देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० १९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८१५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| चित्ररूप उवाच<br>भो निवेद्यतं शीघ्रं हरये परमात्मने।<br>दूतं प्राप्तं हरस्यात्र प्रेरितं शूलपाणिना॥ ९ | चित्ररूप बोला— [हे द्वारपालो!] तुमलोग शीघ्र ही भगवान् विष्णुको सूचित कर दो कि शूलपाणि शिवद्वारा भेजा गया उनका दूत यहाँ आया है॥ ९॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य जयः परमबुद्धिमान्।<br>गत्वा हरिं प्रणम्याह कृताञ्जलिपुटः पुरः॥ १०<br><br>देवदेव रमाकान्त करुणाकर केशव।<br>द्वारि तिष्ठति दूतोऽत्र शङ्करस्य समागतः॥ ११<br><br>आज्ञापय प्रवेष्टव्यो न वेति गरुडध्वज।<br>चित्ररूपधरोऽप्यस्ति न जाने कार्यगौरवम्॥ १२ | उसकी बात सुनकर परम बुद्धिमान् जय श्रीहरिके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर बोला—हे देवदेव! हे रमाकान्त! हे करुणाकर! हे केशव! भगवान् शंकरका दूत आया हुआ है; वह द्वारपर खड़ा है। हे गरुडध्वज! आप आदेश दीजिये कि उसे प्रवेश कराया जाय अथवा नहीं। उसका नाम चित्ररूप है। मैं उसके आनेका प्रयोजन नहीं जानता॥ १०—१२॥ |
| इत्याकर्ण्य हरिः प्राह जयं प्रज्ञातकारणः।<br>प्रवेशयात्र रुद्रस्य भृत्यं समयसंस्थितम्॥ १३ | ऐसा सुनकर दूतके आनेका कारण पहलेसे ही जाननेवाले भगवान् विष्णुने जयसे कहा—द्वारपर रुके हुए शंकरके भृत्यको यहाँ ले आओ॥ १३॥ |
| इत्याकर्ण्य जयस्तूर्णं गत्वा तं परमाद्भुतम्।<br>एहीत्याकारयामास जयः शङ्करसेवकम्॥ १४ | यह सुनकर शीघ्रतापूर्वक जाकर ‘अंदर आइये’—ऐसा उस शंकरसेवक परम अद्भुत चित्ररूपसे जयने कहा॥ १४॥ |
| प्रवेशितो जयेनाथ चित्ररूपस्तथाकृतिः।<br>प्रणम्य दण्डवद्विष्णुं कृताञ्जलिपुटः स्थितः॥ १५ | अपने चित्ररूप नामके समान ही आकृतिवाले उसको जयने प्रवेश कराया। तब विष्णुको साष्टांग प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर वहाँ उनके समक्ष वह खड़ा हो गया॥ १५॥ |
| दृष्ट्वा तं विस्मयं प्राप भगवान् गरुडध्वजः।<br>चित्ररूपधरं शम्भोः सेवकं विनयान्वितम्॥ १६ | विनयसे युक्त तथा विचित्र रूप धारण करनेवाले उस शम्भुसेवकको देखकर गरुडध्वज भगवान् विष्णु विस्मयमें पड़ गये॥ १६॥ |
| पप्रच्छ तं स्मितं कृत्वा चित्ररूपं रमापतिः।<br>कुशलं देवदेवस्य सकुद्रुम्बस्य चानघ॥ १७ | तत्पश्चात् रमापति विष्णुने मुसकराकर उस चित्ररूपसे पूछा—हे पुण्यात्मन्! सपरिवार देवाधिदेव शंकरजीका कुशल तो है॥ १७॥ |
| कस्मात्त्वं प्रेषितोऽस्यत्र ब्रूहि कार्यं हरस्य किम्।<br>अथवा देवतानां च किञ्चित्कार्यं समुत्थितम्॥ १८ | तुम यहाँ किसलिये भेजे गये हो, शंकरजीका कौन-सा कार्य है अथवा देवताओंका कोई काम तो नहीं आ पड़ा, मुझे बताओ॥ १८॥ |
| दूत उवाच<br>किमज्ञातं तवास्तीह संसारे गरुडध्वज।<br>वर्तमानं त्रिकालज्ञ यदहं प्रब्रवीमि वै॥ १९ | दूत बोला— हे गरुडध्वज! हे त्रिकालज्ञ! इस संसारकी कौन-सी बात आपको विदित नहीं है; तथापि इस समय जो बात है, उसे मैं आपसे कह रहा हूँ॥ १९॥ |
| प्रेषितोऽस्मि भवेनात्र विज्ञप्तुं त्वां जनार्दन।<br>हरस्य वचनाद्वाक्यं प्रब्रवीमि त्वयि प्रभो॥ २० | हे जनार्दन! उस बातको बतानेके लिये मैं शंकरजीके द्वारा यहाँ भेजा गया हूँ। हे प्रभो! शिवजीके कहे गये शब्दोंमें मैं आपसे कह रहा हूँ॥ २०॥ |