देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 843, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 843
| ८३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
|---|
| स्वप्ने मम समायाता भक्तिभावेन तोषिता।<br>मामाहामृतया वाचा किं सुप्तासीति चण्डिका॥ ५३<br><br>उत्तिष्ठ याहि तरसा गङ्गातीरं मनोहरम्।<br>आगमिष्यति तत्रासौ हैहयो नृपपुङ्गवः॥ ५४<br><br>एकवीरो महाबाहुः सर्वशत्रुविमर्दनः।<br>दत्तात्रेयेण मन्मन्त्रो महाविद्याभिधः परः॥ ५५<br><br>दत्तोऽस्मै सोऽपि सततं मामुपास्तेऽतिभक्तितः।<br>मय्यासक्तमतिर्नित्यं मम पूजापरायणः॥ ५६<br><br>मामेव सर्वभूतेषु ध्यायन्नास्ते च मत्परः।<br>स ते दुःखविनाशं वै करिष्यति महामतिः॥ ५७<br><br>मासुतो विहरंस्तत्र तव त्राता भविष्यति।<br>हत्वा तं राक्षसं घोरं मोचयिष्यति मानिनीम्॥ ५८<br><br>एकावलीमेकवीरः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>पश्चात्सैव पतिः कार्यस्त्वया राजसुतः शुभः॥ ५९ | तत्पश्चात् मेरे भक्तिभावसे प्रसन्न होकर देवी चण्डिकाने मुझे स्वप्नमें दर्शन दिया और अमृतमयी वाणीमें मुझसे कहा—‘तुम सोयी क्यों हो? उठो और तत्काल गङ्गाजीके मनोहर तटपर चली जाओ; वहींपर विशाल भुजाओंवाले तथा सभी शत्रुओंका दमन करनेवाले नृपश्रेष्ठ हैहय एकवीर आयेंगे। दत्तात्रेयजीने महाविद्या नामक मेरा श्रेष्ठ मन्त्र उन्हें प्रदान किया है। वे भी भक्तिपूर्वक निरन्तर मेरी उपासना करते रहते हैं। उनका मन सदा मुझमें लगा रहता है तथा वे सदा मेरी पूजामें रत रहते हैं। मेरे प्रति आसक्तिभाव रखनेवाले वे सभी प्राणियोंमें एकमात्र मुझे ही देखते हुए सदा मेरे ही परायण रहते हैं। वे महामति एकवीर ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे। वे लक्ष्मीपुत्र एकवीर घूमते हुए गङ्गातटपर आकर तुम्हारी रक्षा करेंगे और उस भयानक राक्षस कालकेतुका वध करके मानिनी एकावलीको मुक्त करेंगे। इसके बाद तुम समस्त शास्त्रोंमें निष्णात उन्हीं सुन्दर राजकुमार एकवीरके साथ एकावलीका विवाह करवा देना’॥ ५३-५९॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी प्रबुद्धाहं तदैव हि।<br>कथितं स्वप्नवृत्तान्तं देव्याश्चाराधनं तथा॥ ६० | ऐसा कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं और मैं उसी समय जग गयी। तत्पश्चात् मैंने स्वप्नका वृत्तान्त तथा देवीकी आराधनाकी बात एकावलीको बतायी॥ ६०॥ |
| प्रसन्नवदना जाता श्रुत्वा सा कमलेक्षणा।<br>विशेषेण च सन्तुष्टा मामुवाच शुचिस्मिता॥ ६१<br><br>गच्छ तत्र त्वरायुक्ता कुरु कार्यं मम प्रिये।<br>सत्यवाक्या भगवती सावां मोक्षं विधास्यति॥ ६२ | सारी बातें सुनकर उस कमलनयनीके मुख-मण्डलपर प्रसन्नता छा गयी। अत्यन्त सन्तुष्ट होकर पवित्र मुसकानवाली एकावलीने मुझसे कहा—हे प्रिये! तुम वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ और मेरा कार्य सिद्ध करो। जो भगवती सत्य वाणीवाली हैं, वे हम दोनोंको मुक्त करेंगी॥ ६१-६२॥ |
| इत्याज्ञप्ता तया चाहं सख्या वै प्रेमयुक्तया।<br>मत्वोपसरणं युक्तं तस्मात्स्थानात्तदा नृप॥ ६३<br><br>चालिताहं ततः शीघ्रं महादेवीप्रसादतः।<br>मार्गज्ञानं शीघ्रगतिर्मया प्राप्ता नृपात्मज॥ ६४ | हे राजन्! सखी एकावलीके इस प्रकार प्रेमपूर्वक आदेश देनेपर उस समय प्रस्थान कर देना उचित समझकर मैं उस स्थानसे तुरंत चल पड़ी। हे राजकुमार! भगवती जगदम्बाकी कृपासे मार्गकी जानकारी तथा द्रुतगतिसे चलनेकी क्षमता मुझे प्राप्त हो गयी थी॥ ६३-६४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—27 B