भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| अ० २४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८४५ | | :--- | :--- | | मात: पापाधिकं कर्म परदाराभिमर्शनम्।<br>ज्ञात्वा धर्मपथं सम्यक्करोमि कथमादरात्॥ ४६<br>तथा यवीयसो भ्रातुर्वधूः कन्या प्रकीर्तिता।<br>व्यभिचारं कथं कुर्यामधीत्य निगमानहम्॥ ४७<br>अन्यायेन न कर्तव्यं सर्वथा कुलरक्षणम्।<br>न तरन्ति हि संसारात्पितरः पापकारिणः॥ ४८<br>लोकानामुपदेष्टा यः पुराणानां प्रवर्तकः।<br>स कथं कुत्सितं कर्म ज्ञात्वा कुर्यान्महाद्भुतम्॥ ४९ | परनारीसंगम महान् पापकर्म है। धर्ममार्गका सम्यक् ज्ञान रखते हुए भी मैं आसक्तिपूर्वक ऐसा कर्म कैसे कर सकता हूँ? और फिर छोटे भाईकी पत्नी कन्याके समान कही गयी है। ऐसी स्थितिमें सभी वेदोंका अध्ययन करके भी मैं ऐसा व्यभिचार कैसे करूँ? अन्यायसे कुलकी रक्षा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि पाप करनेवालेके पितृगण संसार-सागरसे कभी नहीं पार हो सकते। जो समग्र पुराणोंका प्रवर्तक तथा लोगोंको उपदेश करनेवाला हो, वह जान-बूझकर ऐसा अद्भुत तथा निन्दनीय कार्य कैसे कर सकता है?॥ ४६-४९॥ | | पुनरुक्तो ह्यहं मात्रा रुदत्या भृशमन्तिके।<br>पुत्रशोकातिसन्तप्ता या वंशरक्षणकाम्यया॥ ५० | तत्पश्चात् वंश-रक्षाकी कामनासे युक्त मेरी माता, जो पुत्रशोकसे अत्यधिक सन्तप्त थीं, विलाप करती हुई समीपमें आकर मुझसे पुनः कहने लगीं— ॥ ५०॥ | | पाराशर्य न ते दोषो वचनान्मम पुत्रक।<br>गुरूणां वचनं तथ्यं सदोषमपि मानवैः॥ ५१<br>कर्तव्यमविचार्‍यैव शिष्टाचारप्रमाणतः।<br>वचनं कुरु मे पुत्र न ते दोषोऽस्ति मानद॥ ५२<br>पुत्रस्य जननं कृत्वा सुखिनीं कुरु मातरम्।<br>विशेषेण तु सन्तप्तां मग्नां शोकार्णवे सुत॥ ५३ | हे पराशरनन्दन! हे पुत्र! मेरे कहनेपर ऐसा करनेसे तुम दोषभागी नहीं होओगे। शिष्टजनोंका आचार ही प्रमाण है—ऐसा मानकर मनुष्योंको गुरुजनोंके दोषपूर्ण वचनोंको भी उचित समझकर बिना कुछ सोच-विचार किये कर डालना चाहिये। हे पुत्र! मेरी बात मान लो! हे मानद! इससे तुम्हें दोष नहीं लगेगा। हे सुत! पुत्र उत्पन्न करके अत्यधिक सन्तप्त तथा शोकसागरमें निमग्न अपनी माताको सुखी करो॥ ५१-५३॥ | | इति तां ब्रुवतीं श्रुत्वा तदा सुरनदीसुतः।<br>मामुवाच विशेषज्ञः सूक्ष्मधर्मस्य निर्णये॥ ५४<br>द्वैपायन विचारोऽत्र न कर्तव्यस्त्वयानघ।<br>मातुर्वचनमादाय विहरस्व यथासुखम्॥ ५५ | माताकी यह बात सुनकर सूक्ष्मधर्मके निर्णयमें विशेष ज्ञान रखनेवाले गंगातनय भीष्मने मुझसे कहा— हे कृष्ण-द्वैपायन! तुम्हें इस विषयमें विचार नहीं करना चाहिये। हे पुण्यात्मन्! माताका वचन मानकर तुम सुखपूर्वक विहार करो॥ ५४-५५॥ | | व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा मातुश्च प्रार्थनं तथा।<br>निःशङ्कोऽहं तदा जातः कार्ये तस्मिञ्जुगुप्सिते॥ ५६ | व्यासजी बोले—[हे नारद!] भीष्मका यह वचन सुनकर तथा माताकी प्रार्थनापर मैं निःशंक भावसे उस निन्द्य कर्ममें प्रवृत्त हो गया॥ ५६॥ | | अम्बिकायां प्रवृत्तोऽहमृतुमत्यां मुदा निशि।<br>मयि विमनसायां तु तापसे कुत्सिते भृशम्॥ ५७<br>शप्ता मया सा सुश्रोणी प्रसङ्गे प्रथमे तदा।<br>अन्धस्ते भविता पुत्रो यतो नेत्रे निमीलिते॥ ५८ | रात्रिमें मैं प्रसन्नतापूर्वक ऋतुमती अम्बिकाके साथ प्रवृत्त हुआ, किंतु मुझ कुरूप तपस्वीके प्रति उसके अनुरागहीन होनेके कारण मैंने उस सुश्रोणीको शाप दे दिया कि प्रथम संसर्गके समय ही तुमने अपनी दोनों आँखें बन्द कर ली थीं, अतः तुम्हारा पुत्र अन्धा होगा॥ ५७-५८॥ |