भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 825, कुल 889 में से

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पृष्ठ 825
८१६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९

| तेनोक्तमेतद्देवेश भार्या ते कमलालया।<br>तपस्तपति कालिन्दीतमसासङ्गमे विभो॥ २१ | हे देवेश! उन्होंने कहा है कि 'हे विभो! आपकी भार्या लक्ष्मीजी यमुना और तमसा नदीके संगमपर तपस्या कर रही हैं॥ २१॥ | | हयीरूपधरा देवी सर्वार्थसिद्धिदायिनी।<br>ध्यातुं योग्यामरगणैर्मानवैर्यक्षकिन्नरैः॥ २२ | देवगण, मानव, यक्ष तथा किन्नरोंके द्वारा आराधनाके योग्य एवं समस्त मनोरथ पूर्ण करनेवाली वे देवी घोड़ीका रूप धारण किये हैं॥ २२॥ | | विना तया नरः कोऽपि सुखभागी भवेन्न हि।<br>तां त्यक्त्वा पुण्डरीकाक्ष प्राप्नोषि किं सुखं हरे॥ २३ | उन देवीके बिना इस जगत्का कोई भी प्राणी सुखी नहीं रह सकता। हे पुण्डरीकाक्ष! हे हरे! उनका परित्याग करके आप कौन-सा सुख प्राप्त कर रहे हैं?॥ २३॥ | | दुर्बलोऽपि स्त्रियं पाति निर्धनोऽपि जगत्यते।<br>विनापराधं च विभो किं त्यक्ता जगदीश्वरी॥ २४ | हे जगत्पते! दुर्बल तथा निर्धन व्यक्ति भी अपनी भार्याकी रक्षा करता है। तब हे विभो! आपने बिना अपराधके ही उन जगदीश्वरीका त्याग क्यों कर दिया है?॥ २४॥ | | दुःखं प्राप्नोति संसारे यस्य भार्या जगद्गुरो।<br>धिक्त्तस्य जीवितं लोके निन्दितं त्वरिमण्डले॥ २५ | हे जगद्गुरो! जिसकी भार्या संसारमें दुःख प्राप्त करती है, उसके जीवनको धिक्कार है। ऐसा व्यक्ति शत्रुसमुदायमें निन्दित होता है॥ २५॥ | | सकामा रिपवस्तेऽद्य दृष्ट्वा तां दुःखितां भृशम्।<br>त्वां वियुक्तं च रमया हसिष्यन्ति दिवानिशम्॥ २६ | आपके स्वार्थी शत्रु इस समय लक्ष्मीजीको अत्यन्त दुःखित तथा आपको उनसे विलग देखकर दिन-रात हँसते होंगे॥ २६॥ | | रमां रमय देवेश त्वदुत्सङ्गगतां कुरु।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नां सुशीलां च सुरूपिणीम्॥ २७<br><br>सुखितो भव तां प्राप्य वल्लभां चारुहासिनीम्।<br>कान्ताविरहजं दुःखं स्मराम्यहमनातुरः॥ २८<br><br>मम भार्या मृता विष्णो दक्षयज्ञे सती यदा।<br>तदाहं दुःसहं दुःखं भुक्तवानम्बुजेक्षण॥ २९<br><br>संसारेऽस्मिन्नरः कोऽपि माभून्मत्सदृशोऽपरः।<br>मनसाकरवं शोकं तस्या विरहपीडितः॥ ३०<br><br>कालेन महता प्राप्ता मया गिरिसुता पुनः।<br>तपस्तप्त्वातिदुःसाध्यं या दग्धा तु रुषाध्वरे॥ ३१ | हे देवेश! आप सभी लक्षणोंसे सम्पन्न, सुशीला तथा सुन्दर रूपवाली लक्ष्मीजीको अपने अंकमें विराजमान कीजिये और उनके साथ आनन्द प्राप्त कीजिये। सुन्दर मुसकानवाली प्रिया लक्ष्मीको प्राप्तकर आप सुखी हो जाइये॥ २७\frac{१}{२}॥<br><br>उदास रहता हुआ मैं ही स्त्रीवियोगसे उत्पन्न दुःखको समझता हूँ। हे विष्णो! हे कमलनयन! जब मेरी भार्या सती दक्षके यज्ञमें मृत हो गयी थी तब मुझे असहनीय दुःख भोगना पड़ा था। उसके विरहसे पीड़ित होकर मैं मनमें यह शोक करता था कि इस संसारमें मेरे-जैसा कोई अन्य व्यक्ति न हो। जो सती क्रोधवश दक्षके यज्ञमें जलकर भस्म हो गयी थी, उसे मैंने बहुत समयतक कठोर तपस्या करके गिरिजाके रूपमें पुनः प्राप्त किया था॥ २८-३१॥ | | हरे किं सुखमापन्नं त्वया सन्त्यज्य कामिनीम्।<br>एकाकी तिष्ठता कालं सहस्रवत्सरात्मकम्॥ ३२ | हे हरे! आपने अपनी भार्याको छोड़कर एक हजार वर्षकी अवधितक अकेले रहते हुए कौन-सा सुख प्राप्त कर लिया?॥ ३२॥ |

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