भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 803
७९४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १५

| वंशस्यास्य सुखार्थं ते पालयामास पार्थिव ।<br>विशेषेण मुनिं ज्ञात्वा प्रीत्या युक्तो बभूव ह ॥ ६८ | हे राजन् ! आपका यह वंश सुखी रहे, इसलिये राजा इक्ष्वाकुने वसिष्ठका पालन-पोषण किया और विशेष-रूपसे इन्हें मुनि जानकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ ६८ ॥ | | एतत्ते सर्वमाख्यातं वसिष्ठस्य च कारणम् ।<br>शापाद्देहान्तरप्राप्तिर्मित्रावरुणयोः कुले ॥ ६९ | इस प्रकार शापके कारण मित्रावरुणके कुलमें वसिष्ठजीके अन्य शरीरकी प्राप्तिका समस्त आख्यान मैंने आपको बता दिया ॥ ६९ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां षष्ठस्कन्धे वसिष्ठस्य मैत्रावरुणिरितिनामवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥


अथ पञ्चदशोऽध्यायः

भगवतीकी कृपासे निमिको मनुष्योंके नेत्र-पलकोंमें वासस्थान मिलना तथा संसारी प्राणियोंकी त्रिगुणात्मकताका वर्णन

जनमेजय उवाच<br>देहप्राप्तिर्वसिष्ठस्य कथिता भवता किल ।<br>निमिः कथं पुनर्देहं प्राप्तवानिति मे वद ॥ १जनमेजय बोले—आपने वसिष्ठकी शरीर-प्राप्तिका वर्णन किया; निमिने पुनः किस प्रकार देह प्राप्त की; यह मुझसे कहिये ॥ १ ॥
<div align="center">व्यास उवाच</div>वसिष्ठेन च सम्प्राप्तः पुनर्देहो नराधिप ।<br>निमिना न तथा प्राप्तो देहः शापादनन्तरम् ॥ २व्यासजी बोले—हे राजन् ! वसिष्ठने जिस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त किया, उस प्रकार निमिको शापके बाद पुनः देह नहीं मिली ॥ २ ॥
यदा शप्तो वसिष्ठेन तदा ते ब्राह्मणाः क्रतौ ।<br>ऋत्विजो ये वृता राज्ञा ते सर्वे समचिन्तयन् ॥ ३जब वसिष्ठजीने शाप दिया तो राजाके द्वारा यज्ञमें वरण किये गये ब्राह्मण और ऋत्विज् विचार करने लगे— ॥ ३ ॥
किं कर्तव्यमहोऽस्माभिः शापदग्धो महीपतिः ।<br>अस्मिन्यज्ञे त्वसम्पूर्णे दीक्षायुक्तश्च धार्मिकः ॥ ४अहो, यज्ञमें दीक्षित ये धर्मनिष्ठ राजा शापसे दग्ध हो गये हैं और यज्ञ भी अपूर्ण ही रह गया है—ऐसेमें हम सबको क्या करना चाहिये ? अब हम क्या करें ? यह तो विपरीत कार्य हो गया । भवितव्यताके अवश्य होनेके कारण इसका निवारण करनेमें हम असमर्थ हैं ॥ ४-५ ॥
किं कर्तव्यं कार्यमेतद्विपरीतमभूत्किल ।<br>अवश्यम्भाविभावत्वादशक्ताः स्म निवारणे ॥ ५
मन्त्रैर्बहुविधैर्देहं तदा तस्य महात्मनः ।<br>रक्षितं धारयामासुः किञ्चिच्छ्वसनसंयुतम् ॥ ६तब उन महात्मा राजाकी देहको ऋत्विजोंने अनेक प्रकारके मन्त्रोंसे सुरक्षित रखा; उनकी श्वास मन्द गतिसे चल रही थी । मन्त्रशक्तिसे उनकी निर्विकार आत्माको देहमें प्रतिष्ठित करके ऋत्विजोंने उसे अनेक प्रकारके गन्ध, माल्य आदिसे सुपूजित कर रखा था ॥ ६-७ ॥
गन्धैर्माल्यैश्च विविधैः पूज्यमानं मुहुर्मुहुः ।<br>मन्त्रशक्त्या प्रतिष्टभ्य निर्विकारं सुपूजितम् ॥ ७
समाप्ते च क्रतौ तत्र देवाः सर्वे समागताः ।<br>ऋत्विग्भिस्तु स्तुताः सर्वे सुप्रीताश्चाभवन्नृप ॥ ८यज्ञके सम्पूर्ण होनेपर वहाँ सभी देवगण आये । हे राजन् ! ऋत्विजोंने उन सबकी स्तुति की, जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए । मुनियोंके द्वारा राजाके विषयमें समस्त बातोंको जान लेनेपर स्तोत्रोंसे सन्तुष्ट देवताओंने