देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 848, कुल 889 में से
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अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३९
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एकवीरोऽपि सहसा हयारूढः प्रतापवान् ॥ ४४<br>आगतस्तत्र कामिन्या विरहेण समाकुलः।<br>युद्धं तयोरभूत्तत्र वृत्रवासवयोरिव ॥ ४५<br>शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् । | कामिनी एकावलीके विरहसे व्याकुल प्रतापी एकवीर भी घोड़ेपर आरूढ़ होकर अचानक वहींपर आ गया। उन दोनोंका वृत्रासुर तथा इन्द्रकी भाँति युद्ध होने लगा। उस युद्धमें छोड़े गये विविध अस्त्र-शस्त्रोंसे दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं ॥ ४४-४५ १/२ ॥ |
| वर्तमाने तदा युद्धे कातराणां भयावहे ॥ ४६<br>गदया ताडयामास दैत्यं सिन्धुसुतासुतः।<br>स गतासुः पपातोर्व्यां वज्राहत इवाचलः ॥ ४७<br>पलायित्वा गताः सर्वे राक्षसा भयपीडिताः। | भीरुजनोंको भयभीत कर देनेवाले उस युद्धमें लक्ष्मीपुत्र एकवीरने दानव कालकेतुपर अपनी गदासे प्रहार किया। गदाप्रहारसे वह कालकेतु वज्रसे आहत पर्वतकी भाँति प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब भयभीत होकर अन्य सभी राक्षस भाग गये ॥ ४६-४७ १/२ ॥ |
| यशोवती ततो गत्वा वेगादेकावलीं तदा ॥ ४८<br>उवाच मधुरां वाणीं विस्मितां मुदिता भृशम्।<br>एह्यालि नृपपुत्रेण दानवोऽसौ निपातितः ॥ ४९<br>एकवीरेण धीरेण युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ।<br>स्कन्धावारेऽप्यसौ राजा तिष्ठत्यद्य श्रमातुरः ॥ ५०<br>दर्शनं काङ्क्षमाणस्ते श्रुतरूपगुणस्तव ।<br>पश्य तं कुटिलापाङ्गि मनोभवसमं नृपम् ॥ ५१<br>कथिता त्वं मया पूर्वं तस्याग्रे जाह्नवीतटे ।<br>पूर्णानुरागः सञ्जातस्तेनासौ विरहातुरः ॥ ५२<br>वाञ्छति त्वां चारुरूपां द्रष्टुं नृपतिनन्दनः। | तत्पश्चात् यशोवतीने विस्मयमें पड़ी एकावलीके पास जाकर प्रसन्नतापूर्वक मधुर वाणीमें उससे कहा— हे सखि ! इधर आओ। कालकेतुके साथ भीषण युद्ध करके धीरतासम्पन्न राजकुमार एकवीरने उस राक्षसको मार गिराया है। इस समय वे राजकुमार एकवीर थक जानेके कारण अपने शिविरमें विद्यमान हैं। तुम्हारे रूप तथा गुणोंके विषयमें सुनकर वे तुम्हारा दर्शन करना चाहते हैं। हे कुटिलापांगि ! कामदेवसदृश उन राजकुमारको तुम देखो। मैं उनसे तुम्हारे विषयमें गंगातटपर पहले ही बता चुकी हूँ। इससे तुम्हारे प्रति उनका पूर्ण अनुराग हो जानेके कारण वे विरहातुर राजकुमार अब तुझ सुन्दर रूपवालीका दर्शन करना चाहते हैं ॥ ४८-५२ १/२ ॥ |
| सा तस्या वचनं श्रुत्वा गमनाय मनो दधे ॥ ५३<br>लज्जमाना भृशं भीत्या कौमारं प्राप्तया तया ।<br>कथं तस्य मुखं द्रक्ष्ये कुमारी ह्यवशा भृशम् ॥ ५४<br>स मां गृह्णाति कामार्त इति चिन्ताकुला सती ।<br>यशोवत्या युता तत्र नरयानस्थिता ययौ ॥ ५५<br>स्कन्धावारेऽतिमलिना मलिनाम्बरधारिणी । | यशोवतीकी बात सुनकर उसने वहाँ जानेका मन बना लिया। कुमारी अवस्थामें होनेके कारण वह भयवश लज्जित हो रही थी। [वह सोचने लगी] मैं एक अत्यन्त विवश कुमारी कन्या उनका मुख कैसे देखूँगी ? वह साध्वी एकावली इस बातसे चिन्तित हो उठी कि वे कामासक्त राजकुमार मुझे ग्रहण कर लेंगे। तब वह एकावली मलिन वस्त्र धारण करके अत्यन्त उदास होकर पालकीमें बैठकर यशोवतीके साथ उनके शिविरमें पहुँच गयी ॥ ५३-५५ १/२ ॥ |
| तामागतां विशालाक्षीं दृष्ट्वा राजसुतोऽब्रवीत् ॥ ५६<br>दर्शनं देहि तन्वङ्गि तृषिते नयने मम । | उस विशाल नयनोंवाली एकावलीको वहाँ आयी हुई देखकर राजकुमारने उससे कहा—हे तन्वंगि ! मुझे दर्शन दो। मेरे नेत्र तुम्हारे दर्शनके लिये तृष्णाकुल हैं ॥ ५६ १/२ ॥ |