भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 847, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 847

८३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

संस्कृतहिन्दी
तानाज्ञाप्य कालकेतुः पप्रच्छ प्रणयान्वितः ॥ ३१<br>एकावलीं समीपस्थां विवशां भृशदुःखिताम्।<br>कोऽयमायाति तन्वङ्गि पिता ते वापरो पुमान् ॥ ३२<br>त्वदर्थे सैन्यसंयुक्तो ब्रूहि सत्यं कृशोदरि।<br>पिता ते यदि सम्प्राप्तो नेतुं त्वां विरहातुरः ॥ ३३<br>ज्ञात्वा ते पितरं सम्यक् संग्रामं न करोम्यहम्।<br>आनयित्वा गृहे पूजां रत्नैर्वस्त्रैर्हयैः शुभैः ॥ ३४<br>करोमि तस्य चातिथ्यं गृहे प्राप्तस्य सर्वथा।<br>अन्यश्चेद्यदि सम्प्राप्तस्तं हन्मि निशितैः शरैः ॥ ३५<br>आनीतः किल कालेन मरणाय महात्मना।<br>तस्माद्वद विशालाक्षि कोऽयमायाति मन्दधीः ॥ ३६<br>अज्ञात्वा मां दुराधर्षं कालरूपं महाबलम्।उन्हें आज्ञा देकर कालकेतुने अपने निकट बैठी हुई अत्यन्त विवश तथा दुःखित एकावलीसे विनयप्रता-पूर्वक पूछा—'हे तन्वंगि! तुम्हें लेनेके लिये सेनासहित यह कौन आ रहा है? ये तुम्हारे पिता हैं अथवा कोई अन्य पुरुष? हे कृशोदरि! सच-सच बताओ। यदि विरहसे व्यथित होकर तुम्हारे पिता तुम्हें लेनेके लिये आ रहे हों, तो यह जानकर कि ये तुम्हारे पिता हैं, मैं इनके साथ युद्ध नहीं करूँगा, अपितु उन्हें घर लाकर उनकी पूजा करूँगा तथा बहुमूल्य रत्न, वस्त्र तथा अश्व भेंट करके घरमें आये हुए उनका विधिवत् आतिथ्य करूँगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति आया होगा तो मैं अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसे मार डालूँगा। निश्चित ही महान् कालने उसे मरनेके लिये यहाँ ला दिया है। अतएव हे विशाल नयनोंवाली! मुझ अपराजेय, कालरूप तथा अपार बलसम्पन्नके विषयमें न जानकर यह कौन मन्दमति चला आ रहा है? यह तुम मुझे बताओ' ॥ ३१-३६ ½ ॥
एकावल्युवाच<br>न जानेऽहं महाभाग कोऽयमायाति सत्वरः ॥ ३७<br>न मेऽस्ति विदितः कोऽपि स्थितायास्तव बन्धने।<br>नायं पिता मे न भ्राता कोऽप्यन्योऽस्ति महाबलः ॥ ३८<br>किमर्थमिह चायाति नाहं वेद विनिश्चयम्।एकावली बोली—हे महाभाग! मैं यह नहीं जानती कि इतनी तेजीसे यह कौन आ रहा है? आपके बन्धनमें पड़ी हुई मैं नहीं जानती कि यह कौन है? ये न तो मेरे पिता हैं और न मेरे भाई ही। यह दूसरा ही कोई महान् पराक्रमी पुरुष है, यह किसलिये यहाँ आ रहा है, यह भी मैं निश्चितरूपसे नहीं जानती ॥ ३७-३८ ½ ॥
दैत्य उवाच<br>एवं वदन्त्यमी दूता वयस्या ते यशोवती ॥ ३९<br>समानीय च तं वीरमागतेति कृतोद्यमा।<br>क्व गता सा सखी कान्ते विदग्धा कार्यनिश्चये ॥ ४०<br>नान्यः कोऽपि ममारातिर्यो मे प्रतिबलो भवेत्।दैत्य बोला—ये दूत तो कह रहे हैं कि तुम्हारी सखी यशोवती ही प्रयत्नपूर्वक उस वीरको साथमें लेकर आयी है। हे कान्ते! कार्य सिद्ध करनेमें अत्यन्त चतुर तुम्हारी वह सखी कहाँ गयी? कोई अन्य मेरा शत्रु भी नहीं है, जो मेरा विरोधी हो ॥ ३९-४० ½ ॥
व्यास उवाच<br>एतस्मिन्नन्तरे दूतास्तत्रान्ये वै समागताः ॥ ४१<br>ते होचुस्त्वरिता भीताः कालकेतुं गृहे स्थितम्।<br>किं स्वस्थोऽसि महाराज समीपे सैन्यमागतम् ॥ ४२<br>निर्गच्छ नगरात्तूर्णं सैन्येन महतावृत्तः।<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा कालकेतुर्महाबलः ॥ ४३<br>रथमारुह्य त्वरितो निर्ययौ स्वपुराद् बहिः।व्यासजी बोले—इसी बीच दूसरे दूत वहाँ आ गये। भयभीत उन दूतोंने महलमें बैठे कालकेतुसे तुरंत कहा—हे महाराज! आप निश्चिन्त क्यों हैं? शत्रुसेना समीप आ पहुँची है। आप एक विशाल सेनाके साथ शीघ्र ही नगरसे बाहर निकलिये। उनकी यह बात सुनकर महान् बलशाली कालकेतु शीघ्र ही रथपर चढ़कर अपने नगरसे बाहर निकल गया ॥ ४१-४३ ½ ॥