देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ८४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अर्घ्यपाद्याविधिं कृत्वा तस्यासनस्थितस्य च।<br>उपविष्टः समीपेऽहं मुनेरमिततेजसः॥ १२॥ | अर्घ्य तथा पाद्य आदिसे उनका विधिपूर्वक पूजन करके आदरपूर्वक आसनपर विराजमान उन अमित तेजस्वी नारदके समीप मैं बैठ गया॥ १२॥ |
| दृष्ट्वा विश्रमिणं शान्तं नारदं ज्ञानपारदम्।<br>तमपृच्छमहं राजन् यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना॥ १३॥ | हे राजन्! तत्पश्चात् ज्ञानके पार पहुँचानेमें समर्थ मुनि नारदको मार्गश्रमसे रहित तथा शान्तचित्त देखकर मैंने उनसे वही प्रश्न पूछा था, जो आपने इस समय मुझसे पूछा है॥ १३॥ |
| असारेऽस्मिंस्तु संसारे प्राणिनां किं सुखं मुने।<br>न पश्यामि विनिश्चित्य कदाचित्कुत्रचित्क्वचित्॥ १४॥ | [मैंने उनसे पूछा—] हे मुने! इस सारहीन जगत्में प्राणियोंको क्या सुख प्राप्त होता है ? विचार करनेपर मुझे तो कभी भी, कहीं भी तथा कुछ भी सुख नहीं दिखायी देता है॥ १४॥ |
| द्वीपे जातो जनन्याहं संत्यक्तस्तत्क्षणादपि।<br>अनाश्रयो वने वृद्धिं प्राप्तः कर्मानुसारतः॥ १५॥ | मुझे ही देखिये, एक द्वीपमें जन्म लेते ही मेरी माताने मेरा त्याग कर दिया। तभीसे आश्रयहीन रहता हुआ मैं वनमें अपने कर्मके अनुसार बढ़ने लगा॥ १५॥ |
| तपस्तप्तं मया चोग्रं पर्वते बहुवार्षिकम्।<br>पुत्रकामेन देवर्षे शङ्करः समुपासितः॥ १६॥ | हे देवर्षे! तत्पश्चात् मैंने पुत्रप्राप्तिकी कामनासे एक पर्वतपर बहुत वर्षोंतक शंकरजीकी उपासना करते हुए कठोर तपस्या की॥ १६॥ |
| ततो मया शुकः प्राप्तः पुत्रो ज्ञानवतां वरः।<br>पाठितस्तु मया सम्यग्वेदानां सार आदितः॥ १७॥ | तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ शुकदेव मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हुए। मैंने उन्हें आरम्भसे लेकर सम्यक् प्रकारसे वेदोंका सारभूत तत्त्व पढ़ा दिया॥ १७॥ |
| स त्यक्त्वा मां गतः क्वापि रुदन्तं विरहातुरम्।<br>लोकाल्लोकान्तरं साधो वचनात्तव बोधितः॥ १८॥ | हे साधो! आपके वचनोंसे ज्ञान प्राप्त करके मेरा वह पुत्र मुझ विरहातुरको रोता हुआ छोड़कर लोकलोकान्तरमें कहीं चला गया ?॥ १८॥ |
| ततोऽहं पुत्रसन्तप्तस्त्यक्त्वा मेरुं महागिरिम्।<br>मातरं मनसा कृत्वा सम्प्राप्तः कुरुजाङ्गलम्॥ १९॥ | तब पुत्रविरहसे सन्तप्त मैं महापर्वत सुमेरुको छोड़कर अपनी माताको मनमें याद करते हुए कुरुजांगल प्रदेशमें पहुँचा॥ १९॥ |
| पुत्रस्नेहादतितरां कृशाङ्गः शोकसंयुतः।<br>जानन्मिथ्येति संसारं मायापाशनियन्त्रितः॥ २०॥ | संसार मिथ्या है—ऐसा जानते हुए भी मायापाशमें बँधा हुआ मैं पुत्र-स्नेहके कारण शोकाकुल रहनेसे अत्यन्त दुर्बल शरीरवाला हो गया॥ २०॥ |
| ततो राज्ञा वृतां ज्ञात्वा मातरं वासवीं शुभाम्।<br>स्थितोऽत्रैवाश्रमं कृत्वा सरस्वत्यास्तटे शुभे॥ २१॥ | तत्पश्चात् जब मैंने यह जाना कि वासवराजसुता मेरी कल्याणमयी माताका राजा शन्तनुने वरण कर लिया है, तब मैं सरस्वतीके पवित्र तटपर आश्रम बनाकर रहने लगा॥ २१॥ |
| शन्तनुः स्वर्गतिं प्राप्तो विधुरा जननी स्थिता।<br>पुत्रद्वययुता साध्वी भीष्मेण प्रतिपालिता॥ २२॥ | इसके बाद महाराज शन्तनुके स्वर्ग प्राप्त कर लेनेपर मेरी माँ विधवा हो गयीं। तब भीष्मने दो पुत्रोंवाली मेरी माताका पालन किया॥ २२॥ |