देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० २२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यस्यैषा वल्लभा पुत्री न किं जानाति तां हृताम्।<br>नोद्यमः किं कृतस्तेन ततो मोचनहेतवे॥ ४२ | जिसकी ऐसी प्रिय पुत्री हो, क्या वह उसके हरणको नहीं जानता? और फिर उसने एकावलीकी मुक्तिके लिये क्या कोई प्रयास नहीं किया? ॥ ४२॥ |
| बन्दीकृतां सुतां ज्ञात्वा कथं तिष्ठति सुस्थिरः।<br>असमर्थो नृपः किं वा कारणं ब्रूहि सत्वरम्॥ ४३ | अपनी पुत्रीको बन्दी बनाया गया जाननेके बाद भी राजा स्थिरचित्त होकर कैसे चुप बैठे हैं? अथवा राजा कुछ कर पानेमें असमर्थ तो नहीं हैं? मुझे इसका कारण शीघ्र बताओ॥ ४३॥ |
| त्वया मेऽपहृतं चेतो गुणानुक्त्वा ह्यमानुषान्।<br>सख्याः पङ्कजपत्राक्षि कृतः कामवशो भृशम्॥ ४४ | हे कमलनयने! तुमने अपनी सखीके अलौकिक गुणोंको बताकर मेरे चित्तको हर लिया है तथा मैं पूर्ण-रूपसे कामके वशीभूत कर दिया गया हूँ॥ ४४॥ |
| कदा पश्यामि तां कान्तां मोचयित्वातिसङ्कटात्।<br>इति मे हृदयं चाद्य करोत्यतिमनोरथम्॥ ४५ | अब तो मेरे मनकी यही अभिलाषा है कि उस प्रियाको इस महान् संकटसे मुक्त करके मैं उसे कब देख लूँ॥ ४५॥ |
| ब्रूहि मे गमनोपायं पुरे तस्यातिदुर्गमे।<br>कथं त्वमागता तस्मात्सङ्कटादत्र तद्वद॥ ४६ | अब उस दानवके अत्यन्त दुर्गम नगरमें जानेका उपाय मुझे बताओ और यह भी बताओ कि उस महान् संकटसे छूटकर तुम यहाँ कैसे आयी? ॥ ४६॥ |
| यशोवत्युवाच<br>बालभावान्मया मन्त्रो भगवत्या विशांपते।<br>प्राप्तोऽस्ति ब्राह्मणात्सिद्धात्सबीजध्यानपूर्वकः॥ ४७ | यशोवती बोली—हे राजन्! मैंने बाल्यावस्थासे ही एक सिद्ध ब्राह्मणसे बीज तथा ध्यानसहित भगवतीका मन्त्र प्राप्त किया है॥ ४७॥ |
| तत्रावस्थितया राजन् मया चित्ते विचारितम्।<br>आराधयामि सततं चण्डिकां चण्डविक्रमाम्॥ ४८<br><br>सा देवी सेविता कामं बन्धमोक्षं करिष्यति।<br>भक्तानुकम्पिनी शक्तिः समर्था सर्वसाधने॥ ४९<br><br>या विश्वं सृजते शक्त्या पालयत्येव सा पुनः।<br>कल्पान्ते संहरत्येव निराकारा निराश्रया॥ ५०<br><br>इति सञ्चिन्त्य मनसा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्।<br>ध्यात्वा रक्ताम्बरां सौम्यां सुरक्तनयनां हृदि॥ ५१<br><br>संस्मृत्य मनसा रूपं मन्त्रजाप्यपराभवम्।<br>उपासिता मया देवी मासमेकं समाधिना॥ ५२ | हे राजन्! जब मैं कालकेतुके यहाँ थी तभी मैंने अपने मनमें सोचा कि अब मैं प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिकाकी निरन्तर आराधना करूँ। वे भगवती पूर्णरूपसे आराधित होनेपर निश्चितरूपसे मुझे इस बन्धनसे मुक्त करेंगी; क्योंकि भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाली वे शक्तिस्वरूपा चण्डिका सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। जो निराकार तथा निरालम्ब भगवती अपनी शक्तिसे जगत्का सृजन करती हैं तथा पालन करती हैं, वे ही कल्पके अन्तमें उसका संहार भी कर देती हैं। मनमें ऐसा सोचकर मैं विश्वकी अधिष्ठात्री, कल्याणकारिणी, लाल वस्त्र धारण करनेवाली, सौम्य विग्रहवाली तथा सुन्दर रक्त नयनोंवाली भगवतीका ध्यान करके मन-ही-मन उनके रूपका स्मरण करके मन्त्रका जप करनेमें तत्पर हो गयी। इस प्रकार मैं समाधि लगाकर एक माहतक भगवती जगदम्बाकी उपासना करती रही॥ ४८–५२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—27 A