देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० २४ ] षष्ठ स्कन्ध ८४१
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके जन्मकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजोवाच<br>भगवंस्त्वन्मुखाम्भोजाच्च्युतं दिव्यकथारसम्।<br>न तृप्तिमधिगच्छामि पिबंस्तु सुधया समम्॥ १ | राजा बोले— हे भगवन्! आपके मुखारविन्दसे निर्गत इस अमृततुल्य दिव्य कथारसका निरन्तर पान करते रहनेपर भी मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ॥ १॥ |
| विचित्रमिदमाख्यानं कथितं भवता मम।<br>हैहयानां समुत्पत्तिर्विस्तराद्विस्मयप्रदा॥ २ | आपके द्वारा मुझसे यह विचित्र आख्यान विस्तारपूर्वक कहा गया; हैहयवंशी राजाओंकी उत्पत्ति तो अत्यन्त आश्चर्यजनक है॥ २॥ |
| परं कौतूहलं मेऽत्र यद्विष्णुः कमलापतिः।<br>देवदेवो जगन्नाथः सृष्टिस्थित्यन्तकारकः॥ ३<br><br>सोऽप्यश्वभावमापन्नो भगवान्हरिरच्युतः।<br>परतन्त्रः कथं जातः स्वतन्त्रः पुरुषोत्तमः॥ ४<br><br>एतन्मे संशयं ब्रह्मञ्छेत्तुमर्हसि साम्प्रतम्।<br>सर्वज्ञस्त्वं मुनिश्रेष्ठ ब्रूहि वृत्तान्तमद्भुतम्॥ ५ | मुझे इस विषयमें महान् कौतूहल हो रहा है कि देवाधिदेव जगत्पति लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णु स्वयं जगत्के उत्पत्तिकर्ता, पालनकर्ता तथा संहर्ता हैं; उन्हें भी अश्वरूप धारण करना पड़ गया? सर्वथा स्वतन्त्र रहनेवाले वे अच्युत पुरुषोत्तम भगवान् हरि परतन्त्र कैसे हो गये? हे ब्रह्मन्! इस समय मेरे इस सन्देहका निवारण करनेमें आप पूर्ण समर्थ हैं। हे मुनिवर! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव इस अद्भुत वृत्तान्तका वर्णन कीजिये॥ ३–५॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि सन्देहस्यास्य निर्णयम्।<br>यथा श्रुतं मया पूर्वं नारदान्मुनिसत्तमात्॥ ६ | व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, इस सन्देहका निर्णय पूर्व समयमें मैंने मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे जैसा सुना है, वैसा ही आपको बता रहा हूँ॥ ६॥ |
| ब्रह्मणो मानसः पुत्रो नारदो नाम तापसः।<br>सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सर्वलोकप्रियः कविः॥ ७ | नारदजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। वे तपस्वी, सर्वज्ञानी, सर्वत्र गमन करनेवाले, शान्त, समस्त लोकोंके प्रिय एवं मनीषी हैं॥ ७॥ |
| स चैकदा मुनिश्रेष्ठो विचरन्पृथिवीमिमाम्।<br>वादयन्महतीं वीणां स्वरतानसमन्विताम्॥ ८<br><br>बृहद्रथन्तरादीनां साम्नां भेदाननेकशः।<br>गायन्गायत्रममृतं सम्प्राप्तोऽथ ममाश्रमम्॥ ९<br><br>शम्याप्रासं महातीर्थं सरस्वत्याः सुपावनम्।<br>निवासं मुनिमुख्यानां शर्मदं ज्ञानदं तथा॥ १० | एक बार वे मुनिवर नारद स्वर तथा तानसे युक्त अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए तथा सामगानके बृहद्रथन्तर आदि अनेक भेदों और अमृतमय गायत्र-सामका गान करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करते हुए मेरे आश्रमपर पहुँचे। वह शम्याप्रास महातीर्थ सरस्वतीके पावन तटपर विराजमान है। कल्याण और ज्ञान प्रदान करनेवाला वह तीर्थ प्रधान ऋषियोंका निवासस्थान है॥ ८–१०॥ |
| तमागतमहं प्रेक्ष्य ब्रह्मपुत्रं महाद्युतिम्।<br>अभ्युत्थानादिकं सर्वं कृतवानर्चनादिकम्॥ ११ | ब्रह्माजीके पुत्र महान् तेजस्वी नारदजीको अपने आश्रममें आया देखकर मैं उठकर खड़ा हो गया और मैंने भलीभाँति उनकी पूजा आदि की॥ ११॥ |