भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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८२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा नृपप्रार्थितमादिदेव-<br>स्तमाह राजानममोघवाक्यम्।<br>ययातिसूनो व्रज तत्र तीर्थे<br>कलिन्दकन्यातमसाप्रसङ्गे ॥ ३४<br>मयाद्य पुत्रस्तु यथेप्सितस्ते<br>तत्रैव मुक्तोऽस्त्यमितप्रभावः।<br>लक्ष्म्याः प्रसूतो मम वीर्यजश्च<br>कृतस्तवार्थेऽथ गृहाण राजन्॥ ३५राजाकी प्रार्थना सुनकर आदिदेव भगवान् विष्णुने राजासे सार्थक वचन कहा—हे ययातिनन्दन! तुम इसी समय यमुना तथा तमसा नदीके उस पावन संगम तीर्थपर चले जाओ। हे राजन्! आप जैसा पुत्र चाहते हैं, वैसा ही पुत्र मैंने वहाँ रख दिया है। मेरे तेजसे प्रादुर्भूत वह पुत्र अमित प्रभाववाला है तथा लक्ष्मीजीने उसे उत्पन्न किया है। तुम्हारे लिये ही उसकी उत्पत्ति की गयी है, अतः तुम उसे ग्रहण करो॥ ३४-३५॥
श्रुत्वा हरेर्वाक्यमतीव मृष्टं<br>सन्तुष्टचित्तः प्रबभूव राजा।<br>हरिस्तु दत्त्वेति वरं जगाम<br>वैकुण्ठलोकं रमया युतश्च॥ ३६भगवान् विष्णुकी अत्यन्त मधुर वाणी सुनकर राजाके मनमें प्रसन्नता हुई। राजाको यह वरदान देकर भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ वैकुण्ठ चले गये॥ ३६॥
गते हरौ सोऽथ ययातिसूनु-<br>र्ययावनुद्घातरथेन राजा।<br>प्रेमान्वितस्तत्र सुतोऽस्ति यत्र<br>वचो निशम्येति जनार्दनस्य॥ ३७भगवान् विष्णुके चले जानेपर उन जनार्दनकी बात सुनकर आनन्दविभोर ययातिनन्दन राजा हरिवर्मा एक अप्रतिहत गति वाले रथपर आरूढ़ होकर उस स्थानपर गये, जहाँ बालक स्थित था॥ ३७॥
स तत्र गत्वातिमनोहरं तं<br>ददर्श बालं भुवि खेलमानम्।<br>मुखे निवेश्यैककरेण कृत्वा<br>श्लक्ष्णं पदाङ्गुष्ठमनन्यसत्त्वः॥ ३८वहाँ पहुँचनेपर परम तेजस्वी राजाने उस अति मनोहर बालकको एक हाथसे पैरका कोमल अँगूठा मुखमें डालकर भूमिपर खेलता हुआ देखा॥ ३८॥
तं वीक्ष्य पुत्रं मदनस्वरूपं<br>नारायणांशं कमलाप्रसूतम्।<br>हरिप्रभावं हरिवर्मनामा<br>हर्षप्रफुल्लाननपङ्कजोऽभूत् ॥ ३९<br>गृह्णन् सुवेगात् करपङ्कजाभ्यां<br>बभूव प्रेमार्णवमग्नदेहः।<br>मूर्ध्न्युपाघ्राय मुदान्वितोऽसौ<br>ननन्द राजा सुतमालिङ्ग ॥ ४०लक्ष्मीजीसे उत्पन्न भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप तथा उन्हींके समान प्रभावशाली एवं कामदेवके सदृश रूपवान् उस पुत्रको देखकर राजा हरिवर्माका मुखारविन्द हर्षसे खिल उठा। उस बालकको अपने करकमलोंसे बड़ी तेजीसे उठाते हुए राजा हरिवर्मा प्रेमसागरमें मग्न हो गये। प्रसन्नतापूर्वक उसका मस्तक सूँघकर उन राजाने पुत्रका आलिंगन किया और अत्यन्त आनन्द प्राप्त किया॥ ३९-४०॥
मुखं समीक्ष्यातिमनोहरं त-<br>मुवाच नेत्राम्बुनिरुद्धकण्ठः।<br>दत्तोऽसि देवेन जनार्दनेन<br>मात्रा हि पुत्रावमदुःखभीतेः॥ ४१<br>तप्तं मया पुत्र तपस्त्वदर्थे<br>सुदुष्करं वर्षशतं च पूर्णम्।<br>तेनैव तुष्टेन रमाप्रियेण<br>दत्तोऽसि संसारसुखोदयाय॥ ४२उस बालकका अत्यन्त मनोहर मुख देखकर प्रेमके अश्रुसे रुँधे कण्ठवाले राजाने उससे कहा—हे पुत्र! भगवान् विष्णु तथा माता लक्ष्मीके द्वारा तुम मेरे लिये प्रदान किये गये हो। हे पुत्र! नरकभोगके दुःखसे भयभीत होकर मैंने तुम्हारे लिये पूरे सौ वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या की है। उसी तपसे प्रसन्न होकर रमाकान्त विष्णुने सांसारिक सुख भोगनेके लिये तुम्हें पुत्ररूपमें मुझे प्रदान किया है॥ ४१-४२॥