देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 860, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० २६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५१ | | :--- | :--- |
| दृष्ट्वाथ विभवं तेषां तथा मयकृतां सभाम्।<br>दुर्योधनोऽतिसन्तप्तो दुरोदरमथाकरोत्॥ ५७<br><br>दुर्धूतवेदी शकुनिरनक्षज्ञश्च धर्मजः।<br>हृतं राज्यं धनं सर्वं याज्ञसेनी च क्लेशिता॥ ५८<br><br>वने द्वादश वर्षाणि पाण्डवास्ते विवासिताः।<br>पाञ्चालीसहितास्तेन दुःखं मे जनितं भृशम्॥ ५९ | उन पाण्डवोंका वैभव तथा मय दानवद्वारा निर्मित की गयी सभाको देखकर दुर्योधन अत्यन्त दुःखित हुआ और उसने द्यूतक्रीडाकी योजना बनायी। शकुनि कपटपूर्ण द्यूतमें अति निपुण था तथा धर्मराज युधिष्ठिर पासेके खेलसे अनभिज्ञ थे। अतएव दुर्योधनने [द्यूतक्रीडाके माध्यमसे] पाण्डवोंका सम्पूर्ण राज्य तथा धन छीन लिया तथा द्रौपदीको भी अपमानित किया। दुर्योधनने द्रौपदीसहित पाँचों पाण्डवोंको बारह वर्षकी अवधितक वनमें निवास करनेके लिये निर्वासित कर दिया; इससे मुझे बहुत दुःख हुआ॥ ५७—५९॥ | | एवं नारद संसारे सुखदुःखात्मके भृशम्।<br>निमग्नोऽहं भ्रमेणैव जानन् धर्मं सनातनम्॥ ६० | हे नारद! इस प्रकार सनातन धर्मको जानते हुए भी मैं सुख तथा दुःखसे पूर्ण इस संसारमें भ्रमसे ही बन्धनमें पड़ा हूँ। | | कोऽहं कस्य सुतास्तेऽमी का माता किं सुखं पुनः।<br>येन मे हृदयं मोहाद् भ्रमतीति दिवानिशम्॥ ६१ | मैं कौन हूँ, ये किसके पुत्र हैं, यह किसकी माता है और सुख क्या है? जिससे मेरा मन मोहित होकर दिन-रात इन्हींमें भ्रमण करता रहता है॥ ६०-६१॥ | | किं करोमि क्व गच्छामि सन्तोषो नाधिगच्छति।<br>दोलारूढं मनो मेऽत्र चञ्चलं न स्थिरं भवेत्॥ ६२ | मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? किसी प्रकारसे भी मुझे सन्तोष नहीं मिलता। दोलायमान मेरा चंचल मन स्थिर नहीं हो पा रहा है॥ ६२॥ | | सर्वज्ञोऽसि मुनिश्रेष्ठ सन्देहं मे निवर्तय।<br>तथा कुरु यथाऽहं स्यां सुखितो विगतज्वरः॥ ६३ | हे मुनिश्रेष्ठ! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव मेरे सन्देहका निवारण कीजिये। आप कोई ऐसा उपाय कीजिये, जिससे मैं सन्तापरहित होकर सुखी हो जाऊँ॥ ६३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे व्यासस्वकीयमोहवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः
देवर्षि नारद और पर्वतमुनिका एक-दूसरेको शाप देना, राजकुमारी दमयन्तीका नारदसे विवाह करनेका निश्चय
| व्यास उवाच<br>इति मे वचनं श्रुत्वा नारदः परमार्थवित्।<br>मामाह च स्मितं कृत्वा पृच्छन्तं मोहकारणम्॥ १ | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] तब परमार्थवेत्ता नारदजी मेरी बात सुननेके पश्चात् मोहका कारण पूछनेवाले मुझसे मुसकराकर कहने लगे॥ १॥ |
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| नारद उवाच<br>पाराशर्य पुराणज्ञ किं पृच्छसि सुनिश्चितम्।<br>संसारेऽस्मिन् विना मोहं कोऽपि नास्ति शरीरवान्॥ २ | नारदजी बोले— हे पुराणवेत्ता व्यासजी! आप क्या पूछ रहे हैं? यह पूर्णरूपसे निश्चित है कि इस संसारमें रहनेवाला कोई भी प्राणी मोहसे परे हो ही नहीं सकता॥ २॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—28 C