देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 835, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
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| मुनीनामाश्रमान् दिव्यान् वेदध्वनिनिनादितान्।<br>होमधूमावृताकाशान् मृगशावसमावृतान्॥ १९<br><br>केदाराञ्छालिसम्पक्वान् गोपिकाभिः सुरक्षितान्।<br>प्रफुल्लपङ्कजारामान्निनुकुञ्जांश्च मनोरमान्॥ २०<br><br>प्रेक्षमाणः प्रियालांस्तु चम्पकान् पनसद्रुमान्।<br>बकुलांस्तिलकान्नीपान् मन्दारांश्च प्रफुल्लितान्॥ २१<br><br>शालांस्तालांस्तमालांश्च जम्बूचूतकदम्वकान्।<br>स गच्छञ्जाह्नवीतोये प्रफुल्लं शतपत्रकम्॥ २२<br><br>पङ्कजं चातिगन्धाढ्यमपश्यदवनीपतिः।<br>दक्षिणे जलजस्याथ पार्श्वे कमललोचनाम्॥ २३<br><br>कनकाभां सुकेशीं च कम्बुग्रीवां कृशोदरीम्।<br>बिम्बोष्ठीं सुन्दरीं किञ्चित्समुद्गतसुपयोधराम्॥ २४<br><br>सुनासां चारुसर्वाङ्गीमपश्यत् कन्यकां नृपः।<br>रुदतीं तां सखीं त्यक्त्वा विह्वलां दुःखपीडिताम्॥ २५<br><br>साश्रुनेत्रां क्रन्दमानां विजने कुररीमिव।<br>संवीक्ष्य राजा पप्रच्छ कन्यकां शोककारणम्॥ २६ | दिव्य मुनि-आश्रमों; गोपिकाओंके द्वारा सुरक्षित तथा पके हुए शालिधान्यसे युक्त खेतों; विकसित कमलोंसे सुशोभित अनेक सरोवरों तथा मनको आकर्षित करनेवाले निकुंजोंको देखा। उन राजा एकवीरने प्रियाल, चम्पक, कटहल, बकुल, तिलक, नीप, पुष्पित मन्दार, शाल, ताल, तमाल, जामुन, आम और कदम्बके आदि वृक्षोंको देखते हुए कुछ दूर आगे जानेपर गंगाके जलमें उत्कृष्ट गन्धयुक्त एक खिला हुआ शतदल कमल देखा। राजाने उस कमलके दक्षिण भागमें कमलसदृश नेत्रोंवाली, स्वर्णके समान कान्तिवाली, सुन्दर केश-पाशवाली, शंखतुल्य गर्दनवाली, कृश कटिप्रदेशवाली, बिम्बाफलके समान ओष्ठवाली, किंचित् स्फुट पयोधरवाली, मनोहर नासिकावाली तथा समस्त सुन्दर अंगोंवाली एक सुन्दरी कन्याको देखा। अपनी सखीसे बिछुड़ जानेसे व्याकुल होकर दुःखपूर्वक विलाप करती हुई, निर्जन वनमें आँखोंमें आँसू भरकर कुररी पक्षीकी भाँति क्रन्दन करती हुई उस कन्याको देखकर राजा एकवीरने उससे शोकका कारण पूछा॥ १७—२६॥ | | सुनसे ब्रूहि कासि त्वं कस्य पुत्री शुभानने।<br>गन्धर्वी देवकन्याथ कथं रोदिषि सुन्दरि॥ २७ | हे सुन्दर नासिकावाली! तुम कौन हो? हे सुमुखि! तुम किसकी पुत्री हो? तुम गन्धर्वकन्या हो अथवा देवकन्या? हे सुन्दरि! तुम क्यों रो रही हो? यह मुझे बताओ॥ २७॥ | | कथमेकाकिनी बाले त्यक्ता केन पिकस्वरे।<br>पतिस्ते क्व गतः कान्ते पिता वा ब्रूहि साम्प्रतम्॥ २८ | हे बाले! तुम यहाँ अकेली क्यों हो? हे पिकस्वरे! तुम्हें यहाँ किसने छोड़ दिया है? हे प्रिये! तुम्हारे पति अथवा पिता इस समय कहाँ चले गये हैं? मुझे बताओ॥ २८॥ | | किं ते दुःखमरालभ्रु कथयाद्य ममान्तिके।<br>करोमि दुःखनाशं ते सर्वथैव कृशोदरि॥ २९ | हे वक्र भौंहोंवाली! तुम्हें क्या दुःख है? उसे मेरे सामने अभी व्यक्त करो। हे कृशोदरि! मैं सब प्रकारसे तुम्हारा दुःख दूर करूँगा॥ २९॥ | | न राज्ये मम तन्वङ्गि पीडां कोऽपि करोत्यलम्।<br>न भयं चौरजं कान्ते न राक्षसभयं तथा॥ ३० | हे तन्वंगि! मेरे राज्यमें कोई भी प्राणी किसीको पीड़ा नहीं पहुँचा सकता और हे कान्ते! कहीं न तो चोरोंका भय है और न राक्षसोंका ही भय है॥ ३०॥ | | मयि शासति भूपाले नोत्पाता दारुणा भुवि।<br>भयं न व्याघ्रसिंहेभ्यो न भयं कस्यचिद्द्भवेत्॥ ३१ | मुझ नरेशके शासन करते हुए इस पृथ्वीपर भीषण उत्पात नहीं हो सकते; बाघ अथवा सिंहसे किसीको भय नहीं हो सकता और किसीको कोई भी भय नहीं रहता॥ ३१॥ | | वद वामोरु कस्मात्त्वं विलापं जाह्नवीतटे।<br>करोषि त्राणहीनात्र किं ते दुःखं वदस्व मे॥ ३२ | हे वामोरु! असहाय होकर तुम गंगातटपर क्यों विलाप कर रही हो, तुम्हें क्या दुःख है? मुझे बताओ॥ ३२॥ |