भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 799, कुल 889 में से

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पृष्ठ 799

| ७९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पराशक्तिप्रभावोऽयं नोल्लङ्घ्यः केनचित्क्वचित्।<br>यस्यानुग्रहमिच्छेत्सा मोचयत्येव तं क्षणात्॥ १३यह पराशक्तिका ही प्रभाव है और कोई कभी इसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। जिसपर वे भगवती कृपा करना चाहती हैं, उसे तत्काल मुक्त कर देती हैं॥ १३॥
महान्तोऽपि न मुच्यन्ते हरिब्रह्महरादयः।<br>पामरा अपि मुच्यन्ते यथा सत्यव्रतादयः॥ १४ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि महान् देवता भी मुक्त नहीं हो पाते, किंतु सत्यव्रत आदि जैसे अधम भी मुक्त हो जाते हैं॥ १४॥
तस्यास्तु हृदयं कोऽपि न वेत्ति भुवनत्रये।<br>तथापि भक्तवश्येयं भवत्येव सुनिश्चितम्॥ १५यद्यपि तीनों लोकोंमें भगवतीके रहस्यको कोई नहीं जानता है, फिर भी वे भक्तके वशमें हो जाती हैं—ऐसा निश्चित है॥ १५॥
तस्मात्तद्भक्तिरास्थेया दोषनिर्मूलनाय च।<br>रागदम्भादियुक्ता चेत्सा भक्तिर्नाशिनी भवेत्॥ १६अतः दोषोंके निर्मूलनके लिये उनकी भक्ति करनी चाहिये। यदि वह भक्ति राग, दम्भ आदिसे युक्त हो तो वह नाश करनेवाली होती है॥ १६॥
इक्ष्वाकुकुलसम्भूतो निमिर्नाम नराधिपः।<br>रूपवान् गुणसम्पन्नो धर्मज्ञो लोकरञ्जकः॥ १७<br><br>सत्यवादी दानपरो याजको ज्ञानवाञ्छुचिः।<br>द्वादशस्तनयो धीमान्प्रजापालनतत्परः॥ १८इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न निमि नामके एक राजा थे। वे रूपवान्, गुणवान्, धर्मज्ञ, प्रजावत्सल सत्यवादी, दानशील, यज्ञ-कर्ता, ज्ञानी और पुण्यात्मा थे। वे बुद्धिमान् और प्रजापालक राजा निमि इक्ष्वाकुके बारहवें पुत्र थे॥ १७-१८॥
पुरं निवेशयामास गौतमाश्रमसन्निधौ।<br>जयन्तपुरसंज्ञं तु ब्राह्मणानां हिताय सः॥ १९उन्होंने ब्राह्मणोंके हितके लिये गौतममुनिके आश्रमके समीप जयन्तपुर नामका एक नगर बसाया॥ १९॥
बुद्धिस्तस्य समुत्पन्ना यजेयमिति राजसी।<br>यज्ञेन बहुकालेन दक्षिणासंयुतेन च॥ २०उनके मनमें एक बार यह राजसी बुद्धि उत्पन्न हुई कि बहुत समयतक चलनेवाले और विपुल दक्षिणावाले यज्ञके द्वारा आराधना करूँ॥ २०॥
इक्ष्वाकुं पितरं पृष्ट्वा यज्ञकार्याय पार्थिवः।<br>कारयामास सम्भारं यथोद्दिष्टं महात्मभिः॥ २१तब राजाने यज्ञकार्यके लिये अपने पिता इक्ष्वाकुसे आज्ञा लेकर महात्माओंके कथनानुसार समस्त यज्ञीय सामग्री एकत्र करायी॥ २१॥
भृगुमङ्गिरसं चैव वामदेवं च गौतमम्।<br>वसिष्ठं च पुलस्त्यं च ऋचीकं पुलहं क्रतुम्॥ २२<br><br>मुनीनामन्त्रयामास सर्वज्ञांर्वेदपारगान्।<br>यज्ञविद्याप्रवीणांश्च तापसान्वेदवित्तमान्॥ २३इसके बाद राजाने भृगु, अंगिरा, वामदेव, गौतम, वसिष्ठ, पुलस्त्य, ऋचीक, पुलह और क्रतु—इन सर्वज्ञ, वेदमें पारंगत, यज्ञविद्याओंमें कुशल एवं वेदज्ञ मुनियों और तपस्वियोंको आमन्त्रित किया॥ २२-२३॥
राजा सम्भृतसम्भारः सम्पूज्य गुरुमात्मनः।<br>वसिष्ठं प्राह धर्मज्ञो विनयेन समन्वितः॥ २४समस्त सामग्री एकत्र कर धर्मज्ञ राजाने अपने गुरु वसिष्ठकी पूजा करके विनयसे युक्त होकर उनसे कहा—॥ २४॥
यजेयं मुनिशार्दूल याजयस्व कृपानिधे।<br>गुरुस्त्वं सर्ववेत्तासि कार्यं मे कुरु साम्प्रतम्॥ २५हे मुनिश्रेष्ठ! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ। अतः यज्ञ करानेकी कृपा करें। हे कृपानिधे! आप सर्वज्ञ हैं और मेरे गुरु हैं; इस समय आप मेरा कार्य सम्पन्न कीजिये॥ २५॥
यज्ञोपकरणं सर्वं समानीतं सुसंस्कृतम्।<br>पञ्चवर्षसहस्रं तु दीक्षां कर्तुं मतिश्च मे॥ २६मैंने समस्त यज्ञीय सामग्री मँँगवा ली है और उसका संस्कार भी करा लिया है। मेरा विचार है कि मैं पाँच हजार वर्षके लिये यज्ञ-दीक्षा ग्रहण कर लूँ॥ २६॥
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