देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ८०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १७] | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भगवानपि तं दृष्ट्वा हयारूढं मनोहरम्।<br>आगच्छन्तं रमां विष्णुः पप्रच्छ प्रणयात्प्रभुः ॥ ५४<br><br>कोऽयमायाति चार्वङ्गि हयारूढ इवापरः।<br>स्मरतेजस्तनुः कान्ते मोहयन्भुवनत्रयम् ॥ ५५ | भगवान् विष्णुने उस मनोहर रेवन्तको घोड़ेपर बैठकर आता हुआ देखकर लक्ष्मीजीसे प्रेमपूर्वक पूछा—हे सुन्दर अंगोंवाली! हे प्रिये! दूसरे कामदेवके समान तेजोमय शरीरवाला यह कौन है जो घोड़ेपर सवार होकर तीनों लोकोंको मोहित करता हुआ इधर चला आ रहा है॥ ५४-५५॥ |
| प्रेक्षमाणा तदा लक्ष्मीस्तच्चित्ता दैवयोगतः।<br>नोवाच वचनं किञ्चित्पृष्टापि च पुनः पुनः ॥ ५६ | उस समय घोड़ेको एकटक देखते रहनेसे दैववशात् उसीमें चित्तयोग हो जानेके कारण भगवान् विष्णुके बार-बार पूछनेपर भी लक्ष्मीजीने कुछ नहीं कहा॥ ५६॥ |
| व्यास उवाच<br>अश्वासक्तमतिं वीक्ष्य कामिनीमतिमोहिताम्।<br>पश्यन्तीं परमप्रेम्णा चञ्चलाक्षीं च चञ्चलाम्॥ ५७<br><br>तामाह भगवान्क्रुद्धः किं पश्यसि सुलोचने।<br>मोहिता च हरिं दृष्ट्वा पृष्टा नैवाभिभाषसे ॥ ५८ | व्यासजी बोले—भगवान् विष्णु कामिनी, चपल नेत्रोंवाली तथा चंचला लक्ष्मीको अत्यन्त मोहित होकर अत्यधिक प्रेमके साथ निहारती हुई तथा उस अश्वमें अनुरक्त बुद्धिवाली देखकर क्रोधित हो उठे और उनसे बोले—हे सुलोचने! तुम क्या देख रही हो? इस घोड़ेको देखकर मोहित हुई तुम मेरे पूछनेपर भी उत्तर नहीं दे रही हो॥ ५७-५८॥ |
| सर्वत्र रमसे यस्माद्रमा तस्माद् भविष्यसि।<br>चञ्चलत्वाच्चलेत्येवं सर्वथैव न संशयः ॥ ५९ | क्योंकि तुम्हारा चित्त सभी ओर रमण करता है अतएव ‘रमा’ और तुम्हारी चंचल होके कारण तुम ‘चला’ कही जाओगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५९॥ |
| प्राकृता च यथा नारी नूनं भवति चञ्चला।<br>तथा त्वमपि कल्याणि स्थिरा नैव कदाचन ॥ ६० | जिस प्रकार सामान्य नारी चंचल होती है, उसी प्रकार हे कल्याणि! तुम भी कभी स्थिर स्वभाववाली नहीं रहोगी॥ ६०॥ |
| त्वं हयं मत्समीपस्था समीक्ष्य यदि मोहिता।<br>वडवा भव वामोरु मर्त्यलोकेऽतिदारुणे ॥ ६१ | मेरे पास रहनेपर भी तुम यदि एक अश्वको देखकर मोहित हो गयी हो तो हे वामोरु! तुम अत्यन्त दारुण मर्त्यलोकमें घोड़ीके रूपमें जन्म ग्रहण करो॥ ६१॥ |
| इति शप्ता रमा देवी हरिणा दैवयोगतः।<br>रुरोद वेपमाना सा भयभीतातिदुःखिता ॥ ६२ | दैवयोगसे भगवान् विष्णुने जब देवी लक्ष्मीको ऐसा शाप दे दिया तब वे अत्यन्त भयभीत तथा दुःखी होकर काँपती हुई रोने लगीं॥ ६२॥ |
| तमुवाच रमानाथं शङ्किता चारुहासिनी।<br>प्रणम्य शिरसा देवं स्वपतिं विनयान्विता ॥ ६३ | सुन्दर मुसकानवाली लक्ष्मीजी दुविधामें पड़ गयीं और अपने पति भगवान् विष्णुको विनयसे युक्त होकर मस्तक झुकाकर प्रणाम करके उनसे कहने लगीं— ॥ ६३॥ |
| देवदेव जगन्नाथ करुणाकर केशव।<br>स्वल्पेऽपराधे गोविन्द कस्माच्छापं ददासि मे ॥ ६४ | हे देवदेव! हे जगदीश्वर! हे करुणानिधान! हे केशव! हे गोविन्द! एक छोटेसे अपराधके लिये आपने मुझे ऐसा शाप क्यों दे दिया?॥ ६४॥ |
| न कदाचिन्मया दृष्टः क्रोधस्ते हीदृशः प्रभो।<br>क्व गतस्ते मयि स्नेहः सहजो न तु नश्वरः ॥ ६५ | हे प्रभो! मैंने आपका ऐसा क्रोध पहले कभी नहीं देखा। मेरे प्रति आपका वह सहज तथा शाश्वत प्रेम कहाँ चला गया?॥ ६५॥ |