भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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७९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम्।<br>वेदशास्त्रार्थविज्ञानात्तद्द्भवेद् बुद्धियोगतः॥ ५१<br>विकल्पास्तत्र बहवो भवन्ति मतिकल्पिताः।<br>( कुतर्ककल्पिताः केचित्सुतर्ककल्पिताः परे।<br>वितर्कैर्विभ्रमोत्पत्तिर्विभ्रमाद् बुद्धिभ्रंशता।<br>बुद्धिभ्रंशाज्ज्ञाननाशः प्राणिनां परिकीर्तितः।)<br>अनुभवाख्यं द्वितीयं तु ज्ञानं तद्दुर्लभं नृप॥ ५२<br>तत्तदा प्राप्यते तस्य वेत्तुः सङ्गो यदा भवेत्।<br>शब्दज्ञानान्न कार्यस्य सिद्धिर्भवति भारत॥ ५३<br>तस्मान्नानुभवज्ञानं सम्भवत्यतिमानुषम्।<br>अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शब्दबोधो हि न क्षमः॥ ५४<br>यथा न नश्यति तमः कृत्यया दीपवार्तया।ज्ञान भी दो प्रकारका कहा गया है। प्रथम शाब्दिक ज्ञान बताया गया है। वह ज्ञान बुद्धिकी सहायतासे वेद और शास्त्रके अर्थविज्ञानद्वारा प्राप्त हो जाता है। बुद्धिवैभिन्न्यके अनुसार इस ज्ञानके भी बहुत-से भेद हो जाते हैं। (इनमेंसे कुछ ज्ञान कुतर्कसे और कुछ सुतर्कसे कल्पित होते हैं। कुतर्कोंसे भ्रान्तिकी उत्पत्ति होती है और विभ्रमसे बुद्धिनाश हो जाता है। बुद्धिनाशसे प्राणियोंका ज्ञान नष्ट हो जाना कहा गया है।) हे राजन्! अनुभव नामक वह दूसरा ज्ञान तो दुर्लभ होता है। वह ज्ञान तब प्राप्त होता है, जब उसके जाननेवालेका संग हो जाय। हे भारत! शब्दज्ञानसे कार्यकी सिद्धि नहीं होती, इसलिये अनुभवज्ञान अत्यन्त अलौकिक होता है। शब्दज्ञान अन्तःकरणके अन्धकारको दूर करनेमें उसी प्रकार समर्थ नहीं है जैसे दीपकसम्बन्धी वार्ता करनेसे अन्धकार नष्ट नहीं होता॥ ५१–५४ १/२ ॥
तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये॥ ५५<br>आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्।<br>शीलं परहितत्वं च कोपाभावः क्षमा धृतिः॥ ५६<br>सन्तोषश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम्।<br>विद्यया तपसा वापि योगाभ्यासेन भूपते॥ ५७<br>विना कामादिशत्रूणां नैव नाशः कदाचन।<br>( मनस्तु चञ्चलं राजन्स्वभावादतिदुर्ग्रहम्।<br>तद्वशः सर्वथा प्राणी त्रिविधो भुवनत्रये।)<br>कामक्रोधादयो भावाश्चित्तजाः परिकीर्तिताः॥ ५८<br>ते तदा न भवन्त्येव यदा वै निर्जितं मनः।<br>तस्मात्तु निमिना राजन् क्षमा विहिता मुनौ॥ ५९<br>यथा ययातिना पूर्वं कृता शुक्रे कृतागसि।<br>भृगुपुत्रेण शप्तोऽपि ययातिर्नृपसत्तमः॥ ६०<br>न शशाप मुनिं क्रोधाज्जरां राजा गृहीतवान्।कर्म वही है, जो बन्धन न करे और विद्या वही है जो मुक्तिके लिये हो। अन्य कर्म तो मात्र परिश्रमके लिये होता है तथा दूसरी विद्या तो मात्र शिल्पसम्बन्धी कौशल है। शील, परोपकार, क्रोधका अभाव, क्षमा, धैर्य और सन्तोष—यह सब विद्याका अत्यन्त उत्तम फल है। हे भूपते! विद्या, तपस्या अथवा योगाभ्यासके बिना काम आदि शत्रुओंका नाश कभी नहीं हो सकता। (हे राजन्! मन चंचल और स्वभावतः अति दुर्ग्रह होता है, तीनों लोकोंमें तीनों प्रकारके प्राणी उसी मनके वशमें रहते हैं) काम-क्रोध आदि भाव चित्तजन्य कहे गये हैं। ये सब उस समय नहीं उत्पन्न होते, जब मनपर विजय पा ली जाती है। हे राजन्! इसीलिये निमिने मुनिको उस प्रकार क्षमा नहीं किया, जिस प्रकार ययातिने अपराध करनेपर भी शुक्राचार्यको क्षमा कर दिया था। पूर्वकालमें भृगुपुत्र शुक्राचार्यने नृपश्रेष्ठ ययातिको शाप दे दिया था, लेकिन राजाने क्रोधित होकर मुनिको शाप नहीं दिया और स्वयं वृद्धावस्थाको स्वीकार कर लिया था॥ ५५–६० १/२ ॥
कश्चित्सौम्यो भवेत्कश्चित्क्रूरो भवति पार्थिवः॥ ६१<br>स्वभावभेदान्नृपते कस्य दोषोऽत्र कल्प्यते।<br>हैहया भार्गवान्पूर्वं धनलोभात्पुरोहितान्॥ ६२हे राजन्! कोई राजा शान्तस्वभाव और कोई क्रूर होता है। स्वभावमें भेद होनेके कारण इसमें किसका दोष कहा जाय? पूर्वकालमें हैहयवंशी क्षत्रियोंने ब्रह्महत्याजनित पापकी उपेक्षा करके धनके