भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| अ० १८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८१३ | | :--- | :--- |

नरकं यान्ति ते नूनं ये द्विषन्ति महेश्वरम्।<br>भक्ता मम विशालाक्षि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ ४७हे विशालनयने! मेरे जो भक्त भगवान् शंकरसे द्वेष करते हैं वे निश्चितरूपसे नरकमें पड़ते हैं; मैं यह सत्य कह रहा हूँ॥ ४७॥
इत्युक्तं देवदेवेन विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>एकान्ते किल पृष्टेन मया शैलसुताप्रिय॥ ४८<br>तस्मात्त्वां वल्लभं विष्णोर्ज्ञात्वा ध्यातवती ह्यहम्।<br>तथा कुरु महेशान यथा मे प्रियसङ्गमः॥ ४९हे गिरिजावल्लभ! एकान्तमें मेरे पूछनेपर सर्वसमर्थ देवदेव भगवान् विष्णुने ऐसा बताया था। अतएव आपको विष्णुका परम प्रिय जानकर मैंने आपका ध्यान किया। हे महेशान! अब जैसे मुझे पतिसान्निध्य प्राप्त हो जाय, वैसा आप कीजिये॥ ४८-४९॥
व्यास उवाच<br>इति श्रियो वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच महेश्वरः।<br>तामाश्वास्य प्रियैर्वाक्यैरथार्थं वाक्यकोविदः॥ ५०व्यासजी बोले— लक्ष्मीजीका यह वचन सुनकर वाणीविशारद भगवान् शंकरने मधुर वचनोंसे उन्हें आश्वासन देकर कहा—हे पृथुश्रोणि! धैर्य रखो। मैं तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न हूँ। पतिसे तुम्हारा मिलन अवश्य होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५०-५१॥
स्वस्था भव पृथुश्रोणि तुष्टोऽहं तपसा तव।<br>समागमस्ते पतिना भविष्यति न संशयः॥ ५१
अत्रैव हयरूपेण भगवाञ्जगदीश्वरः।<br>आगमिष्यति ते कामं पूर्णं कर्तुं मयेरितः॥ ५२वे भगवान् जगदीश्वर मुझसे प्रेरित होकर तुम्हारी कामना पूर्ण करनेके लिये अश्वका रूप धारण करके यहींपर आयेंगे॥ ५२॥
तथाहं प्रेरयिष्यामि तं देवं मधुसूदनम्।<br>यथासौ हयरूपेण त्वामेष्यति मदातुरः॥ ५३मैं उन मधुसूदनको इस प्रकार प्रेरित करूँगा, जिससे वे मदातुर होकर अश्वरूपमें तुम्हारे पास आयेंगे॥ ५३॥
पुत्रस्ते भविता सुभ्रु नारायणसमः क्षितौ।<br>भविष्यति स भूपालः सर्वलोकनमस्र्कृतः॥ ५४हे सुभ्रु! उन्हीं नारायणके समान तुम्हें पुत्र उत्पन्न होगा। वह पृथ्वीपर राजाके रूपमें प्रतिष्ठित तथा सभी लोगोंसे नमस्कृत होगा॥ ५४॥
सुतं प्राप्य महाभागे त्वं तेन पतिना सह।<br>गन्तासि देवि वैकुण्ठं प्रिया तस्य भविष्यसि॥ ५५हे महाभागे! इस प्रकार पुत्र प्राप्त करके तुम उन्हींके साथ वैकुण्ठलोक चली जाओगी और हे देवि! वहाँ उनकी प्रिया हो जाओगी॥ ५५॥
एकवीरेति नाम्नासौ ख्यातिं यास्यति ते सुतः।<br>तस्मात्तु हैहयो वंशो भुवि विस्तारमेष्यति॥ ५६आपका वह पुत्र एकवीर—इस नामसे लोकमें ख्याति प्राप्त करेगा। उसीसे पृथ्वीपर हैहयवंश विस्तारको प्राप्त होगा॥ ५६॥
परं तु विस्मृतासि त्वं हृदिस्थां परमेश्वरीम्।<br>मदान्धा मत्तचित्ता च तेन ते फलमीदृशम्॥ ५७<br>अतस्तद्दोषशान्त्यर्थं हृदिस्थां परदेवताम्।<br>शरणं याहि सर्वात्मभावेन जलधेः सुते॥ ५८<br>अन्यथा तव चित्तं तु कथं गच्छेद्वयोत्तमे।किंतु मदान्ध एवं मदचित्त होकर तुमने हृदयमें सदा विराजमान रहनेवाली परमेश्वरी जगदम्बाका विस्मरण कर दिया है, उसीसे तुम्हें ऐसा फल मिला है। अतः हे सिन्धुपुत्रि! उस दोषके शमनके लिये तुम हृदयमें विराजमान रहनेवाली परम देवीकी शरणमें सर्वात्मभावसे जाओ; यदि तुम्हारा मन भगवतीमें लगा होता तो उत्तम घोड़ेपर क्यों जाता?॥ ५७-५८ १/२॥
व्यास उवाच<br>इति दत्त्वा वरं देव्यै भगवाञ्छैलजापतिः॥ ५९<br>अन्तर्धानं गतः साक्षादुमया सहितः शिवः।व्यासजी बोले— इस प्रकार देवी लक्ष्मीको वरदान देकर गिरिजापति भगवान् शंकर पार्वतीसहित अन्तर्धान हो गये॥ ५९ १/२॥