भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 823

८१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९

| सापि तत्रैव चार्वङ्गी संस्थिता कमलासना॥ ६०<br><br>ध्यायन्ती चरणाम्भोजं देव्याः परमशोभनम्।<br>देवासुरशिरोरत्ननिघृष्टनखमण्डलम् ॥ ६१<br><br>प्रेमगद्गदया वाचा तुष्टाव च मुहुर्मुहुः।<br>प्रतीक्षमाणा भर्तारं हयरूपधरं हरिम्॥ ६२ | सुन्दर अंगोंवाली वे लक्ष्मीजी वहीं स्थित रहकर भगवती जगदम्बाके देवासुरोंके शिरोरत्न (मुकुट)-से घर्षित नखमण्डलवाले परम सुन्दर चरणकमलका ध्यान करने लगीं और अपने पति श्रीहरिके अश्वरूप धारण करके आनेकी प्रतीक्षा करती हुई प्रेमयुक्त गद्गद वाणीसे बार-बार उनकी स्तुति करती रहीं॥ ६०-६२॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे शिवप्रसादेन लक्ष्मीद्वारा भगवत्याः समाराधनवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥


अथैकोनविंशोऽध्यायः

भगवती लक्ष्मीको अश्वरूपधारी भगवान् विष्णुके दर्शन और उनका वैकुण्ठगमन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तस्यै दत्त्वा वरं शम्भुः कैलासं त्वरितो ययौ।<br>रम्यं देवगणैर्जुष्टमप्सरोभिश्च मण्डितम्॥ १व्यासजी बोले—उन लक्ष्मीजीको वरदान देकर भगवान् शंकर देवगणोंसे सेवित तथा अप्सराओंसे सुशोभित रमणीक कैलासपर शीघ्र चले गये॥ १॥
तत्र गत्वा चित्ररूपं गणं कार्यविशारदम्।<br>प्रेषयामास वैकुण्ठे लक्ष्मीकार्यार्थसिद्धये ॥ २वहाँ पहुँचते ही शंकरजीने लक्ष्मीका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे अपने कार्यकुशल गण चित्ररूपको वैकुण्ठ भेजा॥ २॥
शिव उवाच<br>चित्ररूप हरिं गत्वा ब्रूहि त्वं वचनान्मम।<br>यथासौ दुःखितां पत्नीं विशोकां च करिष्यति॥ ३शिवजी बोले—हे चित्ररूप! तुम विष्णुके पास जाकर मेरे शब्दोंमें यह बात कहो और इस प्रकार यत्न करना, जिससे वे अपनी दुःखी पत्नीको शोकमुक्त कर दें॥ ३॥
इत्युक्तश्चित्ररूपोऽथ निर्जगाम त्वरान्वितः।<br>वैकुण्ठं परमं स्थानं वैष्णवैश्च गणैर्वृतम्॥ ४<br><br>नानाद्रुमगणाकीर्णं वापीशतविराजितम्।<br>संजुष्टं हंसकारण्डमयूरशुककोकिलैः ॥ ५<br><br>उच्चप्रासादसंयुक्तं पताकाभिरलंकृतम्।<br>नृत्यगीतकलापूर्णं मन्दारद्रुमसंयुतम्॥ ६<br><br>बकुलाशोकतिलकचम्पकालीविमण्डितम् ।<br>कूजितैर्विहगानां तु कर्णाह्लादकरैर्युतम्॥ ७<br><br>संवीक्ष्य भवनं विष्णोर्द्वारस्थौ प्राह प्रणम्य च।<br>जयविजयनामानौ वेत्रपाणी स्थितावुभौ ॥ ८भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर वह चित्ररूप वैष्णवगणोंसे घिरे, अनेक प्रकारके वृक्षसमूहोंसे युक्त, सैकड़ों बावलियोंसे सुशोभित, हंस-सारस-मोर, शुक तथा कोकिलोंसे सुसेवित, पताकाओंसे सुशोभित ऊँचे-ऊँचे भवनोंवाले, नृत्य तथा गायनकलामें प्रवीण जनोंसे युक्त, मन्दारवृक्षोंसे परिपूर्ण, बकुल-अशोक-तिलक-चम्पक आदि वृक्षोंकी पंक्तियोंसे मण्डित तथा पक्षियोंके कर्णप्रिय कलरवोंसे गुंजित परम धाम वैकुण्ठके लिये शीघ्र ही निकल पड़ा। वहाँ भगवान् विष्णुका भवन देखकर हाथमें दण्ड (छड़ी) धारण किये हुए द्वारपर स्थित जय-विजय नामक दो द्वारपालोंको प्रणाम करके चित्ररूपने उनसे कहा—॥ ४-८॥