देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 798, कुल 889 में से
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| अ० १४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८९ |
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अथ चतुर्दशोऽध्यायः
राजा निमि और वसिष्ठका एक-दूसरेको शाप देना, वसिष्ठका मित्रावरुणके पुत्रके रूपमें जन्म लेना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जनमेजय उवाच<br>मैत्रावरुणिरित्युक्तं नाम तस्य मुनेः कथम्।<br>वसिष्ठस्य महाभाग ब्रह्मणस्तनुजस्य ह॥ १<br>किमसो कर्मतो नाम प्राप्तवान् गुणतस्तथा।<br>ब्रूहि मे वदतां श्रेष्ठ कारणं तस्य नामजम्॥ २ | जनमेजय बोले—हे महाभाग! ब्रह्माके पुत्र मुनि वसिष्ठका 'मैत्रावरुणि'—यह नाम कैसे पड़ा? हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! किस कर्म अथवा गुणके कारण उन्होंने यह नाम प्राप्त किया। उनके नाम पड़नेका कारण मुझे बताइये॥ १-२॥ |
| व्यास उवाच<br>निबोध नृपतिश्रेष्ठ वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः।<br>निमिशापात्तनुं त्यक्त्वा पुनर्जातो महाद्युतिः॥ ३<br>मित्रावरुणयोर्यस्मात्तस्मात्तन्नाम विश्रुतम्।<br>मैत्रावरुणिरित्यस्मिँल्लोके सर्वत्र पार्थिव॥ ४ | व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! सुनिये, वसिष्ठजी ब्रह्माके पुत्र हैं, उन महातेजस्वीने निमिके शापसे वह शरीर त्यागकर पुनः जन्म लिया॥ ३॥<br>हे राजन्! उनका जन्म मित्र और वरुणके यहाँ हुआ था, इसीलिये इस संसारमें सर्वत्र उनका 'मैत्रावरुणि'—यह नाम विख्यात हुआ॥ ४॥ |
| राजोवाच<br>कस्माच्छप्तः स धर्मात्मा राज्ञा ब्रह्मात्मजो मुनिः।<br>चित्रमेतन्मुनिं लग्नो राज्ञः शापोऽतिदारुणः॥ ५<br>अनागसं मुनिं राजा किमसो शप्तवान्मुने।<br>कारणं वद धर्मज्ञ तस्य शापस्य मूलतः॥ ६ | राजा बोले—राजा निमिने ब्रह्माजीके पुत्र धर्मात्मा वसिष्ठको शाप क्यों दिया? राजाका वह दारुण शाप मुनिको लग गया—यह तो आश्चर्य है!॥ ५॥<br>हे मुने! निरपराध मुनिको राजाने क्यों शाप दे दिया; हे धर्मज्ञ! उस शापका कारण यथार्थरूपमें बताइये?॥ ६॥ |
| व्यास उवाच<br>कारणं तु मया प्रोक्तं तव पूर्वं विनिश्चितम्।<br>संसारोऽयं त्रिभिर्व्याप्तो राजन्मायागुणैः किल॥ ७<br>धर्मं करोतु भूपालश्चरन्तु तापसास्तपः।<br>सर्वेषां तु गुणैर्विद्धं प्रोज्ज्वलं तद्भवेदिह॥ ८<br>कामक्रोधाभिभूताश्च राजानो मुनयस्तथा।<br>लोभाहङ्कारसंयुक्ताश्चरन्ति दुश्चरं तपः॥ ९<br>यजन्ति क्षत्रिया राजन् रजोगुणसमावृताः।<br>ब्राह्मणास्तु तथा राजन् न कोऽपि सत्त्वसंयुतः॥ १०<br>ऋषिणासौ निमिः शप्तस्तेन शप्तो मुनिः पुनः।<br>दुःखाह्दुःखतरं प्राप्तावुभावपि विधेर्बलात्॥ ११<br>द्रव्यशुद्धिः क्रियाशुद्धिर्मनसः शुद्धिरुज्ज्वला।<br>दुर्लभा प्राणिनां भूप संसारे त्रिगुणात्मके॥ १२ | व्यासजी बोले—इसका सम्यक् रूपसे निर्णीत कारण तो मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ। हे राजन्! यह संसार मायाके तीनों गुणोंसे व्याप्त है॥ ७॥<br>राजा धर्म करें और तपस्वी तप करें—यह स्वाभाविक कर्म है, परंतु सभी प्राणियोंका मन गुणोंसे आबद्ध रहनेके कारण विशुद्ध नहीं रह पाता॥ ८॥<br>राजालोग काम और क्रोधसे अभिभूत रहते हैं और उसी प्रकार तपस्वीगण भी लोभ और अहंकारयुक्त होकर कठोर तपस्या करते हैं॥ ९॥<br>हे राजन्! क्षत्रियगण रजोगुणसे युक्त होकर यज्ञ करते थे, वैसे ही ब्राह्मण भी थे। हे राजन्! कोई भी सत्त्वगुणसे युक्त नहीं था॥ १०॥<br>ऋषिने राजाको शाप दिया और तब राजाने भी मुनिको शाप दे दिया। इस प्रकार दैववशात् दोनोंको बहुत दुःख प्राप्त हुआ॥ ११॥<br>हे राजन्! इस त्रिगुणात्मक जगत्में प्राणियोंके लिये द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और उज्ज्वल मनःशुद्धि दुर्लभ है॥ १२॥ |