देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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८५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५ ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कर्णः कुन्त्या परित्यक्तो जातमात्रः शिशुर्यदा ॥ ४४<br><br>सूतेन पालितो नद्यां प्राप्तश्चाधिरथेन ह।<br>दुर्योधनप्रियश्चाभूत्कर्णः शूरतमस्तथा ॥ ४५<br><br>परस्परं विरोधोऽभूद्भीमदुर्योधनादिषु।<br>धृतराष्ट्रस्तु सञ्चिन्त्य क्लेशं पुत्रेषु तेषु च ॥ ४६<br><br>निवासं कल्पयामास पाण्डवानां महात्मनाम्।<br>विरोधशमनायैव नगरे वारणावते ॥ ४७ | कुन्तीने उत्पन्न होते ही जब बालक कर्णका परित्याग कर दिया तब अधिरथ नामक सूतने नदीमें बहते हुए उस कर्णको पाया और उसका पालन-पोषण किया। सर्वश्रेष्ठ वीर होनेके कारण कर्ण दुर्योधनका प्रिय हो गया। बादमें भीम तथा दुर्योधन आदिमें परस्पर विरोध भाव उत्पन्न हो गया॥ ४४-४५ १/२ ॥<br><br>तब धृतराष्ट्रने अपने पुत्रों तथा उन पाण्डवोंके परस्पर संकटका विचार करके तथा उनके विरोध-भावको समाप्त करनेके उद्देश्यसे वारणावत नगरमें महात्मा पाण्डवोंको बसानेका निश्चय किया॥ ४६-४७॥ |
| दुर्योधनेन तत्रैव द्रोहाज्जतुगृहाणि वै।<br>कारितानि च दिव्यानि प्रेष्य मित्रं पुरोचनम् ॥ ४८ | द्रोहके कारण दुर्योधनने अपने मित्र पुरोचनको वहाँ भेजकर दिव्य लाक्षागृहका निर्माण करा दिया॥ ४८॥ |
| श्रुत्वा जतुगृहे दग्धान्पाण्डवान्पृथया युतान्।<br>पौत्रभावान्मुनिश्रेष्ठ मग्नोऽहं व्यसनार्णवे ॥ ४९<br><br>शोकातुरो भृशं शून्ये वने पश्यन्नहर्निशम्।<br>दृष्टा मयैकचक्रायां पाण्डवा दुःखकर्शिताः ॥ ५०<br><br>ततस्तुष्टमनाश्चाहं जातः पार्थान्विलोक्य च।<br>प्रेरितास्ते मया तूर्णं द्रुपदस्य पुरं प्रति ॥ ५१ | हे मुनिश्रेष्ठ! तत्पश्चात् कुन्तीसहित उन पाण्डवोंके उस लाक्षागृहमें दग्ध हो जानेका समाचार सुनकर उनके प्रति पौत्र-भाव होनेके कारण मैं दुःखके सागरमें डूब गया और उस निर्जन वनमें उन्हें दिन-रात खोजता हुआ अति शोकसन्तप्त रहता था। तभी मैंने दुःखके कारण अत्यन्त दुर्बल उन पाण्डवोंको एकचक्रा नगरीमें देखा। उन पाण्डवोंको देखकर मेरे मनमें अत्यधिक प्रसन्नता हुई और मैंने उन्हें तुरंत महाराज द्रुपदके नगरमें भेज दिया॥ ४९-५१॥ |
| ते गतास्तत्र दुःखार्ता विप्रवेषधराः कृशाः।<br>मृगचर्मपरीधानाः सभायां संस्थितास्तदा ॥ ५२<br><br>कृत्वा पराक्रमं जिष्णुः स जित्वा द्रुपदात्मजाम्।<br>चकुर्विवाहं मानिन्या पञ्चैव मातृवाक्यतः ॥ ५३ | कृश शरीरवाले वे दुःखित पाण्डव मृगचर्म पहनकर ब्राह्मणका वेश धारण करके वहाँ गये और द्रुपदकी स्वयंवर-सभामें जा पहुँचे। वहाँपर अर्जुन अपने पराक्रमका प्रदर्शन करके द्रुपद-पुत्री द्रौपदीको जीतकर ले आये। पुनः माता कुन्तीके आदेशसे पाँचों भाइयोंने मानिनी द्रौपदीके साथ विवाह किया॥ ५२-५३॥ |
| दृष्ट्वा विवाहं तेषां तु मुदितोऽहं भृशं तदा।<br>ततो नागाह्वये प्राप्ताः पाञ्चालीसहिता मुने ॥ ५४ | उनका विवाह देखकर मैं परम प्रसन्न हुआ। हे मुने! तत्पश्चात् वे सभी द्रौपदीसहित हस्तिनापुर चले आये॥ ५४॥ |
| निवासं खाण्डवप्रस्थं धृतराष्ट्रेण कल्पितम्।<br>पाण्डवानां द्विजश्रेष्ठ वसुदेवसुतेन वै ॥ ५५<br><br>तर्पितः पावकस्तत्र विष्णुना सह जिष्णुना।<br>राजसूयः कृतो यज्ञस्तदाहं मुदितोऽभवम् ॥ ५६ | धृतराष्ट्रने उन पाण्डवोंके रहनेके लिये खाण्डवप्रस्थ देनेका निश्चय किया। हे द्विजश्रेष्ठ नारद! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके साथ अग्निदेवको सन्तुष्ट किया। पाण्डवोंने जब राजसूय यज्ञ किया तब मैं बहुत प्रसन्न हुआ॥ ५५-५६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 28 B