देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 855, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें८४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
| द्वितीयेऽह्नि मुनिश्रेष्ठ पृष्टो मात्रा रहः पुनः।<br>भविष्यति सुतः पुत्र काशिराजसुतोदरे ॥ ५९<br><br>मयोक्ता जननी तत्र व्रीडानम्रमुखेन ह।<br>विनेत्रो भविता पुत्रो मातः शापान्ममैव हि ॥ ६०<br><br>तया निर्भर्त्सितस्तत्र कठोरवचसा मुने।<br>कथं पुत्र त्वया शप्ता पुत्रस्तेऽन्धो भविष्यति ॥ ६१ | हे मुनिवर! दूसरे दिन माताने एकान्तमें मुझसे फिर पूछा—हे पुत्र! क्या काशिराजकी पुत्री अम्बिकाके गर्भसे पुत्र उत्पन्न होगा? तब लज्जाके कारण मुख नीचे किये हुए मैंने मातासे कहा—हे माता! मेरे शापके प्रभावसे नेत्रहीन पुत्र उत्पन्न होगा॥ ५९-६०॥<br><br>हे मुने! इसपर माताने कठोर वाणीमें मेरी भर्त्सना की—'हे पुत्र! तुमने शाप क्यों दिया कि तुम्हारा पुत्र अन्धा होगा'॥ ६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां षष्ठस्कन्धे अम्बिकायां नियोगोत्पुत्रोत्पादनाय गर्भधारणवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः
पाण्डु और विदुरके जन्मकी कथा, पाण्डवोंका जन्म, पाण्डुकी मृत्यु, द्रौपदीस्वयंवर, राजसूययज्ञ, कपटद्यूत तथा वनवास और व्यासजीके मोहका वर्णन
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| वासवी चकिता जाता श्रुत्वा मे वाक्यमीदृशम्।<br>दाशेयी मामुवाचेदं पुत्रार्थे भृशमातुरा ॥ १<br><br>अम्बालिका वधूर्धन्या काशिराजसुता सुत।<br>भार्या विचित्रवीर्यस्य विधवा शोकसंयुता ॥ २<br><br>सर्वलक्षणसम्पन्ना रूपयौवनशालिनी।<br>तस्यां जनय सङ्गं त्वं कृत्वा पुत्रं सुसम्मतम् ॥ ३ | मेरी वह बात सुनकर वासवराजकुमारी सत्यवती चकित हो गयीं और पुत्रके लिये अत्यन्त व्यग्र होकर मुझसे कहने लगीं—हे पुत्र! काशिराजकी श्रेष्ठ पुत्री वधू अम्बालिका विचित्रवीर्यकी भार्या है, जो विधवा तथा पतिशोकसे सन्तप्त है। वह सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और रूप तथा यौवनसे युक्त है। तुम उसके साथ संसर्ग करके प्रिय पुत्र उत्पन्न करो॥ १—३॥ |
| नान्धो राजाधिकारी स्यात्तस्मात्पुत्रं मनोहरम्।<br>उत्पादय राजपुत्र्यां वचनान्मम मानद ॥ ४ | नेत्रहीनको राजा बननेका अधिकार नहीं हो सकता। इसलिये हे मानद! मेरी बात मानकर तुम उस राजपुत्रीसे एक मनोहर पुत्र उत्पन्न करो॥ ४॥ |
| इत्युक्तोऽहं तदा मात्रा स्थितस्तत्र गजाह्वये।<br>यावदृतुमती जाता काशिराजसुता मुने ॥ ५<br><br>एकान्ते शयनागारे प्राप्ता सा मम सन्निधौ।<br>लज्जमाना सुकेशान्ता स्वश्वश्रूवचनात्तदा ॥ ६ | हे मुने! तब मैं माताजीके ऐसा कहनेपर वहीं हस्तिनापुरमें ठहर गया और जब सुन्दर केशपाशवाली काशिराजकी पुत्री अम्बालिका ऋतुमती हुई तो अपनी सासके कहनेपर वह एकान्त शयनकक्षमें लज्जित होती मेरे पास आयी॥ ५-६॥ |
| दृष्ट्वा मां जटिलं दान्तं तापसं रसवर्जितम्।<br>सा स्वेदवदना जाता पाण्डुरा विमना भृशम् ॥ ७ | वहाँ मुझ जटाधारी, इन्द्रियनिग्रही तथा शृङ्गाररससे अनभिज्ञ तपस्वीको देखकर उसके मुखपर पसीना आ गया, शरीर पीला पड़ गया और उसका मन बहुत खिन्न हो गया॥ ७॥ |