देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 827, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| अनाश्रयं सुतं त्यक्त्वा कथं गन्तुं मनो मम।<br>समर्थं सदयं स्वामिन् भवेदम्बुजलोचन ॥ ४५ | हे कमलनयन! हे स्वामिन्! इस आश्रयहीन पुत्रको छोड़कर मेरा दयालु मन यहाँसे जानेके लिये भला कैसे तैयार हो सकता है ? ॥ ४५ ॥ | | दिव्यदेहौ ततो जातौ लक्ष्मीनारायणावुभौ।<br>विमानवरसंविष्टौ स्तूयमानौ सुरैर्दिवि ॥ ४६ | तत्पश्चात् लक्ष्मीजी तथा भगवान् विष्णु दोनों दिव्य शरीर धारणकर उत्तम विमानपर विराजमान हुए; देवगण अन्तरिक्षमें उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४६ ॥ | | गन्तुकामं पतिं प्राह कमला कमलापतिम्।<br>गृहाणेमं सुतं नाथ नाहं शक्तास्मि हापितुम् ॥ ४७<br><br>प्राणप्रियोऽस्ति मे पुत्रः कान्त्या त्वत्सदृशः प्रभो।<br>गृहीत्वैनं गमिष्यावो वैकुण्ठं मधुसूदन ॥ ४८ | वैकुण्ठके लिये प्रस्थान करनेके इच्छुक भगवान् विष्णुसे लक्ष्मीजीने कहा—हे नाथ! मैं इस पुत्रका त्याग नहीं कर सकती, अतएव इसे भी साथ ले लीजिये। हे प्रभो! मेरा यह प्राणके समान प्रिय पुत्र कान्तिमें आपके सदृश है। हे मधुसूदन! इसे लेकर हम दोनों वैकुण्ठ चलेंगे ॥ ४७-४८ ॥ | | हरिरुवाच<br>मा विषादं प्रिये कर्तुं त्वमर्हसि वरानने।<br>तिष्ठत्वयं सुखेनात्र रक्षा मे विहिता त्विह ॥ ४९ | **हरि बोले—**हे प्रिये! हे वरानने! इस पुत्रके विषयमें शोक करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। यह सुखपूर्वक यहीं रहे; मैंने इसकी रक्षाका उपाय कर दिया है ॥ ४९ ॥ | | कार्यं किमपि वामोरु वर्तते महदद्भुतम्।<br>निबोध कथयाम्यद्य सुतस्यात्र विमोचने ॥ ५० | हे वामोरु! इस पुत्रके यहाँ छोड़नेके पीछे कोई महान् तथा आश्चर्यजनक कारण छिपा है। मैं उसे बता रहा हूँ; तुम जान लो ॥ ५० ॥ | | तुर्वसुर्नाम विख्यातो ययातितनूजो भुवि।<br>हरिवर्मेति पित्रास्य कृतं नाम सुविश्रुतम् ॥ ५१<br><br>स राजा पुत्रकामोऽद्य तपस्तपति पावने।<br>तीर्थे वर्षशतं जातं तस्य वै कुर्वतस्तपः ॥ ५२<br><br>तस्यार्थे निर्मितः पुत्रो मयायं कमलालये।<br>तत्र गत्वा नृपं सुभ्रु प्रेषयिष्यामि साम्प्रतम् ॥ ५३<br><br>तस्मै दास्याम्यहं पुत्रं पुत्रकामाय कामिनि।<br>गृहीत्वा स्वगृहं राजा प्रापयिष्यति बालकम् ॥ ५४ | इस पृथ्वीपर ययातिके पुत्र तुर्वसु नामक एक प्रसिद्ध राजा हैं। उनके पिताने उनका लोक-प्रसिद्ध हरिवर्मा—यह नाम रखा था। इस समय पुत्रकी कामनावाले वे नरेश एक पवित्र तीर्थमें तपस्या कर रहे हैं। उन्हें तप करते हुए पूरे एक सौ वर्ष बीत चुके हैं। हे कमलालये! उन्हींके लिये मैंने यह पुत्र उत्पन्न किया है। हे सुभ्रु! वहाँ राजाके पास जाकर मैं उन्हें इसी समय भेज दूँगा। हे प्रिये! पुत्रके अभिलाषी उन्हीं राजाको मैं यह पुत्र दे दूँगा और वे इस बालकको लेकर अपने घर चले जायँगे ॥ ५१—५४ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्याश्वास्य प्रियां पद्मां कृत्वा रक्षां च बालके।<br>विमानवरमारुह्य प्रययौ प्रियया सह ॥ ५५ | **व्यासजी बोले—**इस प्रकार अपनी प्रिय भार्याको आश्वासन देकर तथा बालककी रक्षाका प्रबन्ध करके भगवान् विष्णु उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर अपनी प्रियाके साथ चले गये ॥ ५५ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे पुत्रजन्मानन्तरं स्वस्वरूपेण वैकुण्ठगमनवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
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