भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| अ० २४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८४३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चित्राङ्गदः कृतो राजा गङ्गापुत्रेण धीमता।<br>कालेन सोऽपि मे भ्राता मृतः कामसमद्युतिः॥ २३बुद्धिमान् गङ्गापुत्र भीष्मने चित्रांगदको राजा बनाया। किंतु कुछ ही समयमें कामदेवके सदृश कान्तिमान् मेरे भाई चित्रांगद भी मृत्युको प्राप्त हो गये॥ २३॥
ततः सत्यवती माता निमग्ना शोकसागरे।<br>चित्राङ्गदं मृतं पुत्रं रुरोद भृशमातुरा॥ २४पुत्र चित्रांगदके मर जानेपर मेरी माता सत्यवती अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगीं और नित्य शोकके समुद्रमें निमग्न रहने लगीं॥ २४॥
सम्प्राप्तोऽहं महाभाग ज्ञात्वा तां दुःखितां सतीम्।<br>आश्वासिता मयात्यर्थं भीष्मेण च महात्मना॥ २५हे महाभाग! उन पतिव्रताको दुःखित जानकर मैं उनके पास गया। वहाँ मैंने तथा महात्मा भीष्मने उन्हें बहुत सान्त्वना दी॥ २५॥
विचित्रवीर्यस्त्वपरो वीर्यवान्पृथिवीपतिः।<br>कृतो भीष्मेण भ्राता वै स्त्रीराज्यविमुखेन ह॥ २६तब स्त्री तथा राज्यसे विमुख भीष्मने अपने दूसरे भाई पराक्रमी विचित्रवीर्यको राजा बना दिया॥ २६॥
काशिराजसुते रम्ये विजित्य पृथिवीपतीन्।<br>भीष्मेणानीय स्वबलात्कन्यके द्वे समर्पिते॥ २७<br><br>सत्यवत्यै शुभे काले विवाहः परिकल्पितः।<br>भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य तदाहं सुखितोऽभवम्॥ २८तत्पश्चात् भीष्मने अपने बलसे राजाओंको जीतकर काशिराजकी दो सुन्दर पुत्रियोंको लाकर माता सत्यवतीको समर्पित कर दिया। पुनः शुभ मुहूर्तमें जब भाई विचित्रवीर्यका विवाह सम्पन्न हो गया तब मैं बहुत प्रसन्न हुआ॥ २७-२८॥
पुनः सोऽपि मृतो भ्राता यक्ष्मणा पीडितो भृशम्।<br>अनपत्यो युवा धन्वी माता मे दुःखिताभवत्॥ २९कुछ ही समयमें मेरे धनुर्धर भाई विचित्रवीर्य भी यक्ष्मा रोगसे ग्रस्त होकर युवावस्थामें ही निःसन्तान मर गये, जिससे मेरी माता दुःखित हुईं॥ २९॥
काशिराजसुते द्वे तु मृतं दृष्ट्वा पतिं तदा।<br>पतिव्रताधर्मपरे भगिन्यौ सम्बभूवतुः॥ ३०इधर जब काशिराजकी दोनों पुत्रियोंने अपने पतिको मृत देखा तब वे दोनों बहनें पातिव्रत्य धर्मके पालनके लिये तत्पर हुईं॥ ३०॥
ते ऊचतुः सतीं श्वश्रूं रुदतीं भृशदुःखिताम्।<br>पतिना सहगामिन्यौ भविष्यावो हुताशने॥ ३१<br><br>पुत्रेण सह ते श्वश्रु स्वर्गे गत्वाथ नन्दने।<br>सुखेन विहरिष्यावः पतिना सह संयुते॥ ३२वे दारुण दुःखके कारण रोती हुई अपनी साध्वी साससे कहने लगीं—हे श्वश्रु! हम दोनों चिताग्निमें अपने पतिके साथ ही जायँगी। आपके पुत्रके साथ स्वर्गमें जाकर हम दोनों अपने पतिसे युक्त होकर नन्दनवनमें सुखपूर्वक विहार करेंगी॥ ३१-३२॥
निवारिते तदा मात्रा वध्वौ तस्मान्महोद्यमात्।<br>स्नेहभावं समाश्रित्य भीष्मस्य वचनात्तदा॥ ३३तब स्नेहभावका आश्रय लेकर मेरी माताने भीष्मके परामर्शसे उन दोनों वधुओंको महान् चेष्टा करनेसे रोक दिया॥ ३३॥
गाङ्गेयेन च मात्रा मे सम्मन्त्र्य च परस्परम्।<br>कृत्वौर्ध्वदैहिकं सर्वं संस्मृतोऽहं गजाव्हये॥ ३४विचित्रवीर्यकी सभी और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करके गङ्गातनय भीष्म तथा मेरी माताने आपसमें मन्त्रणा करके मुझे हस्तिनापुर आनेके लिये मेरा स्मरण किया॥ ३४॥