देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० १८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८०९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वज्रपातस्तु शत्रौ वै कर्तव्यो न सुहृज्जने।<br>सदाहं वरयोग्या ते शापयोग्या कथं कृता॥ ६६ | आपको वज्रपात शत्रुपर करना चाहिये न कि अपने स्नेहीजनपर। आपसे सदा वर पानेयोग्य मैं आज शापके योग्य कैसे हो गयी?॥ ६६॥ |
| प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द पश्यतोऽद्य तवाग्रतः।<br>कथं जीवे त्वया हीना विरहानलतापिता॥ ६७ | हे गोविन्द! मैं इसी समय आपके देखते-देखते आपके सामने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि आपसे वियुक्त होकर विरहाग्निमें जलती हुई मैं कैसे जीवित रह सकूँगी?॥ ६७॥ |
| प्रसादं कुरु देवेश शापादस्मात्सुदारुणात्।<br>कदा मुक्ता समीपं ते प्राप्नोमि सुखदं विभो॥ ६८ | हे देवेश! मेरे ऊपर कृपा कीजिये। हे विभो! अब मैं इस दारुण शापसे मुक्त होकर आपका सुखदायी सांनिध्य कब प्राप्त करूँगी?॥ ६८॥ |
| हरिरुवाच<br>यदा ते भविता पुत्रः पृथिव्यां मत्समः प्रिये।<br>तदा मां प्राप्य तन्वङ्गि सुखिता त्वं भविष्यसि॥ ६९ | हरि बोले— हे प्रिये! हे तन्वंगि! जब पृथ्वीलोकमें तुम्हें मेरे समान एक पुत्रकी प्राप्ति हो जायगी तब पुनः मुझे प्राप्त करके तुम सुखी हो जाओगी॥ ६९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयानामुत्पत्ति-प्रसङ्गे रमाविष्णुसंवादवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः
भगवती लक्ष्मीद्वारा घोड़ीका रूप धारणकर तपस्या करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जनमेजय उवाच<br>इति शप्ता भगवता सिन्धुजा कोपयोगतः।<br>कथं सा वडवा जाता रेवन्तेन च किं कृतम्॥ १ | जनमेजय बोले— [हे मुने!] इस प्रकार कोप करके भगवान्के द्वारा शापित लक्ष्मीजीने घोड़ीके रूपमें किस प्रकार जन्म लिया और इसके बाद रेवन्तने क्या किया?॥ १॥ |
| कस्मिन्देशेऽब्धिजा देवी वडवारूपधारिणी।<br>संस्थितैकाकिनी बाला परोषितपतिका यथा॥ २ | अपने पतिके प्रवासमें रहनेके कारण उसके वियोगमें एकाकिनी समय व्यतीत करनेवाली नारीकी भाँति लक्ष्मीजीने घोड़ीका रूप धारण करके किस देशमें समय व्यतीत किया?॥ २॥ |
| कालं कियन्तमायुष्मन् वियुक्ता पतिना रमा।<br>संस्थिता विजनेऽरण्ये किं कृतं च तया पुनः॥ ३ | हे आयुष्मन्! पतिसे वियुक्त रहते हुए लक्ष्मीजीने कितना समय बिताया और पुनः उस निर्जन वनमें रहती हुई उन्होंने क्या किया?॥ ३॥ |
| समागमं कदा प्राप्ता वासुदेवस्य सिन्धुजा।<br>पुत्रः कथं तया प्राप्तो नारायणवियुक्तया॥ ४ | समुद्रतनया लक्ष्मीको पुनः भगवान् विष्णुका समागम कब प्राप्त हुआ तथा विष्णुसे अलग रहते हुए उन्होंने किस प्रकार पुत्र प्राप्त किया?॥ ४॥ |
| एतद्वृत्तान्तमार्येश कथयस्व सविस्तरम्।<br>श्रोतुकामोऽस्मि विप्रेन्द्र कथाख्यानमनुत्तमम्॥ ५ | हे आर्येश! इस वृत्तान्तका वर्णन विस्तारके साथ कीजिये। हे विप्रवर! मैं इस अत्युत्तम पौराणिक आख्यानको सुनना चाहता हूँ॥ ५॥ |
| सूत उवाच<br>इति पृष्टस्तदा व्यासः परीक्षित्तनयेन वै।<br>कथयामास भो विप्राः कथामेतां सुविस्तराम्॥ ६ | सूतजी बोले— हे विप्रो! परीक्षित्पुत्र जनमेजयके ऐसा पूछनेपर व्यासजी इस अति विस्तृत कथाका वर्णन करने लगे॥ ६॥ |