देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 810, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 810
| अ० १६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८०१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| निर्भिद्य हैहया द्रव्यं ददृशुर्धनलिप्सया।<br>ब्राह्मणाश्चुक्रुशुः सर्वे भीताश्च शरणं गताः॥ २२ | क्षत्रियोंको पर्याप्त धन दिखलायी पड़ा। इसपर सभी ब्राह्मण रोने-चिल्लाने लगे और भयभीत होकर क्षत्रियोंके शरणागत हो गये॥ २०-२२॥ |
| अतिचिन्वत्सु विप्राणां भवनान्निःसृतं बहु।<br>निजघ्नुस्ताञ्छरैः कोपाद्भाडवाञ्छरणान्गतान्॥ २३ | बार-बार खोजते रहनेपर उन ब्राह्मणोंके घरसे प्रायः सभी धन निकल चुका था। फिर भी वे क्षत्रिय उन शरणागत ब्राह्मणोंपर कोप करके बाणोंसे प्रहार करते रहे॥ २३॥ |
| ययुस्ते गिरिदुर्गांश्च यत्र वै भृगवः स्थिताः।<br>आगर्भादनुकृन्तन्तश्चेरुरुश्चैव महीमिमाम्॥ २४ | इसके पश्चात् वे उन पर्वतकी गुफाओंमें पहुँच गये, जहाँ भृगुवंशी ब्राह्मण स्थित थे। इस प्रकार गर्भस्थ शिशुओंसहित ब्राह्मणोंको नष्ट करते हुए क्षत्रिय इस पृथ्वीमण्डलपर घूमने लगे॥ २४॥ |
| प्राप्तानप्राप्तान्भृगून्सर्वान्निजघ्नुर्निशितैः शरैः।<br>आबालवृद्धानपरानवमन्य च पातकम्॥ २५ | उन्हें जहाँ कहीं भृगुवंशी बालक, वृद्ध तथा अन्य भी मिल जाते थे, वे पापकी परवा किये बिना उन सभीको तीक्ष्ण बाणोंसे मार डालते थे॥ २५॥ |
| एवमुत्पाट्यमानेषु भार्गवेषु यतस्ततः।<br>हन्युर्गभांश्च नारीणां गृहीत्वा हैहया भृशम्॥ २६<br><br>रुरुदुस्ताः स्त्रियः कामं कुरर्य इव दुःखिताः।<br>गर्भाश्च कृन्तिता यासां क्षत्रियैः पापनिश्चयैः॥ २७ | इस प्रकार इधर-उधर सभी भृगुवंशी ब्राह्मणोंके मार दिये जानेपर उन हैहय क्षत्रियोंने स्त्रियोंको पकड़-पकड़कर उनका गर्भ नष्ट कर डाला। पापकृत्यपर तुले हुए क्षत्रियोंके द्वारा जिन स्त्रियोंके गर्भ नष्ट कर दिये जाते थे, वे बेचारी अत्यन्त दुःखित होकर कुररी पक्षीकी भाँति विलाप करने लगती थीं॥ २६-२७॥ |
| अन्येऽप्याहुश्च तान्दृप्तान्मुनयस्तीर्थवासिनः।<br>मुञ्चन्तु क्षत्रियाः क्रोधं ब्राह्मणेषु भयावहम्॥ २८<br><br>अयुक्तमेतदारब्धं भवद्भिः कर्म गर्हितम्।<br>यद् गर्भान्भृगुपत्नीनां निहन्युः क्षत्रियर्षभाः॥ २९<br><br>अत्युग्रपुण्यपापानामिहैव फलमाप्नुयात्।<br>तस्माज्जुगुप्सितं कर्म त्यक्तव्यं भूतिमिच्छता॥ ३० | तब अन्य तीर्थवासी मुनियोंने भी अभिमानमें चूर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंसे कहा—हे क्षत्रियो! तुमलोग ब्राह्मणोंपर ऐसा भयंकर क्रोध करना छोड़ दो। हे श्रेष्ठ क्षत्रियो! तुमलोगोंने तो अत्यन्त निन्दनीय तथा अनुचित कार्य आरम्भ कर दिया है जो कि तुमलोग भृगुवंशी ब्राह्मणोंकी पत्नियोंका गर्भोच्छेद कर रहे हो। अत्यन्त उग्र पाप अथवा पुण्यका फल इसी लोकमें प्राप्त हो जाता है। इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले प्राणीको गर्हित कर्मका परित्याग कर देना चाहिये॥ २८-३०॥ |
| तानाहुर्हैहयाः क्रुद्धा मुनीनथ दयापरान्।<br>भवन्तः साधवः सर्वे नार्थज्ञाः पापकर्मणाम्॥ ३१ | तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए उन हैहय क्षत्रियोंने उन परम दयालु मुनियोंसे कहा—आप सभी लोग साधु हैं, अतः पापकर्मोंका रहस्य नहीं जानते॥ ३१॥ |
| एभिर्हृतं धनं सर्वं पूर्वजानां महात्मनाम्।<br>वञ्चयित्वा छलाभिज्ञैर्मार्गे पाटच्चरैरिव॥ ३२ | छल-छद्मको जाननेवाले इन ब्राह्मणोंने कपट करके हमारे महात्मा पूर्वजोंका सारा धन उसी प्रकार छीन लिया था जैसे कोई लुटेरा किसी पथिकका धन छीन लेता है॥ ३२॥ |
| एते प्रतारका दम्भास्तादृशा बकवृत्तयः।<br>उत्पन्ने च महाकार्ये प्रार्थिता विनयेन ते॥ ३३ | ये सभी ठग, दम्भी तथा बकवृत्तिवाले (पाखण्डी) हैं। आवश्यक कार्य पड़नेपर हमने विनम्रतापूर्वक इनसे धनकी याचना की थी, किंतु इन्होंने नहीं दिया। |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—26 A