भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 809
८००श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यज्वा परमधर्म्मिष्ठः सदा दानपरायणः।<br>ददौ वित्तं भृगुभ्योऽसौ कृत्वा यज्ञाननेकशः॥ १०<br><br>धनिनस्ते द्विजा जाता भृगवो नृपदानतः।<br>हयरत्नसमृद्ध्याढ्याः सञ्जाताः प्रथिता भुवि॥ ११वे यज्ञ करनेवाले, धर्मनिष्ठ तथा सदैव दान देनेमें रुचि रखनेवाले थे। उन्होंने अनेक यज्ञ करके अपनी विपुल सम्पदा भृगुवंशी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी। राजाके द्वारा दिये गये दानसे वे भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े धनी हो गये। घोड़े तथा रत्न आदि सम्पदासे युक्त हो जानेके कारण जगत्में वे अतीव प्रसिद्ध हो गये॥ १०-११॥
स्वर्याते नृपशार्दूले कार्तवीर्यार्जुने पुनः।<br>हैहया निर्धना जाताः कालेन महता नृप॥ १२हे राजन्! नृपश्रेष्ठ कार्तवीर्यार्जुनके दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् उनके स्वर्ग चले जानेपर हैहयवंशी क्षत्रिय धनहीन हो गये॥ १२॥
धनकार्यं समुत्पन्नं हैहयानां कदाचन।<br>याचिष्णावोऽभिजग्मुस्तान्भृगूंस्ते हैहया नृप॥ १३हे राजन्! किसी समय हैहय क्षत्रियोंको कार्य-विशेषके लिये धनकी आवश्यकता पड़ गयी। तब वे धन माँगनेकी इच्छासे भृगुवंशी ब्राह्मणोंके पास गये॥ १३॥
विनयं क्षत्रियाः कृत्वाप्ययाचन्त धनं बहु।<br>न ददुस्तेऽतिलोभार्ता नास्ति नास्तीतिवादिनः॥ १४उन क्षत्रियोंने अत्यधिक विनम्रतापूर्वक उन ब्राह्मणोंसे धनकी याचना की, किंतु लोभके वशीभूत उन ब्राह्मणोंने कुछ नहीं दिया और बार-बार कहते रहे—'मेरे पास नहीं है, मेरे पास नहीं है'॥ १४॥
भूमौ च निदधुः केचिद् भृगवो धनमुत्तमम्।<br>ददुः केचिद् द्विजातिभ्यो ज्ञात्वा क्षत्रियतो भयम्॥ १५हैहयवंशी क्षत्रियोंसे भयभीत होकर कुछ भृगुवंशी ब्राह्मणोंने अपनी प्रचुर सम्पत्ति जमीनमें गाड़ दी और कुछने अन्य ब्राह्मणोंको दे दी॥ १५॥
कृत्वा स्थानान्तरे द्रव्यं ब्राह्मणा भयविह्वलाः।<br>त्यक्त्वाश्रमान्ययुः सर्वे भृगवस्तृष्णयान्विताः॥ १६भयाक्रान्त तथा लोभके वशीभूत वे सभी भृगुवंशी ब्राह्मण अपना-अपना धन स्थानान्तरित करके अपने आश्रम छोड़कर अन्यत्र चले गये॥ १६॥
याज्यांश्च दुःखितान्दृष्ट्वा न ददुर्लोभमोहिताः।<br>पलायित्वा गताः सर्वे गिरिदुर्गानुपाश्रिताः॥ १७अपने यजमानोंको दुःखित देखकर भी लोभसे विमोहित ब्राह्मणोंने उन्हें कुछ भी नहीं दिया। उन सभीने भागकर पर्वतकी गुफाओंका आश्रय ग्रहण किया॥ १७॥
ततस्ते हैहयास्तात दुःखिताः कार्यगौरवात्।<br>भृगूणामाश्रमाञ्जग्मुर्द्रव्यार्थं क्षत्रियर्षभाः॥ १८हे तात! तत्पश्चात् कष्ट झेल रहे अनेक हैहय क्षत्रियप्रमुख विशेष कार्यवश द्रव्यप्राप्तिके लिये भृगुवंशी ब्राह्मणोंके आश्रमोंपर पहुँचे॥ १८॥
भृगूंस्तु निर्गतान्वीक्ष्य शून्यांस्त्यक्त्वा गृहानथ।<br>चखनुर्भूतलं तत्र द्रव्यार्थं हैहया भृशम्॥ १९अपने-अपने आश्रमको सुनसान छोड़कर भृगुवंशी ब्राह्मणोंको बाहर गया हुआ देखकर वे हैहय क्षत्रिय धनके लिये वहाँकी जमीन खोदने लगे॥ १९॥
खनताधिगतं वित्तं केनचिद् भृगुवेश्मनि।<br>ददृशुः क्षत्रियाः सर्वे तद्वित्तं श्रमकर्शिताः॥ २०<br><br>यत्र यत्र समुत्पन्नं भूरि द्रव्यं महीतलात्।<br>तदा ते पार्श्वभागस्थब्राह्मणानां गृहाण्यपि॥ २१तत्पश्चात् किसी ब्राह्मणके घरमें जमीन खोद रहे किसी क्षत्रियने कुछ पाया। अब परिश्रमके कारण क्षीणकाय सभी क्षत्रियोंने उस धनको देख लिया। उस समयसे जहाँ-जहाँ भी पता चलता, वे जमीन खोदकर समस्त धन ले लेते थे। धनके लोभसे आस-पास रहनेवाले ब्राह्मणोंके भी घरोंको खोदनेपर उन