देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 816, कुल 889 में से
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| अ० १७ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८०७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इति तेन समादिष्टा हैहयाः प्राप्तलोचनाः।<br>और्वमामन्त्र्य जग्मुस्ते सदनानि यथारुचि ॥ ४२ | इस प्रकार उसके कहनेपर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंको दृष्टि प्राप्त हो गयी और वे और्व (ऊरुसे उत्पन्न) उस बालकसे आज्ञा लेकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने घर चले गये॥ ४२ ॥ |
| ब्राह्मणी तं सुतं दिव्यं गृहीत्वा स्वाश्रमं गता।<br>पालयामास भूपाल तेजस्विनमतन्द्रिता ॥ ४३ | हे राजन्! वह ब्राह्मणी भी उस तेजस्वी तथा अलौकिक बालकको लेकर अपने आश्रम चली गयी और बड़ी सावधानीपूर्वक उसका पालन-पोषण करने लगी ॥ ४३ ॥ |
| एवं ते कथितं राजन् भृगूणां तु विनाशनम्।<br>लोभाविष्टैः क्षत्रियैश्च यत्कृतं पातकं किल ॥ ४४ | हे राजन्! इस प्रकार भृगुवंशके विनाश तथा लोभके वशीभूत हैहय क्षत्रियोंने जो पापकर्म किया था; उसके विषयमें मैंने आपसे कहा ॥ ४४ ॥ |
| जनमेजय उवाच<br>श्रुतं मया महत्कर्म क्षत्रियाणाञ्च दारुणम्।<br>कारणं लोभ एवात्र दुःखदश्चोभयोस्तु सः ॥ ४५ | **जनमेजय बोले—**हे मुने! मैंने क्षत्रियोंके अत्यन्त दारुण कर्मके विषयमें सुन लिया। इहलोक तथा परलोकमें दुःख देनेवाला वह लोभ ही इसमें मूल कारण है॥ ४५ ॥ |
| किञ्चित्प्रष्टुमिहेच्छामि संशयं वासवीसूत।<br>हैहयास्ते कथं नाम्ना ख्याता भुवि नृपात्मजाः ॥ ४६ | हे सत्यवतीनन्दन! मैं संशयग्रस्त हूँ; [इस विषयमें] आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। ये क्षत्रिय राजकुमार इस जगत्में हैहय नामसे क्यों प्रसिद्ध हुए? ॥ ४६ ॥ |
| यदोस्तु यादवाः कामं भरताद्भारतास्तथा।<br>हैहयः कोऽपि राजाभूत्तेषां वंशे प्रतिष्ठितः ॥ ४७ | यदुसे यादव हुए तथा भरतसे भारत हुए। उसी प्रकार क्या उन क्षत्रियोंके वंशमें 'हैहय' नामधारी कोई प्रतिष्ठित राजा हुआ था ? ॥ ४७ ॥ |
| तदहं श्रोतुमिच्छामि कारणं करुणानिधे।<br>हैहयास्ते कथं जाताः क्षत्रियाः केन कर्मणा ॥ ४८ | हे करुणानिधान! उन हैहय क्षत्रियोंकी उत्पत्ति कैसे हुई तथा किस कर्मसे उनका यह नाम पड़ा ? वह कारण मैं सुनना चाहता हूँ॥ ४८ ॥ |
| व्यास उवाच<br>हैहयानां समुत्पत्तिं शृणु भूप सविस्तराम्।<br>पुरातनीं सुपुण्यां च कथां पापप्रणाशिनीम् ॥ ४९ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! अब मैं हैहयोंकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित अति प्राचीन, पुण्यदायिनी तथा पापनाशिनी कथाका विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ, आप इसे सुनिये ॥ ४९ ॥ |
| कस्मिश्चित्समये भूप सूर्यपुत्रः सुशोभनः।<br>रेवन्तेति च विख्यातो रूपवानमितप्रभः ॥ ५०<br><br>उच्चैःश्रवसमारुह्य हयरत्नं मनोहरम्।<br>जगाम विष्णुसदनं वैकुण्ठं भास्करात्मजः ॥ ५१ | हे महाराज! किसी समय अत्यन्त सुन्दर, रूपवान् तथा अपरिमित तेजवाले सूर्यपुत्र जो 'रेवन्त' नामसे विख्यात थे, अपने मनोहर अश्वरत्न उच्चैःश्रवापर आरूढ़ होकर भगवान् विष्णुके निवासस्थान वैकुण्ठलोक गये ॥ ५०-५१ ॥ |
| भगवद्दर्शनाकांक्षी हयारूढो यदागतः।<br>हयस्थस्तु तदा दृष्टो लक्ष्म्यासौ रविनन्दनः ॥ ५२ | विष्णुके दर्शनके आकांक्षी वे भास्करनन्दन घोड़ेपर सवार होकर जब वहाँ पहुँचे तब लक्ष्मीजीकी दृष्टि अश्वपर विराजमान रेवन्तपर पड़ गयी ॥ ५२ ॥ |
| रमा वीक्ष्य हयं दिव्यं भ्रातरं सागरोद्भवम्।<br>रूपेण विस्मिता तस्य तस्थौ स्तम्भितलोचना ॥ ५३ | समुद्रसे प्रादुर्भूत अपने भाई अलौकिक उच्चैःश्रवा घोड़ेको देखकर वे महान् विस्मयमें पड़ गयीं और उसके रूपको स्थिर नेत्रोंसे देखती रह गयीं ॥ ५३ ॥ |