भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 849, कुल 889 में से

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पृष्ठ 849

८४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३

| कामातुरं च तं वीक्ष्य तां च लज्जाभरावृताम् ॥ ५७ <br><br> नीतिज्ञा शिष्टमार्गज्ञा तमुवाच यशोवती ।<br>राजपुत्र पिताप्यस्यास्त्वामेनां दातुमिच्छति ॥ ५८ <br><br> एषापि त्वद्वशा नूनं भविता सङ्गमस्तव ।<br>कालं प्रतीक्ष्य राजेन्द्र नयैनां पितुरन्तिकम् ॥ ५९ <br><br> स विवाहविधिं कृत्वा दास्यतीति विनिश्चयः । | एकवीरको कामातुर तथा एकावलीको लज्जासे युक्त देखकर नीतिका ज्ञान रखनेवाली तथा श्रेष्ठजनोंके मार्गका अनुसरण करनेवाली यशोवतीने उस एकवीरसे कहा—हे राजकुमार! इसके पिता भी इसे आपको ही देना चाहते हैं। यह एकावली भी आपके वशीभूत है; इसलिये इसके साथ आपका मिलन अवश्य होगा, किंतु हे राजेन्द्र! कुछ समय प्रतीक्षा करके पहले इसे इसके पिताके पास पहुँचा दीजिये। वे विधिपूर्वक विवाह करके इसे आपको निश्चितरूपसे सौंप देंगे॥ ५७-५९ १/२॥ | | स तस्या वचनं तथ्यं मत्वा सैन्यसमन्वितः ॥ ६० <br><br> समेतः कामिनीभ्यां तु ययौ तत्पितुराश्रमम् । | यशोवतीकी बातको उचित मानकर उन दोनों कन्याओं—एकावली तथा यशोवतीको साथमें लेकर सेनासहित वे राजकुमार एकवीर उसके पिताके स्थानपर पहुँचे॥ ६० १/२॥ | | राजपुत्रीं तथायातां श्रुत्वा प्रेमसमन्वितः ॥ ६१ <br><br> प्रययौ सम्मुखस्तूर्णं सचिवैः परिवेष्टितः ।<br>बहुभिर्दिवसैर्दृष्टा पुत्री सा मलिनाम्बरा ॥ ६२ <br><br> यशोवत्या तु वृत्तान्तः कथितो विस्तरात्पुनः ।<br>एकवीरं मिलित्वासौ गृहानीय चादरात् ॥ ६३ <br><br> पुण्येऽह्नि कारयामास विवाहं विधिपूर्वकम् ।<br>पारिबर्हं ततो दत्त्वा सम्पूज्य विधिवत्तदा ॥ ६४ <br><br> पुत्रीं विसर्जयामास यशोवत्या समन्विताम् । | राजपुत्रीको आयी हुई सुनकर राजा रैभ्य प्रेमपूर्वक मन्त्रियोंके साथ उसके सम्मुख शीघ्रतासे पहुँच गये। मलिन वस्त्र धारण की हुई उस पुत्रीको राजाने बहुत दिनोंके बाद देखा, पुनः यशोवतीने रैभ्यको सारा वृत्तान्त विस्तारके साथ बताया। तत्पश्चात् एकवीरसे मिलकर राजा रैभ्य उन्हें आदरपूर्वक घर ले आये। पुनः उन्होंने शुभ दिनमें विधिविधानसे दोनोंका विवाह सम्पन्न कराया। तदुपरान्त राजाने पर्याप्त वैवाहिक उपहार देकर एकवीरको भलीभाँति सम्मानित करके पुत्रीको यशोवतीसहित विदा कर दिया॥ ६१-६४ १/२॥ | | एवं विवाहे संवृत्ते रमापुत्रो मुदान्वितः ॥ ६५ <br><br> गृहं प्राप्य बहून्भोगान्बुभुजे प्रियया समम् ।<br>बभूव तस्यां पुत्रस्तु कृतवीर्याभिधः किल ।<br>तत्सूनुः कार्तवीर्यस्तु वंशोऽयं कथितो मया ॥ ६६ | इस प्रकार विवाह हो जानेपर लक्ष्मीपुत्र एकवीर हर्षित हो गये और घर पहुँचकर अपनी भार्या एकावलीके साथ नानाविध सुखोपभोग करने लगे। यथासमय उस एकावलीसे कृतवीर्य नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्य हुए। इस प्रकार मैंने आपसे इस हैहयवंशका वर्णन कर दिया॥ ६५-६६॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीरैकावल्योर्विवाहवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

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