भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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८२८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २१

| नाम्ना चैकावली लोके ख्याता पुत्री भविष्यति।<br>सुखितो भव भूपाल पुत्र्या पुत्रसमानया॥ ४६<br><br>सन्तोषं कुरु राजेन्द्र दत्ता देवेन विष्णुना।<br>होतुर्वाक्यं नृपः श्रुत्वा दृष्ट्वा तां कन्यकां शुभाम्॥ ४७<br><br>जग्राह परमप्रीतो होत्रा दत्तां सुसम्मताम्।<br>गृहीत्वा नृपतिस्तां तु ददौ पत्न्यै वराननाम्॥ ४८<br><br>आभाष्य रुक्मरेखायै गृहाण सुभगे सुताम्।<br>सा तां कमलपत्राक्षीं प्राप्य कन्यां मनोरमाम्॥ ४९<br><br>जहर्ष मुदिता राज्ञी पुत्रं प्राप्य यथासुखम्।<br>चकार मङ्गलं कर्म जातकर्मादिकं शुभम्॥ ५०<br><br>पुत्रजन्मसमुत्थं यत्तत्सर्वं विधिवत्ततः।<br>समाप्य च मखं राजा द्विजेभ्यो दक्षिणां शुभाम्॥ ५१<br><br>दत्त्वा विसृज्य विप्रेन्द्रान् मुदं प्राप महीपतिः।<br>दिने दिनेऽसितापाङ्गी पुत्रवृद्ध्या भृशं बभौ॥ ५२<br><br>मुदं च परमां प्राप नृपभार्या सुतान्विता।<br>उत्सवस्तद्दिने तस्य प्रवृत्तः सुतजन्मजः॥ ५३<br><br>पुत्री पुत्रसमात्यर्थं बभूव वल्लभा किल।<br>राज्ञो मन्त्रिसुता चाहं सुबुद्धे मन्मथाकृते॥ ५४<br><br>यशोवती च मे नाम समानं वय आवयोः।<br>वयस्याहं कृता राज्ञा क्रीडनाय तया सह॥ ५५<br><br>सदा सहचरी जाता प्रेमयुक्ता दिवानिशम्।<br>एकावली गन्धवन्ति यत्र पद्मानि पश्यति॥ ५६<br><br>तत्र सा रमते बाला नान्यत्र सुखमाप्नुयात्।<br>सुदूरे जाह्नवतीरे भवन्ति कमलान्यपि॥ ५७ | पुत्री जगत्में 'एकावली' नामसे प्रसिद्ध होगी। पुत्रतुल्य इस कन्याको प्राप्तकर आप सुखी हो जायें। हे राजेन्द्र! सन्तोष कीजिये; भगवान् विष्णुने आपको यह कन्या दी है॥ ४४–४६ १/२॥<br><br>होताकी बात सुनकर राजाने उस सुन्दर कन्याकी ओर देखकर होताके द्वारा प्रदत्त उस कन्याको अति प्रसन्न होकर ले लिया। राजाने सुन्दर मुखवाली उस कन्याको ले करके अपनी पत्नी रुक्मरेखाको यह कहकर दे दिया कि हे सुभगे! इस कन्याको स्वीकार करो। कमलपत्रके समान नेत्रोंवाली उस मनोहर कन्याको पाकर रानी बहुत हर्षित हुईं; वे ऐसी सुखी हो गयीं मानो उन्हें पुत्र प्राप्त हो गया हो॥ ४७–४९ १/२॥<br><br>तत्पश्चात् राजाने उसके जातकर्म आदि सभी शुभ मंगल कार्य सम्पन्न किये तथा पुत्रजन्मके अवसरपर होनेवाले जो कुछ भी कार्य थे, वे सब उन्होंने विधिपूर्वक सम्पन्न कराये। यज्ञ सम्पन्न करके राजा रैभ्य ब्राह्मणोंको विपुल दक्षिणा देकर तथा सभी विप्रेन्द्रोंको विदाकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ ५०–५१ १/२॥<br><br>श्याम नेत्रोंवाली वह कन्या पुत्रवृद्धिके समान दिनोंदिन बढ़ने लगी। उसे देखकर उस समय रानी अपनेको पुत्रवती समझकर परम आनन्दित हुई। उस दिन महलमें ऐसा उत्सव मनाया गया, जैसा पुत्रजन्मके अवसरपर मनाया जाता है। वह पुत्री उन दोनोंके लिये पुत्रके ही सदृश प्रिय हो गयी॥ ५२–५३ १/२॥<br><br>हे सुबुद्धे! हे कामदेवसदृश रूपवाले! मैं उन्हीं राजा रैभ्यके मन्त्रीकी पुत्री हूँ। मेरा नाम यशोवती है। मेरी तथा एकावलीकी अवस्था समान है। उसके साथ खेलनेके लिये राजाने मुझे उसकी सखी बना दिया। इस प्रकार मैं उसकी सहचरी बनकर प्रेमपूर्वक दिन-रात उसके साथ रहने लगी॥ ५४–५५ १/२॥<br><br>एकावली जहाँ भी सुगन्धित कमल देखती थी, वह बाला वहीं खेलने लग जाती थी; अन्यत्र कहीं भी उसे सुख नहीं मिलता था। [एक बार] गंगाके तटपर बहुत दूर कमल खिले हुए थे। राजकुमारी एकावली सखियोंसहित मेरे साथ घूमती हुई वहाँ |