देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० २१] षष्ठ स्कन्ध ८२७
| संस्कृत | हिन्दी |
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| हन्त्यहं दुःखमत्युग्रं प्राणिनां पृथिवीतले।<br>दैवं च मानुषं कान्ते व्रतमेतन्ममाद्भुतम्॥ ३३<br>विशाललोचने ब्रूहि करोमि तव चिन्तितम्। | हे कान्ते! मैं जगत्के प्राणियोंके अत्यन्त भीषण दैविक तथा मानुषिक कष्टको भी दूर करता हूँ; यह मेरा अद्भुत व्रत है। हे विशालनयने! बताओ, मैं तुम्हारा वांछित कार्य करूँगा॥ ३३ ½ ॥ |
| इत्युक्ते वचने राज्ञा श्रुत्वोवाच मृदुस्वना॥ ३४<br>शृणु राजेन्द्र वक्ष्यामि मम शोकस्य कारणम्।<br>विपत्तिरहितः प्राणी कथं रोदिति भूपते॥ ३५<br>प्रब्रवीमि महाबाहो यदर्थं रुदती त्वहम्।<br>तव राज्यादन्यदेशे राजा परमधार्मिकः॥ ३६<br>रैभ्यो नाम महाराजः सन्तानरहितो भृशम्।<br>तस्य भार्या सुविख्याता रुक्मरेखेति नामतः॥ ३७<br>सुरूपा चतुरा साध्वी सर्वलक्षणसंयुता।<br>अपुत्रा दुःखिता कान्तमित्युवाच पुनः पुनः॥ ३८<br>किं जीवितेन मे नाथ धिग्वृथा जीवितं मम।<br>वन्ध्यायाः सुखहीनाया ह्यपुत्राया धरातले॥ ३९ | राजाके ऐसा कहनेपर उसे सुनकर मधुरभाषिणी कन्याने कहा—हे राजेन्द्र! सुनिये, मैं आपको अपने शोकका कारण बता रही हूँ। हे राजन्! विपदारहित प्राणी भला क्यों रोयेगा? हे महाबाहो! मैं जिसलिये रो रही हूँ, वह आपको बता रही हूँ। आपके राज्यसे भिन्न दूसरे देशमें रैभ्य नामक एक महान् धार्मिक राजा हैं, वे महाराज सन्तानहीन हैं, उनकी पत्नी रुक्मरेखा—इस नामसे प्रसिद्ध हैं। वे परम रूपवती, बुद्धिमती, पतिव्रता तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं। पुत्रहीन होनेसे दुःखित रहनेके कारण वे अपने पतिसे बार-बार कहा करती थीं—हे नाथ! मेरे इस जीवनसे क्या लाभ? इस जगत्में मुझ वन्ध्या, पुत्रहीन तथा सुखरहित नारीके इस व्यर्थ जीवनको धिक्कार है॥ ३४—३९॥ |
| इत्येवं भार्यया भूपः प्रेरितो मखमुत्तमम्।<br>चकार ब्राह्मणांस्तज्ज्ञानाहूय विधिवत्तदा॥ ४० | इस प्रकार अपनी भार्यासे प्रेरणा पाकर राजा रैभ्यने यज्ञके ज्ञाता ब्राह्मणोंको बुलाकर विधिवत् उत्तम यज्ञ सम्पन्न किया॥ ४०॥ |
| पुत्रकामो धनं भूरि ददावथ यथोदितम्।<br>हूयमाने घृतेऽत्यर्थं पावकादतिसुप्रभात्॥ ४१<br>आविर्बभूव चार्वङ्गी कन्यका शुभलक्षणा।<br>बिम्बोष्ठी सुदती सुभ्रूः पूर्णचन्द्रनिभानना॥ ४२<br>कनकाभा सुकेशान्ता रक्तपाणितला मृदुः।<br>सुरक्तनयना तन्वी रक्तपादतला भृशम्॥ ४३ | पुत्राभिलाषी राजा रैभ्यने शास्त्रोक्त रीतिसे प्रचुर धन दान दिया। घृतकी आहुति अधिक पड़ते रहनेसे तीव्र प्रभायुक्त अग्निसे सुन्दर अंगोंवाली, शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, बिम्बाफलके समान ओष्ठवाली, सुन्दर दाँतों तथा भौंहोंवाली, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली, स्वर्णके समान आभावाली, सुन्दर केशोंवाली, रक्त हथेलियोंवाली, कोमल, सुन्दर लाल नेत्रोंवाली, कृश शरीरवाली तथा रक्त पादतल [तलवे]-वाली एक कन्या प्रकट हुई॥ ४१—४३॥ |
| हुताशनात्समुद्भूता होत्रा सा स्वीकृता तदा।<br>होता प्रोवाच राजानं गृहीत्वा तां सुमध्यमाम्॥ ४४<br>राजन् पुत्रीं गृहाणेमां सर्वलक्षणसंयुताम्।<br>एकावलीव सम्भूता हूयमानाद्धुताशनात्॥ ४५ | तब होताने अग्निसे उत्पन्न हुई उस कन्याको स्वीकार कर लिया। इसके बाद उस सुन्दर कन्याको लेकर होताने राजा रैभ्यसे कहा—हे राजन्! समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न इस पुत्रीको ग्रहण कीजिये। हवन करते समय अग्निसे उत्पन्न यह कन्या मोतियोंकी मालाके समान प्रतीत होती है। अतः हे राजन्! यह |