भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 826, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 826

| अ० १९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८१७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गत्वाश्वास्य महाभागां समानय निजालयम्।<br>माभूत्कोऽपीह संसारे विमुक्तो रमया तया॥ ३३अतः आप महाभागा लक्ष्मीके पास जायें और उन्हें आश्वासन देकर अपने घर ले आयें। इस संसारमें कोई भी प्राणी उन रमा (लक्ष्मी)-से विमुक्त न होने पाये॥ ३३॥
कृत्वा तुरगरूपं त्वं भज तां कमलालयाम्।<br>उत्पाद्य पुत्रमायुष्मंस्तामानय शुचिस्मिताम्॥ ३४हे आयुष्मन्! आप अभी अश्वरूप धारण करके पवित्र मुस्कानवाली लक्ष्मीके पास जाइये और पुत्र उत्पन्न करके उन्हें [वैकुण्ठ] ले आइये॥ ३४॥
व्यास उवाच<br>हरिराकर्ण्य तद्वाक्यं चित्ररूपस्य भारत।<br>तथेत्युक्त्वा तु तं दूतं प्रेषयामास शङ्करम्॥ ३५व्यासजी बोले— हे भारत! चित्ररूपकी वह बात सुनकर भगवान् विष्णुने 'ठीक है'—ऐसा कहकर उस दूतको शंकरजीके पास भेज दिया॥ ३५॥
गते दूतेऽथ भगवान्वैकुण्ठात्कामसंयुतः।<br>जगाम धृत्वा तत्राशु वाजिरूपं मनोहरम्॥ ३६<br><br>यत्र सा वडवारूपं कृत्वा तपति सिन्धुजा।<br>विष्णुस्तं देशमासाद्य तामपश्यद्धयीं स्थिताम्॥ ३७<br><br>सापि तं वीक्ष्य गोविन्दं हयरूपधरं पतिम्।<br>ज्ञात्वा वीक्ष्य स्थिता साध्वी विस्मिता साश्रुलोचना॥ ३८तत्पश्चात् दूतके चले जानेपर भगवान् विष्णु मनोहर अश्वरूप धारणकर कामयुक्त होकर शीघ्र ही वैकुण्ठसे वहींपर पहुँचे जहाँ घोड़ीका रूप धारणकर सिन्धुतनया लक्ष्मीजी तपस्या कर रही थीं। विष्णुजीने उस स्थानपर पहुँचकर हयरूपधारिणी लक्ष्मीजीको विराजमान देखा। अश्वका रूप धारण किये हुए अपने पति गोविन्दको देखते ही लक्ष्मीजीने भी उन्हें पहचान लिया और वे साध्वी विस्मयमें पड़कर अश्रुपूरित नेत्रोंसे देखती हुई वहीं खड़ी रहीं॥ ३६–३८॥
तयोस्तु सङ्गमस्तत्र प्रवृत्तो मन्मथार्तयोः।<br>कालिन्दीतमसासङ्गे पावने लोकविश्रुते॥ ३९यमुना और तमसाके लोकप्रसिद्ध पवित्र संगमपर कामार्त उन दोनोंका समागम हुआ॥ ३९॥
सगर्भा सा तदा जाता वडवा हरिवल्लभा।<br>सुषुवे सुन्दरं बालं तत्रैव सुगुणोत्तरम्॥ ४०इस प्रकार वडवारूपधारिणी वे विष्णुप्रिया गर्भवती हो गयीं और वहींपर उन्होंने सद्गुणोंसे सम्पन्न तथा सुन्दर पुत्रको जन्म दिया॥ ४०॥
तामाह भगवान्वाक्यं प्रहस्य समयाश्रितम्।<br>त्यजाद्य वाडवं देहं पूर्वदेहा भवाधुना॥ ४१भगवान् विष्णुने हँसकर उनसे यह समयोचित बात कही—तुम अब अपना यह अश्वीरूप छोड़ दो और पहले जैसा शरीर धारण कर लो॥ ४१॥
गमिष्यावः स्ववैकुण्ठमावां कृत्वा निजं वपुः।<br>तिष्ठत्वत्र कुमारोऽयं त्वया जातः सुलोचने॥ ४२हे सुलोचने! हम दोनों अपनी दिव्य देह धारण करके अपने वैकुण्ठधाम चलेंगे और तुमसे उत्पन्न यह कुमार अब यहीं रहे॥ ४२॥
लक्ष्मीरुवाच<br>स्वदेहसम्भवं पुत्रं कथं हित्वा व्रजाम्यहम्।<br>स्नेहः सुदुस्त्यजः कामं स्वात्मजस्य सुरर्षभ॥ ४३लक्ष्मीजी बोलीं— हे देवश्रेष्ठ! अपने शरीरसे उत्पन्न पुत्रको छोड़कर मैं कैसे जाऊँ? अपने पुत्रके प्रति स्नेहका त्याग अत्यन्त ही कठिन है॥ ४३॥
का गतिः स्यादमेयात्मन् बालस्यास्य नदीतटे।<br>अनाथस्यासमर्थस्य विजनेऽल्पतनोरिह॥ ४४हे अमेयात्मन्! इस निर्जन नदीतटपर इस लघुकाय, अनाथ तथा असमर्थ बालककी क्या गति होगी?॥ ४४॥
देवी भागवत महापुराण · पृष्ठ 826, कुल 889 में से · BharatKosha