भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 819

८१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८

व्यास उवाच
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>पावनीं सुखदां कर्णे विशदाक्षरसंयुताम्॥ ७व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये मैं अब वह शुभ, पवित्र, स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त तथा कानोंको प्रिय लगनेवाली पौराणिक कथा कहूँगा॥ ७॥
रेवन्तस्तु रमां दृष्ट्वा शप्तां देवेन कामिनीम्।<br>भयार्तः प्रययौ दूरात्प्रणम्य जगतां पतिम्॥ ८कामिनी रमाको विष्णुद्वारा शापित की गयी देखकर रेवन्त भयके कारण जगत्पति वासुदेवको दूरसे ही प्रणाम करके चले गये॥ ८॥
पितुः सकाशं त्वरितो वीक्ष्य कोपं जगत्पतेः।<br>निवेदयामास कथां भास्कराय स शापजाम्॥ ९जगन्नाथ विष्णुका यह क्रोध देखकर वे तत्काल अपने पिताके पास गये और उन सूर्यसे शापसे सम्बन्धित कथा बतायी॥ ९॥
दुःखिता सा रमा देवी प्रणम्य जगदीश्वरम्।<br>आज्ञप्ता मानुषं लोकं प्राप्ता कमलोचना॥ १०<br>सूर्यपत्न्या तपस्तप्तं यत्र पूर्वं सुदारुणम्।<br>तत्रैव सा ययावाशु वडवारूपधारिणी॥ ११<br>कालिन्दीतमसास्सङ्गे सुपर्णाक्षस्य चोत्तरे।<br>सर्वकामप्रदे स्थाने सुरम्यवनमण्डिते॥ १२इसके बाद कमलके समान नेत्रोंवाली वे दुःखित लक्ष्मीजी जगदीश्वर विष्णुजीसे आज्ञा लेकर उन्हें प्रणाम करके मृत्युलोकमें आ गयीं। सूर्यकी पत्नीने पूर्वकालमें सुपर्णाक्षकी उत्तरदिशामें यमुना—तमसा नदीके संगमपर सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा सुन्दर वनोंसे सुशोभित जिस स्थानपर कठोर तपस्या की थी, वहीं वडवारूपधारिणी वे लक्ष्मीजी शीघ्र पहुँच गयीं॥ १०—१२॥
तत्र स्थिता महादेवं शङ्करं वाञ्छितप्रदम्।<br>दध्यौ चैकेन मनसा शूलिनं चन्द्रशेखरम्॥ १३<br>पञ्चाननं दशभुजं गौरीदेहार्धधारिणम्।<br>कर्पूरगौरदेहाभं नीलकण्ठं त्रिलोचनम्॥ १४<br>व्याघ्राजिनधरं देवं गजचर्मोत्तरीयकम्।<br>कपालमालाकलितं नागयज्ञोपवीतिनम्॥ १५वहाँ रहकर वे लक्ष्मीजी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले, त्रिशूलधारी, चन्द्रशेखर, पाँच मुखोंवाले, दस भुजाओंवाले, गौरीके शरीरका अर्ध भाग धारण करनेवाले, कर्पूरके समान गौर शरीरवाले, नीले कण्ठसे सुशोभित, तीन नेत्रोंवाले, व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले, हाथीके चर्मका उत्तरीय धारण करनेवाले, गलेमें नरमुण्डकी मालासे मण्डित तथा सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले महादेव शंकरका एकाग्रमनसे ध्यान करने लगीं॥ १३—१५॥
सागरस्य सुता कृत्वा हयीरूपं मनोहरम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे रमादेवी चकार दुश्चरं तपः॥ १६सागरपुत्री लक्ष्मीजीने सुन्दर घोड़ीका रूप धारण करके उस तीर्थमें अत्यन्त कठोर तपस्या की॥ १६॥
ध्यायमाना परं देवं वैराग्यं समुपाश्रिता।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु गतं तत्र महीपते॥ १७हे राजन्! महादेव शंकरका ध्यान करते-करते लक्ष्मीजीके मनमें वैराग्यका प्रादुर्भाव हो गया। इस प्रकार [उनको तप करते हुए] एक हजार दिव्य वर्ष बीत गये॥ १७॥
ततस्तुष्टो महादेवो वृषारूढस्त्रिलोचनः।<br>प्रत्यक्षोऽभून्महेशानः पार्वतीसहितः प्रभुः॥ १८तदनन्तर प्रसन्न होकर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने वृषभपर सवार होकर पार्वतीजीके साथ उन्हें साक्षात् दर्शन दिया॥ १८॥
तत्रैत्य सगणः शम्भुस्तामाह हरिवल्लभाम्।<br>तपस्यन्तीं महाभागामश्विनीरूपधारिणीम्॥ १९भगवान् शंकरने अपने गणोंसहित वहाँ आकर तप करती हुई वडवारूपधारिणी महाभागा विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीसे कहा—॥ १९॥
किं तपस्यसि कल्याणि जगन्मातर्वदस्व मे।<br>सर्वार्थदः पतिस्तेऽस्ति सर्वलोकविधायकः॥ २०हे कल्याणि! हे जगज्जननि! आप तपस्या क्यों कर रही हैं? मुझे इसका कारण बतायें। आपके पति विष्णु तो स्वयं सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा सभी लोकोंका विधान करनेवाले हैं॥ २०॥
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