देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 808, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 808
अ० १६ ] षष्ठ स्कन्ध ७९९
| ब्राह्मणामूलतः सर्वांश्चच्छिदुः क्रोधमूर्च्छिताः।<br>पातकं पृष्ठतः कृत्वा ब्रह्महत्यासमुद्भवम् ॥ ६३ | लोभसे भृगुवंशी ब्राह्मण पुरोहितोंका कोपाविष्ट होकर समूलोच्छेद कर दिया था॥ ६१-६३॥ |
|---|
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे देवीमहिम्नि नानाभाववर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः
हैहयवंशी क्षत्रियोंद्वारा भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार
| जनमेजय उवाच | जनमेजय बोले— |
|---|---|
| कुले कस्य समुत्पन्नाः क्षत्रिया हैहयाश्च ते।<br>ब्रह्महत्यामनादृत्य निजघ्नुर्भार्गवांश्च ये ॥ १ | जिन हैहय क्षत्रियोंने ब्रह्महत्याकी लेशमात्र भी चिन्ता न करके भृगुवंशी ब्राह्मणोंका वध कर दिया, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए थे? ॥ १॥ |
| वैरस्य कारणं तेषां किं मे ब्रूहि पितामह।<br>निमित्तेन विना क्रोधं कथं कुर्वन्ति सत्तमाः ॥ २ | हे पितामह ! उनके वैरका क्या कारण था, आप मुझे बतलाइये। श्रेष्ठजन किसी कारणविशेषके बिना क्रोध कैसे कर सकते हैं ? ॥ २ ॥ |
| वैरं पुरोहितैः सार्धं कस्मात्तेषामजायत ।<br>नाल्पहेतोर्हि तद्वैरं क्षत्रियाणां भविष्यति ॥ ३ | अपने ही पुरोहितोंके साथ उनकी शत्रुता किसलिये हो गयी थी ? सम्भवतः उन क्षत्रियोंकी उस शत्रुताके पीछे कोई महान् कारण रहा होगा। अन्यथा पापसे भयभीत रहनेवाले वे पराक्रमी क्षत्रिय निरपराध एवं पूजनीय ब्राह्मणोंकी हत्या क्यों करते ? ॥ ३-४॥ |
| अन्यथा ब्राह्मण्यान्पूज्यान्कथं जघ्नुरनागसः।<br>बाहुजा बलवन्तोऽपि पापभीताः कथं न ते ॥ ४ | |
| स्वल्पेऽपराधे को हन्याद्ब्राह्मणांक्षत्रियर्षभः।<br>सन्देहो मे मुनिश्रेष्ठ कारणं वक्तुमर्हसि ॥ ५ | हे मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कौन श्रेष्ठ क्षत्रिय होगा, जो अल्प अपराधके कारण ब्राह्मणोंका वध करेगा ? मुझे तो इस विषयमें महान् शंका हो रही है, इसका कारण बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| इति पृष्टस्तदा तेन राज्ञा सत्यवतीसुतः।<br>उवाच परमप्रीतः कथां संस्मृत्य चेतसा ॥ ६ | तब राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर सत्यवतीनन्दन व्यासजी परम प्रसन्न हुए और मनमें उस वृत्तान्तका स्मरण करके कहने लगे ॥ ६ ॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| शृणु पारिक्षिते वार्तां क्षत्रियाणां पुरातनीम् ।<br>आश्चर्यकारिणीं सम्यग्विदितां च पुरा मया ॥ ७ | हे जनमेजय ! मेरे द्वारा पूर्वकालमें सम्यक् प्रकारसे ज्ञात, क्षत्रियोंसे सम्बन्ध रखनेवाली इस आश्चर्यजनक प्राचीन कथाको आप सुनिये ? ॥ ७ ॥ |
| कार्तवीर्येति नाम्नाभूद्धैहयः पृथिवीपतिः।<br>सहस्त्रबाहुर्बलवानर्जुनो धर्मतत्परः ॥ ८ | कार्तवीर्य नामक एक हैहयवंशीय राजा हो चुके हैं। सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले उन बलवान् राजाकी हजार भुजाएँ थीं, वे सहस्रार्जुन भी कहे जाते थे ॥ ८ ॥ |
| दत्तात्रेयस्य शिष्योऽभूदवतारो हरेरिव ।<br>सिद्धः सर्वार्थदः शाक्तो भृगूणां याज्य एव सः ॥ ९ | वे भगवान् विष्णुके अवतारस्वरूप, दत्तात्रेयके शिष्य, भगवतीके उपासक, परम सिद्ध, सब कुछ देनेमें समर्थ तथा भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यजमान थे ॥ ९ ॥ |