भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० २० ]षष्ठ स्कन्ध८२१

| तस्माच्चम्पक मुञ्चैनं राजा प्राप्नोतु पुत्रकम्।<br>एकवीरेति नाम्नायं ख्यातः स्यात् पृथिवीतले॥ २४ | अतएव हे चम्पक! इस बालकको छोड़ आओ, जिससे राजा पुत्र प्राप्त कर लें। यह पृथ्वीलोकमें 'एकवीर'—इस नामसे प्रसिद्ध होगा॥ २४॥ | | व्यास उवाच | व्यासजी बोले— | | इति तस्य वचः श्रुत्वा चम्पकस्त्वरयान्वितः।<br>जगाम पुत्रमादाय स्थले तस्मिन्महीपते॥ २५<br>मुमोच बालकं तत्र यत्र पूर्वं स्थितो ह्यभूत्।<br>आरुह्य स्वविमानं तु ययौ स्वाश्रममण्डलम्॥ २६ | हे राजन्! इन्द्रकी यह बात सुनकर चम्पक शीघ्रतापूर्वक उस बालकको लेकर उस स्थानपर पहुँच गया। बालक पहले जहाँ पड़ा हुआ था, वहींपर उसने बालकको रख दिया और अपने विमानपर चढ़कर अपने स्थानको लौट गया॥ २५-२६॥ | | तदैव कमलाकान्तो लक्ष्म्या सह जगद्गुरुः।<br>विमानवरमारूढो जगाम नृपतिं प्रति॥ २७ | इसके तुरंत बाद कमलाकान्त जगद्गुरु भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर राजाके यहाँ पहुँचे॥ २७॥ | | दृष्टस्तदा तेन नृपेण विष्णुः<br>समुत्तरंस्तत्र विमानमुख्यात्।<br>जहर्ष राजा हरिदर्शनेन<br>पपात भूमौ खलु दण्डवच्च॥ २८ | उस समय राजा हरिवर्माने भगवान् विष्णुको उत्तम विमानसे उतरते हुए देखा। भगवान्‌के दर्शनसे राजा अत्यन्त हर्षित हुए और दण्डकी भाँति उनके समक्ष पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २८॥ | | उत्तिष्ठ वत्सेति हरिः पतन्त-<br>माश्वासयद्भूमिगतं स्वभक्तम्।<br>सोऽप्युत्सुको वासुदेवं पुरःस्थं<br>तुष्टाव भक्त्या मुखरीकृतोऽथ॥ २९ | 'हे वत्स! उठो'—ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने भूमिपर पड़े हुए अपने भक्तको आश्वासन दिया। इसके बाद राजा हरिवर्मा भी उल्लसित होकर अपने सामने खड़े वासुदेवकी भक्तिपूर्वक स्पष्ट वाणीमें स्तुति करने लगे—॥ २९॥ | | देवाधिदेवाखिललोकनाथ<br>कृपानिधे लोकगुरो रमेश।<br>मन्दस्य मे ते किल दर्शनं य-<br>त्सुदुर्लभं योगिजनैरलभ्यम्॥ ३० | हे देवाधिदेव! हे अखिललोकनाथ! हे कृपानिधे! हे लोकगुरो! हे रमेश! आपका जो दर्शन योगिजनोंके लिये भी अलभ्य है, वह मुझ अज्ञानीके लिये तो अत्यन्त ही दुर्लभ था॥ ३०॥ | | ये निःस्पृहास्ते विषयैरपेता-<br>स्तेषां त्वदीयं खलु दर्शनं स्यात्।<br>आशापरोऽहं भगवन्ननन्त<br>योग्यो न ते दर्शने देवदेव॥ ३१ | जो लोग कामनारहित तथा विषयोंसे मुक्त हैं, उन्हें ही आपका दर्शन हो सकता है। हे भगवन्! हे अनन्त! हे देवदेव! केवल आशापरायण मैं वास्तवमें आपके दर्शनके योग्य नहीं था॥ ३१॥ | | इति स्तुतस्तेन नृपेण विष्णु-<br>स्तमाह वाक्येन सुधामयेन।<br>वृणीष्व राजन् मनसेप्सितं ते<br>ददामि तुष्टस्तपसा तवेति॥ ३२ | इस प्रकार उन राजाके स्तुति करनेपर भगवान् विष्णुने अमृतमयी वाणीमें उनसे कहा—हे राजन्! मैं तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न हूँ। अतः मैं तुम्हें मनोवांछित वरदान दूँगा; तुम माँग लो॥ ३२॥ | | ततो नृपस्तं प्रणिपत्य पादयोः<br>प्रोवाच विष्णुं पुरतः स्थितं च।<br>तपस्तु तप्तं हि मया सुतार्थे<br>पुत्रं ददस्वात्मसमं मुरारे॥ ३३ | तत्पश्चात् राजाने अपने सामने स्थित विष्णुके चरणोंमें सिर झुकाकर उनसे कहा—हे मुरारे! मैंने पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या की है। अतएव आप मुझे अपने ही सदृश पुत्र दीजिये॥ ३३॥ |