर्ककल्पिताः केचित्सुतर्ककल्पिताः परे।<br>वितर्कैर्विभ्रमोत्पत्तिर्विभ्रमाद् बुद्धिभ्रंशता।<br>बुद्धिभ्रंशाज्ज्ञाननाशः प्राणिनां परिकीर्तितः।)<br>अनुभवाख्यं द्वितीयं तु ज्ञानं तद्दुर्लभं नृप॥ ५२<br>तत्तदा प्राप्यते तस्य वेत्तुः सङ्गो यदा भवेत्।<br>शब्दज्ञानान्न कार्यस्य सिद्धिर्भवति भारत॥ ५३<br>तस्मान्नानुभवज्ञानं सम्भवत्यतिमानुषम्।<br>अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शब्दबोधो हि न क्षमः॥ ५४<br>यथा न नश्यति तमः कृत्यया दीपवार्तया। | ज्ञान भी दो प्रकारका कहा गया है। प्रथम शाब्दिक ज्ञान बताया गया है। वह ज्ञान बुद्धिकी सहायतासे वेद और शास्त्रके अर्थविज्ञानद्वारा प्राप्त हो जाता है। बुद्धिवैभिन्न्यके अनुसार इस ज्ञानके भी बहुत-से भेद हो जाते हैं। (इनमेंसे कुछ ज्ञान कुतर्कसे और कुछ सुतर्कसे कल्पित होते हैं। कुतर्कोंसे भ्रान्तिकी उत्पत्ति होती है और विभ्रमसे बुद्धिनाश हो जाता है। बुद्धिनाशसे प्राणियोंका ज्ञान नष्ट हो जाना कहा गया है।) हे राजन्! अनुभव नामक वह दूसरा ज्ञान तो दुर्लभ होता है। वह ज्ञान तब प्राप्त होता है, जब उसके जाननेवालेका संग हो जाय। हे भारत! शब्दज्ञानसे कार्यकी सिद्धि नहीं होती, इसलिये अनुभवज्ञान अत्यन्त अलौकिक होता है। शब्दज्ञान अन्तःकरणके अन्धकारको दूर करनेमें उसी प्रकार समर्थ नहीं है जैसे दीपकसम्बन्धी वार्ता करनेसे अन्धकार नष्ट नहीं होता॥ ५१–५४ १/२ ॥ |
| तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये॥ ५५<br>आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्।<br>शीलं परहितत्वं च कोपाभावः क्षमा धृतिः॥ ५६<br>सन्तोषश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम्।<br>विद्यया तपसा वापि योगाभ्यासेन भूपते॥ ५७<br>विना कामादिशत्रूणां नैव नाशः कदाचन।<br>( मनस्तु चञ्चलं राजन्स्वभावादतिदुर्ग्रहम्।<br>तद्वशः सर्वथा प्राणी त्रिविधो भुवनत्रये।)<br>कामक्रोधादयो भावाश्चित्तजाः परिकीर्तिताः॥ ५८<br>ते तदा न भवन्त्येव यदा वै निर्जितं मनः।<br>तस्मात्तु निमिना राजन् क्षमा विहिता मुनौ॥ ५९<br>यथा ययातिना पूर्वं कृता शुक्रे कृतागसि।<br>भृगुपुत्रेण शप्तोऽपि ययातिर्नृपसत्तमः॥ ६०<br>न शशाप मुनिं क्रोधाज्जरां राजा गृहीतवान्। | कर्म वही है, जो बन्धन न करे और विद्या वही है जो मुक्तिके लिये हो। अन्य कर्म तो मात्र परिश्रमके लिये होता है तथा दूसरी विद्या तो मात्र शिल्पसम्बन्धी कौशल है। शील, परोपकार, क्रोधका अभाव, क्षमा, धैर्य और सन्तोष—यह सब विद्याका अत्यन्त उत्तम फल है। हे भूपते! विद्या, तपस्या अथवा योगाभ्यासके बिना काम आदि शत्रुओंका नाश कभी नहीं हो सकता। (हे राजन्! मन चंचल और स्वभावतः अति दुर्ग्रह होता है, तीनों लोकोंमें तीनों प्रकारके प्राणी उसी मनके वशमें रहते हैं) काम-क्रोध आदि भाव चित्तजन्य कहे गये हैं। ये सब उस समय नहीं उत्पन्न होते, जब मनपर विजय पा ली जाती है। हे राजन्! इसीलिये निमिने मुनिको उस प्रकार क्षमा नहीं किया, जिस प्रकार ययातिने अपराध करनेपर भी शुक्राचार्यको क्षमा कर दिया था। पूर्वकालमें भृगुपुत्र शुक्राचार्यने नृपश्रेष्ठ ययातिको शाप दे दिया था, लेकिन राजाने क्रोधित होकर मुनिको शाप नहीं दिया और स्वयं वृद्धावस्थाको स्वीकार कर लिया था॥ ५५–६० १/२ ॥ |
| कश्चित्सौम्यो भवेत्कश्चित्क्रूरो भवति पार्थिवः॥ ६१<br>स्वभावभेदान्नृपते कस्य दोषोऽत्र कल्प्यते।<br>हैहया भार्गवान्पूर्वं धनलोभात्पुरोहितान्॥ ६२ | हे राजन्! कोई राजा शान्तस्वभाव और कोई क्रूर होता है। स्वभावमें भेद होनेके कारण इसमें किसका दोष कहा जाय? पूर्वकालमें हैहयवंशी क्षत्रियोंने ब्रह्महत्याजनित पापकी उपेक्षा करके धनके |
अ० १६ ] षष्ठ स्कन्ध ७९९
| ब्राह्मणामूलतः सर्वांश्चच्छिदुः क्रोधमूर्च्छिताः।<br>पातकं पृष्ठतः कृत्वा ब्रह्महत्यासमुद्भवम् ॥ ६३ | लोभसे भृगुवंशी ब्राह्मण पुरोहितोंका कोपाविष्ट होकर समूलोच्छेद कर दिया था॥ ६१-६३॥ |
|---|
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे देवीमहिम्नि नानाभाववर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः
हैहयवंशी क्षत्रियोंद्वारा भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार
| जनमेजय उवाच | जनमेजय बोले— |
|---|---|
| कुले कस्य समुत्पन्नाः क्षत्रिया हैहयाश्च ते।<br>ब्रह्महत्यामनादृत्य निजघ्नुर्भार्गवांश्च ये ॥ १ | जिन हैहय क्षत्रियोंने ब्रह्महत्याकी लेशमात्र भी चिन्ता न करके भृगुवंशी ब्राह्मणोंका वध कर दिया, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए थे? ॥ १॥ |
| वैरस्य कारणं तेषां किं मे ब्रूहि पितामह।<br>निमित्तेन विना क्रोधं कथं कुर्वन्ति सत्तमाः ॥ २ | हे पितामह ! उनके वैरका क्या कारण था, आप मुझे बतलाइये। श्रेष्ठजन किसी कारणविशेषके बिना क्रोध कैसे कर सकते हैं ? ॥ २ ॥ |
| वैरं पुरोहितैः सार्धं कस्मात्तेषामजायत ।<br>नाल्पहेतोर्हि तद्वैरं क्षत्रियाणां भविष्यति ॥ ३ | अपने ही पुरोहितोंके साथ उनकी शत्रुता किसलिये हो गयी थी ? सम्भवतः उन क्षत्रियोंकी उस शत्रुताके पीछे कोई महान् कारण रहा होगा। अन्यथा पापसे भयभीत रहनेवाले वे पराक्रमी क्षत्रिय निरपराध एवं पूजनीय ब्राह्मणोंकी हत्या क्यों करते ? ॥ ३-४॥ |
| अन्यथा ब्राह्मण्यान्पूज्यान्कथं जघ्नुरनागसः।<br>बाहुजा बलवन्तोऽपि पापभीताः कथं न ते ॥ ४ | |
| स्वल्पेऽपराधे को हन्याद्ब्राह्मणांक्षत्रियर्षभः।<br>सन्देहो मे मुनिश्रेष्ठ कारणं वक्तुमर्हसि ॥ ५ | हे मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कौन श्रेष्ठ क्षत्रिय होगा, जो अल्प अपराधके कारण ब्राह्मणोंका वध करेगा ? मुझे तो इस विषयमें महान् शंका हो रही है, इसका कारण बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| इति पृष्टस्तदा तेन राज्ञा सत्यवतीसुतः।<br>उवाच परमप्रीतः कथां संस्मृत्य चेतसा ॥ ६ | तब राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर सत्यवतीनन्दन व्यासजी परम प्रसन्न हुए और मनमें उस वृत्तान्तका स्मरण करके कहने लगे ॥ ६ ॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| शृणु पारिक्षिते वार्तां क्षत्रियाणां पुरातनीम् ।<br>आश्चर्यकारिणीं सम्यग्विदितां च पुरा मया ॥ ७ | हे जनमेजय ! मेरे द्वारा पूर्वकालमें सम्यक् प्रकारसे ज्ञात, क्षत्रियोंसे सम्बन्ध रखनेवाली इस आश्चर्यजनक प्राचीन कथाको आप सुनिये ? ॥ ७ ॥ |
| कार्तवीर्येति नाम्नाभूद्धैहयः पृथिवीपतिः।<br>सहस्त्रबाहुर्बलवानर्जुनो धर्मतत्परः ॥ ८ | कार्तवीर्य नामक एक हैहयवंशीय राजा हो चुके हैं। सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले उन बलवान् राजाकी हजार भुजाएँ थीं, वे सहस्रार्जुन भी कहे जाते थे ॥ ८ ॥ |
| दत्तात्रेयस्य शिष्योऽभूदवतारो हरेरिव ।<br>सिद्धः सर्वार्थदः शाक्तो भृगूणां याज्य एव सः ॥ ९ | वे भगवान् विष्णुके अवतारस्वरूप, दत्तात्रेयके शिष्य, भगवतीके उपासक, परम सिद्ध, सब कुछ देनेमें समर्थ तथा भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यजमान थे ॥ ९ ॥ |
| ८०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्वा परमधर्म्मिष्ठः सदा दानपरायणः।<br>ददौ वित्तं भृगुभ्योऽसौ कृत्वा यज्ञाननेकशः॥ १०<br><br>धनिनस्ते द्विजा जाता भृगवो नृपदानतः।<br>हयरत्नसमृद्ध्याढ्याः सञ्जाताः प्रथिता भुवि॥ ११ | वे यज्ञ करनेवाले, धर्मनिष्ठ तथा सदैव दान देनेमें रुचि रखनेवाले थे। उन्होंने अनेक यज्ञ करके अपनी विपुल सम्पदा भृगुवंशी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी। राजाके द्वारा दिये गये दानसे वे भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े धनी हो गये। घोड़े तथा रत्न आदि सम्पदासे युक्त हो जानेके कारण जगत्में वे अतीव प्रसिद्ध हो गये॥ १०-११॥ |
| स्वर्याते नृपशार्दूले कार्तवीर्यार्जुने पुनः।<br>हैहया निर्धना जाताः कालेन महता नृप॥ १२ | हे राजन्! नृपश्रेष्ठ कार्तवीर्यार्जुनके दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् उनके स्वर्ग चले जानेपर हैहयवंशी क्षत्रिय धनहीन हो गये॥ १२॥ |
| धनकार्यं समुत्पन्नं हैहयानां कदाचन।<br>याचिष्णावोऽभिजग्मुस्तान्भृगूंस्ते हैहया नृप॥ १३ | हे राजन्! किसी समय हैहय क्षत्रियोंको कार्य-विशेषके लिये धनकी आवश्यकता पड़ गयी। तब वे धन माँगनेकी इच्छासे भृगुवंशी ब्राह्मणोंके पास गये॥ १३॥ |
| विनयं क्षत्रियाः कृत्वाप्ययाचन्त धनं बहु।<br>न ददुस्तेऽतिलोभार्ता नास्ति नास्तीतिवादिनः॥ १४ | उन क्षत्रियोंने अत्यधिक विनम्रतापूर्वक उन ब्राह्मणोंसे धनकी याचना की, किंतु लोभके वशीभूत उन ब्राह्मणोंने कुछ नहीं दिया और बार-बार कहते रहे—'मेरे पास नहीं है, मेरे पास नहीं है'॥ १४॥ |
| भूमौ च निदधुः केचिद् भृगवो धनमुत्तमम्।<br>ददुः केचिद् द्विजातिभ्यो ज्ञात्वा क्षत्रियतो भयम्॥ १५ | हैहयवंशी क्षत्रियोंसे भयभीत होकर कुछ भृगुवंशी ब्राह्मणोंने अपनी प्रचुर सम्पत्ति जमीनमें गाड़ दी और कुछने अन्य ब्राह्मणोंको दे दी॥ १५॥ |
| कृत्वा स्थानान्तरे द्रव्यं ब्राह्मणा भयविह्वलाः।<br>त्यक्त्वाश्रमान्ययुः सर्वे भृगवस्तृष्णयान्विताः॥ १६ | भयाक्रान्त तथा लोभके वशीभूत वे सभी भृगुवंशी ब्राह्मण अपना-अपना धन स्थानान्तरित करके अपने आश्रम छोड़कर अन्यत्र चले गये॥ १६॥ |
| याज्यांश्च दुःखितान्दृष्ट्वा न ददुर्लोभमोहिताः।<br>पलायित्वा गताः सर्वे गिरिदुर्गानुपाश्रिताः॥ १७ | अपने यजमानोंको दुःखित देखकर भी लोभसे विमोहित ब्राह्मणोंने उन्हें कुछ भी नहीं दिया। उन सभीने भागकर पर्वतकी गुफाओंका आश्रय ग्रहण किया॥ १७॥ |
| ततस्ते हैहयास्तात दुःखिताः कार्यगौरवात्।<br>भृगूणामाश्रमाञ्जग्मुर्द्रव्यार्थं क्षत्रियर्षभाः॥ १८ | हे तात! तत्पश्चात् कष्ट झेल रहे अनेक हैहय क्षत्रियप्रमुख विशेष कार्यवश द्रव्यप्राप्तिके लिये भृगुवंशी ब्राह्मणोंके आश्रमोंपर पहुँचे॥ १८॥ |
| भृगूंस्तु निर्गतान्वीक्ष्य शून्यांस्त्यक्त्वा गृहानथ।<br>चखनुर्भूतलं तत्र द्रव्यार्थं हैहया भृशम्॥ १९ | अपने-अपने आश्रमको सुनसान छोड़कर भृगुवंशी ब्राह्मणोंको बाहर गया हुआ देखकर वे हैहय क्षत्रिय धनके लिये वहाँकी जमीन खोदने लगे॥ १९॥ |
| खनताधिगतं वित्तं केनचिद् भृगुवेश्मनि।<br>ददृशुः क्षत्रियाः सर्वे तद्वित्तं श्रमकर्शिताः॥ २०<br><br>यत्र यत्र समुत्पन्नं भूरि द्रव्यं महीतलात्।<br>तदा ते पार्श्वभागस्थब्राह्मणानां गृहाण्यपि॥ २१ | तत्पश्चात् किसी ब्राह्मणके घरमें जमीन खोद रहे किसी क्षत्रियने कुछ पाया। अब परिश्रमके कारण क्षीणकाय सभी क्षत्रियोंने उस धनको देख लिया। उस समयसे जहाँ-जहाँ भी पता चलता, वे जमीन खोदकर समस्त धन ले लेते थे। धनके लोभसे आस-पास रहनेवाले ब्राह्मणोंके भी घरोंको खोदनेपर उन |
| अ० १६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८०१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निर्भिद्य हैहया द्रव्यं ददृशुर्धनलिप्सया।<br>ब्राह्मणाश्चुक्रुशुः सर्वे भीताश्च शरणं गताः॥ २२ | क्षत्रियोंको पर्याप्त धन दिखलायी पड़ा। इसपर सभी ब्राह्मण रोने-चिल्लाने लगे और भयभीत होकर क्षत्रियोंके शरणागत हो गये॥ २०-२२॥ |
| अतिचिन्वत्सु विप्राणां भवनान्निःसृतं बहु।<br>निजघ्नुस्ताञ्छरैः कोपाद्भाडवाञ्छरणान्गतान्॥ २३ | बार-बार खोजते रहनेपर उन ब्राह्मणोंके घरसे प्रायः सभी धन निकल चुका था। फिर भी वे क्षत्रिय उन शरणागत ब्राह्मणोंपर कोप करके बाणोंसे प्रहार करते रहे॥ २३॥ |
| ययुस्ते गिरिदुर्गांश्च यत्र वै भृगवः स्थिताः।<br>आगर्भादनुकृन्तन्तश्चेरुरुश्चैव महीमिमाम्॥ २४ | इसके पश्चात् वे उन पर्वतकी गुफाओंमें पहुँच गये, जहाँ भृगुवंशी ब्राह्मण स्थित थे। इस प्रकार गर्भस्थ शिशुओंसहित ब्राह्मणोंको नष्ट करते हुए क्षत्रिय इस पृथ्वीमण्डलपर घूमने लगे॥ २४॥ |
| प्राप्तानप्राप्तान्भृगून्सर्वान्निजघ्नुर्निशितैः शरैः।<br>आबालवृद्धानपरानवमन्य च पातकम्॥ २५ | उन्हें जहाँ कहीं भृगुवंशी बालक, वृद्ध तथा अन्य भी मिल जाते थे, वे पापकी परवा किये बिना उन सभीको तीक्ष्ण बाणोंसे मार डालते थे॥ २५॥ |
| एवमुत्पाट्यमानेषु भार्गवेषु यतस्ततः।<br>हन्युर्गभांश्च नारीणां गृहीत्वा हैहया भृशम्॥ २६<br><br>रुरुदुस्ताः स्त्रियः कामं कुरर्य इव दुःखिताः।<br>गर्भाश्च कृन्तिता यासां क्षत्रियैः पापनिश्चयैः॥ २७ | इस प्रकार इधर-उधर सभी भृगुवंशी ब्राह्मणोंके मार दिये जानेपर उन हैहय क्षत्रियोंने स्त्रियोंको पकड़-पकड़कर उनका गर्भ नष्ट कर डाला। पापकृत्यपर तुले हुए क्षत्रियोंके द्वारा जिन स्त्रियोंके गर्भ नष्ट कर दिये जाते थे, वे बेचारी अत्यन्त दुःखित होकर कुररी पक्षीकी भाँति विलाप करने लगती थीं॥ २६-२७॥ |
| अन्येऽप्याहुश्च तान्दृप्तान्मुनयस्तीर्थवासिनः।<br>मुञ्चन्तु क्षत्रियाः क्रोधं ब्राह्मणेषु भयावहम्॥ २८<br><br>अयुक्तमेतदारब्धं भवद्भिः कर्म गर्हितम्।<br>यद् गर्भान्भृगुपत्नीनां निहन्युः क्षत्रियर्षभाः॥ २९<br><br>अत्युग्रपुण्यपापानामिहैव फलमाप्नुयात्।<br>तस्माज्जुगुप्सितं कर्म त्यक्तव्यं भूतिमिच्छता॥ ३० | तब अन्य तीर्थवासी मुनियोंने भी अभिमानमें चूर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंसे कहा—हे क्षत्रियो! तुमलोग ब्राह्मणोंपर ऐसा भयंकर क्रोध करना छोड़ दो। हे श्रेष्ठ क्षत्रियो! तुमलोगोंने तो अत्यन्त निन्दनीय तथा अनुचित कार्य आरम्भ कर दिया है जो कि तुमलोग भृगुवंशी ब्राह्मणोंकी पत्नियोंका गर्भोच्छेद कर रहे हो। अत्यन्त उग्र पाप अथवा पुण्यका फल इसी लोकमें प्राप्त हो जाता है। इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले प्राणीको गर्हित कर्मका परित्याग कर देना चाहिये॥ २८-३०॥ |
| तानाहुर्हैहयाः क्रुद्धा मुनीनथ दयापरान्।<br>भवन्तः साधवः सर्वे नार्थज्ञाः पापकर्मणाम्॥ ३१ | तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए उन हैहय क्षत्रियोंने उन परम दयालु मुनियोंसे कहा—आप सभी लोग साधु हैं, अतः पापकर्मोंका रहस्य नहीं जानते॥ ३१॥ |
| एभिर्हृतं धनं सर्वं पूर्वजानां महात्मनाम्।<br>वञ्चयित्वा छलाभिज्ञैर्मार्गे पाटच्चरैरिव॥ ३२ | छल-छद्मको जाननेवाले इन ब्राह्मणोंने कपट करके हमारे महात्मा पूर्वजोंका सारा धन उसी प्रकार छीन लिया था जैसे कोई लुटेरा किसी पथिकका धन छीन लेता है॥ ३२॥ |
| एते प्रतारका दम्भास्तादृशा बकवृत्तयः।<br>उत्पन्ने च महाकार्ये प्रार्थिता विनयेन ते॥ ३३ | ये सभी ठग, दम्भी तथा बकवृत्तिवाले (पाखण्डी) हैं। आवश्यक कार्य पड़नेपर हमने विनम्रतापूर्वक इनसे धनकी याचना की थी, किंतु इन्होंने नहीं दिया। |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 A
| ८०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न ददुः प्रार्थितं विप्राः पादवृद्ध्यापि याचिताः।<br>नास्तीतिवादिनः स्तब्धाः दुःखितान्वीक्ष्य याज्यकान्॥ ३४ | यहाँतक कि चतुर्थांशवृद्धिपर भी धन माँगनेपर हम याचकोंको अत्यन्त दुःखित देखकर इन निष्ठुर ब्राह्मणोंने ‘हमारे पास नहीं है’—ऐसा कहा॥ ३३-३४॥ |
| धनं प्राप्तं कार्तवीर्याद्रक्षितं केन हेतुना।<br>न कृताः क्रतवः किं तैर्दानं चार्थिषु भूरिशः॥ ३५ | महाराज कार्तवीर्यसे धन प्राप्त करके इन्होंने किस प्रयोजनसे धनकी रक्षा की? इन्होंने न तो यज्ञ किये और न तो याचकोंको ही प्रचुर दान दिया॥ ३५॥ |
| न सञ्चितव्यं विप्रैस्तु धनं क्वापि कदाचन।<br>यष्टव्यं विधिवद्धेयं भोक्तव्यं च यथासुखम्॥ ३६ | ब्राह्मणोंको कभी भी धनका संग्रह नहीं करना चाहिये। यज्ञ करने, दान देने तथा सुखोपभोगमें यथेच्छ धनका उपयोग करना चाहिये॥ ३६॥ |
| द्रव्ये चौरभयं प्रोक्तं तथा राजभयं द्विजाः।<br>वह्नेर्भयं महाघोरं तथा धूर्तभयं महत्॥ ३७ | हे विप्रो! पासमें धन रहनेपर चोर, राजा, अग्नि तथा धूर्तोंसे महान् भय कहा गया है॥ ३७॥ |
| येन केनाप्युपायेन धनं त्यजति रक्षकम्।<br>अथवासौ मृतो याति द्रव्यं त्यक्त्वा ह्यसद्गतिम्॥ ३८ | जिस किसी भी उपायसे अपनी ही रक्षा करनेवालेको धन छोड़ देता है अथवा वह व्यक्ति धन छोड़कर स्वयं मर जाता है और दुर्गतिको प्राप्त होता है॥ ३८॥ |
| पादवृद्ध्या तथास्माभिः प्रार्थितं विनयान्वितैः।<br>तथापि लोभसन्दिग्धैर्न दत्तं नः पुरोहितैः॥ ३९ | हम सबने बड़ी विनम्रताके साथ इन लोगोंसे चतुर्थांशवृद्धिपर धन माँगा था, फिर भी लोभके कारण संशयमें पड़े हुए पुरोहितोंने हमें धन नहीं दिया॥ ३९॥ |
| दानं भोगस्तथा नाशो धनस्य गतिरीदृशी।<br>दानभोगौ कृतीनां च नाशः पापात्मनां किल॥ ४० | दान, भोग तथा नाश—धनकी इस प्रकारकी गति होती है। पुण्यशाली प्राणियोंके धनकी गति दान तथा भोग है और दुष्ट आत्मावाले प्राणियोंके धनकी गति नाश है। |
| न दाता न च यो भोक्ता कृपणो गुप्तितत्परः।<br>राज्ञासौ सर्वथा दण्ड्यो वञ्चको दुःखभाङ्नरः॥ ४१ | जो कृपण व्यक्ति न दान करता है और न धनका उपभोग करता है, अपितु केवल धनके संग्रहमें लगा रहता है, वह वंचक प्राणी राजाके द्वारा सर्वथा दण्डनीय है और दुःखका भागी होता है॥ ४०-४१॥ |
| तस्माद्वयं गुरूनेतान्वञ्चकान्ब्राह्मणाधमान्।<br>हन्तुं समुद्यताः सर्वे न क्रोधव्यं महात्मभिः॥ ४२ | इसीलिये इन वंचक गुरुओं तथा अधम ब्राह्मणोंको मारनेके लिये हम सभी उद्यत हुए हैं। आप महात्माजन इसके लिये हमपर कोप न करें॥ ४२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा हेतुमद्वाक्यं तानाश्वास्य मुनीनथ।<br>विचेरुश्च विचिन्वाना भृगुदाराननेकशः॥ ४३ | व्यासजी बोले— इस प्रकार सहेतुक वचन कहकर उन मुनियोंको पूर्ण आश्वस्त करनेके बाद वे पुनः भृगुकुलकी स्त्रियोंको खोजते हुए भ्रमण करने लगे॥ ४३॥ |
| भयार्ता भृगुपत्न्यस्तु हिमवन्तं धराधरम्।<br>प्रपेदिरे रुदन्त्यश्च वेपमानाः कृशा भृशम्॥ ४४ | भयार्त तथा अत्यन्त कृश शरीरवाली भृगुवंशीय पत्नियाँ हिमवान् पर्वतपर रोती तथा काँपती हुई पहुँचीं॥ ४४॥ |
| एवं ते हैहयैर्विप्राः पीडिता धनकामुकैः।<br>निहताश्च यथाकामं संरब्धैः पापकर्मभिः॥ ४५ | इस प्रकार धनलोलुप तथा पापकर्मोंसे अभिभूत हैहयोंने उन ब्राह्मणोंको बहुत पीड़ित किया तथा उनका संहार किया॥ ४५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 B
अ० १७] षष्ठ स्कन्ध ८०३
अ० १७] षष्ठ स्कन्ध ८०३
| लोभ एव मनुष्याणां देहसंस्थो महारिपुः।<br>सर्वदुःखाकरः प्रोक्तो दुःखदः प्राणनाशकः॥ ४६ | लोभ मनुष्योंके देहमें रहनेवाला सबसे बड़ा शत्रु है। यह समस्त दुःखोंका आगार, दुःखदायी तथा प्राणोंका नाश करनेवाला कहा गया है॥ ४६॥ |
| सर्वपापस्य मूलं हि सर्वदा तृष्णायान्वितः।<br>विरोधकृत्त्रिवर्णानां सर्वार्तेः कारणं तथा॥ ४७ | यह लोभ सम्पूर्ण पापोंकी जड़ तथा सभी दुःखोंका कारण है। लोभसे युक्त प्राणी सदा तीनों वर्णोंके लोगोंसे विरोध रखनेवाला होता है॥ ४७॥ |
| लोभात्त्यजन्ति धर्मं वै कुलधर्मं तथैव हि।<br>मातरं भ्रातरं हन्ति पितरं बान्धवं तथा॥ ४८ | लोभके वशीभूत प्राणी अपने सदाचार तथा कुल-धर्मका भी परित्याग कर देते हैं। वे अपने माता, पिता, भाई, बान्धव, गुरु, मित्र, पत्नी, पुत्र तथा बहनतकका वध कर देते हैं। इस प्रकार लोभके वशीभूत मनुष्य पापसे विमोहित होकर कौन-सा दुष्कर्म नहीं कर डालता॥ ४८-४९॥ |
| गुरुं मित्रं तथा भार्यां पुत्रं च भगिनीं तथा।<br>लोभाविष्टो न किं कुर्यादकृत्यं पापमोहितः॥ ४९ | |
| क्रोधात्कामादहङ्कारालोभ एव महारिपुः।<br>प्राणांस्त्यजति लोभेन किं पुनः स्यादनावृतम्॥ ५० | क्रोध, काम तथा अहंकारसे भी बढ़कर लोभ महान् शत्रु है। लोभमें पड़कर मनुष्य अपने प्राणतक गँवा देता है; फिर इसके विषयमें और क्या कहा जाय !॥ ५०॥ |
| पूर्वजास्ते महाराज धर्मज्ञाः सत्पथे स्थिताः।<br>पाण्डवाः कौरवाश्चैव लोभेन निधनं गताः॥ ५१ | हे महाराज ! आपके पूर्वज धर्मज्ञ तथा सत्यपथपर चलनेवाले थे, किंतु वे पाण्डव तथा कौरव लोभके कारण ही मारे गये। जहाँ भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, बाह्रीक, भीमसेन, धर्मपुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन तथा श्रीकृष्ण थे, फिर भी लोभके वशीभूत उन्होंने आपसमें भीषण युद्ध किया और अपने कुटुम्बका महाविनाश कर डाला। उस युद्धमें द्रोण, भीष्म, पाण्डवोंके पुत्र, भाई, पिता, पुत्र सभी मारे गये॥ ५१-५४॥ |
| यत्र भीष्मश्च द्रोणश्च कृपः कर्णश्च बाह्लिकः।<br>भीमसेनो धर्मपुत्रस्तथैवार्जुनकेशवौ॥ ५२ | |
| तथापि युद्धमत्युग्रं कृतं तैश्च परस्परम्।<br>कुटुम्बकदनं भूरि कृतं लोभात्तैरैरिह॥ ५३ | |
| हतो द्रोणो हतो भीष्मस्तथैव पाण्डवात्मजाः।<br>भ्रातरः पितरः पुत्राः सर्वे वै निहता रणे॥ ५४ | |
| तस्माल्लोभाभिभूतस्तु किं न कुर्यान्नरः किल।<br>हैहयैर्निहताः सर्वे भृगवः पापबुद्धिभिः॥ ५५ | अतएव लोभपरायण मनुष्य क्या नहीं कर डालता? [लोभके कारण ही] पापबुद्धि हैहयवंशी क्षत्रियोंने भृगुकुलके समस्त ब्राह्मणोंको मार डाला था॥ ५५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयैर्धनाहरणेन सह भृगूणां वधवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः
भगवतीकी कृपासे भार्गव-ब्राह्मणीकी जंघासे तेजस्वी बालककी उत्पत्ति, हैहयवंशी क्षत्रियोंकी उत्पत्तिकी कथा
| जनमेजय उवाच<br>कथं ताश्च स्त्रियः सर्वा भृगूणां दुःखसागरात्।<br>मुक्ता वंशः पुनस्तेषां ब्राह्मणानां स्थिरोऽभवत्॥ १ | जनमेजय बोले— भृगुवंशकी स्त्रियोंका पुनः दुःखरूप समुद्रसे कैसे उद्धार हुआ और उन ब्राह्मणोंकी वंशपरम्परा किस प्रकार स्थिर रही?॥ १॥ |
| हैहयैः किं कृतं कार्यं हत्वा तान्ब्राह्मणानपि।<br>क्षत्रियैर्लोभसंयुक्तैः पापाचारैर्वदस्व तत्॥ २ | लोभके वशीभूत तथा पापाचारी हैहय क्षत्रियोंने उन ब्राह्मणोंको मारनेके पश्चात् कौन-सा कार्य किया? उसे आप बताइये॥ २॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 C
| ८०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न तृप्तिरस्ति मे ब्रह्मन् पिबतस्ते कथामृतम् ।<br>पावनं सुखदं नृणां परलोके फलप्रदम् ॥ ३ | हे ब्रह्मन्! आपके द्वारा कथित इस पवित्र, लोगोंके लिये सुखदायक तथा परलोकमें फल देनेवाले कथामृतका पान करते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ३ ॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् ।<br>यथा स्त्रियस्तु ता मुक्ता दुःखात्तस्माद्दुरत्ययात् ॥ ४ | व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, वे स्त्रियाँ उस भयावह दुःखसे जिस प्रकार मुक्त हुई, अब मैं उस पापनाशिनी कथाका वर्णन करूँगा ॥ ४ ॥ |
| भृगुपत्न्यो यदा राजन् हिमवन्तं गिरिं गताः ।<br>भयत्रस्ता विभग्नाशा हैहयैः पीडिता भृशम् ॥ ५ | हे राजन्! जब क्षत्रिय हैहय भृगुकुलकी नारियोंको बहुत पीड़ित करने लगे तब वे भयभीत तथा निराश होकर हिमालयपर्वतपर चली गयीं ॥ ५ ॥ |
| गौरीं तत्र तु संस्थाप्य मृण्मयीं सरितस्तटे ।<br>उपोषणपराश्चक्रुर्निश्चयं मरणं प्रति ॥ ६ | उन्होंने वहाँ नदीके तटपर गौरीकी मृण्मयी प्रतिमा स्थापित करके निराहार रहते हुए [उपासनामें लीन होकर] अपने मरणके प्रति पूरा निश्चय कर लिया ॥ ६ ॥ |
| स्वप्ने गत्वा तदा देवी प्राह ताः प्रमदोत्तमाः ।<br>युष्मासु मध्ये कस्याश्चिद्भविता चोरुजः पुमान् ॥ ७<br>मदंशशक्तिसम्भिन्नः स वः कार्यं विधास्यति ।<br>इत्यादिश्य पराम्बा सा पश्चादन्तर्हिताभवत् ॥ ८ | एक समय स्वप्नमें भगवती जगदम्बाने उन उत्तम स्त्रियोंके पास पहुँचकर कहा—तुमलोगोंमेंसे किसीकी जंघासे एक पुरुष उत्पन्न होगा। मेरा अंशभूत वही शक्तिमान् पुरुष तुमलोगोंका कार्य सिद्ध करेगा। ऐसा कहकर पराम्बा भगवती अन्तर्धान हो गयीं ॥ ७-८ ॥ |
| जागृतास्तु ततः सर्वा मुदमापुर्वराङ्गनाः ।<br>काचित्तासां भयोद्विग्ना कामिनी चतुरा भृशम् ॥ ९<br>दधार चोरुणैकेन गर्भं सा कुलवृद्धये । | जागनेपर वे सभी स्त्रियाँ बहुत प्रसन्न हुईं। उनमेंसे किसी चतुर, कामिनी स्त्रीने जो भयसे त्रस्त थी; वंशवृद्धिकेहेतु अपनी एक जंघामें गर्भ धारण किया ॥ ९ १/२ ॥ |
| पलायनपरा दृष्टा क्षत्रियैर्ब्राह्मणी यदा ॥ १०<br>विह्वला तेजसा युक्ता तदा ते दुद्रुवुर्भृशम् । | जब उन हैहय क्षत्रियोंने व्याकुल तथा तेजयुक्त उस स्त्रीको भागती हुई देखा तब वे उसके पीछे दौड़ पड़े ॥ १० १/२ ॥ |
| गृह्यतां वध्यतां नारी सगर्भा याति सत्वरा ॥ ११<br>इति ब्रुवन्तः सम्प्राप्ताः कामिनीं खड्गपाणयः । | 'यह गर्भ धारण करके वेगपूर्वक भागी जा रही है, इसे पकड़ लो और मार डालो'—इस प्रकार कहते हुए हाथमें तलवार लेकर वे उस स्त्रीके पास पहुँच गये ॥ ११ १/२ ॥ |
| सा भयार्ता तु तान्दृष्ट्वा रुरोद समुपागतान् ॥ १२<br>गर्भस्य रक्षणार्थं सा चुक्रोशातिभयातुरा । | भयसे घबरायी हुई वह स्त्री अपने समीप आये हुए उन क्षत्रियोंको देखकर रोने लगी और पुनः गर्भरक्षाके लिये भयसे विह्वल होकर जोर-जोरसे विलाप करने लगी ॥ १२ १/२ ॥ |
| रुदतीं मातरं श्रुत्वा दीनां प्राणविवर्जिताम् ॥ १३<br>निराधारां क्रन्दमानां क्षत्रियैर्भृशतापिताम् ।<br>गृहीतामिव सिंहेन सगर्भां हरिणीं यथा ॥ १४<br>साश्रुनेत्रां वेपमानां सङ्क्रुध्य बालकस्तदा ।<br>भित्त्वोरुं निर्जगामाशु गर्भः सूर्य इवापरः ॥ १५<br>मुष्णन्दृष्टीः क्षत्रियाणां तेजसा बालकः शुभः । | तब दयनीय दशावाली, प्राणहीन-सी प्रतीत हो रही, आश्रयहीन, क्षत्रियोंसे पीड़ित होनेके कारण क्रन्दन करती हुई, सिंहके द्वारा पकड़ी गयी गर्भवती हिरनीके समान प्रतीत होनेवाली, आँसूभरे नेत्रोंवाली तथा थर-थर काँपती हुई माताका रुदन सुनकर वह सुन्दर गर्भस्थ बालक कुपित होकर अपने तेजसे क्षत्रियोंकी नेत्र-ज्योतिका हरण करता हुआ जंघाका भेदन करके दूसरे सूर्यकी भाँति शीघ्र ही बाहर निकल आया ॥ १३-१५ १/२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 26 D
| अ० १७] | षष्ठ स्कन्ध | ८०५ |
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| दर्शनाद् बालकस्याशु सर्वे जाता विलोचनाः ॥ १६ <br><br> बभ्रमुर्गिरिदुर्गेषु जन्मान्धा इव क्षत्रियाः । <br> चिन्तितं मनसा सर्वैः किमेतदिति साम्प्रतम् ॥ १७ <br><br> सर्वे चक्षुर्विहीना यज्जाताः स्म बालदर्शनात् । <br> ब्राह्मण्यास्तु प्रभावोऽयं सतीव्रतबलं महत् ॥ १८ <br><br> क्षणाद्दामोघसङ्कल्पाः किं करिष्यन्ति दुःखिताः । <br> इति सञ्चिन्त्य मनसा नेत्रहीना निराश्रयाः ॥ १९ <br><br> ब्राह्मणीं शरणं जग्मुर्हैहया गतचेतसः । <br> प्रणेमुस्तां भयत्रस्तां कृताञ्जलिपुटाश्च ते ॥ २० <br><br> ऊचुश्चैनां भयोद्विग्नां दृष्ट्यर्थं क्षत्रियर्षभाः । <br> प्रसीद सुभगे मातः सेवकास्ते वयं किल ॥ २१ <br><br> कृतापराधा रम्भोरु क्षत्रियाः पापबुद्धयः । <br> दर्शनात्तव तन्वङ्गि जाताः सर्वे विलोचनाः ॥ २२ <br><br> मुखं ते नैव पश्यामो जन्मान्धा इव भामिनि । <br> अद्भुतं ते तपो वीर्यं किं कुर्मः पापकारिणः ॥ २३ <br><br> शरणं ते प्रपन्नाः स्मो देहि चक्षूंषि मानदे । <br> अन्धत्वं मरणादुग्रं कृपां कर्तुं त्वमर्हसि ॥ २४ <br><br> पुनर्दृष्टिप्रदानेन सेवकांश्क्षत्रियान्कुरु । <br> उपरम्य च गच्छेम सहिताः पापकर्मणः ॥ २५ <br><br> अतः परं न कर्तव्यमीदृशं कर्म कर्हिचित् । <br> भार्गवाणां तु सर्वेषां सेवकाः स्मो वयं किल ॥ २६ <br><br> अज्ञानाद्यत्कृतं पापं क्षन्तव्यं तत्त्वयाधुना । <br> वैरं नातः परं क्वापि भृगुभिः क्षत्रियैः सह ॥ २७ <br><br> कर्तव्यं शपथैः सम्यग्वर्तितव्यं तु हैहयैः । <br> सपुत्रा भव सुश्रोणि प्रणताः स्मो वयं च ते ॥ २८ <br><br> प्रसादं कुरु कल्याणि न द्विष्यामः कदाचन । <br><br> व्यास उवाच <br> इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्राह्मणी विस्मयान्विता ॥ २९ | उस बालककी ओर देखते ही वे सभी दृष्टिहीन हो गये। तत्पश्चात् वे क्षत्रिय जन्मान्धकी भाँति पर्वतकी गुफाओंमें इधर-उधर भटकने लगे। सभी क्षत्रिय मनमें विचार करने लगे कि इस समय यह क्या हो गया है कि हम सभी लोग बालकको देखनेमात्रसे चक्षुहीन हो गये। ऐसा प्रतीत होता है कि इसी ब्राह्मणीका यह प्रभाव है; क्योंकि सतीव्रत एक महान् बल है। अमोघ संकल्पवाली दुःखित स्त्रियाँ क्षणभरमें न जाने क्या कर डालेंगी! ॥ १६-१८ १/२ ॥ <br><br> ऐसा मनमें सोचकर नेत्रहीन, निराश्रय तथा चेतना-रहित हैहयवंशी क्षत्रिय उस ब्राह्मणीकी शरणमें गये और उन्होंने भयसे त्रस्त उस स्त्रीको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। वे श्रेष्ठ क्षत्रिय अपनी नेत्रज्योतिके लिये इस भयाकुल ब्राह्मणीसे कहने लगे— ॥ १९-२० १/२ ॥ <br><br> हे सुभगे! हे माता! हम सब आपके सेवक हैं। अब आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइये। हे रम्भोरु! पाप बुद्धिवाले हम क्षत्रियोंने अपराध किया है। हे तन्वंगि! इसीलिये आपको देखते ही हम सब चक्षुविहीन हो गये। हे भामिनि! जन्मसे अन्धे व्यक्तिकी भाँति हम आपका मुखदर्शन कर पानेमें समर्थ नहीं हैं। आपका तप तथा पराक्रम अद्भुत है; हम पापपरायण कर ही क्या सकते हैं? हे मानदे! हम आपकी शरणमें हैं। हमें नेत्र दीजिये; क्योंकि नेत्रज्योतिसे विहीन हो जाना मृत्युसे भी कष्टकारक होता है। आप हमारे ऊपर कृपा कीजिये। फिरसे नेत्रज्योति देकर इन समस्त क्षत्रियोंको अपना सेवक बना लीजिये। इसके बाद पापकर्मसे रहित होकर हमलोग साथ-साथ चले जायेंगे। अब हमलोग इस प्रकारका कर्म कभी नहीं करेंगे। अब हम सभी भार्गव ब्राह्मणोंके सेवक हो गये। हमलोगोंने अज्ञानवश जो भी पाप किया है उसे आप क्षमा करें। हम हैहय क्षत्रिय शपथपूर्वक कहते हैं कि आजसे कभी भी भृगुवंशी ब्राह्मणोंके साथ हमें वैरभाव नहीं रखना चाहिये और यथोचित व्यवहार करना चाहिये। हे सुश्रोणि! आप पुत्रवती होवें। हम आपकी शरणमें हैं। हे कल्याणि! आप कृपा करें; हमलोग अब कभी भी द्वेषभाव नहीं रखेंगे ॥ २१-२८ १/२ ॥ <br><br> व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उन क्षत्रियोंकी यह बात सुनकर ब्राह्मणी विस्मयमें पड़ गयी और उसने शरणागत तथा दुर्गतिंको प्राप्त उन नेत्रहीन |
| ८०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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| तानाह प्रणतान्दुःखान्नाश्वास्य गतलोचनान्।<br>गृहीता न मया दृष्टिर्युष्माकं क्षत्रियाः किल॥ ३० | क्षत्रियोंको आश्वासन देकर कहा—हे क्षत्रियो! आपलोग निश्चितरूपसे जान लें कि मैंने आप सबकी दृष्टिका हरण नहीं किया है॥ २९-३०॥ | | नाहं रुषान्विता सत्यं कारणं शृणुताद्य यत्।<br>अयं च भार्गवो नूनमूरुजः कुपितोऽद्य वः॥ ३१ | मैं आपलोगोंपर कुपित नहीं हूँ। अब मैं वास्तविक कारण बता रही हूँ, आपलोग सुनिये। मेरी जंघासे उत्पन्न यह भृगुवंशी बालक आज आपलोगोंपर कुपित है। क्षत्रियोंके द्वारा अपने बान्धवों और यहाँतक कि गर्भस्थित बालकोंका वध किये जानेकी बात जानकर कोपाविष्ट इसी बालकने आपलोगोंके नेत्र स्तम्भित कर दिये हैं॥ ३१-३२॥ | | चक्षूंषि तेन युष्माकं स्तम्भितानि रुषावता।<br>स्वबन्धून्निहताञ्ज्ञात्वा गर्भस्थानपि क्षत्रियैः॥ ३२ | | | अनागसो धर्मपरांस्तापसान्धनकाम्यया।<br>गर्भानपि यदा यूयं भृगूनघ्नंस्तु पुत्रकाः॥ ३३ | हे वत्सगण! जब आपलोग निरपराध, धर्मनिष्ठ तथा तपस्वी भार्गव ब्राह्मणों और गर्भस्थ बालकोंको भी धन-लोलुपतामें पड़कर मार रहे थे तभी मैंने इसे अपनी जंघामें गर्भरूपसे एक सौ वर्षतक धारण किये रखा। भृगुवंशकी वृद्धिके लिये इस गर्भस्थ बालकने छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका बड़े सहजभावसे अध्ययन कर लिया है और अब यह अपने पितृजनोंके वधसे अत्यन्त कुपित होकर आपलोगोंका संहार करना चाहता है॥ ३३—३५॥ | | तदायमूरुणा गर्भो मया वर्षशतं धृतः।<br>षडङ्गश्चाखिलो वेदो गृहीतोऽनेन चाञ्जसा॥ ३४ | | | गर्भस्थेनापि बालेन भृगुवंशविवृद्धये।<br>सोऽपि पितृवधान्नूंनं क्रोधोद्धो हन्तुमिच्छति॥ ३५ | | | भगवत्याः प्रसादेन जातोऽयं मम बालकः।<br>तेजसा यस्य दिव्येन चक्षूंषि मुषितानि वः॥ ३६ | मेरा यह पुत्र भगवतीकी कृपासे उत्पन्न हुआ है, जिसके अलौकिक तेजने आपलोगोंके नेत्र हर लिये हैं॥ ३६॥ | | तस्मादौर्वं सुतं मेऽद्य याचध्वं विनयान्विताः।<br>प्रणिपातेन तुष्टोऽसौ दृष्टिं वः प्रतिमोक्ष्यति॥ ३७ | अतएव आपलोग इसी समय मेरी जंघासे उत्पन्न इस बालकसे विनम्रतापूर्वक याचना कीजिये। चरणोंमें गिरनेसे प्रसन्न होकर यह बालक आपलोगोंकी नेत्रज्योति मुक्त कर देगा॥ ३७॥ | | व्यास उवाच | व्यासजी बोले— | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या हैहयास्तुष्टुवुश्च तम्।<br>प्रणेमुर्विनयोपेता ऊरुजं मुनिसत्तमम्॥ ३८ | उस ब्राह्मणीका वचन सुनकर हैहयोंने जंघासे उत्पन्न बालकरूप मुनिश्रेष्ठको प्रणाम किया और वे विनयसे युक्त होकर उसकी स्तुति करने लगे॥ ३८॥ | | स सन्तुष्टो बभूवाथ तानुवाच विचक्षणः।<br>गच्छध्वं स्वगृहान्भूपा ममाख्यानकृतं वचः॥ ३९ | तत्पश्चात् प्रसन्न होकर उस बालकने उन नेत्रहीन क्षत्रियोंसे कहा—हे राजाओ! अब तुमलोग मेरी कही हुई बातपर विश्वास करके अपने घर लौट जाओ॥ ३९॥ | | अवश्यम्भाविभावास्ते भवन्ति देवनिर्मिताः।<br>नात्र शोकस्तु कर्तव्यः पुरुषेण विजानता॥ ४० | दैवने जो विधान सुनिश्चित कर दिये हैं, वे अवश्य होकर रहते हैं; ज्ञानी व्यक्तिको इस विषयमें चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥ ४०॥ | | पूर्ववदृषयः सर्वे प्राप्नुवन्तु यथासुखम्।<br>व्रजन्तु विगतक्रोधा भवनानि यथासुखम्॥ ४१ | सभी ऋषिगण पूर्वकी भाँति सुख प्राप्त करें तथा सभी क्षत्रिय भी अब क्रोधरहित होकर सुखपूर्वक अपने-अपने घरोंके लिये प्रस्थान करें॥ ४१॥ |
| अ० १७ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८०७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति तेन समादिष्टा हैहयाः प्राप्तलोचनाः।<br>और्वमामन्त्र्य जग्मुस्ते सदनानि यथारुचि ॥ ४२ | इस प्रकार उसके कहनेपर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंको दृष्टि प्राप्त हो गयी और वे और्व (ऊरुसे उत्पन्न) उस बालकसे आज्ञा लेकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने घर चले गये॥ ४२ ॥ |
| ब्राह्मणी तं सुतं दिव्यं गृहीत्वा स्वाश्रमं गता।<br>पालयामास भूपाल तेजस्विनमतन्द्रिता ॥ ४३ | हे राजन्! वह ब्राह्मणी भी उस तेजस्वी तथा अलौकिक बालकको लेकर अपने आश्रम चली गयी और बड़ी सावधानीपूर्वक उसका पालन-पोषण करने लगी ॥ ४३ ॥ |
| एवं ते कथितं राजन् भृगूणां तु विनाशनम्।<br>लोभाविष्टैः क्षत्रियैश्च यत्कृतं पातकं किल ॥ ४४ | हे राजन्! इस प्रकार भृगुवंशके विनाश तथा लोभके वशीभूत हैहय क्षत्रियोंने जो पापकर्म किया था; उसके विषयमें मैंने आपसे कहा ॥ ४४ ॥ |
| जनमेजय उवाच<br>श्रुतं मया महत्कर्म क्षत्रियाणाञ्च दारुणम्।<br>कारणं लोभ एवात्र दुःखदश्चोभयोस्तु सः ॥ ४५ | **जनमेजय बोले—**हे मुने! मैंने क्षत्रियोंके अत्यन्त दारुण कर्मके विषयमें सुन लिया। इहलोक तथा परलोकमें दुःख देनेवाला वह लोभ ही इसमें मूल कारण है॥ ४५ ॥ |
| किञ्चित्प्रष्टुमिहेच्छामि संशयं वासवीसूत।<br>हैहयास्ते कथं नाम्ना ख्याता भुवि नृपात्मजाः ॥ ४६ | हे सत्यवतीनन्दन! मैं संशयग्रस्त हूँ; [इस विषयमें] आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। ये क्षत्रिय राजकुमार इस जगत्में हैहय नामसे क्यों प्रसिद्ध हुए? ॥ ४६ ॥ |
| यदोस्तु यादवाः कामं भरताद्भारतास्तथा।<br>हैहयः कोऽपि राजाभूत्तेषां वंशे प्रतिष्ठितः ॥ ४७ | यदुसे यादव हुए तथा भरतसे भारत हुए। उसी प्रकार क्या उन क्षत्रियोंके वंशमें 'हैहय' नामधारी कोई प्रतिष्ठित राजा हुआ था ? ॥ ४७ ॥ |
| तदहं श्रोतुमिच्छामि कारणं करुणानिधे।<br>हैहयास्ते कथं जाताः क्षत्रियाः केन कर्मणा ॥ ४८ | हे करुणानिधान! उन हैहय क्षत्रियोंकी उत्पत्ति कैसे हुई तथा किस कर्मसे उनका यह नाम पड़ा ? वह कारण मैं सुनना चाहता हूँ॥ ४८ ॥ |
| व्यास उवाच<br>हैहयानां समुत्पत्तिं शृणु भूप सविस्तराम्।<br>पुरातनीं सुपुण्यां च कथां पापप्रणाशिनीम् ॥ ४९ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! अब मैं हैहयोंकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित अति प्राचीन, पुण्यदायिनी तथा पापनाशिनी कथाका विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ, आप इसे सुनिये ॥ ४९ ॥ |
| कस्मिश्चित्समये भूप सूर्यपुत्रः सुशोभनः।<br>रेवन्तेति च विख्यातो रूपवानमितप्रभः ॥ ५०<br><br>उच्चैःश्रवसमारुह्य हयरत्नं मनोहरम्।<br>जगाम विष्णुसदनं वैकुण्ठं भास्करात्मजः ॥ ५१ | हे महाराज! किसी समय अत्यन्त सुन्दर, रूपवान् तथा अपरिमित तेजवाले सूर्यपुत्र जो 'रेवन्त' नामसे विख्यात थे, अपने मनोहर अश्वरत्न उच्चैःश्रवापर आरूढ़ होकर भगवान् विष्णुके निवासस्थान वैकुण्ठलोक गये ॥ ५०-५१ ॥ |
| भगवद्दर्शनाकांक्षी हयारूढो यदागतः।<br>हयस्थस्तु तदा दृष्टो लक्ष्म्यासौ रविनन्दनः ॥ ५२ | विष्णुके दर्शनके आकांक्षी वे भास्करनन्दन घोड़ेपर सवार होकर जब वहाँ पहुँचे तब लक्ष्मीजीकी दृष्टि अश्वपर विराजमान रेवन्तपर पड़ गयी ॥ ५२ ॥ |
| रमा वीक्ष्य हयं दिव्यं भ्रातरं सागरोद्भवम्।<br>रूपेण विस्मिता तस्य तस्थौ स्तम्भितलोचना ॥ ५३ | समुद्रसे प्रादुर्भूत अपने भाई अलौकिक उच्चैःश्रवा घोड़ेको देखकर वे महान् विस्मयमें पड़ गयीं और उसके रूपको स्थिर नेत्रोंसे देखती रह गयीं ॥ ५३ ॥ |
| ८०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १७] | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भगवानपि तं दृष्ट्वा हयारूढं मनोहरम्।<br>आगच्छन्तं रमां विष्णुः पप्रच्छ प्रणयात्प्रभुः ॥ ५४<br><br>कोऽयमायाति चार्वङ्गि हयारूढ इवापरः।<br>स्मरतेजस्तनुः कान्ते मोहयन्भुवनत्रयम् ॥ ५५ | भगवान् विष्णुने उस मनोहर रेवन्तको घोड़ेपर बैठकर आता हुआ देखकर लक्ष्मीजीसे प्रेमपूर्वक पूछा—हे सुन्दर अंगोंवाली! हे प्रिये! दूसरे कामदेवके समान तेजोमय शरीरवाला यह कौन है जो घोड़ेपर सवार होकर तीनों लोकोंको मोहित करता हुआ इधर चला आ रहा है॥ ५४-५५॥ |
| प्रेक्षमाणा तदा लक्ष्मीस्तच्चित्ता दैवयोगतः।<br>नोवाच वचनं किञ्चित्पृष्टापि च पुनः पुनः ॥ ५६ | उस समय घोड़ेको एकटक देखते रहनेसे दैववशात् उसीमें चित्तयोग हो जानेके कारण भगवान् विष्णुके बार-बार पूछनेपर भी लक्ष्मीजीने कुछ नहीं कहा॥ ५६॥ |
| व्यास उवाच<br>अश्वासक्तमतिं वीक्ष्य कामिनीमतिमोहिताम्।<br>पश्यन्तीं परमप्रेम्णा चञ्चलाक्षीं च चञ्चलाम्॥ ५७<br><br>तामाह भगवान्क्रुद्धः किं पश्यसि सुलोचने।<br>मोहिता च हरिं दृष्ट्वा पृष्टा नैवाभिभाषसे ॥ ५८ | व्यासजी बोले—भगवान् विष्णु कामिनी, चपल नेत्रोंवाली तथा चंचला लक्ष्मीको अत्यन्त मोहित होकर अत्यधिक प्रेमके साथ निहारती हुई तथा उस अश्वमें अनुरक्त बुद्धिवाली देखकर क्रोधित हो उठे और उनसे बोले—हे सुलोचने! तुम क्या देख रही हो? इस घोड़ेको देखकर मोहित हुई तुम मेरे पूछनेपर भी उत्तर नहीं दे रही हो॥ ५७-५८॥ |
| सर्वत्र रमसे यस्माद्रमा तस्माद् भविष्यसि।<br>चञ्चलत्वाच्चलेत्येवं सर्वथैव न संशयः ॥ ५९ | क्योंकि तुम्हारा चित्त सभी ओर रमण करता है अतएव ‘रमा’ और तुम्हारी चंचल होके कारण तुम ‘चला’ कही जाओगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५९॥ |
| प्राकृता च यथा नारी नूनं भवति चञ्चला।<br>तथा त्वमपि कल्याणि स्थिरा नैव कदाचन ॥ ६० | जिस प्रकार सामान्य नारी चंचल होती है, उसी प्रकार हे कल्याणि! तुम भी कभी स्थिर स्वभाववाली नहीं रहोगी॥ ६०॥ |
| त्वं हयं मत्समीपस्था समीक्ष्य यदि मोहिता।<br>वडवा भव वामोरु मर्त्यलोकेऽतिदारुणे ॥ ६१ | मेरे पास रहनेपर भी तुम यदि एक अश्वको देखकर मोहित हो गयी हो तो हे वामोरु! तुम अत्यन्त दारुण मर्त्यलोकमें घोड़ीके रूपमें जन्म ग्रहण करो॥ ६१॥ |
| इति शप्ता रमा देवी हरिणा दैवयोगतः।<br>रुरोद वेपमाना सा भयभीतातिदुःखिता ॥ ६२ | दैवयोगसे भगवान् विष्णुने जब देवी लक्ष्मीको ऐसा शाप दे दिया तब वे अत्यन्त भयभीत तथा दुःखी होकर काँपती हुई रोने लगीं॥ ६२॥ |
| तमुवाच रमानाथं शङ्किता चारुहासिनी।<br>प्रणम्य शिरसा देवं स्वपतिं विनयान्विता ॥ ६३ | सुन्दर मुसकानवाली लक्ष्मीजी दुविधामें पड़ गयीं और अपने पति भगवान् विष्णुको विनयसे युक्त होकर मस्तक झुकाकर प्रणाम करके उनसे कहने लगीं— ॥ ६३॥ |
| देवदेव जगन्नाथ करुणाकर केशव।<br>स्वल्पेऽपराधे गोविन्द कस्माच्छापं ददासि मे ॥ ६४ | हे देवदेव! हे जगदीश्वर! हे करुणानिधान! हे केशव! हे गोविन्द! एक छोटेसे अपराधके लिये आपने मुझे ऐसा शाप क्यों दे दिया?॥ ६४॥ |
| न कदाचिन्मया दृष्टः क्रोधस्ते हीदृशः प्रभो।<br>क्व गतस्ते मयि स्नेहः सहजो न तु नश्वरः ॥ ६५ | हे प्रभो! मैंने आपका ऐसा क्रोध पहले कभी नहीं देखा। मेरे प्रति आपका वह सहज तथा शाश्वत प्रेम कहाँ चला गया?॥ ६५॥ |
| अ० १८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८०९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वज्रपातस्तु शत्रौ वै कर्तव्यो न सुहृज्जने।<br>सदाहं वरयोग्या ते शापयोग्या कथं कृता॥ ६६ | आपको वज्रपात शत्रुपर करना चाहिये न कि अपने स्नेहीजनपर। आपसे सदा वर पानेयोग्य मैं आज शापके योग्य कैसे हो गयी?॥ ६६॥ |
| प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द पश्यतोऽद्य तवाग्रतः।<br>कथं जीवे त्वया हीना विरहानलतापिता॥ ६७ | हे गोविन्द! मैं इसी समय आपके देखते-देखते आपके सामने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि आपसे वियुक्त होकर विरहाग्निमें जलती हुई मैं कैसे जीवित रह सकूँगी?॥ ६७॥ |
| प्रसादं कुरु देवेश शापादस्मात्सुदारुणात्।<br>कदा मुक्ता समीपं ते प्राप्नोमि सुखदं विभो॥ ६८ | हे देवेश! मेरे ऊपर कृपा कीजिये। हे विभो! अब मैं इस दारुण शापसे मुक्त होकर आपका सुखदायी सांनिध्य कब प्राप्त करूँगी?॥ ६८॥ |
| हरिरुवाच<br>यदा ते भविता पुत्रः पृथिव्यां मत्समः प्रिये।<br>तदा मां प्राप्य तन्वङ्गि सुखिता त्वं भविष्यसि॥ ६९ | हरि बोले— हे प्रिये! हे तन्वंगि! जब पृथ्वीलोकमें तुम्हें मेरे समान एक पुत्रकी प्राप्ति हो जायगी तब पुनः मुझे प्राप्त करके तुम सुखी हो जाओगी॥ ६९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयानामुत्पत्ति-प्रसङ्गे रमाविष्णुसंवादवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः
भगवती लक्ष्मीद्वारा घोड़ीका रूप धारणकर तपस्या करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जनमेजय उवाच<br>इति शप्ता भगवता सिन्धुजा कोपयोगतः।<br>कथं सा वडवा जाता रेवन्तेन च किं कृतम्॥ १ | जनमेजय बोले— [हे मुने!] इस प्रकार कोप करके भगवान्के द्वारा शापित लक्ष्मीजीने घोड़ीके रूपमें किस प्रकार जन्म लिया और इसके बाद रेवन्तने क्या किया?॥ १॥ |
| कस्मिन्देशेऽब्धिजा देवी वडवारूपधारिणी।<br>संस्थितैकाकिनी बाला परोषितपतिका यथा॥ २ | अपने पतिके प्रवासमें रहनेके कारण उसके वियोगमें एकाकिनी समय व्यतीत करनेवाली नारीकी भाँति लक्ष्मीजीने घोड़ीका रूप धारण करके किस देशमें समय व्यतीत किया?॥ २॥ |
| कालं कियन्तमायुष्मन् वियुक्ता पतिना रमा।<br>संस्थिता विजनेऽरण्ये किं कृतं च तया पुनः॥ ३ | हे आयुष्मन्! पतिसे वियुक्त रहते हुए लक्ष्मीजीने कितना समय बिताया और पुनः उस निर्जन वनमें रहती हुई उन्होंने क्या किया?॥ ३॥ |
| समागमं कदा प्राप्ता वासुदेवस्य सिन्धुजा।<br>पुत्रः कथं तया प्राप्तो नारायणवियुक्तया॥ ४ | समुद्रतनया लक्ष्मीको पुनः भगवान् विष्णुका समागम कब प्राप्त हुआ तथा विष्णुसे अलग रहते हुए उन्होंने किस प्रकार पुत्र प्राप्त किया?॥ ४॥ |
| एतद्वृत्तान्तमार्येश कथयस्व सविस्तरम्।<br>श्रोतुकामोऽस्मि विप्रेन्द्र कथाख्यानमनुत्तमम्॥ ५ | हे आर्येश! इस वृत्तान्तका वर्णन विस्तारके साथ कीजिये। हे विप्रवर! मैं इस अत्युत्तम पौराणिक आख्यानको सुनना चाहता हूँ॥ ५॥ |
| सूत उवाच<br>इति पृष्टस्तदा व्यासः परीक्षित्तनयेन वै।<br>कथयामास भो विप्राः कथामेतां सुविस्तराम्॥ ६ | सूतजी बोले— हे विप्रो! परीक्षित्पुत्र जनमेजयके ऐसा पूछनेपर व्यासजी इस अति विस्तृत कथाका वर्णन करने लगे॥ ६॥ |
८१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
८१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
| व्यास उवाच | |
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| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>पावनीं सुखदां कर्णे विशदाक्षरसंयुताम्॥ ७ | व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये मैं अब वह शुभ, पवित्र, स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त तथा कानोंको प्रिय लगनेवाली पौराणिक कथा कहूँगा॥ ७॥ |
| रेवन्तस्तु रमां दृष्ट्वा शप्तां देवेन कामिनीम्।<br>भयार्तः प्रययौ दूरात्प्रणम्य जगतां पतिम्॥ ८ | कामिनी रमाको विष्णुद्वारा शापित की गयी देखकर रेवन्त भयके कारण जगत्पति वासुदेवको दूरसे ही प्रणाम करके चले गये॥ ८॥ |
| पितुः सकाशं त्वरितो वीक्ष्य कोपं जगत्पतेः।<br>निवेदयामास कथां भास्कराय स शापजाम्॥ ९ | जगन्नाथ विष्णुका यह क्रोध देखकर वे तत्काल अपने पिताके पास गये और उन सूर्यसे शापसे सम्बन्धित कथा बतायी॥ ९॥ |
| दुःखिता सा रमा देवी प्रणम्य जगदीश्वरम्।<br>आज्ञप्ता मानुषं लोकं प्राप्ता कमलोचना॥ १०<br>सूर्यपत्न्या तपस्तप्तं यत्र पूर्वं सुदारुणम्।<br>तत्रैव सा ययावाशु वडवारूपधारिणी॥ ११<br>कालिन्दीतमसास्सङ्गे सुपर्णाक्षस्य चोत्तरे।<br>सर्वकामप्रदे स्थाने सुरम्यवनमण्डिते॥ १२ | इसके बाद कमलके समान नेत्रोंवाली वे दुःखित लक्ष्मीजी जगदीश्वर विष्णुजीसे आज्ञा लेकर उन्हें प्रणाम करके मृत्युलोकमें आ गयीं। सूर्यकी पत्नीने पूर्वकालमें सुपर्णाक्षकी उत्तरदिशामें यमुना—तमसा नदीके संगमपर सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा सुन्दर वनोंसे सुशोभित जिस स्थानपर कठोर तपस्या की थी, वहीं वडवारूपधारिणी वे लक्ष्मीजी शीघ्र पहुँच गयीं॥ १०—१२॥ |
| तत्र स्थिता महादेवं शङ्करं वाञ्छितप्रदम्।<br>दध्यौ चैकेन मनसा शूलिनं चन्द्रशेखरम्॥ १३<br>पञ्चाननं दशभुजं गौरीदेहार्धधारिणम्।<br>कर्पूरगौरदेहाभं नीलकण्ठं त्रिलोचनम्॥ १४<br>व्याघ्राजिनधरं देवं गजचर्मोत्तरीयकम्।<br>कपालमालाकलितं नागयज्ञोपवीतिनम्॥ १५ | वहाँ रहकर वे लक्ष्मीजी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले, त्रिशूलधारी, चन्द्रशेखर, पाँच मुखोंवाले, दस भुजाओंवाले, गौरीके शरीरका अर्ध भाग धारण करनेवाले, कर्पूरके समान गौर शरीरवाले, नीले कण्ठसे सुशोभित, तीन नेत्रोंवाले, व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले, हाथीके चर्मका उत्तरीय धारण करनेवाले, गलेमें नरमुण्डकी मालासे मण्डित तथा सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले महादेव शंकरका एकाग्रमनसे ध्यान करने लगीं॥ १३—१५॥ |
| सागरस्य सुता कृत्वा हयीरूपं मनोहरम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे रमादेवी चकार दुश्चरं तपः॥ १६ | सागरपुत्री लक्ष्मीजीने सुन्दर घोड़ीका रूप धारण करके उस तीर्थमें अत्यन्त कठोर तपस्या की॥ १६॥ |
| ध्यायमाना परं देवं वैराग्यं समुपाश्रिता।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु गतं तत्र महीपते॥ १७ | हे राजन्! महादेव शंकरका ध्यान करते-करते लक्ष्मीजीके मनमें वैराग्यका प्रादुर्भाव हो गया। इस प्रकार [उनको तप करते हुए] एक हजार दिव्य वर्ष बीत गये॥ १७॥ |
| ततस्तुष्टो महादेवो वृषारूढस्त्रिलोचनः।<br>प्रत्यक्षोऽभून्महेशानः पार्वतीसहितः प्रभुः॥ १८ | तदनन्तर प्रसन्न होकर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने वृषभपर सवार होकर पार्वतीजीके साथ उन्हें साक्षात् दर्शन दिया॥ १८॥ |
| तत्रैत्य सगणः शम्भुस्तामाह हरिवल्लभाम्।<br>तपस्यन्तीं महाभागामश्विनीरूपधारिणीम्॥ १९ | भगवान् शंकरने अपने गणोंसहित वहाँ आकर तप करती हुई वडवारूपधारिणी महाभागा विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीसे कहा—॥ १९॥ |
| किं तपस्यसि कल्याणि जगन्मातर्वदस्व मे।<br>सर्वार्थदः पतिस्तेऽस्ति सर्वलोकविधायकः॥ २० | हे कल्याणि! हे जगज्जननि! आप तपस्या क्यों कर रही हैं? मुझे इसका कारण बतायें। आपके पति विष्णु तो स्वयं सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा सभी लोकोंका विधान करनेवाले हैं॥ २०॥ |
अ० १८] षष्ठ स्कन्ध ८११
| हरिं त्यक्त्वाद्य मां कस्मात्स्तौषि देवि जगत्पतिम्।<br>वासुदेवं जगन्नाथं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्॥ २१ | हे देवि! भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले जगत्पति वासुदेव जगन्नाथ विष्णुको छोड़कर इस समय आप मेरी आराधना किसलिये कर रही हैं?॥ २१॥ |
| वेदोक्तं वचनं कार्यं नारीणां देवता पतिः।<br>नान्यस्मिन्सर्वथा भावः कर्तव्यः कर्हिचित्क्वचित्॥ २२ | स्त्रियोंके लिये पति ही उनका देवता होता है—इस वेदोक्त वचनका उन्हें पालन करना चाहिये। किसी दूसरेमें कभी कहीं भी भावना नहीं करनी चाहिये॥ २२॥ |
| पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां धर्म एव सनातनः।<br>यादृशस्तादृशः सेव्यः सर्वथा शुभकाम्यया॥ २३ | पतिकी सेवा-शुश्रूषा ही स्त्रियोंका सनातन धर्म है। पति चाहे जैसा भी हो, कल्याणकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको निरन्तर उसकी सेवा करनी चाहिये॥ २३॥ |
| नारायणस्तु सर्वेषां सेव्यो योग्यः सदैव हि।<br>तं त्यक्त्वा देवदेवेशं किं मां ध्यायसि सिन्धुजे॥ २४ | भगवान् विष्णु तो सर्वदा सभी प्राणियोंकी आराधनाके योग्य हैं। अतएव हे सिन्धुजे! उन देवाधिदेवको छोड़कर आप मेरा ध्यान क्यों कर रही हैं?॥ २४॥ |
| लक्ष्मीरुवाच<br>आशुतोष महेशान शप्ताहं पतिना शिव।<br>मां समुद्धर देवेश शापादस्माद्दयानिधे॥ २५ | लक्ष्मी बोलीं—हे आशुतोष! हे महेशान! हे शिव! हे देवेश! हे दयानिधान! मेरे पतिने मुझे शाप दे दिया है; अतएव इस शापसे आप मेरा उद्धार कीजिये॥ २५॥ |
| तदोक्तं हरिणा शम्भो शापानुग्रहकारणम्।<br>विज्ञप्तेन मया कामं दयायुक्तेन विष्णुना॥ २६<br><br>यदा ते भविता पुत्रस्तदा शापस्य मोक्षणम्।<br>भविष्यति च वैकुण्ठवासस्ते कमलालये॥ २७ | हे शम्भो! उस समय मेरे बहुत पूछनेपर दयालु भगवान् विष्णुने शापसे मुक्तिका यह उपाय भी बतला दिया था—'हे कमलालये! जब तुम्हें एक पुत्र उत्पन्न हो जायगा तब तुम शापसे मुक्त हो जाओगी और वैकुण्ठधाममें पुनः तुम्हारा वास होगा'॥ २६-२७॥ |
| इत्युक्ताहं तपस्तप्तुमागतास्मि तपोवने।<br>आराधितो मया देव त्वं सर्वार्थप्रदायकः॥ २८ | हे देव! श्रीविष्णुके इस प्रकार कहनेपर मैं तपस्या करनेके लिये इस तपोवनमें आ गयी और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले आप परमेश्वरकी आराधना करने लगी॥ २८॥ |
| पतिसङ्गं विना पुत्रं देवदेव लभे कथम्।<br>स तु तिष्ठति वैकुण्ठे त्यक्त्वा वामामनागसम्॥ २९ | हे देवदेव! मुझ निरपराध पत्नीको छोड़कर वे विष्णु तो वैकुण्ठमें विराजमान हैं; अतएव पतिके सांनिध्यके बिना मैं पुत्र कैसे प्राप्त कर सकती हूँ?॥ २९॥ |
| वरं मे देहि देवेश यदि तुष्टोऽसि शङ्कर।<br>तव तस्य द्विधा भावो नास्ति नूनं कदाचन॥ ३० | हे देवेश! हे शंकर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे वर दीजिये। आप तथा श्रीहरिमें निश्चितरूपसे कोई भेद नहीं है॥ ३०॥ |
| मयैतद् गिरिजाकान्त ज्ञातं पत्युः पुरो हर।<br>यस्त्वं योऽसौ पुनर्योऽसौ स त्वं नास्त्यत्र संशयः॥ ३१ | हे गिरिजाकान्त! हे हर! जब मैं पतिदेवके पास थी तभीसे मुझे यह ज्ञात है कि जो आप हैं, वही वे हैं तथा जो वे हैं, वही आप हैं; इसमें संशय नहीं है॥ ३१॥ |
| एकत्वं च मया ज्ञात्वा मया ते स्मरणं कृतम्।<br>अन्यथा मम दोषस्त्वामाश्रयन्त्या भवेच्छिव॥ ३२ | [आप तथा श्रीविष्णुमें] एकत्व जानकर ही मैंने आपका स्मरण किया है, अन्यथा हे शिव! आपका आश्रय लेनेसे मुझे दोष ही लगता॥ ३२॥ |
| ८१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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| शिव उवाच<br>कथं ज्ञातस्त्वया देवि मम तस्य च सुन्दरि।<br>ऐक्यभावो हरेर्नूनं सत्यं मे वद सिन्धुजे॥ ३३<br>एकत्वं च न जानन्ति देवाश्च मुनयस्तथा।<br>ज्ञानिनो वेदतत्त्वज्ञाः कुतर्कोपहताः किल॥ ३४<br>मद्भक्ता वासुदेवस्य निन्दका बहवस्तथा।<br>विष्णुभक्तास्तु बहवो मम निन्दापरायणाः॥ ३५<br>भवन्ति कालभेदेन कलौ देवि विशेषतः।<br>कथं ज्ञातस्त्वया भद्रे दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः॥ ३६<br>सर्वथा त्वैक्यभावस्तु हरेर्मम च दुर्लभः। | शिव बोले— हे देवि! हे सुन्दरि! मेरे तथा उन विष्णुके एकत्वका ज्ञान तुम्हें किस प्रकार हुआ? हे सिन्धुजे! मुझे सच-सच बताओ॥ ३३॥<br>देवता, मुनि, ज्ञानी तथा वेदोंके तत्त्वदर्शी विद्वान् भी तरह-तरहके कुतर्कोंसे ग्रस्त पड़े रहनेके कारण इस ऐक्यभावको नहीं जानते॥ ३४॥<br>मेरे बहुत-से भक्त वासुदेव श्रीविष्णुके निन्दक हैं तथा श्रीविष्णुके बहुत-से भक्त मेरी निन्दामें लगे रहते हैं। हे देवि! कालभेदके कारण कलियुगमें ऐसे लोग विशेषरूपसे होंगे। हे भद्रे! दूषित आत्मावाले लोगोंद्वारा दुर्ज्ञेय इस एकत्वको आप कैसे जान गयीं? मेरे तथा श्रीविष्णुका ऐक्यभाव जान पाना सर्वथा दुर्लभ है॥ ३५-३६ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>इति सा शम्भुना पृष्टा तुष्टेन हरिवल्लभा॥ ३७<br>वृत्तान्तं तस्य विज्ञातं प्रवक्तुमुपचक्रमे।<br>शिवं प्रति रमा तत्र प्रसन्नवदना भृशम्॥ ३८ | व्यासजी बोले— प्रसन्न हुए भगवान् शंकरके इस प्रकार पूछनेपर अत्यन्त प्रसन्नमुखवाली हरिप्रिया लक्ष्मीजीने [उस एकत्वसे सम्बन्धित] ज्ञात प्रसंगको शिवजीसे कहना प्रारम्भ किया॥ ३७-३८॥ | | लक्ष्मीरुवाच<br>एकदा देवदेवेश विष्णुर्ध्यानपरो रहः।<br>दृष्टो मया तपः कुर्वन्पद्मासनगतो यदा॥ ३९<br>तदाहं विस्मिता देवं तमपृच्छं पतिं किल।<br>प्रबुद्धं सुप्रसन्नं च ज्ञात्वा विनयपूर्वकम्॥ ४०<br>देवदेव जगन्नाथ यदाहं निर्गतार्णवात्।<br>मथ्यमानात्सुरैर्दैत्यैः सर्वैर्ब्रह्मादिभिः प्रभो॥ ४१<br>वीक्षिताश्च मया सर्वे पतिकामनया तदा।<br>वृतस्त्वं सर्वदेवेभ्यः श्रेष्ठोऽसीति विनिश्चयात्॥ ४२<br>त्वं कं ध्यायसि सर्वेश संशयोऽयं महान्मम।<br>प्रियोऽसि कैटभारे मे कथयस्व मनोगतम्॥ ४३ | लक्ष्मीजी बोलीं— हे देवदेवेश! एक बार भगवान् विष्णुको एकान्तमें पद्मासन लगाकर ध्यानस्थ हो तपस्या करते हुए जब मैंने देखा तब मुझे महान् विस्मय हुआ; और पुनः समाधिसे जगनेपर उन्हें अति प्रसन्न जानकर मैंने पतिदेवसे विनयपूर्वक पूछा—॥ ३९-४०॥<br>हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे प्रभो! जिस समय ब्रह्मा आदि सभी देवताओं तथा दैत्योंके द्वारा मथे जा रहे समुद्रसे मैं निकली, उस समय पतिकी इच्छासे मैंने सभीकी ओर देखा, सभी देवताओंकी अपेक्षा आप ही श्रेष्ठ हैं—ऐसा निश्चय करके मैंने आपका ही वरण किया था। अतः हे सर्वेश! आप किसका ध्यान कर रहे हैं? मुझे यह महान् सन्देह है। हे कैटभारे! आप मेरे प्रिय हैं। अतः अपने मनकी बात मुझे बतायें॥ ४१—४३॥ | | विष्णुरुवाच<br>शृणु कान्ते प्रवक्ष्यामि यं ध्यायामि सुरोत्तमम्।<br>आशुतोषं महेशानं गिरिजावल्लभं हृदि॥ ४४<br>कदाचिद्देवदेवो मां ध्यायत्यमितविक्रमः।<br>ध्यायाम्यहं च देवेशं शङ्करं त्रिपुरान्तकम्॥ ४५<br>शिवस्याहं प्रियः प्राणः शङ्करस्तु तथा मम।<br>उभयोरन्तरं नास्ति मिथः संसक्तचेतसोः॥ ४६ | विष्णु बोले— हे प्रिये! मैं जिन सुरश्रेष्ठ, आशुतोष, महेश्वर तथा पार्वतीपति शंकरका ध्यान [अपने] हृदयमें कर रहा हूँ, उनके विषयमें बताऊँगा; सुनो॥ ४४॥<br>असीम पराक्रमसम्पन्न देवाधिदेव भगवान् शंकर कभी मेरा ध्यान करते हैं और कभी मैं त्रिपुरासुरके संहारक देवेश शंकरका ध्यान करने लगता हूँ॥ ४५॥<br>शिवका प्रिय प्राण मैं हूँ तथा मेरे प्रिय प्राण वे हैं। इस प्रकार परस्पर अनुरक्त चित्तवाले हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है॥ ४६॥ |