देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 800, कुल 889 में से
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अ० १४ ] षष्ठ स्कन्ध ७९१
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| यस्मिन्यज्ञे समाराध्या देवी श्रीजगदम्बिका।<br>तत्प्रीत्यर्थमहं यज्ञं करोमि विधिपूर्वकम्॥ २७<br>तच्छ्रुत्वासौ निमेर्वाक्यं वसिष्ठः प्राह भूपतिम्।<br>इन्द्रेणाहं वृतः पूर्वं यज्ञार्थं नृपसत्तम॥ २८<br>पराशक्तिमखं कर्तुमुद्युक्तः पाकशासनः।<br>स दीक्षां गमितो देवः पञ्चवर्षशतात्मिकाम्॥ २९<br>तस्मात्त्वमन्तरं तावत्प्रतिपालय पार्थिव।<br>इन्द्रयज्ञे समाप्तेऽत्र कृत्वा कार्यं दिवस्पतेः॥ ३०<br>आगमिष्याम्यहं राजंस्तावत्त्वं प्रतिपालय। | जिस यज्ञमें भगवती जगदम्बाकी आराधना होती हो, उस यज्ञको मैं उनकी प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक करना चाहता हूँ॥ २७॥<br>निमिकी वह बात सुनकर वसिष्ठजीने राजासे कहा—हे नृपश्रेष्ठ! मैं इन्द्रके द्वारा यज्ञके लिये पहले ही वरण कर लिया गया हूँ। इन्द्र पराशक्तिके प्रीत्यर्थ यज्ञ करनेके लिये तत्पर हैं और देवेन्द्रने पाँच सौ वर्षतक चलनेवाले यज्ञकी दीक्षा ले ली है। अतः हे राजन्! तबतक आप यज्ञ-सामग्रियोंकी रक्षा करें, इन्द्रके यज्ञके पूर्ण हो जानेपर उन देवराजका कार्य सम्पन्न करके मैं आ जाऊँगा। हे राजन्! तबतक आप समयकी प्रतीक्षा करें॥ २८—३० १/२॥ |
| राजोवाच<br>मया निमन्त्रिताश्चान्ये मुनयो यज्ञकारणात्॥ ३१<br>सम्भाराः सम्भृताः सर्वे पालयामि कथं गुरो।<br>इक्ष्वाकूणां कुले ब्रह्मन्गुरुस्त्वं वेदवित्तमः॥ ३२<br>कथं त्यक्त्वाद्य मे कार्यमुद्यतो गन्तुमाशु वै।<br>न ते युक्तं द्विजश्रेष्ठ यदुत्सृज्य मखं मम॥ ३३<br>गन्तासि धनलोभेन लोभाकुलितचेतनः। | राजा बोले—हे गुरुदेव! मैंने यज्ञके लिये दूसरे बहुत-से मुनियोंको निमन्त्रित कर दिया है तथा समस्त यज्ञीय सामग्रियाँ भी एकत्र कर ली हैं, मैं इन सबको [इतने समयतक] कैसे सुरक्षित रखूँगा ? हे ब्रह्मन्! आप इक्ष्वाकुवंशके वेदवेत्ता गुरु हैं, आज मेरा कार्य छोड़कर आप अन्यत्र जानेके लिये क्यों उद्यत हैं? हे द्विजश्रेष्ठ! यह आपके लिये उचित नहीं है जो कि लोभसे व्याकुलचित्तवाले आप मेरा यज्ञ छोड़कर अन्यत्र जा रहे हैं॥ ३१—३३ १/२॥ |
| निवारितोऽपि राज्ञा स जगामेन्द्रमखं गुरुः॥ ३४<br>राजापि विमना भूत्वा गौतमं प्रत्यपूजयत्।<br>इयाज हिमवत्पार्श्वे सागरस्य समीपतः॥ ३५<br>दक्षिणा बहुला दत्ता विप्रेभ्यो मखकर्मणि।<br>निमिना पञ्चसाहस्त्री दीक्षा तत्र कृता नृप॥ ३६<br>ऋत्विजः पूजिताः कामं धनैर्गोभिर्मुदा युताः। | राजाके इस प्रकार रोकनेपर भी वे गुरु वसिष्ठ इन्द्रके यज्ञमें चले गये। राजाने भी उदास होकर [अपना आचार्य बनाकर] गौतमऋषिका पूजन किया। उन्होंने हिमालयके पार्श्वभागमें समुद्रके निकट यज्ञ किया और उस यज्ञकर्ममें ब्राह्मणोंको बहुत दक्षिणा दी। हे राजन्! निमिने उस पाँच हजार वर्षवाले यज्ञकी दीक्षा ली और ऋत्विजोंको उनके इच्छानुसार धन और गौएँ प्रदान करके उनकी पूजा की, जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए॥ ३४—३६ १/२॥ |
| शक्रयज्ञसमाप्ते तु पञ्चवर्षशतात्मके॥ ३७<br>आजगाम वसिष्ठस्तु राज्ञः सत्रदिदृक्षया।<br>आगत्य संस्थितस्तत्र दर्शनार्थं नृपस्य च॥ ३८ | इन्द्रके पाँच सौ वर्षवाले यज्ञके समाप्त होनेपर वसिष्ठजी राजाके यज्ञको देखनेकी इच्छासे आये और आकरके राजाके दर्शनके लिये वहाँ रुके रहे॥ ३७-३८॥ |
| तदा राजा प्रसुप्तस्तु निद्रयापहतो भृशम्।<br>नासौ प्रबोधितो भृत्यैर्नागतस्तु मुनिं नृपः॥ ३९<br>वसिष्ठस्य ततो मन्युः प्रादुर्भूतोऽवमानतः।<br>अदर्शनान्निमेस्तत्र चुकोप मुनिसत्तमः॥ ४० | उस समय राजा निमि सोये हुए थे और उन्हें गहरी नींद आ गयी थी। सेवकोंने उन्हें नहीं जगाया, जिससे वे राजा मुनिके पास न आ सके। तब अपमानके कारण वसिष्ठजीको क्रोध आ गया। मिलनेके लिये निमिके न आनेसे मुनिश्रेष्ठ कुपित हो उठे। क्रोधके वशीभूत हुए |